यों तो जिला अस्पताल में रोज ही मरीजों की भीड़ होती है पर आज तो पूरे कम्पाउंड में पैर रखने को जगह नहीं थी। दुर्घटनाग्रस्त मरीज ड्युटी पर उपलब्ध डाक्टर भगवान से गिड़गिडाते, साथीगण स्ट्रेचर और वार्डव्वाय को तलाशते, अन्य, स्टोर से दवा पाने के लिए अपनी बारी का इंतजार करते बेबसी पर चुप थे, अचानक डाक्टर के कक्ष से आवाज आई,
‘‘ राजू और दीनू! तुम दोनों उस मरीज को तीसरी मंजिल पर मेडीसन वार्ड में पहुंचाने के बाद इन दोनों मरीजों को पहली मंजिल के आपरेशन थिएटर में जल्दी ले चलो ’’
‘‘ सर! आप हमेशा हम लोगों को ही मरीजों को स्ट्रेचर पर लाने और ले जाने के लिए कहते हैं, एक काम पूरा नहीं हो पाता कि दूसरा आर्डर मिल जाता है। कालीचरण तो आपके पास ही बैठा रहता है, उसे क्यों नहीं भेजते ?’’
‘‘ उसको भी भेजते हैं’’
‘‘ लेकिन हम लोगों ने तो कभी उसे स्ट्रेचर ले जाते नहीं देखा ।’’
‘‘ तो क्या मुझे हर बार तुम लोगों को यह बताना होगा कि देखो कालीचरण स्ट्रेचर ले जा रहा है? ’’
‘‘ नहीं सर! हम लोगों को यह अच्छा नहीं लगता कि पूरे समय हमें ही हर जगह दौड़ना पडे़ और वह कुछ न करे, जबकि वह भी हमारी तरह ही काम करने के लिए नियुक्त किया गया है।’’
‘‘ अरे भाई! जरा समझा करो, जो लोग अच्छा काम करते हैं, उन्हीं को काम के लिए कहा जाएगा कि नहीं ?’’
‘‘ सर! ये कहाॅं का न्याय है कि जो अच्छा काम करे उसे काम से लाद दिया जाय और जो खराब काम करे या कोई काम ही न करे उसे मुफ्त का वेतन दिया जाय? ’’
‘‘ तुम क्या जानते नहीं हो कि वह मंत्री जी का आदमी है? ’’ डाक्टर ने फुसफुसाते हुए कहा।
‘‘ तो क्या हुआ, वह है तो हमारी तरह ही वार्ड व्वाय .. ?’’ कहते हुए वे भी कालीचरण के पास जा बैठे।
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