Friday, September 25, 2020

172 बड़ा आदमी

 ‘‘ पापा ! मेरी क्लास में पढ़ने वाला राजू कह रहा था कि उसके पास कई कारें, मकान, जमीन और बहुत धन दौलत है, उसके पापा बहुत बड़े आदमी हैं। ये बड़ा आदमी क्या होता है? ’’

‘‘ उसके पापा धनी कहे जा सकते हैं पर बड़े आदमी नहीं।’’

‘‘ क्यों? क्या उनकी लम्बाई कम है?’’

‘‘ नहीं, आदमी धन दौलत या लम्बाई के अधिक होने से बड़ा नहीं होता।’’

‘‘तो फिर कैसा होता है ?’’

‘‘ वह स्वयं तो बड़ा होता ही है, अपने सम्पर्क में आने वालों को भी बड़ा बना देता है।’’


171 आरक्षण

 ‘‘ अरे! इस स्थान पर तुमने ये कौन से पौधे लगा दिए?’’

‘‘ चन्दन के हैं साहब ! मेरे बिचार से उनके लिए यही सबसे अच्छा स्थान रहेगा’’

‘‘ अपने बिचार को अपने पास ही रखो, यहाॅं ‘कैक्टस’ लगाओ, समझे’’

‘‘ ये कैक्टस कौन सा है साहब?’’

‘‘ वहाॅं पर देखो, चमकीले बाक्स में रखे हैं’’

‘‘ ये तो नागफनी हैं साहब, इनके काॅंटे बड़े खतरनाक होते हैं!  इन्हें लगाना है...?’’

‘‘ हाॅं इनके लिए यही स्थान आरक्षित है।’’

‘‘ क्या कहते हो साहब! इतनी अच्छी जगह इन काॅंटों के लिए? मेरी बात मान लीजिए इन्हें कहीं दूसरी जगह लगाए देते हैं, यहाॅं तो चन्दन ही ... ’’

‘‘ क्या समझ में नहीं आता? जो कहा है वैसा ही करो, यहाॅं कैक्टस ही लगाए जाएं।’’

‘‘ तो चन्दन वहाॅं सामने की ओर लगा दें साहब!’’

‘‘ नहीं वह जगह तो मंत्री जी ने  ‘सुबबूल’ के लिए आरक्षित कर दी  है । ’’

‘‘ ओह!! तो चन्दन के लिए कोई जगह नहीं है .. ..?’’

‘‘ हाॅं है, तुम्हारे खेत की मेंड़ पर ... ’’


170 मेरे अपने !

‘‘ आपने मुझे पाला, पढ़ा लिखा कर योग्य बनाया, तो यह तो आपका कर्तव्य था। अब आप हमसे यह अपेक्षा क्यों करते हैं कि हम इस कारण आपके आदेशों के गुलाम बने रहेंगे?’’ रवि  अपने चाचा से कहते हुए उठ खड़ा हुआ।

‘‘ यह बात नहीं है बेटा! तुम्हारी भलाई के लिए ही हम अपने अनुभव की बात करते हैं, तुम्हारे पिता होते तो क्या उनसे भी यही कहते?’’

‘‘ क्यों नहीं ? मेरी अपनी सोच है, अपनी मान्यताएं हैं, उनमें कोई बाधा डाले यह मैं नहीं चाहता।’’  कहते हुए रवि बाहर चला गया।

पास में बैठे रवि के चाचा के मित्र बोले,

‘‘ मलय! तेरा पुत्र और पुत्री भी इसी प्रकार अपने अड़ियलपन से विदेश जाकर वहीं बस गए। अब ये भतीजा भी बगावत पर उतर आया है, इसने तो मेरा भी लिहाज  नहीं किया! धिक्कार है ऐसी संतान पर! ’’

‘‘ शायद, अपनों का सुख इसे ही कहते हैं! ’’ मलय ने क्षोभ में धीरे से कहा ।

‘‘ अरे ! जिससे अन्य लोग शेर की तरह डरते हों उसे अपने ही घर में क्या हो जाता है ?’’

‘‘ अब क्या.. बताएं नरेश !’’

‘‘क्या मतलबं?’’

‘‘ मेरी स्थिति भी अपने देश की तरह हो गई है, वह ‘चीन’ और ‘पाकिस्तान’ कीे बमबारी से एक साथ जूझ सकता है पर अपने ही घर के पत्थरबाजों के सामने पंगु हो जाता है, मूक हो जाता है।’’


169 स्वयंवर

 अपनी आत्मनिर्भर, सुन्दर, योग्य, और सुशील पुत्री के लिए उसके स्तर का वर खोजने में पिता ने अपनी पूरी ताकत लगा दी पर कहीं भी बात नहीं बनी । अवसादग्रस्त होते पति की दशा जब पत्नी से नहीं देखी गई तो एक दिन साहस बटोरकर वह पुत्री से बोली,

‘‘ क्या बात है बेटी, कल जिसे देखा वह लड़का तो पद में तुम से बड़ी नौकरी में है, सुन्दर भी है, फिर भी तुम्हें पसंद नहीं आया? इसके पहले, उद्योगपति के इंजीनियर बेटे और विद्वान प्रोफेसर के डीएसपी बेटे को भी तुमने पसंद नहीं किया?’’

‘‘हाॅं! वे सचमुच बड़े पदाधिकारी, सम्पन्न / विद्वान हैं ।’’

‘‘ तो, संकोच किस बात का है जो अब तक मौन ...?’’

‘‘ माॅं!  मैं किसी ‘इन्सान’ को ही वरण करूंगी । ’’ 


168 कुशासन

अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस पर बुलाए गए विदेश की ‘‘योगा ट्रेनिंग इन्सटीटृयूट’’ के डिमांस्ट्रेटर्स द्वारा किए गए प्रदर्शन के बाद संस्था के संचालक ने उद्घोषणा की,

 ‘‘ हमारी संस्था ने योगा करने के लिए बहुउपयोगी आसन का अनुसंधान कर उसका निर्माण भी किया है । इस आसन पर योगा करने से अपेक्षतया शीघ्र ही लाभ मिलने लगता है, शरीर स्वस्थ हो जाता है, ध्यान स्थिर हो जाता है और आत्मानुभूतियाॅं होने लगती हैं, अतः जो कोई भी इसे लेना चाहता है वह ले सकता है मूल्य केवल 2500 रुपये।’’ 

 अनेक व्ही आइ पी दर्शकों सहित नेताजी भी एक आसन क्रय कर लाये और अपने घर के बगीचे में अभ्यास करने के लिए उन्होंने वह आसन बिछाने के लिए माली को आदेश दिया । माली ने पूछा,

‘‘ क्या यह आसन आप विदेश से मंगाए हैं साहब?’’

‘‘हाॅं, इसकी कीमत ढाई हजार रुपये है।’’ 

‘‘ अरे साहब! हमसे कहे होते, हमारे गांव के खेत की मेढ़ पर यह घास बहुत होता है, उखाड़ उखाड़ कर फेकना पड़ता है। ज्यादा से ज्यादा एक सौ रुपया भी खर्च नहीं होते, हम तो बनाना भी जानते हैं, यह कुशासन कहलाती है।’’


Thursday, September 24, 2020

167 न्याय, यमराज का

 ‘‘ अच्छा! तो तुमने अपने पिछले जन्मों के लेखेजोखे की फिल्म देख ली?’’ यमराज ने अनेक वर्ष पहले मृत हुए व्यक्ति की भटकती जीवात्मा को पुनः देह पाने का क्रम आने पर पूछा।

‘‘ देख ली प्रभु! ’’

‘‘ तो स्वयं निर्णय करो कि उन जन्मों के संचित संस्कारों को भोगने के लिए तुम्हें किस जीवधारी का शरीर दिया जाना उचित होगा’’  यमराज बोले।

‘‘ उनके अनुसार तो कुत्ते का शरीर ही मिल सकता है।’’

‘‘ तो ठीक है कुत्तों के लिए अभी धरती पर बहुत स्थान खाली है, जा सकते हो’’ यमराज ने आदेश दिया।

‘‘परन्तु प्रभो! मुझे कम से कम एक बार और मनुष्य का शरीर दे दो, वचन देता हॅूं कि मैं परिमार्जन कर अपना लक्ष्य पाने की चेष्टा करूंगा’’  जीवात्मा ने गिड़गिड़ाकर कहा।

‘‘अच्छा ! तो थोड़ा सा इस फिल्म को भी देखो’’ यमराज ने घूरते हुए इशारा किया।

‘‘ अरे! यह लोग भी मेरी तरह मनुष्य का शरीर पाने के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं।’’

‘‘हाॅं, अब मनुष्य देह पाने के बाद इनको देखो।’’

‘‘ अरे! यह लोग तो बड़े ही सम्मानित स्तर पर दिखाई देते हैं, लाखों लोग इन्हें घेरे रहते हैं, उन्हें देवता मानकर पूजते हैं और अनुसरण भी करते हैं, वाह!’’

‘‘ और अब यह दृश्य भी देखो ।’’

‘‘ ओह! भीतर कुछ और, बाहर कुछ और। कितने निकृष्ट हैं ये, कहते कुछ हैं करते कुछ हैं। ये तो जिसका खाते हैं उसी के पेट पर लात मारकर चल देते हैं। इससे अच्छे तो कुत्ते हैं कम से कम टुकड़े का मान तो रखते हैं !’’

‘‘ तो समझे, मैंने यदि तुम्हारे गिड़गिड़ाने पर दया दिखाई तो यही तुम्हारा हाल होगा।’’

‘‘ नहीं प्रभो! मैं वचन देता हॅूं अपनी मानव देह का आत्मोत्थान में ही सदुपयोग करूंगा’’

‘‘ नहीं ! मैं अब मनुष्य जाति को और अधिक कलंकित नहीं होने दे सकता’’ यमराज ने दृढ़ता पूर्वक कहा।


166 भंवरजाल

‘‘ मैंने हमेशा आप लोगों की ही इच्छाओं के अनुकूल काम किया, आज जब मैं अपनी पसन्द की लड़की से विवाह करने की अनुमति चाहता हॅूं तो आपको क्यों आपत्ति है?’’ 

‘‘ इसलिए कि वह लड़की अपनी जाति की नहीं है, खानदान का भी तो ध्यान रखना होता है कि नही?’’

‘‘ वह पांच साल तक मेरे साथ कालेज में पढ़ी है, हम एक दूसरे की रुचियों को अच्छी तरह समझते हैं और स्वभाव से पसंद करते हैं, तो क्या यह व्यर्थ है?’’

‘‘ अनेक लोगों की रुचियाॅं समान होती हैं, अनेक वर्षों से जान पहचान भी होती है तो क्या सभी से विवाह किया जा सकता है? विवाह क्या आजकल की चिथड़े जैसे कपड़ों वाली फैशन है ? ’’ 

‘‘ परन्तु यह कहाॅं तक उचित है कि आपने जिस परिवार की लड़की को पसंद किया है उसे एक घंटे में ही पसंद कर मैं अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय कर लॅूं?’’ 

‘‘ क्यों नहीं? हम तो उनके परिवार और खानदान  को जन्म से जानते हैं, हमारे पुराने संबंध उस कुल से जुड़े हैं ।’’ पिता मूछों पर ताव देते बोले।

‘‘ आप बार बार कुल, खानदान के भंवरजाल में क्यों उलझा रहे हैं? सभी मनुष्य बंदरों के बंशज हैं यह प्रमाणित है ?..? ..  माॅं ! मैं इसे नहीं मानता।’’

‘‘ अच्छा बेटा! जब तू अपने विचारों पर इतना दृढ़ है तो मेरी एक बात मान ले, योग्य ज्योतिषी से कुंडली का मिलान कराके देख ले यदि उत्तम मिलान होता होगा तो हम सहमत हो जाएंगे ’’ माॅं ने आंसू पोंछते हुए कहा।

‘‘ फिर दूसरा चक्कर? हम ज्योतिष को नहीं मानते, यह सब मूर्ख बनाने के धंधे हैं।’’

‘‘ अरे मूर्ख! यह तो सोच, जो लोग तेरी तारीफ खानदानी और संस्कारी पुत्र के रूप में करते नहीं थकते और उदाहरण देकर समाज में कहते हैं कि पुत्र हो तो देवकीनन्दन के पुत्र जैसा, वे क्या कहेंगे?’’ पिता क्रोध में आकर बोले।

‘‘ दूसरे क्या कहेंगे इसकी हम क्यों चिन्ता करें?’’

‘‘ हमारी सभ्यता और संस्कृति ?’’ 

‘‘ ये भी समय समय पर बदलती रही हैं, आप सबने अपने जमाने की संस्कृति और फैशन को अपनाया तो हमें अपने जमाने की फैशन और संस्कृति को अपनानें पर आपत्ति क्यों ??’’


Wednesday, September 23, 2020

165 लेन देन

 ‘‘पापा! वह नदी के किनारे रेत में कौन है?’’

‘‘मगरमच्छ’’

‘’ वह क्या पानी में रहता है?’’

‘‘ नहीं, परन्तु पानी में बड़ी बड़ी मछलियों का शिकार करने जाता है, फिर बाहर आकर रेत पर आराम करता है।’’

‘‘ लेकिन उसे देखकर लगता है कि वह जीवित नहीं है, देखो वह मुंह फैलाए है और छोटे छोटे पक्षी उसमें घुसकर दांतों पर चोंच मारते हैं और कुछ दूर बैठे देख रहे हैं, पर वह किसी को कुछ भी नुकसान नहीं पहुंचाता ?’’

‘‘ वह जीवित है, वे पक्षी उसके दांतो में फंसे मांस के टुकड़े खाते रहते हैं, जो दूर बैठे हैं वे अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं?’’

‘‘ इस प्रकार तो वह पक्षियों का बहुत हितैषी हुआ, वह भोजन देकर उनकी सेवा करता है।’’

‘‘ यह सेवा नहीं लेन.देन कहलाता है, सेवा में तो केवल देना होता है बदले में लेने की कोई अपेक्षा नहीं होती।’’

‘‘ कैसे?’’

‘‘ मगरमच्छ इसलिए मुंह फैलाए रहता हैं क्योंकि वह अपने दांतों की सफाई कराना चाहता है और पक्षी दांतों के बीच फसे मांस के टुकड़े खाने के बदले यह काम कर देते हैं, यह लेनदेन हुआ कि नहीं।’’

‘‘ हमारे देश के नेता लोग कहते हैं कि वह देश की बहुत सेवा करते हैं?’’

‘‘ वह भी मगरमच्छ की तरह जनता के धन की बड़ी बड़ी योजनाओं के सागर में अपनी पसंद की बड़ी बड़ी मछलियों का शिकार करते हैं और दांतों की साफ सफाई कराने के लिए सरकारी तन्त्र के साथ अपने चमचों को लगाये रहते हैं, बेचारी जनता आस लगाए दूर से ही सब देखती रहती है।’’


164 टेक्नीक अपनी अपनी

‘‘ आइए आइए ! हम अभी आपको दिखाएंगे कि अधर में ही यह रस्सी किस प्रकार अपने आप लटक जाती है ! इसी पर फिर यह छोटी सी लड़की किस प्रकार बिना रुके चढ़ती जाती है ! आइए ! आइए ! ’’

बाजार में जादूगर अपना खेल दिखाते हुए चिल्ला रहा है। दर्शक उत्सुकता से उस क्षण को देखने के प्रयास में धक्का मुक्की कर अपने को आगे की कतार में लाने को संघर्ष कर रहे हैं और लो, वह मोटी रस्सी अचानक जादूगर के हाथ से सरकती हुई एकदम लम्बवत स्थिर दिखाई देने लगती है और पास खड़ी जादूगर की बच्ची उसे दोनों हाथों से पकड़कर ऊपर की ओर चढ़ती जाती है। जादूगर अचानक रस्सी को छोड़ देता है और वह बच्ची धड़ाम से नीचे आ गिरती है पर कोई चोट नहीं! दर्शक तालियों की झड़ी लगाकर वाह वाह करते नहीं थकते।

‘‘ तो दोस्तो! आपने यह कमाल देखा? यह लड़की उतनी ऊंचाई से गिरी परन्तु खरोंच भी नहीं आई, इसका कारण है मेरे द्वारा बनाई गई यह दवा जो अनेक प्रकार की चोटों के लिए ही नहीं, सर्दी, खांसी, निमोनिया, पीलिया, मलेरिया और हैजा जैसे रोगों पर भी इसी चमत्कार के साथ लाभ पहुंचाती है। एक शीशी की कीमत दस रुपये, पाॅंच शीशियों की कीमत चालीस रुपये, जिस किसी को भी लेना हो ले ले, थोड़ी सी ही बची हैं।’’

उस एरिया में ड्युटी कर रहा सिपाही कुछ ऊंचाई पर खड़ा दूर से इस भीड़ पर निगहें गड़ाये था, दवा खरीदने के लिए जब भीड़ में उथल पुथल देखी तो पास आकर बोला,

‘‘ क्यों रे ! सबको उल्लू बनाता है, मुझे तो कोई चमत्कार नहीं दिखा, तू केवल आंखे बंद किये खड़ा था और यह लड़की यहीं बैठी थी? सबको हिप्नोटाइज कर इस राख को बेचता है? चल थाने ।’’ 

‘‘ अरे साब! थाने की बात क्यों करता है, नोट खींचने की अपनी अपनी टेक्नीक है, वो हमारी और ये तुम्हारी, अरे! लो ये लो, और जरा दूर से ही खेल देखो। ’’ 


163 बहुत कठिन है डगर .. ..

 

 दादी माॅं को मृत्युशैया पर देख परिवार के सभी सदस्य उनके चारों ओर एकत्रित हो गए। और वे, उन सबसे यह पूछने में व्यस्त थी कि ‘‘आज क्या पकाया गया है? घर के सभी कमरों को ठीक ढंग से धोया गया है कि नहीं? सभी ने स्नान कर लिया या नहीं ?’’  

  सदस्यों ने निवेदन किया कि, ‘‘ माॅं काम की चिन्ता मत करो, सब होता जा रहा है, तुम तो हरि हरि बोलो ।’’

उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया और बोलीं, ‘‘ अरे ! गायों को चारा डाला है या नहीं ?’’ 

 धार्मिक मान्यता के अनुसार सभी सदस्य चाहते थे कि उनकी मुक्ति हो, इसलिए वे उन्हें बार बार हरि हरि बोलने के लिए समझा रहे थे, 

‘‘ माॅं ! घर के सभी कामकाज सही समय पर उचित ढंग से किये जा रहे हैं तुम्हें चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है, तुम तो केवल हरि हरि बोलो ।’’ 

दादी ने इसे फिर से अनसुना कर दिया और पूछने लगी, ‘‘ अरे ! कुत्ते को कुछ खिलाया या भूखा ही बैठा है ?’’ 

सदस्यों ने उनसे हरि हरि बोलने के लिए फिर से प्रार्थना की। इस बार वह झल्लाते हुए बोली, 

‘‘  सब लोग यहाॅं से बाहर जाओ ! क्या मैं मर रही हॅूं ? एक ही नाम बार बार कहने की रट लगाए हो ? ए छोटी बहु ! आॅंगन में जाकर देख कपड़े सूख गए होंगे, उठा ला।’’  

बाहर आकर उनके छोटे बेटे ने अपने बड़े भाई से पूछा, 

‘‘भैया! माॅं को यह क्या हो गया है ? हरि हरि बोलने में उन्हें कठिनाई क्यों हो रही है ?’’ वह बोले,

‘‘ परिवार पर हमेशा अपना वर्चस्व बनाते बनाते उनके विचार घर गृहस्थी तक ही सीमित हो गए हैं इसके आगे भी कुछ होता है, वे नहीं जानती।’’


162 कल्पतरु

 

एक सज्जन, ईश्वर से धनधान्य और भौतिक सुखसुविधाएं पाने के लिए अनेक वर्षों से लगातार प्रार्थनाएं कर रहे थे। अन्ततः भगवान ने भी उनकी सुन ही ली । वह उनके सामने प्रकट होकर बोले,

 ‘‘ भक्त! तुम जानते हो कि मैं सभी लोगों को उनके जन्म के समय ही आवश्यक सभी भौतिक सुविधाएं दे दिया करता हॅूं, परन्तु तुम लम्बे समय से बार बार प्रार्थना कर रहे हो इसलिए अतिरिक्त भौतिक सुख सुविधायें चाहते हो तो सशर्त ही उन्हें दे सकूंगा, बोलो क्या चाहते हो? ’’  

कौन सी शर्त ? प्रभो !’’

‘‘ यही कि तुम जो भी माॅंगोगे उसका दुगना तुम्हारे पड़ौसी को प्राप्त हो जाएगा ’’

सज्जन बड़े ही पशोपेश में पड़ गए, और लगातार सोचने लगे कि यदि धन, फेंसी कार, बंगला आदि मांगा तो क्या होगा, बहुत सोचने के बाद अन्त में बोले,

‘‘ प्रभो! मेरा एक हाथ और एक पैर टूट जाए ’’

यह सुनकर भगवान भी चकित रह गए और बोले,

‘‘ तुम इतने दिनों से धन, वैभव और सम्पन्नता पाने के लिए प्रार्थनाएं करते रहे हो , पर आज क्या हो गया?’’

‘‘ प्रभु ! वरदान देने का यह भी कोई तरीका हुआ? मैं नहीं चाहता कि मेरा पड़ौसी मुझसे अधिक प्रसन्न हो, इसलिए मैं अपने लिए कष्ट माॅंगता हूॅं ताकि शर्त के अनुसार पड़ौसी को मुझसे दुगना कष्ट हो ।’’


161 बोझ, मोह का ? ?

बाल्यावस्था  से ही,  जंगल से सूखी लकड़ियों का गट्ठा सिर पर लाद कर लाना और शहर में बेचना यही दिनचर्या थी बेनीबाई की। इस प्रकार जीविका चलाते चलाते बृद्धावस्था भी आ पहॅुंची। एक दिन अनेक प्रयास करने पर भी जब गट्ठा सिर पर रखते न बना तो हताश बेनीबाई बोली, 

‘‘ हे भगवान ! अब तो भेज दो मौत को? बहुत हो चुका, अरे! बहरे हो गए हो क्या ? कब सुनोगे ?’’

कहने की देर ही हुई थी कि यमराज सामने आकर बोले,

‘‘ चलो, बेनीबाई ! मैं आ गया ’’

‘‘ लेकिन कहाॅं?’’

‘‘ अरे! तुम्हीं ने तो भगवान से कहा कि मौत को भेज दो, मैं हॅंू यमराज, उनकी आज्ञा से मैं तुम्हें ले जाने के लिए आया हॅूं , चलो.. ’’

‘‘ ये तो बहुत अच्छा किया भैया, चलो, जरा अपना एक हाथ इस गट्ठे पर लगा कर मेरे सिर पर रखवा देा । ’’ 


Monday, September 21, 2020

160 यतो धर्मः ततो जयः

 

एक बार किसी राजा ने ऐसे स्थान पर बाजार बनवा दिया जहाॅं  कम लोग ही जाते थे इसलिए दूकानदारों ने कहा ‘‘ महाराज ! हमारा सामान वहाॅं कौन खरीदेगा, यदि सामान न बिका तो हम तो भूखे मर जाऐंगे?’’

राजा ने कहा ‘‘ कोई बात नहीं जिस दिन किसी का सामान न बिक पाए तो वह मैं खरीद लिया करूंगा’’

एक दिन किसी ने दुर्भाग्य की तस्वीर बनाकर बाजार में बेचना चाही, लेकिन रात हो गई किसी ने उसे न खरीदा। अन्त में वह राजा के पास पहुंचा और उनका वचन याद कराया, उन्होंने तत्काल वह तस्वीर खरीद ली।

राजमहल में दुर्भाग्य की तस्वीर के आते ही उसी रात में एक महिला के रोने की आवाज सुनकर राजा ने उसके पास जाकर पूछा ‘‘ तुम कौन हो? क्यों रो रही हो?’’

‘‘ महाराज मैं राजलक्ष्मी हॅूं , यहाॅं अब दुर्भाग्य आकर रहने लगा है इसलिए मैं यहाॅं से जा रही हॅूं’’

‘‘ अच्छा ! जैसी तुम्हारी इच्छा’’ राजा ने कहा।

जब लक्ष्मी चली गई तो एक एक करके सेनापति, सुख, शान्ति और वैभव भी चलते बने। अन्त में धर्मदेव भी जाने लगे तो राजा पूछा ‘‘आप क्यों जाते हो’’

धर्मदेव वोले ‘‘ जब इस राज्य में दुर्भाग्य के कारण सभी चले गए हैं तो मैं भी यहाॅं क्यों रुकूं ?’’

‘‘ लेकिन दुर्भाग्य को खरीद कर मैने तो अपने वचन को निभाया, अपने धर्म का पालन किया ’’ राजा बोला।

‘‘ हाॅं यह बात तो है, अच्छा मैं रुक जाता हॅूं’’ कहते हुए धर्म रुक गया।

धीरे धीरे जो चले गए थे सभी वापस आ गए और सबसे अन्त में लक्ष्मी भी शर्म से लम्बे घूंघट में मुंह छिपाए महल में आ गईं। राजा ने पूछा,

‘‘ अब दुर्भाग्य के साथ कैसे रहोगी?’’

‘‘ जहाॅं धर्म है वहाॅं दुर्भाग्य से क्या डरना ’’


159 वैराग्य


 बहुत ही घने जंगल में पहॅुंचकर मंत्री ने रथ रोक दिया और म्यान से तलवार निकालकर बोला,

 ‘‘ वत्स ! मरने के लिए तैयार हो जाओ, मुझे राजाज्ञा का पालन करना है ’’

बालक को आश्चर्य तो हुआ परन्तु सोचते हुए कि राजाराम को वनवास , राजाबलि का बंधन,  पान्डुपुत्रों का वनवास, कृष्ण के वंशजों की मृत्यु , यह सभी तो कालवश हुई है इसलिए बोला, 

‘‘ मंत्री ! यदि राजाज्ञा यही है तो आप उसका पालन कीजिए ’’

मंत्री ने बालक से पूछा,

‘‘ लेकिन वह राजा ही नहीं तुम्हारे चाचा भी हैं, अतः यदि मरने के पूर्व उनसे कुछ कहना चाहते हो तो बताओ मैं अवश्य ही उन्हें वैसा कह दूंगा’’

बालक ने अपने अंगूठे के खून से भोजपत्र पर लिखा, और मंत्री के हाथ में देते हुए अपनी गर्दन उनके सामने झुकाकर कहा 

‘‘ राजाज्ञा का पालन करो मंत्री !’’

मंत्री  ने पत्र पढ़कर विचार बदला। उसने बालक को ले जाकर अपने महल में छिपा दिया। बकरे की आॅंखो को सबूत के तौर पर राजा को दिखाते हुए मंत्री ने कहा 

‘‘ राजन ! आदेश का पालन हो चुका ’’

राजा ने पूछा ‘‘ क्यों मंत्री ! मरने से पहले उसने कुछ कहा या नहीं ?’’

मंत्री ने वह खून से लिखा पत्र दिखाया। पत्र में लिखा था ‘‘ सतयुग के अलंकार मान्धाता, दसमुख रावण का अन्त करनेवाले राम, और युधिष्ठिर जैसे सत्यवादी सम्राट भी धरती पर आए और चले गए, परन्तु यह धरती किसी के साथ नहीं गई। लगता है मुंज! कि यह तुम्हारे साथ अवश्य जाएगी। ‘‘

 पढ़ते ही राजा के होश उड़ गए, वे जोर से रोने लगे, और मंत्री से कहने लगे ‘‘ मुझे मेरा भोज चाहिए, मुझे मेरा भोज वापस चाहिए ।’’ 

मुंज के पर्याप्त विलाप कर चुकने के बाद मंत्री बोला , 

‘‘ राजन ! मैं जानता था कि भोज साधारण बालक नहीं है, वह मेरे घर पर सुरक्षित है’’ 

अगले ही क्षण मुंज बालक भोज का राज्याभिषेक करते हुए बोले ‘‘ भोज ! आज तुमने मुझे इस मुकुट के भार से ही नहीं अज्ञान के बोझ से भी मुक्त कर दिया’’  और वन की ओर प्रस्थान कर गए  ।


158 दुख

 

  ‘‘ बड़े उदास दिख रहे हो, क्या बात है? कुछ गुम गया है क्या ? ’’

 ‘‘ नहीं , गुमा कुछ नहीं है ’’

‘‘ तो क्या किसी को वह वस्तु दे दी है जिसे तुम नहीं देना चाहते थे ?’’

     ‘‘ नहीं , नहीं , ऐंसा कुछ नहीं है?’’

  ‘‘ तों फिर क्या हुआ है ?’’

     ‘‘ मैं दूसरों को जो कुछ पाते हुए देखता हूॅं वह मुझे क्यों नहीं मिलता ! ’’


157 शास्त्रार्थ


दर्शनशात्रियों द्वारा ‘ मोक्ष के साधन ’ विषय पर आयोजित एक सभा में देश विदेश के प्रकाण्ड विद्वानों ने तीन दिन तक अपने धुआँधार व्यख्यानों और वक्तृत्व कला से सबका मन मोह लिया। अन्त में निर्णायक मंडल के अध्यक्ष बोले, 

‘‘ विद्वानो ! यद्यपि आप सबने अपने कौशल का प्रदर्शन दक्षता के साथ किया है परन्तु दुख है कि किसी की भी व्याख्या सर्वश्रेष्ठ घोषित करने योग्य नहीं पाई गई है । ’’

जहाॅं रोज साधो ! साधो ! और वाह ! वाह ! की ध्वनियाॅं गूंजती थी वहाॅं अब श्मशान का सन्नाटा था। एक विद्वान से यह न सहा गया अतः अपने गंभीर स्वर से इसे भंग करते हुए बोल ही पड़े,

‘‘ इस पवित्र समारोह के समापन को घिनापन में क्यों बदल रहे हो ? यदि किसी एक विद्वान के पक्ष में निर्णय कर पाने में कठिनाई अनुभव करते हैं तो दो या तीन  विद्वानों को संयुक्त रूपसे श्रेष्ठ घोषित करने में क्या कष्ट है ?’’

अध्यक्ष बोले,

‘‘ विद्वानो ! आपका मनोद्वेग उचित है, परन्तु अपके द्वारा प्रदर्शित किया गया ज्ञान उस काठ की हाॅंडी के समान है जो बच्चों के खेल में तो अनेक प्रकार से प्रयुक्त हो सकती है परन्तु व्यवहार में लाये जाने पर स्वयं नष्ट होती है, पकाये गए भोजन को नष्ट करती है और चूल्हे को भी बुझा देती है ।’’

इतना सुनकर कुछ विद्वान आगबबूला होते हुए बोले,

'‘ तो आपके अनुसार क्या हमसब बज्रमूर्ख हैं ?’’ 

 ‘‘ नहीं । आपका ज्ञान और व्याख्यान कौशल, शास्त्रार्थ के लिए तो उचित है परन्तु प्रदत्त विषय  को व्यावहारिक रूपसे प्रकाशित नहीं कर पाता है।’’


156 लौकी


‘‘ अरे, सेठजी! नमस्कार। अच्छा हुआ आप यहीं सब्जी बाजार में मिल गए, मैं तो आपके ही घर जा रहा था। समाचार यह है कि महाराज जी पधारे हैं, उनका कहना है कि इस एरिया में अहिंसा मंदिर का निर्माण कराना है जिसमें आपका सहयोग... ..।’’

‘‘ जी बिलकुल! मेरी ओर से ग्यारह हजार, शाम को आपके पास पहुॅंचा दूॅंगा।’’

यह सुनकर, सब्जी का थैला टाॅंगे सेठजी के शिष्यनुमा नौकर से न रहा गया वह बोला,

‘‘सेठजी! अभी आपने सब्जी की दूकान पर लौकी लेते समय लम्बी बहस के बाद, पूरे बाजार में बीस रुपये प्रति किलो रेट वाली लौकी पन्द्रह रुपये में खरीद कर ही साॅंस ली, जबकि इनके एक इशारे पर ग्यारह हजार रुपये दे दिए ?’’ 

‘‘ अरे तू नहीं समझेगा, पाॅंच रुपया अधिक देता तो वह पता नहीं उनका किस प्रकार दुरुपयोग करता, बीड़ी या शराब पीने में लगाता, परन्तु इस प्रकार बचाकर हमने मंदिर के काम में लगा दिया उससे तो सब लोगों का भला ही होगा ?’’

‘‘ पर आपने ही तो सिखाया है कि किसी को भी मन, कर्म और वचन से कष्ट पहॅंुचाना हिंसा कहलाती है। आपने उस किसान को आर्थिक नुकसान पहुॅंचाकर मानसिक कष्ट दिया जो लाभ के लिये नहीं अपनी आजीविका के लिए सब्जी बेचने बाजार में आया है। तो, इस प्रकार हिंसा करके जोड़ा गया धन अहिंसा मंदिर में लगाने पर क्या उसकी पवित्रता खंडित न होगी ? ’’

‘‘ अरे! प्रवचन न दे, चल आगे, अभी और बहुत कुछ खरीदना है, तू क्या यह नहीं जानता कि सब्जी उगाने से लेकर बेचने तक की क्रियाओं में किसानों के द्वारा कितने जीवों की हिंसा होती है? तो क्या सब्जी भाजी खाना छोड़ देना चाहिए ?’’

‘‘ वही तो मैं कह रहा हॅूं कि आप अहिंसा अहिंसा चिल्लाते हैं पर हिंसा से अर्जित भोजन करने से चूकते नहीं । आपकी कथनी और करनी में अन्तर क्यों है, मुझे आपके यहाॅं नौकरी नहीं करना। सम्हालो अपना थैला, मैं तो चला, इस माह के चार दिन का मेरा वेतन भी मेरी ओर से मंदिर को दे देना।’’


155 मूर्ति

 

‘‘ पापा! बाजार के उस अंधेरे से कोने में वह क्या है ?’’

‘‘ अरे ! तुम्हें नहीं मालूम ? ये महामहोपाध्याय पंडित दिवाकर जी की मूर्ति है, तुम लोगों को पांचवी कक्षा में इनके बारे में नहीं पढाया गया ?’’

‘‘ क्या वही, जो संस्कृत और भारतीय दर्शन के मूर्धन्य विद्वान रहे हैं और शास्त्रार्थ में उन्हें कोई पराजित नहीं कर पाया ?’’

‘‘ वही हैं, तत्कालीन लोगों ने उन्हें सम्मान देने के लिए उनकी मूर्ति यहाॅं स्थापित की थी। यहीं पर, एकत्रित होकर, इस मैदान में कभी धर्म सभायें की जाती थीं परन्तु म्युनीसिपल ने अब यहाॅं बाजार बना दिया है।’’

‘‘ लेकिन मूर्ति की यह दुर्दशा ? शायद अनेक वर्षों से कोई देखरेख नहीं। न तो आस पास ही सफाई है और न ही मूर्ति पर। अरे ! उस पर तो मकड़ियों और पक्षियों का डेरा है, ओ हो ! उनका यह कैसा सम्मान ?’’

‘‘ यह तो मूर्ति है, इस युग में जीवित विद्वानों का तो इससे भी बुरा हाल होता है, बेटा ! ’’

‘‘ लेकिन क्यों ? ’’

‘‘ पता नहीं, तुम इस पर रिसर्च करना।’’


154 गूंगे का गुड़

 

‘‘ सर ! इस पाठ में लिखा है कि सिद्धार्थ , दुखों का समाधान खोजने के लिए अपना सब कुछ छोड़कर वन को चले गए ?’’

‘‘ हाॅं , सही लिखा है ।’’

‘‘ लेकिन सर ! राजकुमार सिद्धार्थ ने राजसी शान शौकत, पत्नी और परिवार को छोड़ कर उचित नहीं किया।’’ 

‘‘क्यों ?’’

‘‘ इसलिए कि उनके पिता राजा थे वे अनेक स्थानों के प्रसिद्ध विद्वानों को बुलाकर अपने पुत्र को वाॅंछित ज्ञान उपलब्ध करा सकते थे।’’

‘‘ यह सब किया ही गया था, पर वे संतुष्ठ नहीं हुए। राजसी सुख सुविधाओं में रहकर जन सामान्य के शारीरिक और मानसिक कष्टों को वह कैसे समझ पाते ?’’

‘‘ परन्तु परिवार छोड़ कर चले जाने में कौन सी बहादुरी थी ? पर्यटन करके भी तो वह इसका अनुभव कर ज्ञान पा सकते थे ?’’

‘‘ राजसी सुख सुविधाएं छोड़, हाथ में भिक्षा पात्र लेकर घूमना क्या इतना सरल है ? कभी यह प्रयोग अपने ऊपर करके देखना, कैसा लगता है।’’

‘‘ परन्तु जिसे ढूढ़ने के लिए उन्होंने सब कुछ छोड़ा उसके सम्बन्ध में तो उन्होंने कुछ कहा ही नहीं कि वह है या नहीं या कैसा है ?’’

‘‘ सही है। उस परमसत्ता को अपने हृदय के भीतर अनुभव कर लेने के बाद शब्दों में कह पाना बुद्ध तो क्या ! किसी के भी वश में नहीं है, समझे ?’’ 


153 संदाह


‘‘ गुरुदेव! परसों, अनेक वर्ष बाद आपके परम शिष्य धर्मदास से मुलाकात हुई। उसके पास आपकी कृपा से सब कुछ है लेकिन कुशल क्षेम के वार्तालाप में ही अनेक बार उसने यह कहा कि बिना आग के जल रहा हॅूं। मैं इसका अर्थ ही नहीं समझ सका, उसे सांत्वना भी नहीं दे सका, यह कितना दुखद है !’’

‘‘ क्या वह अपने स्तर से निम्न स्तर के व्यक्तियों के आधीन कार्य करता है ?’’

‘‘ नहीं गुरुदेव’’

‘‘ तो क्या उसके आस पास दुष्ट लोग निवास करते हैं ?’’

‘‘ नहीं गुरुदेव ’’

‘‘ इसका मतलब है, वह अवश्य ही अस्वास्थ्यकारक भोजन करता होगा ’’

‘‘ नहीं, बिलकुल नहीं गुरुदेव ’’

‘‘ तो हो सकता है उसका पुत्र बिलकुल मूर्ख हो ’’

‘‘ नहीं गुरुदेव ! वह तो अच्छी सरकारी नौकरी करता है’’

‘‘ यह नहीं है तो अवश्य उसकी पत्नी क्रोध मुखी होगी ’’

‘‘ क्या कहते हैं गुरुदेव, वह तो देवियों की तरह सुंदर हैं’’

‘‘ जब इन पाॅंच कारणों में से कोई नहीं है तो छठवां और अन्तिम कारण यही बचता है कि उसकी युवा कन्या विधवा हो गई हो, अन्य कुछ नहीं है जो बिना अग्नि के उसका शरीर जला सके ।’’


152 लखूचंद

एक दिन कालेज के कुछ युवकों ने हलवाई लखूचंद के सामने ही उनकी जमकर तारीफ करते हुए कहा,

 ‘‘ अरे ये तो लखूचंद के एक हाथ का कमाल है, दोनों हाथ होते तो पूरे जिले में मिठाई के नाम पर केवल इन्हें ही जाना जाता। लेकिन यार लखूचंद ! ये तो बताओ कि दूसरा हाथ क्या जन्म से ही ऐसा है या बाद में कुछ हो गया?’’

बहुत दिन बाद लखूचंद को अपनी जवानी के दिन याद आए और बोले,  ‘‘‘ युवावस्था में मैं बहुत धनवान होने का सपना देखा करता। पिताजी चाहते थे कि मैं उनकी हलवाई की दूकान सम्हालूं, इसलिए एक दिन वे सारा काम समझाकर, दूसरे काम से उस ओर चले गए। मैं अपनी मस्ती में कड़ाही के गर्म होने की प्रतीक्षा में बगल में पड़ी बेंच पर लेट गया और झपकी आ गई, सपने में लक्ष्मी जी आईं। मुझे लगा कि आज मेरी इच्छा पूरी हो गई। मैंने उनसे पूछा-

‘‘ हे देवि ! मुझे बताओ कि तुम किसे चाहती हो, शूरबीर को? तो मैं वैसा ही बनकर तुम्हें पाने का प्रयत्न करूं।’’ 

‘‘ नहीं, ‘शूरबीर‘ तो सदा ही लड़ाई झगड़े करता रहेगा, कभी भी मारा जायेगा, मैं विधवा हो जाऊंगी, मैं उसे नहीं चाहती’’

‘‘ तो क्या उदार हृदय के ‘दानी’ को चाहती हो?’’

‘‘ नहीं, वह तो मुझे जिस चाहे को दे देगा, आखिर मेरी भी तो मर्यादा है, सम्मान है ?’’

‘‘ तो क्या बहुत ही ‘विद्वान’ को चाहती हो ?’’

‘‘ नहीं, नहीं, वह तो सरस्वती को ही चाहेगा, किसी की सौत कहलाऊं?, नहीं नहीं, मैं उसे नहीं चाहती।’’

‘‘ तो फिर तुम्हीं बताओ तुम किसे चाहती हो ?’’

‘‘ मैं तो ‘कंजूस’ व्यक्ति को चाहती हॅूं वह हमेशा मेरी ही पूजा करेगा, अपने कलेजे से लगा कर रखेगा, हर समय मेरी प्रशंसा करेगा .. .. चूमता रहेगा ..’’

यह कहते कहते उन्होंने धीरे से मेरे गाल पर अपने हाथ से छुआ ही था कि मैंने उन्हें पकड़ने के लिए दोनों हाथ पूरी ताकत से उनकी कमर की ओर फैलाए और बेंच से लुड़ककर उबलती कड़ाही में जा गिरा, उसी में ये हाथ .. .. ।’’’


151 सबकुछ उल्टा

 

‘‘ गुरु ! आज क्या मौन व्रत है ? चलते चलते एक किलोमीटर हो गया एक शब्द भी नहीं बोले ? ’’

‘‘ हाॅं यार, क्या बताऊं बड़े ही असमंजस में पड़ गया हॅूं। ’’

‘‘ कोई गंभीर चिन्तन प्रताड़ित कर रहा है क्या ? ’’

‘‘  हाॅ, क्या तुम बता सकते हो आजकल धन सम्पन्न कौन हैं ? ’’

‘‘ अरे ! यह कौन नहीं जानता, व्यापारी, राजनेता, डाकू, लुटेरे आदि आदि, सब धनवान हैं ।’’

‘‘ सही कहा, जो जितना कुलक्षणी है उतना ही धनवान देखा गया है। अच्छा, अब ये बताओ विद्वान कौन हैं ?’’

‘‘ ये तो अपने अपने अभ्यास पर निर्भर करता है, यह तो कोई भी हो सकता है ’’

‘‘ नहीं, गलत कहते हो,वे लोग अधिक ज्ञानी और प्रकाण्ड माने जाते हैं जो शीलहीन और अधिक आडम्बरी होते हैं। ’’

‘‘ यार ! सही कहते हो ’’

‘‘ इतना ही नहीं, कुपात्रों को सुशील स्त्रियाॅं मिल जाती हैं, और पानी भी बरसता है तो पहाड़ों पर अधिक ! ’’





Sunday, September 20, 2020

150 जानकार दुर्लभ

 ‘‘ अरे ठाकुर! घर में ही घुसे रहते हो, रिटायर होने के बाद, एक बार भी  नहीं दिखे , क्या बात है ?’’

‘‘ अरे, आओ पंडितजी! क्या बताएं सभी दुर्भाग्य है ।’’

‘‘ भाग्य को दोष देते हो ठाकुर! वह तो अपने ही पिछले संस्कारों का क्षयकाल होता है। ’’

‘‘ पता नहीं क्या सच है, मित्रों, रिश्तेदारों से मिलने में अपार ग्लानी होती है, देशविदेश में जाकर खूब इलाज कराया, पानी की तरह पैसा बहाया लेकिन मर्ज घटने के स्थान पर बढ़ता ही जा रहा है। ये देखो .. .. ’’

‘‘ अच्छा! तो यह बात है, ये तो सचमुच घातक चर्मरोग है। कोई बात नहीं जब संस्कार उदय हुआ है तो उसका अन्त भी होगा, हमें अपने प्रयास जारी रखना चाहिए।’’

‘‘ शायद मरने के बाद ही संभव हो ।’’

‘‘ लेकिन, आपने देशी जड़ीबूटी का उपयोग करके देखा कि नहीं ?’’

‘‘ अरे महाराज! सब प्रकार से थक चुका हॅूं ।’’

‘‘ अच्छा, वो जो हलके पीले फूलोंवाला छोटासा पौधा वहाॅं घूरे पर लगा है उसकी जड़, पत्ते, तना, फल, फूल सबको पीसकर लगा कर देखो।’’

‘‘ अरे पंडितजी! क्यों हंसी उड़ाते हो, चलो यह भी कर लेते हैं। ए धन्ना ! जा वह पौधा उखाड़ ला जो घूरे पर लगा है।’’ 

‘‘ ऐसे नहीं ठाकुर साब ! गहराई से खोदना पड़ेगा उसकी जड़ें बहुत मजबूत और गहरी होती हैं। इस रोग की यही दवा है।’’

‘‘ हः हः हः हः .... ’’

‘‘हॅस रहे हो! कोई भी अक्षर ऐसा नहीं जो मंत्र न हो, कोई भी वनस्पति ऐसी नहीं जो औाषधि न हो और कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं जिसमें योग्यता न हो, कमी रहती है तो केवल परख करने वाले की। जैसा बताया है वैसे लगाओ कुछ माह में इस कष्ट से मुक्त हो जाओगे।’’


149 कचरा रिसर्च का

 रोज की तरह अनुत्साहित दिनेश आज जब अपनी लेब में पहॅंुचा तो टेबिल पर रखे लिफाफे को देख उसे डरते डरते खोला। पत्र पढ़ते ही उसकी खुशी का ठिकाना न रहा जब उसने पढ़ा ‘‘ योर पेपर एन्टाइटिल्ड.. .. .. हेज बीन एस्सेप्टेड फार पब्लिकेशन इन दिस जरनल एन्ड द जूरी हेज डिसाइडेड टू एवार्ड इट ए सर्टीफिकेट आफ मेरिट इन फोर्थकमिंग एनुअल मीट आफ द सोसाइटी’’। तत्काल उसका मन छः माह पहले हुए उस वार्तालाप पर जा टिका जब इसी पेपर के संबंध में सबसे पहले उसने अपने रिसर्च गाईड से चर्चा की थी।

‘‘ सर, वो अकेशिया वाले सेम्पिल में ‘इलेक्ट्रोल्यूम्नीसेंस’ के ट्रेसेज दिखाई दिये हैं, उसमें  इलेक्ट्रोड्स वेरिएशन करने पर प्रोमिसिंग रिजल्ट्स आये हैं। मैंने उनको एक्सप्लेन करने का प्रयास किया है, जरा देख लीजिए’’

‘‘ और, मैंने जो कहा था कि ‘पीआईपी’ का टेस्ट करना, तो, आठ माह से कोई रिजल्ट्स नहीं मिले? मैं जिस पैटर्न पर काम करा रहा हॅू उससे हटकर तुम क्या प्रदर्शित करना चाहते हो? आइंसटीन कहलाना चाहते हो?’’

‘‘  नहीं सर, ‘पीआईपी’ को भी पूरा कर चुका हॅूं केवल लिखना रह गया है। ‘इएल’ में एंकरेजिंग रिजल्ट्स जानकर उसे पहले लिख लिया। आप देख लीजिए, यदि सहमत हों तो किसी अच्छे जरनल में प्रकाशन के लिए भेज देते हैं।’’ 

‘‘ अच्छा, हाॅं, तो ये है तुम्हारा काम? सब रबिश है, किसने कह दिया कि ये एंकरेजिंग  रिजल्ट्स है? अरे ये रिजल्ट्स तो ‘नाइट्रोजनस डिस्चार्ज’ में पाए जाते हैं, तुम इन्हें.. .. ?’’ 

.. कहते हुए पेपर्स दूर फेककर रिसर्च गाइड नाराज होकर चले गए थे, वह दृश्य फिर सामने था और, उसी तरह आंसू भी जब मित्र की सलाह पर कोआथर में गाइड का नाम देकर उसने वह पेपर देश के ही प्रसिद्ध जरनल में भेज दिया था कि सचमुच कचरा ही होगा तो वापस आ जाएगा। इस मनःस्थिति में डूबा दिनेश सोच रहा था कि काश! गाइड महोदय ने नकारात्मक रुख न अपनाया होता... ... इसी बीच गाइड महोदय भी उसी प्रकार का लिफाफा लिए दिनेश की लेब में आए और बोले,

‘‘अरे दिनेश! यह कौन सा पेपर था, तुमने बताया ही नहीं, ये तो अमेरिका के जरनल में प्रकाशित होने लायक था’’

‘‘ सर, यह वही .. .. ..’’


148 नारी

 ‘‘ दीदी ! मैं आपके दरवाजे पर घण्टी बजाने के पहले जो कुछ सुन पा रहा था क्या वह रोज ही होता है ?’’

‘‘ क्या हुआ? मुझे तो कुछ नहीं पता’’

‘‘ क्यों झूठ बोलती हो? अभी अभी आपकी मदर इन ला आप पर कितना बरस रहीं थीं और आपने एक शब्द भी नहीं बोला?’’

‘‘ अरे, वह तो यों ही बोलती रहती हैं, उनका यही स्वभाव है, उन्हें जवाब देने का किसी में साहस नहीं।’’

‘‘ तो तुम पिछले तीन साल से इस प्रकार की मानसिक प्रताड़ना झेल रही हो और हम लोगों को कभी नहीं बताया? जानती हो, यह घरेलू हिंसा कहलाती है और इस पर सरकार ने कड़े कानून बना रखे हैं? जीजा जी तो खुद पुलिस अफसर हैं इतना तो जानते ही होंगे?’’  

‘‘ अवश्य जानते हैं, परन्तु वे इतने मातृभक्त हैं कि उनके कहने से एक पैर पर दिनभर खड़े रह सकते हैं।’’

‘‘ अच्छा, तो अब हमें ही कुछ उपाय करना पड़ेगा, आखिर चार भाइयों की इकलौती बहिन हो, तुम्हें इस प्रकार से गुलामों जैसी जिंदगी नहीं जीने देंगे, चलो आज ही मेरे साथ, मैं तुम्हें लेने ही आया हॅूं।’’

‘‘ नहीं भैया। तुम वकील हो, कानून जानते हो अतः तुम जो कह रहे हो वह उचित है। लेकिन मैंने अपने बाबा के पास बैठ कर मनोविज्ञान के कुछ सूत्र सीखे हैं जिनमें एक सूत्र यह है कि क्रोध को अक्रोध से जीता जा सकता है। मैं उसी का प्रयोग कर शाॅंत रहती हॅूं।’’

‘‘ तुम सूत्र कहो या शस्त्र, तीन साल से तो इसको प्रयोग में ला ही रही हो और स्थिति ज्यों की त्यों है। अब तो भाइयों का एक ही अस्त्र आजमा कर देखो, चार दिन में ही सब सरेंडर हो जाऐंगे, आखिर हम किसी से कम हैं क्या?’’

‘‘  भैया! यह बताओ, जो लोग मानसिक रूपसे बीमार होते हैं, उनको दवा देना चाहिए या सजा ?’’

‘‘ अरे ! तो उन्हें मनोचिकित्सालय में भरती क्यों नहीं करते? मेरी बहिन ने ही उनकी गुलामी करने का ठेका ले रखा है? चलो मेरे साथ, अब यहाॅं मैं एक पल भी तुम्हें नहीं रहने दूंगा।’’

‘‘ ठीक है, कब तक रहॅूंगी वहाॅं ?’’

‘‘ आजीवन रहो, हमारे पास क्या कमी है?’’

‘‘ क्या तुमने इस धरती पर बिना पहिए का कोई वाहन चलते देखा है? अथवा क्या बिना तार की वीणा बजते देखी है ?’’

‘‘नहीं’’

‘‘ तो बिना पति के पत्नी की कल्पना कैसे की जा सकती है? तुम निश्चिंत रहो मुझे कोई कष्ट नहीं है।’’


147 स्कूली बच्चों के मामा

 

‘‘बाबूजी! बाबूजी! एक रुपया दे दो’’, हाथ फैलाए एक स्कूली बच्चे ने बीच बाजार में एक  सज्जन के सामने गिड़गिड़ाते हुए कहा।

‘‘ तुम तो स्कूल में पढ़नेवाले लड़के लगते हो? भीख माॅंगते हो? स्कूल की यूनीफार्म  किसने दी?’’ लगातार प्रश्नों की बौछार सज्जन ने कर डाली।

‘‘ जी बाबूजी। मैं कक्षा 4 का छात्र हॅू, ये स्कूल यूनीफार्म मुझे मामा ने दी है’’, लड़का डरते डरते बोला।

‘‘ तो क्या तुम्हारा मामा तुम से भीख मँगवाता है?’’

‘‘ नहीं नहीं, मामा नहीं, बाप यह काम करवाता है’’

‘‘ पर क्यों?’’

‘‘ वह कहता है, तुम्हारा मामा तुम्हें कपड़े देता है, खाना देता है, किताबें देता है, पर मुझे कुछ नहीं देता, न काम और न खाना, इसलिए तुम स्कूल से लौटते समय लोगों से इतने पैसे तो जरूर माॅंग कर लाना जिनसे मेरी बीड़ी तम्बाखू का सिलसिला बना रहे।’’

‘‘ और माॅं क्या करती है?’’

‘‘ वह भी भीख ही माँगती है बाबूजी।’’

‘‘ हद हो गई, आखिर ये भिखारी भी बच्चे क्यों पैदा करते हैं?’’ बड़बड़ाते हुए सज्जन चलते बने। 


146 स्वच्छता अभियान

जिले के वरिष्ठ अधिकारियों के निरीक्षण से पूर्व अपनी तल्लीनता और कर्तव्य के प्रति समर्पण प्रमाणित करने के लिए नगर स्वास्थ्य अधिकारी ने कुछ निरीक्षकों को चिन्हित किए गए गंदे स्थानों पर खुले में शौच जाने वालों पर सख्ती से कार्यवाही करने के निर्देश दिए। निरीक्षक ने एक अधेड़ व्यक्ति को नाली पर शौच करते पकड़ लिया। निर्देशानुसार वह, उस व्यक्ति का पानी से भरा लोटा छीनकर डाॅंटने लगा,

‘‘क्यों रे अधबूढे़! तुझे स्वच्छता अभियान के बारे कुछ नहीं पता? खुले में शौच करने में तुझे जरा भी शर्म नहीं आती?’’

‘‘ काहे की शर्म ? मैं तो जनम से ही यहीं शौच करता हॅूं, आज तक किसी ने नहीं टोका, तुम कौन होते हो?’’

‘‘ जानता नहीं, मैं नगरनिगम का सफाई दरोगा हॅूं, ज्यादा बड़बड़ मत कर, चल पचास रुपया फाइन जमा कर’’

‘‘ अजीब बात है, शौच के लिये कोई पैसा रख कर लाता है क्या? मेरे पास कुछ नहीं है, जो कुछ करना है कर लो?’’

‘‘ चल! तो मुर्गा बन जा ’’ दरोगा ने लोटे का पानी वहीं पर उड़ेलते हुए कहा।

इतने मंे स्वाथ्य अधिकारी निरीक्षण करने वहीं पहॅुंचे और सड़क पर मुंह में भरी पान तम्बाकू की पीक पिच्च करते हुए बोले,

‘‘ क्या बात है दरोगा? ’’

‘‘ सर! ये नाली पर शौच करते पकड़ा गया है, फाइन नहीं दे रहा, मुर्गा भी नहीं बन रहा?’’

‘‘ क्यों बे! गंदगी करता है और आॅंखें दिखाता है’’

‘‘ सर! आप मेरे इस काम को तो गंदा कह रहें हैं जिसे मैं बाल्यावस्था से करता रहा हॅूं पर आपने जो अभी अभी स्वच्छ सड़क को अपनी पीक से लालपीला कर दिया है वह क्यों नहीं दिखता? उसका फाइन कौन देगा?’’


145 ठोकर

मिठाई का लालच देकर मेले में से चुराए गए एक गरीब किसान के बेटे ‘गफलू’ को चोरों के सरदार ‘धन्ना’ ने ऐसा ट्रेन्ड किया था कि उसके गिरोह के इस लड़के ने न केवल लोगों को परेशान कर रखा था बल्कि पुलिस की नाक में दम कर रखा था। अंधेरी रातों के मालिक, इस गिरोह में केवल गफलू का ही रिकार्ड था कि अभी तक एक भी रात ऐसी नहीं आई थी जिसमें उसे चोरी में सफलता न मिली हो। गफलू यह मानता था कि उसने धन्ना का नमक खाया है अतः जी जान से उसकी कीमत चुकाएगा। एक बार चोरी के लिए गफलू एक भीड़ भरे पंडाल में जा पहुॅंचा जहाॅं प्रवचनकर्ता कह रहे थे कि,

‘‘ इस प्रकार युद्ध में अजेय भीष्मपितामह और कर्ण मारे गए। वह दोनों, दुष्ट दुर्योधन के पापों को अपनी आंखों के सामने होते देखते रहे और एक बार भी नहीं टोक पाए क्योंकि वे सहज नैतिकता के प्रभाव में आकर यह मानते रहे कि उन्होंने उसका नमक खाया है। यदि उन दोनों ने सहज नैतिकता के स्थान पर आध्यात्मिक नैतिकता को अपनाया होता तो कह सकते थे कि, ठीक है तुम्हारा नमक खाया है इसलिए तुम्हें परामर्श दे रहा हॅूं कि पापकर्म छोड़कर समाज कल्याण करने का सही रास्ता पकड़ लो नहीं तो हम तुम्हारा साथ नहीं देंगे’’

इतना सुनकर गफलू के सुसंस्कार जागे और उसके दिमाग पर ऐसी ठोकर मारी कि वह  वापस धन्ना के पास  पहुंचकर  बोला,

‘‘ ठीक है, तुम्हारा नमक खाया है इसलिए तुम्हें सुझाव दे रहा हॅूं कि पापकर्म छोड़कर समाज कल्याण करने का सही रास्ता पकड़ लो नहीं तो हम तुम्हारा साथ नहीं देंगे ’’

‘‘अबे! माल निकाल, कहाॅं है? क्या आज बड़ा खजाना हाथ लग गया है जो बगावती सुर निकाल रहा है?’’

‘‘ नहीं उस्ताद! खाली हाथ हूॅं, आज कुछ नहीं मिला, पर बहुत कुछ पा गया हॅूॅं और मैं पुलिस के पास सरेंडर करने जा रहा हॅूं।’’


144 कोई आपत्ति नहीं

 समाजविरोधी गतिविधियों में लगे एक धनी व्यापारी का युवा मित्र महात्मा बुद्ध के किसी विशेष प्रवचन से प्रभावित होकर उनका शिष्य हो गया। अपने परम मित्र को, बुद्ध का शिष्य हो जाने से इस धनी व्यापारी को अकेलेपन का बड़ा दुख होने लगा क्योंकि अब उसके कार्यों में साथ देने वाला कोई नहीं था। जब यह व्यापारी अपने आप पर नियंत्रण न कर पाया तो वह वहाॅं पहुंचा जहाॅं पर बुद्ध अपना प्रवचन दे रहे थे। उन्हें देखकर वह बहुत ही निन्दनीय भाषा में अपशब्दों का प्रयोग कर बुद्ध का अपमान करने लगा। बुद्ध ने कुछ नहीं कहा केवल मुस्काते रहे। अन्त में व्यापारी थककर बोला, 

‘‘ मैं ने तुम्हें इतना भला बुरा कहा लेकिन तुम्हारी ओर से थोड़ी सी भी प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली, थोड़ी सी भी नाराजी दिखाते या विरोध करते तो मैं सन्तुष्ठ हो जाता?’’

बुद्ध दबी हुई हंसी लिये बोले, ‘‘ मानलो तुम किसी को एक लाख रुपये देते हो और वह स्वीकार कर लेता है तो वह रुपये किसके कहलाएंगे?’’

‘‘ ये भी कोई पूछने की बात है, उसी के हो जाएंगे जिसे मैं ने दिये हैं,’’ धनी व्यापारी बोला।  

‘‘ अच्छा, अब मानलो वह व्यक्ति तुम्हारे द्वारा दिया गया रुपया लेना अस्वीकार कर देता है तो वह धन कहाॅं जाएगा?’’ बुद्ध ने फिर से पूछा।

‘‘ अरे! इतना भी नहीं जानते, जब वह नहीं लेगा तो मेरे पास ही मेरा धन रहेगा, और कहाॅं जाएगा?’’ व्यापारी ने तत्क्षण जबाब दिया।

‘‘ इसी प्रकार, जब तुम मुझे अपनी गन्दगी भेंट कर रहे थे, मुझे उसे स्वीकारने की कोई इच्छा नहीं थी। तुम उसे अपने पास ही रखे रह सकते हो।’’ बुद्ध मुस्काते हुए बोले।

‘‘ लेकिन, मैं इतनी अधिक निन्दित गन्दगी का क्या करूंगा’’ वह व्यक्ति बोला।

‘‘ भाई! यह तो तुम ही जानो, चाहे उसे आभूषणों की तरह पहने रहो या जैसे तुम चाहो वह करोे, मुझे उस पर कोई आपत्ति नहीं है’’ बुद्ध ने जबाब दिया।


143 सुखी कौन


‘‘ अच्छा, युधिष्ठिर ! ये बताओ कि संसार में सुखी कौन है? ’’ यक्ष ने पूछा ।

वे बोले ‘‘ दिवसस्याष्टमे भागे शाकम पचति यो नरः, अनृणी अप्रवासी च स वारिचारः मोदते।’’

अर्थात् ‘ वह व्यक्ति जो एक दिन में कम से कम एक बार भोजन पा जाता है, जिसे किसी का कोई कर्ज नहीं देना है, और जिसे आजीविका के लिये अपना घरबार छोड़कर दूसरे स्थान पर नहीं रहना पड़ता है, वास्तव में वही सुखी है।’


221 चिंजा की शादी

5 वीं क्लास में पढ़ रहीं स्वभाव से सीधी सादी सहुद्रा और भोली सी चिंजा में गहरी दोस्ती थी। चिंजा की स्पष्टवादिता से क्लास के सभी लड़के लड़किय...