सुकृत्य
पड़ोस में रहने वाले सरदार गुरशरण सिंग जी को मैंने एक दिन पहले ही सहमत कर लिया था कि आज वह मुझे बस स्टेण्ड पर ड्राप करते हुए अपने आफिस चले जायेंगे इसीलिए, मैं उनके घर समय से पाँच मिनट पहले ही पहुँच गया। बाहर लान में बैठे उनके पिताजी ने मुझे पास में बैठने का इशारा किया और वहीं खेल रही चार पाँच साल की अपनी पोती से मेरे आने की सूचना भीतर दे आने के लिए कहा, वह झट से अन्दर दौड़ गई।
वापस आकर बोली, ‘‘पापाजी ग्रन्थ साहब दा पाठ कर दे हण, मैं दस दिता‘‘ और वहीं खेलने लगी।
सरदारजी बाहर की तरफ आ ही रहे थे कि वह बोल पड़ी,
‘‘ओ पापाजी ! तुसी किन्नी देर कर दिती ? अँकल जी कब तों त्वानु वेट करदे हन।‘‘
‘‘हाँ जी पुत्तर! मैं पाठ पूरा करना सी।‘‘
‘‘क्या जी ! तुसी किताब दा इक इक पेज पढ़दे हो, इसलई अजे तक पूरी न हुई, इक बारी चँगी तराँ बैह के पूरी क्यों नहीं पढ़ लेन्दे जी ?‘‘
गुरशरणजी ने उसे बाँहों में उछालते हुए प्यार से कहा,
‘‘ पुत्तर! तेरा पापा बुद्धू आ, पर तू इन्नी चँगी गल मैंनू पर्ले क्यों ना दस्सी ? हुँण मैं इद्दां ही करणगा। ‘‘ और लड़की को पिताजी की गोद में देेते हुए मेरी ओर बढ़े।
पिताजी की बगुले जैसी लम्बी सफेद दाढ़ी विस्मय से हँसते हुए बोली,
‘‘ ए नन्हीं सी जान ! तुझे कैसे समझाएं कि यह ग्रन्थ तो कभी पूरा न होने वाला ग्रन्थ है, इसे पूरा करने के लिए चाहिए अनेक जन्मों के सुकृत्य। ‘‘