Friday, September 18, 2020

142 व्हीआइपी


‘‘ अरे ! इस गेट पर क्यों आ गए? क्या तुम्हारे पास व्हीआइपी टिकिट है? यह व्हीआइपी गेट है ।’’

‘‘ यह क्या होता है?’’

‘‘ इस गेट से भगवान के वही दर्शन करने जा सकते हैं जो उच्च पदों पर हैं जैसे विधायक सांसद, मंत्री, बड़े अधिकारी या वे धनी या व्यापारी लोग जिन्होंने मंदिर को कम से कम दस हजार रुपये दान में दिये हों।’’

‘‘ तो क्या भगवान ने हम गरीब लोगों को दर्शन देना बन्द कर दिया है?’’

‘‘ फ्री में दर्शन करने वालों की लाइन गेट नम्बर तीन पर लगी है वहाॅं लाइन में लग जाओ, जब नम्बर आ जायेगा तब दर्शन मिल जाएंगे ।’’

‘‘ अजीब बात है! तीन दिन से बैंक की लाइन में लगा रहा, वहाॅं नोटों के भी दर्शन नहीं हो सके, आज सोचा कि भगवान से ही प्रार्थना करता चलूॅं कि आज बेंक में नोट मिल जायें, पर हाय रे दुर्भाग्य! वे तो पहले ही बेच दिए गए !’’


141 लम्बी उम्र

 

‘‘ बड़े भाग्यशाली हैं, बहुत लम्बी आयु पायी, बहुत होते हैं एक सौ सात साल ! "

‘‘ सच? एक सौ सात साल! इतने सालों में उन्होंने कुछ अनुकरणीय या समाज हित में उल्लेखनीय काम किया हो तो बताएं?’’

‘‘ उल्लेखनीय?’’

‘‘ हाॅं, ऐंसे कार्य जिन्हें हम अपने जीवन में उपयोगी कह सकें और उनका पालन करते हुए उन्हें आदरपूर्वक याद रख सकें?’’

‘‘ कई राज्यों में व्यवसाय फैलाया, बहुत धन कमाया, सात लड़के लड़कियाॅं हैं, वे भी अच्छी पोजीशन में हैं, उन्हीं की तरह धन कमा रहे हैं, बहुत नाम और प्रभाव है उन सबका’’

‘‘ ये कोई बड़ी बात नहीं, ये तो सभी लोग करते हैं, कभी उनसे अवकाश के समय मिलने और बातचीत करने के अवसर पर यदि उनके जीवन के अनुभवों या सफलता के रहस्यों पर उन्होंने कुछ बताया हो तो वह बताओ, उससे दूसरे लोग भी लाभान्वित होंगे ’’ 

‘‘ नहीं, मैं तो अनेक बार उनके निकट सम्पर्क में आया पर पहले तो वे अपने धंधे में ही उलझे रहते और पचास की उम्र के बाद तो प्रायः बीमार ही रहते थे। देश भर के अनेक अस्पतालों में उनका इलाज चलता रहा, अन्त में घर में ही बीमारी से जूझते रहे।’’

‘‘ तो इस प्रकार के उनके लम्बे जीवन को तुम बहुत बड़ी उपलब्धि मानते हो? इससे अच्छा और लम्बा जीवन तो केंचुओं का होता है जो अपने शरीर के टुकड़े टुकड़े हो जाने के बाद भी जीवित रहकर हमें उपजाऊ मिट्टी देते रहते हैं।’’ 


140 भय का भूत


राष्ट्रीय सेवा योजना के छात्र स्वयंसेवकों द्वारा एक गाॅंव के बाहर दिसम्बर माह के अंत में लगाए गए केम्प में नियमानुसार रात को टेन्टों में सोते समय सुरक्षा करने के लिये दो दो स्वयंसेवकों की रात दस बजे के बाद से दो दो घंटे की ड्युटी लगाई गई। बारह से दो और दो से चार बजे तक की ड्युटी करने वालों ने रात में डर न लगे इसलिये आपस में मिलकर एक साथ चार बजे तक ड्युटी करने की योजना बना ली। शहरी परिवेश में पले सम्पन्न परिवारों के ये लड़के जो अपने घरों में  छोटे मोटे काम के लिये भी नौकरों पर अश्रित रहते थे अब सभी काम अपने हाथ से करने और दूसरों की सेवा करने के लिये संकल्पित थे। कड़कड़ाती ठंड में टेन्ट के बाहर लकड़ियाॅं जलाते चारों अपनी ड्युटी पर डटे थे। अचानक पास में लगे पीपल के पेड़ की एक ओर की डालियाॅ हिलने लगीं, खरखर की आवाज आने लगी। टार्च की लाईट फेक कर देखते हुए चारों सोचने लगे कि हवा चलती तो अन्य डालियाॅं भी हिलती परन्तु केवल इन दो चार छोटी छोटी डालियों की ओर से ही आवाज आ रही है, क्या कारण हो सकता है। चारों के मन में भूत होने की शंका उत्पन्न हुई फिर भी चारों डटे रहे। थोड़ी देर में फिर से खरखर के साथ चट चट की आवाज भी सुनाई दी। अब तो उनके मन का संदेह इतना बढ़ गया कि बारह से दो बजे की ड्युटी वाले अपने टैन्ट में जाने लगे और कहने लगे कि चार से छः बजे तक ड्युटी करने वालों को जगाये देते हैं वे लोग अभी से आ जायेंगे । आपस में जोर जोर से बातें होने लगी जिसे सुनकर कुछ लड़के जाग कर उनके पास आ गये। इतने में फिर से दूसरी ओर की डालियों में खरखराहट और चटचट की आवज होने लगी । एक ने जोर से कहा ‘भूत आया, भूत आया’। हल्ला सुनकर प्रोग्राम आफीसर आए और कारण जाना। वे बोले ‘‘ चलो देखते हैं वहाॅं है क्या? ’’

डरते डरते सब उस पेड़ के नीचे पहुॅंचे और टार्च से देखा कि जो डालियाॅं अभी अभी हिल रही थीं और पत्तों में खरखर की आवाज हो रही थी वे गीली हैं। अचानक एक पतली सी सूखी डाली का टुकड़ा चट की आवाज करते हुए प्रोग्राम आफीसर के सिर पर गिरा। सभी घबराये परन्तु जब हाथ से उस डाली के टुकड़े को उठाया तो पाया कि वह भी गीला है । आस पास की झाड़ियों के पत्तों पर देखा तो ओस की बूंदे चमक रही थीं। 

प्रोगा्रम आफीसर ने समझाया कि ‘‘ भूत नाम की कोई चीज नहीं होती है, देखो! ओस के कारण पीपल के पत्तों पर गीलापन है और यही पानी जब अधिक हो जाता है तो बहकर अन्य पत्तो पर गिरता है जिससे वे हिलते हैं और आपस में टकराने से खरखर की आवाज होती है। सूखी सूखी पतली टहनियों पर जब यही ओस की बूंदे पत्तों से बह कर उसे गीला कर देती हैं तो भार के कारण वह टूट कर नीचे गिरने लगती है और उन्हीं के टूटने से चटचट की आवाज आती है। अब किसी को डरने की जरूरत नहीं ।’’

डरने वाले लड़के ने प्रश्न किया‘‘ सर! यदि यही बात है तो पीपल के पेड़ के पत्ते ही क्यों हिलकर आवाज करते हैं, पास में लगे दूसरे पेड़ों से आवाज क्यों नहीं आती?’’

आफीसर बोले,

‘‘ पीपल के पत्ते चिकने, चैड़े और लम्बे डंठल वाले होते हैं इसलिये वह ओस को अधिक एकत्रित कर नीचे अन्य पत्तों और डालियों पर बहा देते हैं जिससे आवाज होती है और देर तक हिलते रहते हैं।’’ 

अगले दिन से, बारह बजे से चार बजे की रात ड्युटी चाहने वालों में स्पर्धा होने लगी।

 


139 ऊँट के मुह में जीरा

 ‘‘ बड़े नोटों के बंद हो जाने से अब काले धन को बटोरने वाले भ्रष्टाचारियों की तो लुटिया ही डूब गई। अब आतंकी, नशेड़ी और तस्करी करनेवाले तो रोऐंगे ।’’ 

‘‘ हाॅं सामने से तो यही लगता है ।’’

‘‘ तो क्या पीछे कुछ और है?’’

‘‘ सामने है अर्थशास्त्र और पीछे है व्यावहारिक गणित।’’

‘‘ तुम कहना क्या चाहते हो? क्या इससे काला धन रखनेवाले भ्रष्टाचारियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा?’’

‘‘ अवश्य पड़ता यदि दण्ड कुछ कड़ा दिया जाता ।’’

‘‘ तो क्या काले धन को जमा करने वालों पर टैक्स के साथ टैक्स का दौ सौ परसेंट फाइन तुम्हें कम लगता है ?’’

‘‘ बस यही तो तस्वीर के पीछे का दृश्य है।’’

‘‘ तुम पहेलियाॅं क्यों बुझाते हो, स्पष्ट कहने में क्या डर लगता है?’’

‘‘ नहीं। सोचो, टैक्स के दो सौ परसेंट फाइन का मतलब क्या हुआ ? टैक्स का केवल दोगुना! यह कोई दण्ड हुआ? सोना और जमीन खरीदने में काला धन निवेश करने वाले कौन है? ये वही हैं जो बड़े शक्तिशली, प्रभावी और मठाधीश है इन पर इसका क्या असर पड़ेगा? बैकों से लोन लेकर वापस न करने वालों पर इसका क्या प्रभाव होगा? ’’

‘‘ तो आखिर तुम कहना क्या चाहते हो?’’

‘‘ अरे ! इसका मतलब क्या है जब रिजर्व बेंक कहता है कि एक लाख चैदह हजार करोड़ रुपया के कर्ज सरकारी बैकों ने ‘डूबत’ घोषत कर अपने रिकार्ड से हटा दिये हैं, वह भी केवल पिछले दो वर्षों में। यह कौन खा गया? रिजर्व बेंक की ‘राइट आफ’ ,‘बेड’, ‘डाउटफुल डेब्ट लोन्स’ आदि, ये शब्दावली क्या प्रकट करती है? क्या यह पैसा, देश हित में कतार में लगे त्रस्त हो रहे ईमानदार नागरिकों का नहीं है? ’’

‘‘ यार ! यह बात तो सचमुच विचार करने योग्य है।’’

‘‘यही नहीं, हर साल सरकार संसद में कहती है कि टैक्स में करोड़ों रुपये बकाया हैं, तो जो लोग इस पैसे को हड़प चुके हैं, खा चुके हैं, उन्हें बकाया क्यों कहते हो? वे लोग कौन हैं? उन लोगों के नाम घोषित किये जाते, उन्हें कड़ा दण्ड मिलता तभी कुछ सार्थक होता।’’ 


138 कष्ट

 ‘‘ देखो तो, बड़े नोटों के बंद हो जाने से मजदूरों और गरीबों को कितना कष्ट हो रहा है, बेचारे दिन दिन भर लाइन में लगे रहने के कारण मजदूरी भी नहीं कर पाते और बेंक से पैसा भी नहीं निकल पाता। दूर से आने वाले तो रात में बेंक के गेट पर ही सो जाते हैं ताकि अगले दिन लाइन में वे आगे रह कर अपना पैसा पा सकें।’’ 

‘‘ हाॅं, ये लोग तो कष्टों को सहने के आदी होते हैं, जब पैसा हाथ में होता है तो भी कष्ट में रहते हैं और जब नहीं होता तब भी।’’

‘‘ अजीब बात है! तुम्हें इनके प्रति लेशमात्र भी सहानुभूति नहीं है?’’ 

‘‘ अरे! उनके कष्ट का तो अनुभव करो जो गरीबों और गरीबी के कष्टों पर भाषण देकर सरकार को हर जगह कटघरे में खड़ा करते रहते हैं?’’

‘‘ क्या मतलब?’’

‘‘ जिनके घरों के कमरों, अलमारियों, बाक्सों इतना तक कि गद्दे और तकियों में ये बड़े बड़े नोट चुनावों के लिये संग्रह कर रखे हुए थे, उन्हें तो अब रद्दी में भी नहीं बेचा जा सकता। मैं उनके कष्टों की बात कर रहा था।’’


137 श्रेय


‘‘सर! पिछले सप्ताह में कुछ व्यापारियों ने चुनाव के लिये जो चंदा दिया था वह करीब डेड़ करोड़ है और सभी पाॅंच सौ और एक हजार के नोट हैं, क्या करें? उन्हें किसी खाते में जमा करा दें ? टैक्स काटकर दस पन्द्रह लाख तो बच ही जायेगा?’’

‘‘ तुम ठीक कहते हो, पीए। पर यह बताओ कि हमारा बिजली और नगर निगम का कितना टैक्स बकाया है?’’

‘‘ सर ! पिछले नोटिस के अनुसार अभी तक लगभग सन्तावन लाख बिजली, बानवे लाख प्रापर्टी और पन्द्रह लाख पानी का टैक्स बकाया है’’

‘‘ जब सरकार को टैक्स देना ही है, तो जाओ नोट बंद हो जाने के कारण केवल आज रात तक ये दोनों आफिस पाॅंच सौ और एक हजार के नोट ले रहे हैं, सभी टैक्स जमा कर दो’’

‘‘ गुड आइडिया सर ! !  टैक्स न भरने का कुछ तो ‘‘क. .लं. .क’’ मिटेगा, यह कहना चाहता था, परन्तु मंत्री जी की आंखों की ओर देख बोला.. , मेरा मतलब टैक्स भरने का कुछ तो श्रेय  मिलेगा ’’


136 प्रोजेक्ट


‘‘सर! कोई अंकल मिलने आये हैं, कहते हैं विधायक के पीए हैं।’’

‘‘ओ ! हो! नमस्कार श्रीवास्तव साहब, आइये आइये। यहाँ बैठिये। इतनी गर्म दोपहरी में क्यों कष्ट किया, फोन कर देते, हम ही आ जाते ...... राजू ! जा बढ़िया शर्वत ले आ. . ’’

पीए साहब अपना काम कराके वापस गये ही थे कि राजू फिर चिल्लाता आया,

‘‘ सर! कोई अंकल मिलने आये हैं, कहते हैं प्रोफेसर पाण्डे हैं। ’’

‘‘ओफ् ओ! इनको चैन नहीं है, राजू ! उन्हें बाहर ही बिठाओ, बोल दो कि आते हैं। ’’

प्रोफेसर पान्डे बाहर बरामदे में पड़ी कुर्सी पर बैठे प्रतीक्षा करते, पढ़े पढ़ाये समाचार पत्र बार बार उलटते पुलटते, घड़ी देखते रहे , अचानक.. ..

‘‘अरे, पाण्डे जी! कहो सब ठीक तो है। ओफ् ओ! गर्मी बहुत है आज, बोलो कैसे आये? ’’

‘‘ बहुत दिनों से यूजीसी के प्रोजेक्ट का मेरा प्रपोजल अधूरा पड़ा है उसी पर आपका परामर्श लेने उस दिन आफिस में आपसे बात की थी, आपने घर पर आने को कहा था इसलिये .. .. ’’

‘‘ अच्छा! फाइल को छोड़ दीजिए मैं रात में उसे पढ़कर कल आफिस में आपसे बात करता हॅूं, ठीक ? कल आफिस में ही मिलेंगे, भई बहुत गर्मी है .. ..।’’ 


135 निरीह

 

सेना से रिटायर होने के बाद, एक अरब़पति सेठ के यहाॅं कार्यरत सीक्योरिटी मेनेजर विक्रमसिंह, अनेक वर्ष बाद  अवकाश लेकर बाल्यावस्था के मित्रों से मिलने अपने गाँव आ पहँुचे। खबर मिलते हीे मिलने आये सभी लोग उन्हें घेरकर बैठ गये। कोई उनसे सेना की बहादुरी के किस्से पूछ रहा था तो कोई वर्तमान में किये जाने वाले कार्य के बारे में।

अपने सेठ की सम्पन्नता के बारे में विक्रमंिसंह बता रहे थे कि किस प्रकार उसके यहाॅं सैकड़ों लोग फैक्टरी में काम करते हैं। बंगले पर सुरक्षा, सफाई, बगीचे की देखभाल के लिये, पालतु कुत्तों, बिल्लियों के लिये नौकर कितने कितने हैं। गाड़ियों के ड्राइवर कितने हैं। भोजन तैयार करने वाले रसोइया कितने हैं, आदि आदि ।

यह सुनते ही विक्रम के एक साथी ने पूछा ‘‘ तुम्हारा सेठ भोजन भी अपने हाथ से करता है या इसके लिये भी नौकर लगाए गए हैं?’’ 

‘‘ हः हः हः, नहीं, भोजन तो अपनेे आप ही करता है, परन्तु बहुत कम। बस, कुछ फल फूल दवाइयाॅं और दाल रोटी।’’ बिक्रम ने जबाब दिया।

‘‘ विक्रम! तुम्हारा सेठ बड़ा निरीह है, दूसरों पर ही निर्भर है बेचारा। हमें तो उस पर बड़ी दया आती है।’’ एक बुजुर्ग अचानक बोल पड़े।


 134 गोमती

जागीरदार पिता के बिगड़ैल लड़के का गाॅंव के ही कहार की लड़की ‘गोमती’ पर ऐसा दिल आया कि उसे अर्धांगिनी ही बना लिया। पिता को पता चला तो दोनों को घर से ही नहीं अपनी जागीर से भी बाहर कर दिया। जागीरदार का बेटा मजदूरी कैसे करता, आलस्य और लिप्सा में ही डूबा रहता। बेचारी गोमती ही गाॅंव के कुछ सम्पन्न घरों में, अपना पैत्रिक काम, कुए से पानी भरकर लाने का, करके परिवार पालने लगी ।

एक दिन, एक जीर्णशीर्ण भिखारी सम्पन्न घर देख वहाॅं कुछ पाने की इच्छा से बड़ी देर तक खड़ा रहा। इस बीच गोमती तीन बार पास के कुए से पानी भर कर ला चुकी । हर बार भिखारी देखता कि गोमती सिर पर एक के ऊपर एक रखे पानी से भरे दो घड़े बायें हाथ से सम्हालती और एक छोटे बच्चे को दायीं ओर कमर पर हाॅथ के सहारे पकड़े चलती जाती और दूसरा बड़ा बच्चा उसकी साड़ी का पल्लू पकड़े पीछे पीछे चलता जाता। 

अगली बार पानी भरने जाते समय बच्चे भूख से रोने लगे। पास में बने पत्थर के चबूतरे पर अपनी लाठी ठोककर भिखारी बोला, 

‘‘ तू तो रोज ही यह दृश्य देखता है, कैसा लगता है?’’ 

चबूतरा बोला, ‘‘ मैं तो पत्थर का हॅूं, तेरी तरह मेरे हाथ पैर होते तो चल फिर कर मैं इसे कुछ मदद करने की सोचता।’’ भिखारी निराशा भरी साँस लेकर बोला,

‘‘ अरे ! ! मेरे पास धन होता तो सबको बाॅंट देता न कोई भिखारी होता और न मजदूर ।’’ 

यह सुनकर रोते बच्चों को चलते चलते सम्हालती, गोमती बोली, 

‘‘ कभी मैं ने भी ऐसे ही सपने देखे थे परन्तु यह भूल गयी थी कि कर्मफल तो खुद को ही भोगना पड़ता है, उससे कैसे बचा जा सकता है?’’

और, रास्ते में पड़ने वाले अपने घर रुककर छोटे बच्चे को दूध पिलाकर रात की बची दो रोटियों में से एक आंगन में खड़े दूसरे बच्चे को देते हुए दूसरी रोटी खुद खाने के लिये वहीं बैठी ही थी कि इतने में वह भिखारी भी धीरे धीरे उसके घर आ पहॅुंचा। गोमती ने अपनी रोटी उस भिखारी को देते हुए घड़े और छोटे बच्चे को उठाया और कुए की ओर चल दी। बच्चा रोटी खाते हुए पीछे पीछे उछलता कूदता जा रहा था और भिखारी कृतज्ञता के आँसुओं से भिगो कर वह रोटी खाते खाते बुदबुदा रहा था,

‘‘ धनी लोगों में गरीबों की तरह उदार हृदय नहीं होता ।’’


133 दिया तले अंधेरा

 कल डाॅ साक्षी के घर आयोजित पारिवारिक कार्यक्रम में गोरखपुर से पधारे प्रोफेसर नेगी से मेरा परिचय कराते हुए वह बोले, 

‘‘आपसे मिलिये, आप हैं  त्रैलोक्यरन्जन जी, हमारे अभिन्न मित्र और योग विज्ञान के प्रसिद्ध लेखक।’’

‘‘ त्रैलोक्यरन्जन! नाम कुछ जाना पहचाना सा लगता है, क्या आप फेसबुक पर भी लिखा करते हैं ?’’ प्रोफेसर नेगी कुछ सोचते हुए बोले ।

‘‘ जी हाॅं, वही ।’’

‘‘ अरे साहब! आपकी लेखनी ने तो बड़े बड़े शोधकर्ताओं को भी हिला दिया है, आध्यात्म पर आपकी वैज्ञानिक और व्यावहारिक व्याख्याओं से ये लोग वर्षों पुरानी स्थापित मान्यतायें भी बदलते देखे जा रहे हैं। ’’

‘‘ प्रोफेसर नेगी ! आपको इनके बारे में केवल इतना ही मालूम है ? ये ज्ञान विज्ञान में ही नहीं साहित्य में भी अपने अचूक तीर चलाते रहते हैं।’’ डाॅ साक्षी ने पुट मिलाया।

‘‘ हः हः हः हः .. .. ..’’

‘‘ आप हॅस रहे हैं त्रैलोक्यरन्जन जी !’’ प्रोफेसर नेगी बोले। 

‘‘ आप जैसे विद्वानों के द्वारा मेरे प्रयत्न को मान्यता मिलना सचमुच उत्साहवर्धक है, परन्तु मैं अपने को अभी अधूरा शिक्षक ही मानता हॅूं।’’

‘‘ लेकिन अधूरा क्यों ?’’

‘‘ प्रोफेसर साहब ! आध्यात्मिक तथ्यों पर मेरी व्याख्याओं को चाहे सारा विश्व ही क्यों न मान्यता दे दे, परन्तु मेरी धर्मपत्नी को समझाते हुए व्यालीस साल बीत जाने के बाद भी उसे सहमत करा पाने में, मैं हर बार असफल ही रहता हॅूं।’’


132 गोत्र

 ‘‘ पाठक जी ! तुम तो जगह जगह यात्रा करते रहते हो, ‘अनु’ अब बड़ी हो गई है, उसके लायक कोई योग्य लड़का हो तो जरा ध्यान रखना ।’’

‘‘ हाॅं, परन्तु यह बताओ कि लड़का किस प्रकार का चाहते हो, अर्थात् प्राइवेट नौकरीवाला, धंधेवाला, देशी या विदेशी ?’’

‘‘ सरकारी नौकरीवाला हो तो उत्तम, वैसे अच्छे खानदान के आत्मनिर्भर लड़के पर भी विचार कर सकते हैं।’’

‘‘लड़का तो मेरी नालेज में है शर्मा जी का, परन्तु अभी तो विदेश में किसी ट्रेनिंग को पूरी करने गया है।’’

‘ तो पता करो कब तक लौटेगा, खानदान, गोत्र, कुंडली आदि का पता कर बताना’’

मिश्र जी ! आप भी गोत्र, सूत्र, कुंडली में उलझे है? लड़का देखोगे तो फिर ये सब कुछ भूल जाओगे’’

‘‘लेकिन फिर भी गोत्र तो ... ’’

‘‘ यदि मेरी बात बुरी न लगे तो सुनो, एन्थ्रोपोलाजी के अनुसार हम सभी का गोत्र तो ‘एप’ अर्थात् बन्दर हैं, फिर चाहे वे शाॅंडिल्य हों या कश्यप हों या भरद्वाज । इस ‘गोत्र’ को क्यों बीच में लाते हो? मैं तो ज्ञान, सुसंस्कार, सदव्यवहार और आत्मनिर्भता को ही जानने की सलाह दूॅंगा ।’’

‘‘ अरे पाठकजी ! ‘शर्मा’ तो अब सभी लिखने लगे हैं, आखिर जाति का भी तो ... ’’

‘‘ तो आपका मतलब यही  हुआ न कि वे ‘‘बन्दर ब्राह्मण हैं या बन्दर क्षत्रिय या बन्दर वैश्य, या बंदर शूद्र ? अरे ! बन्दरों में कोई जाति होती है? यह तो हमने जबरदस्ती ओढ़ कर ऊॅंचनीच के रंग में रंग ली हैं। ’’

‘‘ आपके ये सब कथन तो लेखों और भाषणों के लिये ही उत्तम हैं, आचरण में लाकर देखना तब समझ में आयेगा ! पर उपदेश.. .. । ’’

‘‘ भाई साब! समाज बहुत आगे जा चुका है, हमको तब समझ में आयेगा जब हमारे बच्चे अपनी मर्जी से गृहस्थी बसा कर हमसे से दूर होते जायेंगे।’’


131 मनस्ताप

इमारती लकड़ी खरीदने की सलाह लेने, एक दिन मैं टिम्बर मर्चेंट सरदार अवतारसिंह के घर पहुॅंचा। उनके छोटे छोटे बच्चे, मेरे पहुँचने से पहले धमाचैकड़ी मचाते हुए उनसे कहानी सुनाने की रट लगाये थे। सरदारजी चारपाई पर लेटे, बड़े ही सोच विचार में पड़े थे कि इन्हें क्या सुनाऊँ। अचानक सरदारजी बोले, 

‘आओ जी ! त्वानु मापारत दी कांणी सुणावां। ’’

बच्चे झटपट चारपाई पर उनसे सट  कर बैठ गए। 

‘‘हाँ जी! तुसीं मापारत दा नम सुणा, जा नईं ?’’ बच्चे कोई हाँ जी बोले कोई न।

 ‘‘चंगा जी , तँ... मापारत विचों सी... पंज पंडवा। किन्ने जी ? ’’

 ‘‘पंज।’’

 ‘‘हाँ जी ! ता... उना विचों सब तों बड्डा सी दित्तर, ते दूजा बड्डा तकड़ा सी पिम्म। हैं जी ! ते इक होर... , इक होर..... , ता... इक दा नम मैं पुल गिया जी। ’’

इस पर बड़ा बच्चा बोला, 

‘‘पापाजी! तुसी पंज विचों दो नम ही दस्से हन, कहिन्दे हो इक दा नम पुल गिया ? ’’

 ‘‘ओ पुत्तर! मैं कोई पड्या वड्या नईं ना इसलै पुलता वां ’’ सरदारजी बड़े दुखी हो बोले।

इसी बीच एक बच्चे ने गेट के पास मुझे देख कर उन्हें ध्यान दिलाया, वे जल्दी उठे और ‘सत्श्रीअकाल जी’ कहते हुए अन्दर आने का इशारा किया। पहुॅंचते ही उन्होंने बड़ी ही विनम्रता से, बच्चों को महाभारत की कहानी सुनाने का निवेदन किया। मैं अपनी कहानी बाद में, पहले महाभारत की कहानी सुनाने लगा। सुनते सुनते सरदारजी बच्चों की तरह बड़े ही तल्लीन दिखे। 

मैं ने पूछा, ‘‘ सरदारजी ! कि होया? कहानी तो खत्म हो गई।’’

जैसे किसी ने सोते से जगा दिया हो, वे बोले

‘‘ ओ जी! मै साठ साल पिछों चला गिया सी जदों देश दा बटवारा होया, अपणे परिवार दे नाल लाहौर तों दिल्ली आणे दी धुंधली यादों, माॅंप्यो तों विछुड़ना, स्कूल छूटना, भूखे प्यासे अनेक जगह भटकना आदि सोचने में खो गिया जी! पर, त्वानु बहुत तनवाद जी! काश! मैनु भी पढ़ने दा मौका मिल पाया हुंदा तद अज, इन बच्चयानु मेरी ओर तों इन्नी निराशा न हुंदी ! ’’


130 उपकार

 

जैसे तैसे मुख्य सड़क से गाॅंव तक चार किलोमीटर लम्बा पहुॅंच मार्ग बन ही गया । ग्रामवासी विधायक के गुणगान करते न थकते। उन्हें लगता कि उनके दुखदर्द को समझने वाला कोई है तो वह है विधायक। बच्चे बूढ़े सभी कृतकृत्य थे कि अब गाॅंव के दिन फिरे, उन्हें बरसात में कीचड़ में से नहीं चलना पड़ेगा। पहुंच मार्ग के दोनों ओर लगे पेड़ों पर और बीच बीच में लोहे के खभों पर तीन बाई दो फुट की लोहे की तख्तियों पर बड़े बडे़ अक्षरों में लिखाया गया था -

 ‘‘यह पहुॅंच मार्ग माननीय विधायक ‘कखग’ द्वारा, विधायक निधि से बनावाया गया ।’’

बरसात आई । पानी भी भगवान ने अपनी इच्छा से बरसाया। मार्ग कुछ ही दिनों में अपने इतने विकृत रूप में आ गया कि गड्ढे ही गड्ढे दिखने लगे और पैदल चलना भी दूभर हो गया। लोग निर्माता को कोसने लगे। एक दिन गाॅंव के किसी छात्र ने स्कूल में शिक्षक से पूछा,

‘‘ सर! यह विधायक निधि क्या होती है, क्या यह राशि उनकी स्वयं की होती है?’’

‘‘ नहीं ! यह तो जनता द्वारा सरकार को दिये जाने वाले टैक्स का पैसा ही होता है जो अलग अलग विकास के कामों के लिये विधायकों और साॅंसदों के माध्यम से सरकार खर्च कराती है।’’ 

‘‘ तो क्या ये लोग इसमें अपना कुछ भी खर्च नहीं करते ?’’

‘‘नहीं, यदि उनके जेब से लगता होता तो तुम्हारे गाॅंव की अभी अभी बनी सड़क इतने जल्दी मिट जाती ?’’

‘‘ अच्छा अब समझ में आया’’

अब, गाॅंव के बच्चे उस रोड पर आते जाते विधायक के द्वारा लगाई गयी उन तख्तियों पर पाॅंच पाॅंच पत्थर मारने लगे। अब वे तख्तियाॅं भी रोड की तरह ही विकृत हो चली। एक दिन किसी बुजुर्ग ने बच्चों को तख्तियों पर पत्थर मारने से रोका । बच्चे बोले,

‘‘ दादा ! यह विधायक चोर है, यह हमारे गाॅंव के बोटों से चुना गया और फिर भी इसने हमारे ही टैक्स के पैसों से थर्डक्लास रोड बनवाया। इतना ही नहीं, अपना नाम जगह जगह लिखवा कर अपने को परोपकारी कहता है। यदि अब वह गाॅंव में आयेगा तो उसका स्वागत भी हम इसी प्रकार करेंगे।’’

बुजुर्ग बोले, ‘‘भैया! लेकिन, इसमें विधायक का क्या दोष है, यह तो ठेकेदार की गलती है’’

‘‘ दादा ! ठेकेदार ‘अ ब स’ भी तो विधायक के ही मौसेरे भाई हैं कि नहीं? आने दो गाॅंव में, सबका इसी प्रकार ही स्वागत करेंगे, हमें बिलकुल न रोकना ।’’


129 क्षमावीर

लखन अपनी थोड़ी सी खेती और मेहनत मजदूरी से अपने परिवार का पालन ठीक ढंग से कर लेता था परन्तु एक दिन मजदूरी करते हुए उसकी पत्नी फिसलकर गिर गयी और हाथ में फ्रेक्चर हो गया। अचानक हुई इस दुर्घटना के कारण उसे दवा कराने के लिये सेठ धरमचन्द से एक हजार रुपये, पन्द्रह परसेंट ब्याज पर उधार लेना पड़े। समय आते ही वह सेठ के पास जाकर व्याज की राशि जमा कर देता । परिस्थितियाॅं इस प्रकार बनती बिगड़ती रहीं कि दो साल के बाद भी वह एकहजार रुपये एकत्रित कर मूलधन चुका पाने का सामथ्र्य न जुटा पाया। आज भी वह अपने ब्याज की राशि जमा करने नियमतः सेठ के पास पहॅुचा।

‘‘ जुहार सेठ जी ! ’’

‘‘ अरे ! आओ लखन, भई आदमी हो तो तुम जैसा, बिना टोका टाकी के समय पर अपना पैसा जमा कर देते हो, बैठो ! बैठो ! ‘‘ कहते हुए सेठ धरमचंद बही खाता निकालने लगे। इसी बीच पीले वस्त्र पहने दो लोग आये और बोले ,

‘‘ जुहार सेठजी ! आज क्षमावाणी का पर्व है, हमसे जो कुछ भी जाने अन्जाने में भूल हुई हो उसे क्षमा करने की कृपा करें।’’

‘‘ अरे ! जुहार पंडितजी, हम भी आपसे अपनी अब तक की सभी त्रुटियों के लिये क्षमा चाहते हैं।‘‘

लखन सोचने लगा, आज का दिन तो बड़ा अच्छा है, सेठ जी प्रसन्न हैं और सभी को क्षमा कर रहे हैं। क्यों न अपने कर्ज को क्षमा करने की माॅंग कर ली जाये इसलिये बोला,

‘‘ सेठ जी ! ये लो अपना इस माह का ब्याज। अब तक मैं अपने मूलधन से लगभग चारगुना ब्याज आपको दे चुका हॅूं परन्तु मैं एक साथ इतने रुपये नहीं जुटा पा रहा हॅूं कि मूलधन को वापस कर कर्ज से छुटकारा पा सकॅूं। इसलिये आप आज क्षमावाणी के पर्व पर मेरा कर्ज क्षमा कर दें, आज तो सभी को आप क्षमा कर ही रहे हैं ’’ 

‘‘ हें , हें , हें लखन !  सभी लोग क्षमा माॅंग ही रहे हैं न, क्षमा कर कहाॅं रहे हैं, लोग हमसे क्षमा माॅंगते हैं, हम उनसे क्षमा माॅंग लेते हैं बस। इसीलिये हम भी तुम से तुम्हारा कर्जा क्षमा न कर पाने के लिये क्षमा माॅंगते हैं’’ कहते हुए सेठ, लखन के द्वारा दिये गये रुपये गिनने लगे। 

इसी बीच एक सब्जी विक्रेता हाथठेले पर प्याज का ढेर लगाये चिल्लाता आया,

‘‘ दस रुपये किलो, दस रुपया किलो, अब प्याज बिलकुल सस्ती, ले लो सेठ जी दस रुपया किलो,,,’’

लखन से न रहा गया वह बोला, ‘‘ भैया ! प्याज तो हम गरीब लोगों का भोजन है, सेठ लोग प्याज नहीं ब्याज खाते हैं ’’

‘‘ अरे, कहाॅं भूले हो दाऊ! ये तो सेठ धरमचंद हैं जो प्याज भी खाते हैं और ब्याज भी, बोलो सेठ! कितनी तौल दॅूं पाॅच किलो ?’’


128 गुरु दक्षिणा

रात के ग्यारह बजे अचानक बिजली चली गयी। पंडित हरिहर दरवाजा बंद कर, सोने की तैयारी करने लगे। अचानक पीछे की ओर से किसी के कूदने की आवाज आई। 

‘‘ कौन है? कौन है? .. .. अरे बिजली को भी अभी ... ...’’

 टार्च लेकर ढूॅंडने निकले हरिहर जी ने ज्योंही कौने की ओर टार्च से उजेला फेका उन्हें दो युवक अपना मुॅंह काले कपड़े से ढाॅंके दिखाई दिये।

‘‘ कौन हो तुम लोग? यहाॅं क्यों घुसे हो? जल्दी से बताओ नहीं तो अभी पुलिस को बुलाता हॅंू। हमारा पढ़ाया हुआ छात्र ही यहाॅं का पुलिस इंस्पेक्टर है, बचोगे नहीं समझे?’’

उन लोगों ने हरिहर जी के पास आकर ज्यों ही अपने मुॅंह से कपड़ा हटाया, टार्च की रोशनी में चेहरा पहचान कर वह बोले,

‘‘ अरे! सित्तू तू है ? यहाॅं क्यों आया है, और ये कौन है ?’’

‘‘ हाॅं पॅंडज्जी ! मैं सीताराम और ये है भगवानदास, वही भग्गू जिसे आप रोज मुर्गा बनाते थे’’

‘‘ अरे गधो! क्या पढ़ाते समय मुर्गा बनाने का बदला लेने आये हो? मैं ने तो तभी कह दिया था कि तुम लोग किसी काम के लायक नहीं निकलोगे, बन गये न डाकू? और अब अपने शिक्षक के घर पर ही अंधेरे में डाॅंका डालने आये हो?’’

‘‘ सही कहा पॅंडज्जी, आपने पूरा आशीर्वाद तो रज्जू यानी राजेश को दिया इसलिये वह पुलिस इंस्पेक्टर अर्थात् लाइसेंसी चोर है और हमें आशीर्वाद देने में हमेशा कंजूसी की, फिर भी आपके अभिशाप से ही सही, अब हम हैं इनामी चोर’’

‘‘ ठहरो मैं अभी राजेश को बुलाता हॅूं’’

‘‘ बुला लेना, पहले माल निकालो क्या क्या जोड़ रखा है, तुम्हारे किस काम का है, अकेले तो हो, हमें दे दो सब ’’

‘‘खट खट ! खट खट !’’

‘‘ देखो पॅंडज्जी ! कोई  दरवाजे पर आया है, शायद राजेश ही होगा, बिलकुल चुप रहना नहीं तो ...’’

‘‘ अरे ! राजेश?’’

‘‘ हाॅं पंडित जी ! बिजली देर में आयेगी, अभी खबर मिली है कि दो चोर जेल से निकल भागे हैं और कुछ आतंकी भी इस इलाके में घुस आये हैं इसलिये सतर्क रहना, अंधेरे में कोई भी दुर्घटना घट सकती है, कुछ भी हो तो हमें तत्काल बताना’’ कहते हुए राजेश चला गया।

‘‘ ठीक किया पॅंडज्जी। हमें बचा लिया, इसे आपका आशीर्वाद मान कर अब हमें कुछ नहीं चाहिये, चिंता मत करो हम अभी चले जाते हैं।’’

‘‘ लेकिन तुम लोग इस समय कहाॅं जाओगे? इस गंदे काम को छोड़कर कोई अच्छा काम करो, कब तक छिपे रहोगे, पुलिस के सामने समर्पण कर दो, मैं राजेश से कहकर तुम्हारी सजा माफ करवा दूॅंगा’’

‘‘ पंडज्जी! स्कूल से हमारी और तुम्हारी छुट्टी हो चुकी है, पाठ पढ़ाना बंद करो और ....’’

वाक्य पूरा हुआ ही नहीं था कि फिर से दरवाजे पर खट खट की आवाज आई।

‘‘ देखो ! शायद राजेश को हमारी भनक लग गई है, सावधान रहना समझे? जाकर देखो कौन है?’’

दरवाजा खोलते ही एक आतंकी गन आगे किये हरिहर जी को धक्का देकर नीचे गिराते हुए भीतर घुस आया और बोला,

‘‘बता, कौन कौन हैं घर में,  हमें यहाॅ कुछ दिन रुकना है, हमारे दो साथी और हैं’’

‘‘ मैं तो अकेला ही रहता हॅूं, लेकिन भैया! आप हैं कौन और इस अंधेरे में ही क्यों आये?’’

‘‘ देेख रे बुड्ढे ! ज्यादा सवाल न कर, बस चुपचाप रह, मैं तब तक अपने साथियों को बुलाता हॅूं’’ कहते हुए पास में पड़ी एक बेंच पर बैठ कर अपने साथियों को मोबाइल से संदेश भेजने लगा। इधर सित्तू और भग्गू को समझने में देर न लगी। चुपचाप पीछे से आकर सित्तू ने उसकी गन को और भग्गू ने उसकी गर्दन को जकड़ लिया और झटके से बेंच पर से नीचे पटक कर उसकी छाती पर चढ़ बैठे।

‘‘ बोल.. तू कौन है और तेरा टास्क क्या है? बोल.. नहीं तो तेरी ही गन से तुझे यहीं खत्म कर दॅूंगा।’’

‘‘ क्या तुम लोग भी... ..? ’’

‘‘ हाॅं, हम लोग भी ... ... ? अपना कोडवर्ड बताओ ‘‘’’

‘‘ पुलिस स्टेशन’’

‘‘ अबे साले! झूठ बोलता है। यह कोडवर्ड तो फर्जी है। भग्गू! इसके हाथ पैर बाॅंध दे, इसका बैग और मोबाइल छुड़ा ले। और, पॅंडज्जी आप रज्जू को ... ’’

‘‘ लेकिन तुम लोग ? ’’

‘‘हमारी चिंता न करो, रज्जू के साथ ही हम लोग भी जहाॅं से आये हैं वहीं चले जायेंगे। हमारे  इस काम को अपनी गुरुदक्षिणा समझो, लेकिन अब केवल किताबी ज्ञान से किसी की योग्यता या अयोग्यता का मूल्याॅंकन कभी नहीं करना।’’


127 पारितोषक

  दूरस्थ गाॅंव के स्कूल का निरीक्षण करने हेतु वरिष्ठ अधिकारी पहुंचे । प्राथमिक शाला की पाॅंचों कक्षाओं में 112 बच्चों में शिक्षक के दायीं ओर पहली और दूसरी कक्षा के छात्र और बाॅंयी ओर तीसरी, चैथी और पाॅंचवीं के छात्र शाॅंतिपूर्वक बैठे शिक्षक द्वारा दिया गया कार्य कर रहे थे।

‘‘ अरे ! सभी बच्चे एक साथ क्यों बैठे हैं ?’’ अधिकारी ने पूछा।

‘‘ सर, पाॅंच क्लासों को अकेला मैं किस प्रकार अलग अलग बैठा कर पढ़ा सकता हॅूं?’’ शिक्षक  डरते डरते बोला ।

‘‘ लेकिन रिकार्ड के अनुसार यहाॅं तो दो शिक्षक पदस्थ हैं?’’

‘‘ परन्तु दूसरे शिक्षक तो आपके ही आदेश से विधायक जी के आफिस में तीन साल से अटैच है, मुझे तो अकेले ही पूरा काम सम्हालना पड़ता है’’

‘‘ अच्छा ! पिछली वार्षिक परीक्षाओं  का रिजल्ट कैसा रहा ?’’

‘‘ सर, पाॅंचवी कक्षा का शतप्रतिशत’’ शिक्षक उत्साह के साथ बोला।

‘‘ अरे वाह ! तुमने यह कमाल कैसे कर दिया ? क्या नकल कराते हो?’’

‘‘ नहीं सर, परीक्षा केन्द्र तो दूसरी जगह रहता है, मेरी ड्युटी उसमें नहीं लगायी जाती क्योंकि मुझे यहाॅं की क्लासें देखना पड़ती हैं।’’

‘‘ फिर सभी बच्चे पास हो जाते हैं यह कैसे संभव है?’’

‘‘ सर, मैं तीसरी, चैथी और पाॅंचवीं के बच्चों को एक साथ पाॅंचवीं की किताबें ही पढ़ाता हॅूं, तीसरी का बच्चा पाॅंचवीं में पहुॅंचते पहॅंुंचते तीन साल में सभी विषयों के पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर याद कर लेता है और लिखने का अभ्यास भी।’’

‘‘ ये बात है, अब समझा। बाबू! इन्हें इनाम अवश्य मिलना चाहिये ’’ अफसर ने सामने खड़े बाबू की ओर देखकर कहा।

.... और बाबू ने तत्काल शिक्षक को निलंबन आदेश थमा दिया।


126 उद्घाटन

 

वर्षों की प्रतीक्षा और प्रयास के बाद अन्ततः एक गाॅंव में सरकार ने स्कूल भवन बनवा ही दिया। छात्रों और अभिभावकों को लगने लगा कि अब नये सत्र में नये भवन में  पढ़ाई होने  लगेगी। वर्षा के साथ फिर से नया सत्र आया लेकिन छात्र उसी पुरानी और पानी टपकते छप्पर वाली बिल्डिंग में बैठने को विवश थे क्योंकि पिछले सात आठ माह से कोई नेता स्कूल के उद्घाटन का समय ही नहीं निकाल पा रहा था। गाॅंव के लोगों और शिक्षकों ने सरपंच से कहा कि बच्चे बरसात में परेशान हो रहे हैं, पढ़ाई नहीं हो पा रही है, जब तब छुट्टी करना पड़ती है, इसलिये स्कूल का ताला खोलकर बच्चों को वहाॅं बैठकर पढ़ने दो। पर सरपंच भी थे गजब के अड़ियल। हरबार कहते बस मंत्री जी से उद्घाटन करा लेंने दो फिर तो बच्चों का ही स्कूल है। एक दिन जोर से पानी बरसा छात्र छात्रायें परेशान हो यहाॅं वहाॅं छिपने लगे, स्कूल के हेडमास्टर को यह सहन नहीं हुआ और उन्होंने नये भवन में सरपंच द्वारा लगाया गया ताला तोड़ कर छात्रों की कक्षायें वहाॅं लगाना प्रारम्भ कर दी।

हेडमास्टर की इस कार्यवाही ने सरपंच के अहंकार को इतनी चोट पहॅुचाई कि उसने थाने में रिपोर्ट कर दी और प्रकरण कोर्ट में जा पहुॅंचा। कोर्ट में जज के सामने अभियोजन पक्ष के बकील ने हेडमास्टर पर स्कूल का ताला तोड़ने के अपराध में दंडित करने की माॅंग की। जज ने बचाव पक्ष के बकील को बुलाया। 

‘‘ सर! मैं अपना पक्ष स्वयं रखूॅंगा, मेरा कोई बकील नहीं है’’ हेडमास्टर बोले ।

‘‘ अच्छा, बोलो, आप अपने बचाव में क्या कहना चाहते हैं?’’ जज ने पूछा।

‘‘ सर! मुझे बताया जाय कि स्कूल का भवन निर्मित हो जाने के बाद, कानून की वह कौन सी धारा है जिसके अनुसार यह प्रतिबंध लगाया गया हो कि जब तक  किसी मंत्री या नेता से उद्घाटन न करा लिया जाय उसमें कक्षायें प्रारंभ न की जायें। जिसके उल्लंघन के लिये मैं दोषी बनाया गया हॅूं वह कौन सी धारा है? सर! यदि कोई इस प्रकार की धारा है तो उसमें मंत्री या नेता को कितने समय के भीतर उद्घाटन कर देने का निर्धारण किया गया है?’’ हेडमास्टर ने पूरा विवरण आद्योपान्त देते हुए कहा ।

जज ने अभियोजन पक्ष के बकील की ओर देखते हुए उत्तर की अपेक्षा की,

‘‘ सर! कानून में इस प्रकार की कोई धारायें नहीं हैं, परन्तु सभ्यता और मानवीयता का तकाजा है कि कोई भी नया कार्य प्रारम्भ करने के पहले किसी जनप्रतिनिधि को बुलाया जाना चाहिये’’

जज ने हेडमास्टर की ओर देखा,

‘‘ सर! परिस्थितियाॅं पहले ही आपके सामने स्पष्ट कर दी गयी हैं, आखिर जनप्रतिनिधियों के लिये जनता के प्रति कोई मानवीयता का तकाजा है या नहीं ?  स्कूल भवन का ताला खोलकर उसमें कक्षायें लगाने में मेरा कोई अपराध नहीं है। ’’ 


Wednesday, September 16, 2020

125 मुर्गे की कीमत

 

‘‘रूपसींग ! रूपसींग ! बाहर निकलो, देखो तुम्हारे कुत्ते ने हमारे मुर्गे को खा लिया ।’’

‘‘अरे धनसींग ! क्या हुआ? क्या कह रहे हो?’’

‘‘ अपनी आंखों से देख लो, वो तुम्हारा कुत्ता हमारे मुर्गे को खा रहा है?, जब कुत्ते को खिला नहीं सकते तो पालते क्यों हो? ’’

‘‘ ऐंसी बात नहीं है धनसींग! तुम तो इस प्रकार कह रहे हो जैसे हमने जानबूझकर कुत्ते से तुम्हारे मुर्गे को खाने के लिये कह दिया हो? मुर्गा तो मुर्गा ही है, उसे कोई न कोई, कभी न कभी तो खाता ही, चाहे तुम खाते या कोई और...?’’

‘‘रूपसींग ! तुम ज्यादा बकवास न करो, कुत्ता पालने का इतना ही शौक है तो उसे बाॅंध कर क्यों नहीं रखते, हमारा रोज कुछ न कुछ नुकसान करता रहता है?’’

‘‘ तो तुम क्यों नहीं अपने मुर्गे को बाॅंध कर रखते, हमारे छप्पर पर बैठ बैठ कर खपरे खिसका कर तोड़ता रहता है?’’

जोर जोर से हो रही बातें सुनकर दोनों घरों से महिलायें आईं और एक से स्वर में एक दूसरे पर आरोप लगाते हुए पुरुषों में चल रहे द्वंद्व को अपने हाथों में ले मोर्चा सम्हालने लगीं। माताओं को उलझते देख दोनों ओर से बच्चे भी इस संग्राम में कूद पड़े , फिर क्या था पुरुष महिलायें और बच्चे अपने अपने मोर्चे पर इस प्रकार डटे कि खूनखराबा होते देर न लगी। पड़ौसी दूर से युद्व का मजा लेते रहे । अन्त में दोनों पक्षों के कुल ग्यारह घायल लोग जिला अस्पताल में भरती हो गये। दोनों पक्षों ने एक दूसरे के विरुद्ध पुलिस में प्रकरण दर्ज करा दिया इसलिये पुलिस बयान लेने अस्पताल में आयी । इंस्पेक्टर ने पूछतांछ कर स्थिति समझी और बोला,

‘‘ अरे मूर्खो ! अब मुर्गे की कीमत से हजार गुना खर्च करते रहो डाक्टरों और दबाइयों में, बकीलों और कोर्ट में। लगाते रहो रोज चक्कर यहाॅं से वहाॅं और करते रहो बरबाद सबकी जिंदगी। लूट, मारपीट और हत्या के प्रयास करने की धारायें लगेंगी, फिर जेल काटना, समझे ? करो यहाॅं दोनों लोग दस्तखत ।’’

‘‘ अरे साब! हम गरीब अदमी हैं, केस मेस मत चलाओ, यहीं निपटा दो’’

‘‘ तो पहले लाओ हमारी फीस हम केस नहीं बनायेंगे। बस, यहाॅं दस्तखत करके अपनी अपनी रिपोर्ट वापस ले लो’’ 


124 दिवास्वप्न

 


 ‘‘अब हमारी आन्तरिक सुरक्षा संतोषप्रद हो सकेगी, गुंडे, चोर, उचक्के अब अपराध करने से पहले सौ बार सोचेंगे’’

‘‘ क्यों? ऐंसा क्या हो गया जो अभी तक नहीं था?’’

‘‘ अरे! तुमने पढ़ा नहीं? न्यूज पेपर में छपा है कि अब पुलिस ने अपने विभाग से  भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करने के लिये कमर कस ली है। ’’

‘‘ असंभव’’ 

‘‘ देखो! पेपर में, मंत्रीजी ने डीजीपी के माध्यम से सभी जोन्स के आइजी और डीआइजी स्तर के अधिकारियों से सर्वेक्षण करा कर यह पता लगा लिया है कि पुलिस विभाग में किस किस प्रकार के कामों से किन किन क्षेत्रों में भ्रष्टाचार होता है। उनका कहना है कि अब वे इन पर सख्ती से लगाम कसेंगे ताकि पुलिस में भृष्टाचार जड़ से समाप्त हो जाये’’ 

‘‘ हः हः हः हः!’’

‘‘ अरे! तुम हंॅंस रहे हो?’’

‘‘ हॅंसने की तो बात ही है। अरे! डीजीपी या आइजी  स्तर पर पहुंचने के पहले क्या ये सज्जन फील्ड में बिलकुल नहीं रहे जो उन्हें यह पता ही नहीं है कि पुलिस भृष्टाचार करने के लिये कहाॅ कहाॅं और क्या क्या हथकंडे अपनाती है ?’’

‘‘क्यों नहीं, ये सभी लोग छोटे बड़े सभी पदों पर अनेक स्थानों पर काम कर चुके होेते हैं, उसके बाद ही पदोन्नत होकर इन पदों पर पहुंचते हैं’’

‘‘ तो तुम व्यर्थ ही सपने देख रहे हो।’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘ अरे! कोई अपनी विरासत को इस तरह नष्ट कर सकता है? इसका तो स्पष्ट संदेश यह है कि सर्वेक्षण में चिन्हित किये गये क्षेत्रों से प्राप्त होने वाला मंत्री का  शेयर या तो कम है या पहुंच नहीं रहा है । ज्योंही  उसे बढ़ाते हुए पहुंचा दिया जायेगा सब कुछ यथावत हो जायेगा, समझे? ’’


123 विचित्र धंधा

कुछ देशों के लोगों में स्वयं को दूसरों से अलग कर केवल अपने पालतू जानवरों, कुत्ता, बिल्ली आदि को ही अपनी जान से ज्यादा प्रेम करने की अजीब प्रकार की हठधर्मिता काम कर रही है। उनका मानना है कि वे अपने धर्मप्रवर्तकों की आस्तिकता की शिक्षा विरासत में सम्हाले उनका पालन कर रहे हैं । उनके अनुसार ‘रेप्चर प्रोग्राम’ के दिन वह आकर सभी आस्तिकों को अपने साथ आकाशीय स्वर्ग में ले जायेंगे और नास्तिकों को यहीं धरती पर कष्ट भोगने के लिये छोड़ जायेंगे। इस कारण वे नास्तिकों की तुलना में कुत्ते और बिल्लियों को अपनी जान से भी अधिक प्यार करते हैं। एक दिन नास्तिकों के एक समूह ने इन आस्तिकों के पास आकर  कहा.

 ‘‘ हमें अपना मित्र बना लो, हम लोग भी आपके काम आ सकते हैं’’

‘‘ नहीं , हम नास्तिकों के साथ कदापि मित्रता नहीं करेंगे, यह हमारे धर्मगुरु का निर्देश है’’

‘‘ उन्हीं निर्देर्शों के कारण तो यह सलाह दे रहे हैं’’

‘‘ किस प्रकार ?’’

‘‘ अरे ! रेप्चर प्रोग्राम के समय जब तुम सभी लोग आकाशीय यात्रा करते स्वर्ग चले जाओगे तो तुम्हारे इन पालतू जानवरों की देखरेख इस धरती पर कौन करेगा? वे तड़प तड़प कर मर नहीं जायेंगे?’’

‘‘ हाॅं ! ये बात तो सही है’’

‘‘ इसीलिये तो हम कह रहे हैं, कि तुम लोगों के जाने के बाद दस दस साल तक अपने अपने पालतू जानवरों की देखरेख करने के लिये एडवाॅंस में दस दस हजार डालर हमारे पास जमा कर दो और रसीद लेकर उनकी सीट रिजर्व करा लो। ’’

‘‘ लेकिन तुम्हें ही क्यों दें यह राशि ?’’

‘‘ इसलिये कि हम तो नास्तिक हैं, इसी धरती पर कष्ट भोगने के लिये छोड़ दिये जायेंगे इसलिये निश्चय ही हम उनकी देखभाल करते रहेंगे ।’’


122 समझ का फेर

 

पृथक बुंदेलखंड बनाने के लिये बहुत उत्साहित एक स्थानीय नेता ने अपने अन्य साथियों के सहयोग से  एक बड़े से गाॅंव में रेली का आयोजन किया जो अन्त में  सभा के रूप में बदल गयी। गाॅंव के अधिकांश बुजुर्ग, युवा और बच्चे उपस्थित थे । औपचारिकता के लिये भीड़ में से एक बुुजुर्ग को आदर पूर्वक मंच का सभापतित्व सौपकर नेता जी अपने तर्को को उपस्थित भीड़ में रखने लगे। श्रोता गण सहमति में अपने अपने सिर हिलाकर संकेत दे रहे थे। भीड़ को अपने भाषण से सम्मोहित समझ नेता जी ने अन्त में उनके साथ यह नारा लगाने के लिये कहा.

 ‘‘ बुंदेलखंड के लिये जियेंगे, बुंदेलखंड के लिये मरेंगे’’

यह सुनते ही सभापति बुजुर्ग ने उठकर नेता जी से माइक झटका और बोले.

‘‘ ये बात ठीक है कि बुंदेल खंड के लिये जियेंगे, पर ये क्या बात हुई कि बुंदेलखंड के लिये मरेंगे? अरे ! हम तो काशी में मरना चाहेंगे, क्यों भाइयो?’’

‘‘ हाॅं शास्त्रों में कहा गया है कि काशी में मरने से सीधे स्वर्ग मिलता है,’’ भीड़ में से कुछ लोग बोले।

यह सुन कर अनेक श्रोता खड़े होकर काशी में मरने वालों के समर्थन में चिल्लाने लगे और सभा अस्तव्यस्त हो गई। 

नेता जी और उनके साथी अपने प्रयास को असफल मान आपस में कह रहे थे ,

‘‘ जरूर यह हमारे विरोधी गुट की चालाकी है।’’ 


121 फीस


‘‘ मरीज की हालत बहुत ही सीरियस है, आपरेशन करना पड़ेगा, आप जल्दी इन कागजों पर संबंधित के गार्जियन सेे हस्ताक्षर कर फीस जमा कर दो’’

‘‘ डाॅक्टर साब! हस्ताक्षर तो  अभी करे देता हॅूं परंतु फीस कितनी होगी?’’

‘‘ सब मिला कर पेंतीस हजार’’

‘‘ लेकिन इतने रुपये तो अभी पास में नहीं हैं, इन्तजाम करने में कुछ दिन लग जायेंगे ’’

‘‘ आज ही इंतजाम कर लो नहीं तो मरीज को वापस ले जाओ ’’

‘‘ गांव से आया हूॅं , गरीब आदमी हूॅं साब! आप आपरेशन करके मरीज की जान बचा लें हम जल्दी ही आपकी फीस का इंतजाम कर देंगे’’

‘‘ मालूम है? मेडीकल कालेज में डाक्टरी सीखने के लिये हमसे फीस के लाखों रुपये एडवाॅस में ही जमा कराये गये थे, समझे?’’


Tuesday, September 15, 2020

120 बीमारियाॅ


‘‘ पता नहीं ये नयी नयी बीमारियाॅं कहाॅं से आ जाती हैं, इससे पहले तो इनके नाम तक नहीं जानते थे ’’

‘‘ ये सब एलोपैथी का कमाल है’’

‘‘ क्या मतलब? एलोपैथिक डाक्टर होकर भी यह कह रहे हो? एलोपैथिक दवाओं से तो जल्दी आराम मिलता है?’’

‘‘ हाॅं ! जल्दी आराम मिलता है। दवा माने दबा देना या रोक देना। उससे रोग तत्काल दब तो जाता है पर जड़ से दूर नहीं होता। कुछ दिनों बाद नये रूप में अन्य रोगों को लेकर फिर आ धमकता है’’

‘‘ बात समझ के बाहर है’’

‘‘ इसके भीतर रहस्य यह है कि रोगग्रस्त स्थान पर एलोपैथिक दवा के द्वारा नेगेटिव माइक्रोवाइटा भेजे जाते हैं जो उसे और अधिक बढ़ने से रोकते तो हैं, परंतु ये वहीं इकट्ठे होकर एक निश्चित संख्या से अधिक होते ही अपना अलग प्रभाव डालने लगते हैं जो धीरे धीरे नयी बीमारी का कारण बनते हैं।’’

‘‘ जब आप यह सब जानते हैं तो एलोपैथिक इलाज क्यों करते हैं, मरीजों को सही दिशा में मार्गदर्शन क्यों नहीं करते ?‘‘

‘‘ तुम मेरे अभिन्न मित्र हो इसलिये कह रहा हॅू, रोग को तो शरीर अपने आप ही ठीक करता है परंतु मरीजों को तो जल्दी आराम चाहिये ?  वे मानते कहाॅं हैं, बाद में भले ही अधिक कष्ट भोगते रहें।’’

‘‘लेकिन मानवता भी तो कोई चीज है कि नहीं?’’

‘‘ परंतु हमें भी तो रोजी रोटी चाहिये कि नहीं?’’


119 भृत्य का बेटा


  निष्ठा और ईमानदारी से प्रभावित होकर अफसर ने कार्यालय के भृत्य के रिटायर होने के बाद उसके बेरोजगार लड़के को वन विभाग के स्थानीय चेक पोस्ट पर बैरियर बंद करने और खोलने के काम पर लगवा दिया जहाॅं पर दो फारेस्ट गार्डों की चेकिंग ड्युटी थी। आठ घंटे की ड्युटी के स्थान पर बारह घंटे रुकना पड़ता। डयुटी के दौरान फारेस्टगार्ड ही वाहनों की चेकिंग करते और उन्हें अनधिकृत माल को बैरियर से बिना कार्यवाही के निकाल देने के बदले में प्रति ट्रक तीन सौ से चार सौ रुपये तक मिल जाते जिसमें रेंजर का हिस्सा अलग करने के बाद लड़के को एक सौ रुपये प्रति दिन देकर शेष राशि को दोनों बराबर बराबर  बाॅंट लेते । 

एक दिन कुछ देर के लिये वह लड़का अकेला ही ड्युटी कर रहा था कि एक बूढ़ी  भैसों से भरा ट्रक आया , उसने जांच के लिये बैरियर लगाया, ड्राइवर ने फौरन चारसौ रुपये उसे दिखाये पर उसने ट्रक में भरे माल से संबंधित पूरे कागजाद न पाये जाने के कारण आगामी कार्यवाही के लिये पुलिस को सौंप दिया, इतने में ड्युटी वाले दोनों फारेस्टगार्ड आ गये । वे , उसको बहुत डाॅंटते हुए बोले -

‘‘अबे, कैसी मूर्खता करता है! अब पुलिस वाले उससे एक हजार रुपये लेकर अंत में छोड़ ही देंगे ना ! तुम्हें क्या मिलेगा? अपना तो चार सौ रुपया प्रति ट्रक फिक्स है, ले लेते , इसी से तो तुम्हें वेतन मिलता है?’’

‘‘ लेकिन सर! उसमें तो बूढ़ी भैसें थीं जो वे शहर में उन्हें कटने के लिये, बेचने ले जा रहे थे’’

‘‘ तो! तुम्हारा क्या चला जाता?? सभी जगह यही हो रहा है, गायें हों या भैसें जब तक दूध देती हैं तब तक सब ठीक, बाद में कसाई को ही बेचा जाता है, क्या यह तुम्हें मालूम नहीं है?’’

यह सुनकर वह तत्काल दुखी मन से अपने घर आकर एक ओर उदास बैठ गया।  उदास बैठा देख उसके पिता ने पूछा-

‘‘क्यों बेटा! क्या बात है, आज तो जल्दी आ गये, तबियत खराब है क्या?’’

‘‘नहीं, अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिये घर वापस आ गया हॅूं और सोचता हॅू कि पिछले सात आठ दिन में जो कुछ इस काम से कमाया है उससे भिखारियों को भोजन करा दॅूं और किसी सात्विक कार्य की तलाश में जुट जाऊं।’’ 


118 अकौआ के फूल

‘‘ रमेश! जा कहीं से अकौआ के फूल तोड़ ला, आज भोले नाथ की पूजा उन्हीं फूलों से करना है।’’

‘‘ नहीं रमेश! बिलकुल न जाना। अकौआ बहुत ही जहरीला होता है, उसके फूल तोड़ने पर यदि उसका दूध उचट कर आंख में चला गया तो आंखें हमेशा के लिये नष्ट हो जायेंगी, समझे!’’

‘‘ अरे! क्यों रोकते हो, वह कोई छोटा सा बच्चा है ? सम्हालकर तोड़ लायेगा’’

‘‘ लेकिन अकौआ के फूल ही क्यों? अनेक सुंदर और सुगंधित फूल भी तो प्रकृति ने पैदा किये हैं, उन्हें क्यों नहीं अर्पित कर सकती हो?’’

 तुम नहीं समझोगे, कभी कथा सुनी हैं? पंडित लोग कहते हैं कि भोलेनाथ को अकौआ के फूल पसंद हैं, जो कोई भी उन्हें यह फूल भेट  करता है उससे प्रसन्न होकर वे उसके द्वारा जाने अनजाने किये गये, सभी पाप नष्ट कर देते हैं।’’

‘‘ वाह! वाह! क्या बात कही है, भगवान को जहर देकर स्वयं अमर होने की अच्छी विधि बतायी है!’’


117 फैशन


‘‘ देखो तो! ये क्या पहनावा है आजकल का ! ‘‘

‘‘ तुम क्या जानो! इसे कहते हैं माॅडर्न फैशन‘‘

‘‘ हः हः हः .. .. माॅडर्न फैशन! ‘‘

‘‘ अरे! इसमें हंसने की क्या बात है?‘‘

‘‘ मुझे तो लगता है कि इसके पीछे फैशन और कास्मेटिक के उद्योगपतियों की सोची समझी चाल है‘‘

‘‘कैसे?‘‘

‘‘कम लागत में अधिक कमाई करने की‘‘

‘‘क्या मतलब?‘‘

‘‘ शरीर पर कपड़ा कम होगा तो डिजाइन वाली ड्रेस बनाने में कच्चा माल कम लगेगा और ब्राॅंड तथा डिजाइन के नाम पर कीमतें अधिक मिलेंगी ‘‘

‘‘बस‘‘

‘‘ अरे! अब यह भी कोई बताने की बात है कि शरीर का अधिकांश भाग खुला रहेगा तो उसको चमकदार बनाये रखने के लिये अधिक कास्मेटिक्स का उपयोग करना पड़ेगा कि नहीं?‘‘ 


116 चोर


‘‘ पकड़ो, पकड़ो, चोर... चोर...  वह भागा, उस टपरे की तरफ ‘‘

‘‘ ए.. ए.. ए.. हाॅं, आ गया पकड़ में , क्यों रे चोरी करता है? इतनी सी उमर में चोरी करने को दिन दहाड़े घर में घुसता है? ‘‘

... और चट चट की आवाज के साथ अनेक थप्पड़ जड़ते हुए दो लोगों ने उसे पकड़ ही लिया। वह रोते चिल्लाते वहीं बैठ गया। इसी बीच दौड़ते हुए  दो तीन लोग और आये और अपने अपने हाथ उठाकर बाकी कसर निकालने के  लिये पिल पड़े। टपरे में रहने वाले व्यक्ति से नहीं रहा गया इसलिये बोला,

‘‘ अरे भाइयो! इतना क्यों मारते हो छोटा सा लड़का है, पहले पूछ तो लो कि वह घर में क्यों घुसा था‘‘

‘‘ क्यों रे! क्यों घुसा था घर में?‘‘

‘‘ भैया! दो दिन से भूखा हॅूं, इसलिये रोटी पाने के लिये घुसा था‘‘ वह रोते रोते बोला।

टपरे में रहने वाले व्यक्ति ने उसे दो रोटी और भात लाकर दिया जिसको उसने इस प्रकार लपका जैसे बिल्ली चूहे को, और  पिटाई के दर्द को भूल तत्काल खाने लगा।  पीटने वाले मूक हो यह दृश्य देखते रहे ।


115 आडम्बर

 नगर सेठ पूजा करने के बाद मंदिर की सीढ़ियाॅं उतरते हुए गुनगुनाते आ रहे थे, 

‘‘ तेरा तुझको अर्पित क्या लागे मेरा ’’

नीचे बैठे याचक आशा भरी निगाहों से उन्हें देखने लगे।

स्तुति गाते सेठ जी , हाथ में लिये चने और चिरोंजी दानों के मिश्रण वाले कागज के पेकेट में से थोड़े थोड़े से निकालते, उन्हें प्रसाद के रूप में बाॅंटते हुए चले जा रहे थे कि अपनी कार तक पहुंचने से पहले ही पेकेट की सामग्री समाप्त हो गई।

शेष रह गये याचक लोग आशान्वित थे कि शायद दूसरा पेकेट निकालेंगे, परंतु सेठ जी, ‘‘कहत शिवानन्द स्वामी वाॅंछित फल पावे’’ गुनगुनाते हुए कार में बैठ कर फुर्र हो गये । 


114 इन्द्रजाल

 

गेट पर भजन गाते भिखारी को कुछ देने के लिये शर्मा जी ज्योंही उठे सामने से मित्र गुप्ता जी गेट के भीतर आते दिखे। उन्हें नमस्कार कर बैठने का इशारा करते हुए भिखारी को पाॅंच रुपये का सिक्का देकर बोले, अभी एक भजन और सुनाओ पाॅंच रुपया और दॅूंगा, सुनकर भिखारी दूसरा भजन सुनाने के लिये अपना तम्बूरा ठीक करने लगा और शर्माजी, गुप्ता जी के पास बैठते हुए बोले ...

‘‘ कहो आज कैसे भूल पड़े ?’’ 

‘‘ अरे! तुम्हें मालूम नहीं? तुम्हारे एरिया के सामुदायिक भवन में एक पहॅुचे हुए संत आये हैं, उन्हीं के दर्शन करने आया था, सोचा यहाॅं तक आये हैं तो आप से भी मिलता चलॅूं।’’

‘‘ आपकी कृपा है, मुझे याद रखा।’’

‘‘ लेकिन यार! आश्चर्य है, दूर दूर से बड़े बड़े लोग संत जी से मिलने आ रहे हैं और तुम्हें पता ही नहीं है? विधायक, मंत्री और जिले के बड़े अफसर और नागरिक सभी की भीड़ इतनी थी कि बैठने की जगह ही कम पड़ गयी, मैं भी पीछे की ओर खड़े हो कर ही उन्हें देख पाया। वाह! क्या भव्य रूप है भाई, धन्य हो गया देखकर .... .... ( गुप्ता जी अपना कथन जारी रखे थे, शर्मा जी बिना कुछ प्रतिक्रिया किये सुनते जा रहे थे, और बीच में ही भिखारी भी अपने भजन को तम्बूरे की तान पर गाने लगा था... हरि बोल , हरि बोल, हरि बोल रे मन ... )

... लौटते हुए तुम्हारे घर तक लगभग एक किलोमीटर आने में एक घंटा लग गया, भीड़ केे कारण ट्रेफिक ही जाम हो गया था।’’

‘‘ मित्र गुप्ता जी! क्या बता सकते हो सन्त जी ने क्या कहा मिलने आई भीड़ से?’’

‘‘ मैंने बताया न ! कि भीड़ बहुत थी और मैं सबसे पीछे खड़ा कुछ स्पष्ट सुन ही नहीं पाया वे बहुत देर से बोल रहे थे और मेरे पहुंचने के पन्द्रह मिनट के बाद प्रवचन समाप्त हो गया।’’

( इसी बीच शर्माजी ने भिखारी को पास बुलाया और पाॅंच रुपये का सिक्का देते हुए कहा, बहुत अच्छा भजन गया, धन्यवाद, भिखारी सिक्का लेकर तुरन्त ही दूसरे घर जा पहुंचा ) शर्माजी बोले,

‘‘गुप्ता जी! इन व्यावसायिक प्रवचनकर्ताओं और उनके चेला मेकिंग सिस्टम में बंधे ये तथाकथित लोग इस भजन गायक भिखारी की तरह ही होते हैं’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘देखा नहीं ? इस भिखारी ने भजन तो कितना मार्मिक गाया परंतु उसका अर्थ नहीं समझता रंचमात्र भी। गा रहा था ईश्वर का भजन पर उसका ध्यान था पाॅंच रुपये के सिक्के पर कि कब मिले और वह अन्य स्थान पर माॅंगने जा सके। इसी प्रकार इन विधायकों , मंत्रियों, अफसरों या अन्य श्रोतागणों का लक्ष्य भी केवल प्रवाचक के संबंध में प्रचारित किये गये गुणगान से आकर्षित होकर मान, प्रतिष्ठा, पद और धन पाने की लालसा में तथाकथित कृपा पाने के लिये ही होता है, ईश्वर को पाने के लिये तो बिलकुल नहीं।’’

‘‘तो क्या ...! ...! ...!’’

‘‘ बिल्कुल, इन व्यावसायिक प्रवचनकर्ताओं का लक्ष्य भी प्रवचन करने के रेम्युनरेशन और इन तथकथित बड़े लोगों को, ईश्वर के सबंध में बड़ी बड़ी बातें करते हुए अपने चेलामेकिंग सिस्टम के इंद्रजाल में फंसाये रखने का ही होता है ।’’


113 कट्टरता


‘‘ क्यों ! शिमला मिर्च किस भाव से दी है ?’’

‘‘साठ रुपया किलो’’

‘‘और परमल‘?’’

‘‘पचास रुपये’’

‘‘ कुछ कम कर लो भाईजान! एक, एक किलो चाहिये हैं?’’

‘‘ एक किलो लो या एक क्विंटल रेट यही लगेंगे’’

‘‘ अरे, सही सही बताओ यार! कुछ तो कम कर लो’’

‘‘ अरे साब! अन्ठावन और अड़तालीस रुपया प्रति किलो की खरीदी चीज को साठ और पचास में नहीं बेचेंगे तो इस 46 डिग्री में बैठकर हम अपने बालबच्चे कैसे पालेंगे?’’

‘‘सच बोलना भाईजान, रोजे चल रहे हैं?’’

‘‘ अरे साब! रोजों को बीच में क्यों लाते हो, रोजे अपनी जगह और धंधा अपनी जगह?’’

‘ क्यों ? कामधंधा ठीक तरह से चलता रहे इसीलिये तो रोजे रखते हो? धर्म और कर्म में अन्तर क्यों करते हो?’’

‘‘ देखो साब! लेना हो तो लो, रेट कम नहीं होंगेे, नहीं तो अपना रास्ता देखो, रोजे और धर्म के बारे में आप हमें कुछ मत सिखाईये, ज्यादा खींचतान की तो हम अपने असली धर्म पर उतर पड़ेंगे, समझे?’’


112 लंघन


स्टेशन रोड के किनारे बने ढाबेनुमा टपरे से लगे एक खंडहर की दीवार  के पास बैठे आठ दस भिखारियों को ढावे के मालिक का नौकर बचे हुए जूंठन को एकत्रित कर उन्हें क्रमशः बाॅंटते हुए कहता है,

‘‘ हाॅं! बता कितने हैं?‘‘

‘‘ चार‘‘

‘‘ अच्छा, ले कटोरे में दाल, चावल‘‘

‘‘चल तू   बता रे! आज क्या फिर खाली है?‘‘

‘‘ नहीं मालिक! दो ही मिले हैं‘‘

‘‘ देख बहुत उधारी अच्छी नहीं, समझा?‘‘

‘‘ सब चुका दूंगा साब! आज तो रोटी दे दो‘‘

‘‘ ले तू रोटी, पर कल से नहीं मिलेगी, उधारी चुकाना होगी पहले ‘‘

‘‘अबे!  तू  उधर क्या देख रहा है, मिला कुछ कि नहीं?‘‘

‘‘ एक रुपया ही है साब!‘‘

‘‘ साले! दिनरात दो कट्टा बीड़ी पीने को दस रुपये खर्च करता है पर खाने के लिये एक रुपया दिखाता है, आज तो ले ले पर कल से नहीं आना‘‘

‘‘ ओ किनारे पर लेटे लाटसाहब! तुम्हें क्या अलग से निमंत्रित करना पड़ेगा, गर्मी में कथरी ओढ़े कल से डले हो, तुम्हें चाहिये कुछ ?‘‘

‘‘ नहीं ‘‘ (धीमें से बोला)

‘‘अरे! क्या मर गया? जोर से नहीं बोल सकता?‘‘

‘‘ कह दिया न!!! कोई जरूरत नहीं !!!‘‘ (अपनी रही सही ताकत जुटा कर जोर से बोला)

‘अबे! गरजता क्यों है?‘‘ 

‘‘अरे, छोड़ो साब! मुझे दे दो, वह तो कहता है कि लंघन करने से ज्वर के कष्टों से ही नहीं, कष्टदायी इस जीवन से भी छुटकारा मिल जाता है, इसीलिये वह लंघन कर रहा है।‘‘


111 न्योंता

 

‘‘ समझ में नहीं आता किसके यहाॅं जाऊं और किसके यहाॅं नहीं! एक ही दिन चंदनसिंह बुंदेला और रामरतन यादव दोनों की लड़कियों की शादी है।’’

‘‘दोनों ही तुम्हारे स्कूल के दिनों के मित्र हैं, मेरे अनुसार तो किसी प्रकार व्यवस्था करके दोनों जगहों पर उपस्थिति देना चाहिये, आखिर दोनों के यहाॅं लड़की की शादी है?’’

‘‘तुम ठीक कहती हो, मेरा भी यही विचार है, परंतु जब से हमारे सुपुत्र ने अन्तर्जातीय विवाह कर लिया है तब से मेरे साथ चंदनसिंह का व्यवहार ही बदल गया है। वह हर समय मौके की तलाश में रहता है कि कैसे मेरा सार्वजनिक मजाक उड़ा  कर अपमानित कर सके।’’ 

‘‘ इसमें किसी को क्या दोष दें, मातापिता की गलतियों का परिणाम संतान को और संतान की गलतियों का परिणाम माता पिता को ही तो भोगना पड़ता है, यही संसार का नियम है’’

‘‘ यह तो ठीक है, परंतु यदि कोई सम्मान पूर्वक मुझे विष पिला दे तो मैं सहर्ष पी सकता हॅंू परंतु अपमान के साथ दिया गया अमृत कभी नहीं। यद्यपि रामरतन से मेरे सैद्धान्तिक मतभेद प्रारंभ से ही रहे हैं परंतु उसने मुझे आदरपूर्वक बुलाया है अतः मेरा विचार तो वहाॅं जाने का ही है ।’’


110 षडयंत्र

  ‘‘ जानते हो? मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने पदोन्नतियों में एससी एसटी के लिये दिये जाने वाले आरक्षण को अवैध निर्णीत किया है, इसलिये 2002 से अब तक जितने लोगों को इस प्रकार के आरक्षण का लाभ मिल गया है उन्हें रिवर्ट किया जायेगा?"

‘‘नहीं ! मध्यप्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की तैयारी कर ली है। आधार यह बताया जा रहा है कि यदि हाई कोर्ट के आदेश का पालन किया तो एससी एसटी के लोग धर्म परिवर्तन कर लेंगे। वे लोग यह धमकी दे भी रहे हैं।"

‘‘परंतु एक बात संमझ में नहीं आती कि हमारी सरकारें इस भूत को क्यों पाले हुए हैं, आखिर जिन्हें सचमुच लाभ मिलना चाहिये उन्हें तो मिलता नहीं है, पिछले  पैंसठ सालों में भी इनकी स्थिति में कोई परिवर्तन दिखाई नहीं दिया।"

‘‘ अरे तुम नहीं समझोगे, यह भूत तो अंग्रेज ही छोड़ गये हैं!! भारत में जाति भेद और वर्गसंघर्ष को बनाये रखने, समाज में विद्रूपता का पोषण करने और एकता को खंडित करने के लियेे। यह उन्हीं की सोची समझी चाल थी जिसे अब हमारी सरकारें भी अपनी कुर्सी बचाने के लिये अस्त्र की तरह प्रयुक्त करती रहतीं हैं।"

‘‘कैसे?"

‘‘ याद करो, अंग्रेजों ने भारत की इस ‘जाति भेद और ऊंचनीच‘ की आन्तरिक कमजोरी का लाभ उठाकर ऐंसे कानून बनाये जिन्होंने भारत की राजनीति में जहर भर दिया जैसे, उन्होंने हिंदु और मुसलमानों में घृणा भरकर, मुसलमानों के लिये ‘‘मिन्टो मारले सुधार कानून 1919‘‘ बनाया और इस जाति के मतदाताओं की व्यवस्था पृथक ही बना दी। बाद में, इसी वर्ष  ‘‘मान्टेज. केमस्फोर्ड सुधार कानून‘‘ में भी इनके साथ साथ अन्य अल्पसंख्यकों जैसे क्रिश्चियन, सिख और एंग्लो इंडियन्स के लिये भी जोड़  दिया गया। इस प्रकार, जाति की राजनीति और आरक्षण के षडयंत्र का बीजारोपण तो ब्रिटिश शासन में ही किया गया था। इसी का पालन करने की व्यवस्था हमारे संविधान के आर्टीकल 334 में भी बनाये रखी गयी है "


109 प्रायश्चित


  ‘‘कृपानन्द!. . .कृपानन्द !!. . .’’

‘‘आया गुरुदेव, आया . . .आ हा! अवश्य मेरे अनेक जन्मों  के पुण्य प्रकट हुए, आप मेरे घर पधारे... साष्टाॅंग दण्डवत् प्रणाम करता हॅूं गुरुदेव। आइये आसन ग्रहण कीजिये।’’

‘‘ कृपानन्द! मैं यहाॅं बैठने नहीं आया हॅूं, तुमसे कुछ प्रश्न पूछने आया हॅूं।’’

‘‘ अवश्य पूछिये भगवन्, ’’

‘‘ तुम एक पिता हो, अपनी संतान से क्या अपेक्षा करते हो?’’

‘‘ महाराज! जैसे सभी माता पिता अपनी संतान से अपेक्षा करते हैं, यही कि वे चतुर्दिक उन्नति करें और जीवन में अपने पिता से भी अधिक ऊंचे कीर्तिमान स्थापित करें’’

‘‘ बहुत अच्छा, कृपानन्द! तुम एक गुरु भी हो , तुम अपने शिष्यों से क्या अपेक्षा रखते हो?‘‘

‘‘ प्रभो! यही कि वे अपने गुरु के ज्ञान को प्रचारित कर उसमें अपने पराक्रम से अनेक गुना बृद्धि करें और गुरुत्व के स्तर को और ऊंचा करने में जुटे रहें।’’

‘‘ लेकिन मुझे अन्तः ज्ञान हुआ है कि तुमने अपने एक मेधावी शिष्य के द्वारा पूछे गये परिप्रश्नों का उचित समाधान न कर, उन्हें प्रतिष्ठा का बिंदु बना लिया, तुम्हें लगा कि यह तो तुम्हारे ज्ञान के स्तर से भी अधिक आगे निकल रहा है इसलिये तुमने उसे हतोत्साहित कर अपमानित भी किया ? आखिर क्यो?’’

‘‘ नहीं गुरुदेव! मेरा यह मतलब कदापि नहीं था’’

‘‘ असत्य बोलकर क्या तुम मेरे अन्तः ज्ञान की परीक्षा ले रहे हो?’’

‘‘नहीं महाराज! बिलकुल नहीं ! ! दर्पान्धकार ने मुझे घेर लिया था’’

‘‘ तो प्रायश्चित स्वरूप दण्ड का निर्धारण स्वयं करोगे या मुझे ही निर्धारित करना पड़ेगा?’’

‘‘हे करुणानिधान ! आपका निर्धारण ही मुझे प्रसाद स्वरूप है’’

तो सुनो . . अब तुम्हें अपने ज्ञान स्तर के, कम से कम पचास शिष्य और तैयार करना होंगे? इन शिष्यों को एक वर्ष बाद मुझसे शास्त्रार्थ करना होगा यदि शास्त्रार्थ में एक भी शिष्य कमजोर पाया गया तो पुनः पचास नये शिष्य इसी स्तर के तैयार करना होग, समझेे


Sunday, September 13, 2020

108 रूपान्तरण

‘‘ यार! ये लड़के हैं या लड़कियाॅं? पोशाक से तो समझ में नहीं आता. . ।’’

‘‘ हाॅं , यह आज कल का फैशन है इसमें महिला और पुरुष के भेदभाव को समाप्त कर दिया गया है भले ही वह केवल कपड़ों तक ही सीमित हो’’

‘‘ क्या मतलब?’’

‘‘मतलब यह है कि पोशाक बदलकर वे अपने को साहसी और सुरक्षित होने का अनुभव करतीं हैं परंतु मनोभावनायें वही पुरानी रहती हैं क्योंकि वह तो प्रकृति पदत्त हैं’’

‘‘बात तो मार्के की है यार! पर वे भी हिमालय की चोटी पर चढ़ लेती हैं, सेना में फायटिंग कर लेती हैं, वायुयान तक उड़ा लेती हैं’’ 

‘‘ हाॅं, परंतु केंचुआ, काकरोच और छिपकुली से अभी भी डरती हैं।’’

‘‘ तुम्हारी बातों को सुनकर मुझे चालीस साल पहले गंगासागर यात्रा में मिले महामहोपाद्याय गंगानन्द जी की भविष्यवाणी याद आ गयी’’

‘‘ क्या?’’

‘‘ उनका कहना था कि पुरुषों ने महिलाओं को हजारों वर्ष अपना गुलाम बनाये रखकर अनेक प्रकार के अत्याचार किये हैं, सामाजिक स्तर पर उन्हें बराबरी का स्थान न देकर दूसरा दर्जा ही दिया है, इसलिये अब उनके मन में जमी प्रतिशोध की भावना एक दिन जागेगी और प्रकृति भी उनका साथ देगी। सभी महिलायें पुरुष और सभी पुरुष महिलाओं में रूपान्तरित हो जायेंगे! ! !’’

" अरे अच्छा याद दिलाया, अभी कुंभ मेले में मिले स्वामी विचित्रानन्द जी तो यह रहे थे कि अगले पाॅच सौ सालों में विश्व के महिला और पुरुषों में पारिवारिक संबंध शून्य होकर परस्पर जिम्मेदारी की भावनायें ही समाप्त हो जायेंगी, लिव इन रिलेशन, लेसवियन रिलेशन, और गे रिलेशन की भरमार होगी। सभी आदिमानवों की तरह लिवरटाइन हो जायेंगे।’’


107 पिंटू की पाॅटी

 

‘‘ राजू! जरा संडे का पेपर ढूंड कर देना, उसमें मेरी कथा छपी है।’’ 

‘‘ लीजिये पापा, इसमें तो मुझे नहीं दिखी! किसी और दूसरे दिन का तो नहीं चाहिये?’’

‘‘ अरे नहीं भाई! इसी का सातवाॅं पृष्ठ देखो, कहाॅं है,?

‘‘ सातवाॅं पृष्ठ तो. . .   इसमें नहीं है शायद मम्मी ने. . . ’’

‘‘ क्यों ! ! इस पेपर का सातवाॅं पृष्ठ कहाॅं है? मुझे उसकी जरूरत है।’’

‘‘ अरे उस दिन पिंटू ने फर्श पर ही पाॅटी कर ली थी ना , सो शायद उसी को फाड़ कर सफाई कर फेक दिया होगा" 

‘‘ अरे मूर्ख! तुझे भी पाॅटी को साफ करने के लिये वही पृष्ठ मिला? उसमें मेरी कथा छपी थी और तुमने उसी को. . .?

‘‘  हाॅं, उसमें एक ओर तो विज्ञापन थे और दूसरी ओर कुछ बेकार टाइप की न्यूज, इन पेजों को कोई सम्हालकर रखता है क्या?’’

‘‘ अरे तुमने कभी साहित्य पढ़ा, समझा होता तो लघुकथा का महत्व जान पातीं, मगर ओह! तुमने तो गुड़ गोबर एक कर दिया?’’

‘‘  जानती हॅूं, तुम्हारी लघुकथायें किसी को समझ में तक आती नहीं हैं, सभी लोग मजाक उड़ाते हैं फिर भी दिन रात उन्हीं में अपना समय और दिमाग खराब करते रहते हो? फेक दिया तो फेक दिया, रद्दी कागज ही तो था?’’

‘‘ तुम क्या जानो? . .  उत्तम लघुकथा वही है जो किसी की समझ में आये या नहीं परंतु बार बार पढ़ना अवश्य चाहे।’’


106 लच्छू बरेदी

 

पढ़ाई में मन न लगने पर ‘लच्छू’ भी अपने पूर्वजों के धंधे, पशुपालन करने और दूध बेचकर परिवार का पालनपोषण करने में रम गये और नाम पड़ गया लच्छू बरेदी पर शौक हो गया पहलवानी का। हर साल नागपंचमी पर ‘लच्छू बरेदी‘ की कुश्ती देखने के लिये बच्चे, युवा और बूढ़े सभी उत्साह से आते और क्षेत्र के अन्य पहलवानों के साथ उसके पेंतरे देख सभी उसकी भूरिभूरि प्रशंसा करते रहते। जब आसपास के सभी पहलवान लच्छू बरेदी से हारने लगे तब उसके चर्चे दूर दूर तक होने लगे और अन्य स्थानों से भी प्रसिद्ध पहलवान और अनेक दर्शक लच्छू की कुश्ती प्रतियोगिता में भाग लेने/ देखने आने लगे। एक बार नागपंचमी को जिला स्तर पर प्रस्तावित कुश्ती प्रतियोगिता का उद्घाटन करने और जीतने वाले पहलवानों को पुरस्कार प्रदान करने के लिये जिले के युवा ‘‘आइएएस’’  कलेक्टर को मुख्य अतिथि बनाया गया । कलेक्टर ने लच्छू की पेंतरेवाजी से प्रसन्न हो विशाल जन समूह के सामने  अपनी ओर से पुरस्कार देते हुए कहा -

‘‘ लच्छू जी! आपके दावपेंच, फुर्ती और जोश की जितनी तारीफ की जाय कम है, इसे पाने के लिये आपने सचमुच बहुत दिनों तक कड़ा अभ्यास और पराक्रम किया होगा, मुझे तो यह  ‘कलेक्टर’ की परीक्षा पास करने से भी कठिन लगता है ।’’ 

‘‘ बिलकुल साब! किया होगा नहीं, रोज ही करता हॅूं.... ‘कलेक्टर’ की परीक्षा पास करने के लिये तो अच्छी तरह पढ़ाई कर केवल एक बार ही परीक्षा पास करना होती है। परंतु पहलवान को तो रोज ही, एक सी मेहनत करने की परीक्षा पास करना होती है; जिसदिन मेहनत नहीं कर पाते, लगता है पहलवान नहीं हॅूं।’’


105 रहीम


अकबर बादशाह के नवरत्नों में से एक ‘‘अब्दुल रहीम खान ए खाना‘‘ अपनी विलक्षण प्रतिभा के कारण हिंदी काव्यसाहित्य में अत्यंत सम्मानित हस्ताक्षर माने जाते हैं। हिंदी ही नहीं उनकी दक्षता संस्कृत में भी कम नहीं थी। आश्चर्यजनक यह है कि, उनका व्यक्तित्व परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाले गुणों के उच्चतर समन्वय को प्रकट करता है जैसे, मुसलमान होते हुए भी कृष्ण के अनन्य भक्त होना, कवियों का कोमल हृदय और सेनापति की वीरता होना, अहंकारशून्य दानी होना, तुर्की, अरबी , फारसी के समान ही संस्कृत पर पकड़ होना, क्रूर मुगल शासकों केे साथ रहते हुए अपनी सात्विकता को न खोना आदि, आदि। 

सामान्यतः जब कोई भी संबंधी, मित्र या जनसामान्य उनसे मिला करते तो वह अन्य औपचारिक बातों के साथ साथ उन्हें ईश्वर चिंतन की ओर अपना रुख करने के लिये निवेदन भी करते थे। एक बार उनके किसी मित्र ने बातचीत के बीच उनसे पूंछ ही लिया कि, 

‘‘ क्या यार! तुम जब भी मिलते हो छोटा हो या बड़ा, सबसे बार बार यही दुहराते हुए प्रेरित  करते हो कि भगवान का भजन करना चाहिये, उन्हें सदा याद करना चाहिये। अरे! यह तो बुढ़ापे के काम हैं, तुम तो सभी को बाल्यावस्था से ही सन्त बनाना चाहते हो, इसका क्या मतलब?’’

रहीम ने विनम्रतापूर्वक उनसे निवेदन किया-

‘‘ कृष्ण! त्वदीय पदपंकजपंजरान्ते अद्यैव मे विशतु मानस राजहंसः, 

  प्राण प्रयाण समये कफवातपित्तैः कन्ठावरोधेेनबुधौ स्मरणम् कुतस्ते ?’’

(अर्थात् हे कृष्ण! तुम्हारे पैर रूपी पिंजरे में मेरा मन रूपी राजहंस आज ही प्रवेश क्यों न कर जाये, क्योंकि बुढ़ापे में जब गले में कफ, वात और पित्त ही भरा रहेगा तो तुम्हारे नाम का शुद्ध उच्चारण भी कैसे हो सकेगा?)

उनके मित्र निरुत्तर हो उनके पैरों पर गिर पड़े और रहीम ने तत्काल उठाकर उन्हें गले से लगा लिया।


104 गृहस्थ सन्त

 

रामनाथ जी अपने क्षेत्र के विद्वानों में अग्रगण्य थे। सहजता, सात्विकता, और आध्यात्मिकता उनके आभूषण थे तथा ज्ञान, कर्म और भक्ति उनके अंगवस्त्र ।  सौभाग्यवश उनकी सहधर्मिणी भी उन्हीं के स्वभाव की ही थीं। 

उसी क्षेत्र के एक धन सम्पन्न सज्जन को पूर्व जन्म के किसी सुसंस्कारवश विचार आया कि किसी सुपात्र और सात्विक धर्मपारायण व्यक्ति की तलाश कर अपने धन का कुछ भाग उन्हें देकर पुण्य लाभ लिया जाय। अपने सहयोगियों से परामर्श लेने पर उन्होंने पाया कि पंडित रामनाथ जी से श्रेष्ठ और योग्य अन्य कोई नहीं है जिन्हें वे अपना धन देकर कृतार्थ हो सकते हैं। उन्होंने रामनाथ जी के पास जाकर निवेदन किया-

‘‘ महोदय! क्या आपकी कोई समस्या है, हो तो बतायें , मुझे उसका समाधान करने में प्रसन्नता होगी’’

‘‘ हाॅं! कुछ देर पहले एक श्लोक का अर्थ कुछ परेशान कर रहा था, पर अब सब ठीक है, अब कोई समस्या नहीं है’’

‘‘ अरे महात्मन्! मैं उस समस्या की नहीं, घर गृहस्थी में किसी वस्तु या धन की आवश्यकता की बात कर रहा था’’

‘‘ अरे... घर गृहस्थी के संबंध में तो मेरी धर्मपत्नी ही बता सकती हैं, उन्हीं से पूछ लीजिये’’

‘‘ माता! आपको अपने घर गृहस्थी के संचालन में यदि किसी चीज की कमी हो तो आदेश करें’’

‘‘ आज तो दाल और चावल पर्याप्त है, हाॅं, आटा भी है और... उनके पसंद की आम की चटनी का भी प्रबंध हो गया है, लगता है किसी भी चीज की कमी नहीं है, सब कुछ है, धन्यवाद।’’

 अपने धन का दर्प समेटे सज्जन, चुपचाप वापस चले गये।


103 राज्यादेश


 अंग्रेजी शासन के विरुद्ध चलाये जा रहे आन्दोलन में भाग लेने के उद्देश्य से बुंदेलखंड के एक राजा ने गाॅंधी जी के आमंत्रण पर सलाहकारों के परामर्श पर वहाॅं जाने से पहले अपने राज्य की जनता को सावधान रहने के लिये संबोधित करने हेतु व्यवस्था बनाई। इसके लिये राज्य में शायद पहली बार एक बहुत ऊंचा मंच बनाया गया जिसमें तीन दिन लगे और मुनादी करा दी गयी कि राजा अपनी प्रजा से कुछ कहना चाह रहे हैं इसलिये सभी लोग अमुक दिनाॅंक को किले के मैंदान में उपस्थित रहें।

निर्धारित दिन को राज्य के सभी लोग सबेरे से ही आने लगे और मैदान में यथा स्थान बैठते गये, जिन्हें जमीन पर स्थान न मिला वे मैदान के किनारे बने मकानों की छतांे और पेड़ों की शाखाओं पर जा बैठे। सब की नजरें मंच की ओर लगीं थीं कि कब राजासाब आयें और वे हमसे क्या कहना चाहते हैं, सुनें । अब तक राज्य के संभवतः पहली बार हुए इस आयोजन में प्रजा उत्सुकता और आश्चर्य से बेचैन थी कि आखिर तमाशा क्या होने वाला है। अन्ततः दोपहर में राजासाब अपनी चमकती तलवार लहराते मंच पर आये, और ऊंचे स्वर में बोले-

‘‘ देखो रे ! सबजने अच्छी तरा सें कान दै कें सुन लेव! मोय बुलाव है ओ गाॅंधी ने दिल्ली में, सो मैं तो जा रव हों उतै, तीनक दिन लग जेंहें, सो इतै तुम औरें सबजने शान्त रइयो चाय कोऊ कछु कैत रैवे, समजे? जल्दी लौट आहों।‘‘

यह कहते हुए राजासाब मंच से उतर कर महल की ओर चले गये, प्रजा में  फिर भी देर तक फुसफुसाहट होती रही ... ...‘‘काय रे! काय कई राजा ने, तेंने सुन पाई कछु कै नईं?‘‘

‘‘ आंहाॅ !  मोय तो कछु समजई में नईं आई।‘‘ 

‘‘ बताव तौ ! इत्ती सी बात कैवे खों कित्तो बड़ो तमासौ करौ!‘‘ 

‘‘चलो रे, भग चलो घरै ... ‘‘

.... और, धीरे धीरे मैंदान खाली हो गया।


102 रिजल्ट

 

‘‘अच्छा! सभी विषयों की कापियाॅं जंच गई या किसी की अभी रह गईं है?’’

‘‘ यस सर! सभी की जंच गईं हैं।’’

‘‘ बताइये ग्यारहवीं कक्षा की हिंदी का रिजल्ट कैसा है?’’

‘‘ सर! 19 छात्र प्रथम श्रेणी, 27 छात्र द्वितीय श्रेणी और 4 तृतीय श्रेणी में पास हैं और हिंदी का शतप्रतिशत रिजल्ट है।’’

‘‘ बहुत अच्छा। अंग्रेजी का रिजल्ट कैसा है?’’

‘‘ सर! 10 छात्र पास हैं, 32 को सप्लीमेंटरी क्योंकि कृपाॅंक मिलाकर भी पास नहीं हो पा रहे हैं, और 8 छात्र बिलकुल फेल हैं, कुल 20 प्रतिशत रिजल्ट है’’

‘‘ अरे भाई! विदेशी भाषा है, देख लो इन सप्लीमेंटरी वालों को, यदि कुछ गुंजायश हो तो निकाल दो, क्यों फिर से परीक्षा के चक्कर में डालते हो?’’ 

‘‘ लेकिन सर! उन्हांेने कुछ लिखा ही नहीं है, हम तो वैसे ही छोटी मोटी गलतियाॅं ओवरलुक कर देते हैं, हमने पूरी कोशिश कर ली सर! ‘5 अंक‘ कृपाॅंक के मिलाने पर भी नहीं निकल पा रहे हैं। ’’

‘‘ फिर भी कुछ और देख लो रिजल्ट बढ़ सकता है, समझे कि नहीं?’’ .... 

 हाॅं! आपकी गणित का क्या हाल है?’’

‘‘ सर! बहुत बुरा हाल है, केवल 5 छात्र पास हैं वे भी बाउंडरी से। बाकी 45 छात्र फेल हैं केवल 10 प्रतिशत रिजल्ट है’’

‘‘ अरे! यह कैसे हो सकता है? क्या आपने बिल्कुल ही नहीं पढ़ाया? केवल 5 छात्र पास हैं, लगता है आप अपने साथ मेरे भी चार इंक्रीमेंट बंद कराओगे? लाओ जरा देखें कापियों में क्या उत्तर दिये हैं उन्होंने?’’ 

‘‘ देखिये सर! सब कुछ गलत लिखा है, कहाॅं पर नंबर दूं?’’

‘‘ अरे! देखो यह गोला तो बना है? इस पर, ये समीकरण तो  लिखा है? इस पर, और आगे भी उसने कई सवाल थोड़े थोड़े तो लिखे हैं, क्या उन पर नंबर नहीं दिये जा सकते?’’

‘‘ नहीं सर, वृत्त का प्रश्न है और उसने गोले का उत्तर लिखा है, समीकरण भी गलत लिखा है उसपर कोई अंक नहीं दिया जा सकता, आगे भी उसने केवल प्रश्नों की इबारत ही लिखी है देख लीजिये प्रश्न पत्र ये है, इस प्रकार इसे पास नहीं किया जा सकता, ये सब अगली बोर्ड की परीक्षा में पूरे स्कूल का रिजल्ट बिगाड़ेंगे।’’

‘‘ अरे भाई वो तो मैं भी जानता हॅूं, मैंने भी गणित पढ़ी और पढ़ाई है, सरकार जो चाहती है वैसा ही करो, पास कर दो सबको या फिर इन्क्रमेंट बंद होने का दंड पाओ, तुम्हारा नया नया कैरियर है, काला दाग लग जायेगा कि पढ़ाता नहीं है और मेरा रिटायरमेंट निकट है मेरी तो लुटिया ही डूब जायेगी समझे कि नहीं ? इसलिये जैसा कहा है वैसा ही करो और प्रसन्न रहो।’’

‘‘ लेकिन सर ! !’’


101 मानसिक बीमारी


‘‘रमेश! कालेज से लौटते समय तुम सिविल लाइन में पाॅंडे जी और उन्हीं के बगल में रहने वाले तिवारी जी को कल दोपहर में अपने घर पर भोजन करने का सपरिवार निमंत्रण देते आना। वहाॅं से आगे जाकर गौघाट पर रहने वाले गुप्ताजी और खरे साब को भी कहते हुए घर आ जाना। मैं शाम को घूमने जाते समय चतुर्वेदी जी से कह दूंगा। कल तुम्हारी माॅं की बरसी है, ग्यारह ब्राह्मणों का भोजन कराना है।’’ 

‘‘ लेकिन पापा! मैं तो कल केमिस्ट्री प्रेक्टीकल क्लास से देर में ही छूट पाऊंगा,  सभी जगह कैसे जा पाऊंगा? अतः कुछ लोगों को फोन से कहे देते है।‘‘

‘‘ तुम अपनी अकल क्यों लगाते हो? निमंत्रण घर पर जाकर ही दिया जाता है यही परंपरा है। ’’

‘‘ यदि ब्राह्मणों को ही भोजन कराने की परम्परा है तो गुप्ता और खरे अंकल को आमंत्रित करने की क्या आवश्यकता, यह तो परंपरा का पालन नहीं हुआ? और यदि यह उचित है तो उन्हें भोजन क्यों कराया जाय जो रोज दिन में चार बार खाते हैं, मेरे विचार से तो भोजन भूखे लोगों को ही कराया जाना चाहिये चाहे वे कोई भी हो।’’

‘‘ तुमने कालेज की चार किताबें क्या पढ़ ली सभी परंपराओं को तोड़ने और संस्कारों की होली जलाने को ही उत्सुक रहने लगे हो? जैसा कहा है वैसा ही करना, समझे?’’

‘‘ पापा! मेरी यह समझ में नहीं आता कि आप लोग परंपरा के नाम पर अवैज्ञानिक, अतार्किक और अविवेकपूर्ण पृथाओं को क्यों पाले रहना चाहते हैं । क्या आप बता सकते हैं कि सभी के पूर्वज धोती कुर्ता पहना करते थे तो उसे छोड़कर अब पेंट शर्ट क्यों पहिनते हैं? बैलगाड़ी को छोड़ कर कार, रेल और एरोप्लेन में क्यों यात्रा करते हैं? इसी प्रकार यदि परम्परायें अवैज्ञानिक और अतार्किक आधार पर बनी हों तो उनको त्यागना क्या उचित न  होगा? परंपरा के नाम पर तथ्यों  की अव्यावहारिक और मनमानी व्याख्या करना क्या मानसिक बीमारी नहीं  है ? ’’


221 चिंजा की शादी

5 वीं क्लास में पढ़ रहीं स्वभाव से सीधी सादी सहुद्रा और भोली सी चिंजा में गहरी दोस्ती थी। चिंजा की स्पष्टवादिता से क्लास के सभी लड़के लड़किय...