अकबर बादशाह के नवरत्नों में से एक ‘‘अब्दुल रहीम खान ए खाना‘‘ अपनी विलक्षण प्रतिभा के कारण हिंदी काव्यसाहित्य में अत्यंत सम्मानित हस्ताक्षर माने जाते हैं। हिंदी ही नहीं उनकी दक्षता संस्कृत में भी कम नहीं थी। आश्चर्यजनक यह है कि, उनका व्यक्तित्व परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाले गुणों के उच्चतर समन्वय को प्रकट करता है जैसे, मुसलमान होते हुए भी कृष्ण के अनन्य भक्त होना, कवियों का कोमल हृदय और सेनापति की वीरता होना, अहंकारशून्य दानी होना, तुर्की, अरबी , फारसी के समान ही संस्कृत पर पकड़ होना, क्रूर मुगल शासकों केे साथ रहते हुए अपनी सात्विकता को न खोना आदि, आदि।
सामान्यतः जब कोई भी संबंधी, मित्र या जनसामान्य उनसे मिला करते तो वह अन्य औपचारिक बातों के साथ साथ उन्हें ईश्वर चिंतन की ओर अपना रुख करने के लिये निवेदन भी करते थे। एक बार उनके किसी मित्र ने बातचीत के बीच उनसे पूंछ ही लिया कि,
‘‘ क्या यार! तुम जब भी मिलते हो छोटा हो या बड़ा, सबसे बार बार यही दुहराते हुए प्रेरित करते हो कि भगवान का भजन करना चाहिये, उन्हें सदा याद करना चाहिये। अरे! यह तो बुढ़ापे के काम हैं, तुम तो सभी को बाल्यावस्था से ही सन्त बनाना चाहते हो, इसका क्या मतलब?’’
रहीम ने विनम्रतापूर्वक उनसे निवेदन किया-
‘‘ कृष्ण! त्वदीय पदपंकजपंजरान्ते अद्यैव मे विशतु मानस राजहंसः,
प्राण प्रयाण समये कफवातपित्तैः कन्ठावरोधेेनबुधौ स्मरणम् कुतस्ते ?’’
(अर्थात् हे कृष्ण! तुम्हारे पैर रूपी पिंजरे में मेरा मन रूपी राजहंस आज ही प्रवेश क्यों न कर जाये, क्योंकि बुढ़ापे में जब गले में कफ, वात और पित्त ही भरा रहेगा तो तुम्हारे नाम का शुद्ध उच्चारण भी कैसे हो सकेगा?)
उनके मित्र निरुत्तर हो उनके पैरों पर गिर पड़े और रहीम ने तत्काल उठाकर उन्हें गले से लगा लिया।
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