Friday, July 23, 2021

221 चिंजा की शादी


5 वीं क्लास में पढ़ रहीं स्वभाव से सीधी सादी सहुद्रा और भोली सी चिंजा में गहरी दोस्ती थी। चिंजा की स्पष्टवादिता से क्लास के सभी लड़के लड़कियाॅं उससे बातें करके खूब मजा लेते पर हाॅं, कभी कभी वह ऐसी बात अवश्य  कर देती थी कि अच्छे अच्छे भी भौंचक्के रह जाते। एक दिन चिंजा की माॅं उसकी क्लास में आकर बोलीं,

‘’चलो चिंजा घरै, किताबें स्लेट पिंसल सब धर ले बस्ता में’’

क्लास के शिक्षक ही नहीं, लड़के लड़कियां भी आश्चर्य  में पड़ गए। शिक्षक ने पूछा ‘‘काय बिन्ना! का हो गव, काय की जल्दी है, अबई तो छुट्टी होबे बारी है।’’

‘‘हव गुरुजी! मनों हम तो जा कैबे आ आए कि चिंजा अब दस पंद्रा दिन पड़बे ने आ पेहै, सो छुट्टी दै दे।’’

‘‘ सो, अदबीच में एैसो का काम आ गव के मोड़ी खों क्लास में सें पंद्रा दिन खों ले जा रईं हौ?’’ गुरुजी बोले।

‘‘ ओ कौ व्याव है गुरुजी।’’

‘‘ का कै रई हौ? मौड़ी के दूद के दाॅंत तो टूटे नईं और तुमें व्याव की औरी, दो चार क्लासें और पड़ लेती तो का हर्ज हतौ ?’’

‘‘ अरे! तुम सोई ऊंसई परे। तुम ओरें आव बड़े आदमी सो ऐंसी कै रय हौ, हम औरों के ना तो मोड़ी चार क्लासें पड़ गई बस्स। बताव, अब काय करनें आगें पड़ा कें? चल री चिंजा! ’’

चिंजा बस्ता उठाकर माॅं के साथ चलने लगी और माॅं बोली, 

‘‘सहुद्रा ! तुम चिंजा के व्याव में खत्तम आइयो।’’

चिंजा की शादी होने के बाद जब सहुद्रा स्कूल आई तो क्लास के लड़के लड़कियों ने उससे चिंजा के दूल्हे के बारे में पूछा, सहुद्रा बोली,

‘‘ दूला तौ खूब मुछारौ है। मनों सुनों, चिंजा की जब भांवरें परन लगीं सो ओई समय बा कैत है, बऊ ! भूंक लगी। बऊ बोली, तनक रुक जाव, भावरें तो पर जान दे। चिंजा अनमनी सी मंड़वा में बैठ गई। भावरों के बाद ओकी भौजी समझाउत रई कि तुमाय कपड़ा लत्ता सब ए सिंदुकिया में भर दय हैं सो लेत जइयो, अब तुमें दूला जू के घरै जाकें रैनें परहै। ’’

इसी बीच एक लड़का बोला, ‘‘काय सहुद्रा ! ओकी बऊ ने कछु खाबे नईं दव ओखों?’’

 अरे ! सुनो तौ, जब बऊ ने ओखों खाबे बुलाव सो बा बोली,

‘‘ जब भूक लगी ती सो खाबे नई दव अब का खांय जब भूकई मर गई?’’

सब लोग खिलखिला कर हंसने लगे। सहुद्रा आगे बोली,

‘‘ जब बिदा भई सो ओकी भौजी, बऊ हरें सब रोउन लगे, चिंजा कैत है, गरय लगन लगे सो उतार फेंकौ अब काय खों रोउत हौ; अरे काय भौजी! हमाई किताबें सिंदुकिया में धर दईं कै नईं?’’


- त्रैलोक्यरञ्जन, सागर मप्र। 


( बुंदेली शब्द- सहुद्रा= सहोदरा का अपभ्रंश । चिंजा= चिरोंजी का अपभ्रंश । घरै= घर पर। काय बिन्ना= क्यों बहिन। का हो गव= क्या हो गया। अबई= थोड़ी देर में। हव= हाॅं। मनों = लेकिन। जा= यह। ने आ पैहे= नहीं आ पाएगी। मौड़ी= लड़की। खौं= के लिए। व्याव= विवाह। औरी= सूझी। हतौ= था। सोई= भी। ऊंसई परे= बेकार सोचते हो। तुम औरें= तुम लोग। कै रय= कहते हो। पड़= पढ़। खत्तम= हर हालत में। मुछारौ= मूछों वाला। ओई= उसी। बा कैत है= वह कहने लगी। बऊ, माॅं। भूंक, भूंख। तनक, थोड़ी देर। मंड़वा, विवाह मंडप। ओकी, उसकी। भौजी, भाभी। सिंदुकिया, लोहे की छोटी पेटी। भर दय, रख दिए हैं। कछु खाबे= कुछ खाने को। भूकई= भूख ही। हरें= इत्यादि। रोउन= रोने। गरय लगन लगे सो उतार फेंकौ अब काय खों रोउत हौ= तुम्हारे ऊपर हमारा बोझा बहुत बढ़ता जा रहा था जो उतर गया है, अब क्यों रोती हो। धर र्दइं= रख दीं। )


Thursday, June 3, 2021

220 फीता

 कभी अफसर रहे मिश्राजी के जलवे देख अब रिटायर होने के बाद भी  सभी लोग कहा करते हैं कि उनका कद, फीते (मेजरिंग टेप) से बहुत बड़ा है। अपनी गृहवाटिका में टहलते हुए आज उन्होंने एक सब्जी बेचने वाले लड़के को हाथठेला खींचते और पीछे से एक औरत को धक्का देते हुए अपने गेट के सामने लगे पेड़ की छाया में पसीना पोंछते, सुस्ताते देखा। गेट की ओर जाने पर उन्हें वह लड़का अपनी भयग्रस्त चमकीली आंखों से इस आशा से देखने लगा कि शायद वह सब्जी खरीद लेंगे या यहाॅं से जाने को कहेंगे अतः बोला,

‘‘गुडमार्निंग अंकल’’

सब्जीवाले से अप्रत्याशित अंग्रेजी भाषा के अभिवादन से उत्साहित उन्होंने उससे पूछा,

‘‘ क्या नाम है तुम्हारा?’’

नीचे खिसक आए पेंट को ऊपर खींचकर बाहर झांक रहे अंडरवीयर को ढांकते हुए वह बोला,

‘‘सर! दीनू, मीन्स दीनानाथ।

’’पढ़ते हो?’’

‘‘यस सर। रीसेंटली, नाइंथ क्लास में प्रमोट हुआ हॅूं।’’

‘‘ये कौन है?’’

‘‘मदर।’’

इस वार्ता के दौरान मिश्राजी ने अनुभव किया कि लड़का बात तो बड़ी शालीनता से कर रहा है पर बार बार दायें बायें डरता सा देखता जा रहा है अतः पूछा,

‘‘क्या बात है, डर क्यों रहे हो?’’

‘‘ सर! बात ये है कि सब्जीवालों को 11 बजे तक ही सब्जी बेचना एलाउड है इसके बाद लाकडाउन लग जाएगा, फिर पुलिसवाले परेशान करते हैं, मदर की भी इंसल्ट करते हैं जो मुझे अच्छा नही लगता।’’

मिश्राजी ने जरूरत न होते हुए भी उससे सब्जी देने को कहा। उसने अपने हिसाब से अच्छी अच्छी छांट कर साठ रुपये की सब्जी दे दी। रुपए पाकर कृतज्ञता दर्शाती लड़के की चमकती आंखे जल्दी ही आगे बढ़ने का संकेत करने लगीं। मिश्राजी ने सब्जी ले जाने के लिए पत्नी को आवाज दी,

‘‘स्कूटी की सीट पर रखी सब्जी की थैली ले जाओ।’’

देखते ही पत्नी बरसने लगीं, ‘‘ ये क्या! बासी और सड़ी सब्जी लेकर साठ रुपये बेकार नाश कर डाले!’’ कुछ आगे कहतीं कि अचानक स्कूटी बोल पड़ी, 

‘‘मेडम! ऐसे तो अनेक साठ रुपये आपने केवल अगरबत्ती, माचिस या मोमबत्ती खरीदने जाने के लिए पैट्रोल में ही फूंक दिए हैं, ये साठ रुपए तो बेचारे की आजीविका में सहायक ही होंगे न?...’’

तेजी से दूर जाते हुए उस लड़के को देख मिश्राजी को आज अपना कद फीते से बहुत छोटा लगा।

-त्रैलोक्यरंजन, सागर मप्र।


Monday, May 3, 2021

219 जनम के काछी

 

बड़े गांव में लगने वाले साप्ताहिक बाजार के दिन स्थानीय सम्पन्न ठाकुर परिवार का 12-13 साल का बच्चा बाजार के बीच बने चबूतरे पर बैठा था। बाजार में दूकानें सजती जा रही थीं और आस पास के गांवों के लोग आते जा रहे थे। पास के ही एक गांव से आए ठाकुर परिवार के 18-20 साल के एक युवक ने चबूतरे पर बैठे उस स्थानीय सम्पन्न परिवार के बच्चे से थोड़ा खिसकने को कहा ताकि वह भी वहाॅं बैठ सके। उस बच्चे ने उसे सुना अनसुना कर दिया। युवक ने बच्चे को धक्का देकर खिसका दिया और वहाॅं पर बैठ गया। बच्चे को भरे बाजार में किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा धक्का देना, इंसल्टिंग लगा। उसने रोते हुए घर जाकर घटना बताई जिसे सुनते ही उसके चाचा, बड़े भाई, और अन्य पड़ौसी मित्र युवक, कोई डंडा, कोई लाठी, कोई चाकू लेकर बाजार की ओर दौड़े। गांव के अन्य लोग समझ गए कि कोई लड़ाई जरूर होगी। वे भी दृश्य देखने साथ साथ दौड़े और सबने चबूतरे पर बैठे उस युवक को घेर लिया। अचानक हुई भगदड़ और हल्ला सुनकर पास के खेत में बने कुए पर नहा रहा काछी पटैल का लड़का गीला अंगोछा पहने बालों और शरीर पर मिट्टी लपेटे उस भीड़ में जा पहॅुंचा। उधर सम्पन्न परिवार के युवकों और धक्का देने वाले युवक के बीच तू तू मैं मैं हो रही थी। पटैल का लड़का भीड़ से निकलता हुआ झगड़ रहे युवकों के पास आ गया। वहीं पर खड़े स्कूल के शिक्षक ने आश्चर्य से उसे देखकर हंसते हुए पूछा,

‘‘ काय रे! जो काय?’’

इसे सुनकर, भीड़ में झगड़ रहे युवकों के साथ साथ अन्य लोगों का ध्यान भी उसी ओर आकर्षित हुआ। पटैल का लड़का बोला,

‘‘ कछू नईं सपर रय ते, भीड़ में हल्ला सुनकें सोची, पता करें काय हो गव।’’

‘‘ अरे! सो माटी पोत कें...?’’

‘‘ गुरुजी! हम आंय काछी पटैल। हमें माटी में खेलने कूदने, माटी में रैने, माटी में काम करने, और बाद में माटी में मिल जाने; सो बताव एमें का गल्ती है?’’

‘‘ हाॅं, तेंनें सोई जा नोनी बताई’’ गुरुजी बुदबुदाए।

यह सुनकर भीड़ सहित झगड़ा कर रहे युवक भी हंसने लगे, उनका गुस्सा शान्त हो गया।


( बुंदेली शब्द,  काय रे! जो काय?- क्यों भाई! ये क्या शकल बना रखी है? सपर रय ते- नहा रहे थे। काय हो गव- क्या हो गया। आंय काछी- हैं जन्म के सब्जी भाजी पैदा करने वाले काछी। रैने- रहना होता है। एमें- इसमें। सोई- भी। जा- यह बात। नोनी- अच्छी। )


Thursday, April 29, 2021

218 राम राम


एक सज्जन ने अच्छे किस्म के तोते को पाल पोसकर ‘राम राम’ कहना रटा दिया। अब, जो भी व्यक्ति उन सज्जन से मिलने आता उनसे तोता ‘रामराम’ कहता। आगन्तुक प्रसन्न हो उसकी तारीफ करते। एक दिन तोते ने एक बड़ी सी बिल्ली को पिंजरे की ओर आते देखा। राम राम भूल तोता टें टें टें करता हुआ पिंजरे के भीतर अपने पंख फड़फड़ाने लगा।


Thursday, April 22, 2021

217 स्लीपिंग डिवाइनिटी

 एक साथ पढ़ते पढ़ते रवि और किरण अपनी डिग्री पूरी करते ही अच्छी नौकरी भी पा गए पर अलग अलग क्षेत्रों में। इसे यौवन का उन्माद ही कहा जाएगा कि उन्होंने परिवार, रिश्ते और सामाजिक मान्यताओं को किनारे कर तथाकथित आधुनिक जीवन जीने की पद्धति ‘‘लिव इन’’ को चुना। ‘सेन्सुअल प्लेजर’ ही जिसका एकमात्र लक्ष्य हो उससे ‘मन’ ऊब का शिकार न हो, यह कैसे हो सकता है? अतः अनेक बार अपनी सीमाओं को लाॅंघता हुआ दोनों का मन अपनी मूल अवस्था में आ आकर थकान उतारने लगा। अलग अलग कार्यालयों में काम करने के कारण अब दोनों के मन में शंकाओं और आशंकाओं ने डेरा डालना प्रारंभ किया और मतभेदों ने जन्म ले लिया। लाख प्रयासों के बाद भी दोनों न तो एक ही विभाग में साथ साथ काम करने में सफल हो पाए और न ही मानसिक तरंगों के साथ झूलती कलह से और अन्ततः आरोपों, प्रत्यारोपों में लिपटे मतभेद, मनभेद में बदल गए। दोनों को अपने अपने परिवार और रिश्तेदार याद आने लगे पर उनको तो महत्वहीन मानकर छोड़ ही चुके थे वे, इसलिए उनका मनोद्वन्द्व कभी कभी वाक्युद्ध में, कभी कभी मौन में रूपान्तरित होता रहता। मन पर जब असीमित ‘प्रेशर’ पड़ने लगता है तब वह उन्मादित होकर असामान्य कदम उठाने को विवश होता है अतः इसी अवस्था में किरण एक दिन अपनी डाक्टर मित्र के पास इलाज के लिए पहुंची।

‘‘ आशा! मैं बहुत बीमार हॅूं, मेरा जल्दी इलाज कर दो’’ रोते हुए किरण ने कहा।

‘‘ अरे ! कैसी बातें करती है, तुझे क्या हो सकता है, सबसे न्यारा आनन्दित जीवन तुझे कुछ होने ही नहीं देगा।’’

‘‘ आशा! तू नहीं जानती, ये जीवन ही मेरी बीमारी है इसे ऐसी दवा दे दे जिससे मैं सदा के लिए रोगमुक्त हो जाऊं।’’

‘‘ क्या पागलों की तरह बातें करती है! तू तो कहती थी, जमाना हमसे है हम जमाने से नहीं, तो अब डरती क्यों है, जीवन तो जीने के लिए है विषमताओं से डरकर मरने के लिए नहीं।’’

‘‘ नहीं आशा! मेरा वह निर्णय गलत था, मैं बहुत दुखी हॅूं अब जीना नहीं चाहती, मैंने सब कुछ खो दिया, तू मुझे निराश न कर..।’’

आॅंसुओं की धार में स्नान करते किरण की व्यथाकथा के शब्द अन्त होने का नाम ही नहीं ले रहे थे कि आशा ने टोकते हुए कहा,

‘‘ अरे! कहाॅं गया तेरा वह आत्मविश्वास जिसके आधार पर तूने कभी मेरी निराशा को आशा में बदल दिया था?’’

‘‘ आशा! तू मेरी दुर्दशा को नहीं जानती।’’

‘‘ चल, मैं तेरे ही शब्द तुझे याद कराती हॅूं कि, इस प्रकार ठोकर से रोकर, जीवन हारने से अच्छा है अपने भीतर जन्मों से सोए हुए देवत्व को जगाना। याद आया? तो यही कर, फिर देखना रवि ही नहीं सारा समाज तेरी वन्दना करेगा।’’

किरण के आंसू अब रविकिरणों में चमक उठे।



216 विद्वान भिखारी

 216

विद्वान भिखारी

‘‘ बहुत दिनों में दिखे? कहीं बाहर गए थे क्या?’’

‘‘ नहीं तो। आजकल मंदिरों में भगवानों की रिसर्च में जुटा हॅूं।’’

‘‘ अजीब बात है, भगवानों की रिसर्च?’’

‘‘ जी हाॅं, पर आप नहीं समझेंगे।’’

‘‘ फिर भी, कुछ तो समझ में आएगा यदि आप जैसा विद्वान समझाएगा।’’

‘‘बात ये है कि सभी लोग मंदिर के भीतर जाते हैं और मैं बाहर ही बैठता हॅूं, भिखारियों के बीच।’’

‘‘ लेकिन इसमें रिसर्च की क्या बात है, भाग्य से प्रताड़ित बेचारे भिखारी।’’

‘‘ मैं ने पाया है कि वे विपन्न होते हुए भी विद्वान होते हैं।’’

‘‘ ये भी कोई नयी बात है? अधिकांश विद्वान, विपन्न ही होते हैं।’’

‘‘ नहीं, इनकी विपन्नता और विद्वत्ता अनूठी होती है, उनकी एक दिन की वार्ता सुनो-

 ‘काय रे! परों तें ओ तरप काय दौर लगाउत जा रव तो?’

‘ का तोय पता नई, ओ रिखबदास सेठ के लरका कीं तेरईं हती’

‘ हाॅं, बौई दारू ठेकेदार सेठ जे की तेज कार पुल पे लुड़क गई ती’

‘ हाॅं बौई, ओ के लरका ने सोई फांसी लगा लई ती’

‘ ठीकई तो है, जे के जैसे नदिया नारे, ऊंसई ओ के भरका, जे के जैसे बापमताई, ऊंसई ओ के लरका।’


(बुंदेली शब्द- काय/क्यों। परों/परसों। ओ तरप/ उस तरफ। दौर/दौड़। रव तो/रहा था। तोय/तुम्हें। नई/नहीं। लरका/पुत्र। हती/ती/ थी। बौई/वही। ऊंसई/उसीप्रकार। जेके/ जिसके। ओके/उसके। भरका/लंबी चैड़ी खाइयाॅं, खंदक। बापमताई/ माता पिता।)


Saturday, October 10, 2020

215 पूना

जनकरानी की गाय ने पूर्णिमा के दिन एक बछिया को जन्म दिया वह उस को ‘पूना’ कहकर पुकारने लगी। बड़ी होकर बछिया सात आठ वर्ष तक दूध देती रही फिर दूध देना बंद कर दिया। अब, फिर भी वह यथावत उसकी देखभाल करती, चारा पानी देती और अन्य गायों के साथ चरने के लिए भेजती। एक दिन पड़ौस की कलाबाई आकर बोलीं,

‘‘ काय जिज्जी! तुमाई पूना तो बिलकुल बूढ़ी हो गई है ए खों बेंच काय नईं देत? ऊंसई चारे भुसा को खर्च उठा रईं?’’

‘‘ अरे! तें सोई नोनी बुलयाबे आ गई, कोउ बूढ़ी गइया काय खों खरीद है? जहाॅं चार गइंयाॅ खात हैं उते पांच खा रई हैं सो का नुकसान है?  कछू नई, गोबर तो मिलतई है।’’

‘‘ अरे! ए खों बेंच कें नई कलुरिया लै हो तो दूध दै है और बच्छा बछियाॅं अलग, पूना तो ऊंसई जगा रूंद रई के नईं? हमने तो अपनी दो बूढ़ी गईयां भूरा खों बेंच र्दइं, बौ उनें इतवार के ढोर बजार में शहर में बेंच आव।’’

कलाबाई की सलाह पर जनकरानी ने भूरा के हाथ पूना को पचहत्तर रुपयों में बेच दिया। इतवार को भूरा खरीदी गई अन्य गायों के साथ पूना को शहर में बेचने ले जा रहा था उसी समय गांव के कुए पर जनकरानी पानी भर रही थी। उसने गायों को जाते देखा तो पूना की ओर ध्यान चला गया और वह जोर से चिल्लाई ‘‘पू ... ना...’’।

पूना झट से रंभाती हुई उसकी ओर दौड़ी, भूरा ने बहुत ललकारा, उस पर पत्थर भी फेके पर वह नहीं मानी और जनकरानी के पास जा पहुॅंची। जनकरानी ने उसे दो बाल्टी पानी पिलाया। उसने अनुभव किया कि जब से भूरा उसे ले गया है उसने शायद पानी भी नहीं पिलाया। भूरा दौड़कर पास आ गया। जनकरानी बोली,

‘‘ ए भज्जा! तुम अपने पचहत्तर रुपैया वापस लै लिइयो, हम अपनी पूना खांे वापस लै जा रय हें।’’

( बुंदेली शब्द-काय क्यों, ऊंसई व्यर्थ, तें सोई तू भी, बुलयाबे मजाक करने, खों को, कलुरिया नवयौवना गाय, जगा जगह,रूंद रई घेरे है, बौ उनें वह उनको, आव आया, रय हें रहे हैं। )


221 चिंजा की शादी

5 वीं क्लास में पढ़ रहीं स्वभाव से सीधी सादी सहुद्रा और भोली सी चिंजा में गहरी दोस्ती थी। चिंजा की स्पष्टवादिता से क्लास के सभी लड़के लड़किय...