(फंतासी शैली में लघुकथा)
आज रावण नहीं मरेगा
रामलीला के कार्यक्रम में एक बार निर्धारित किये गये स्टेप्स के बाद राम के वांण से रावण नहीं मरा। दर्शकों में बडा कौतूहल हुआ। स्थिति को भाॅंप कर सँचालक ने पर्दा गिराने का संकेत किया और उदघोषक ने दर्शकों को बहलाने का मोर्चा सम्हाला।
पर्दे के पीछे सँचालक ने पूँछा, ‘‘क्या बात है? स्टेप्स भूल गये क्या?’’
रावण का रोल करने वाला बोला, ‘‘ नहीं सब याद है तुम ही बहुत कुछ भूल गये हो, आज रावण नहीं मरेगा।’’
सँचालक बोला, ‘‘अरे यह क्या करते हो इतने दिनों की मेहनत बेकार हो जायेगी, चलो जाओ तीन स्टेप में ही मर जाओ, वह बोला नहीं आज रावण नहीं मरेगा।’’
अन्त में कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे गाॅंव के प्रधान को मध्यस्थता कर समझाने बुलाया गया। गाँव के प्रधान थे एक पहलवान सो आते ही बोले , ‘‘क्यों रे रावण! क्यों नहीं मरता? ’’
रावण बोला. ‘‘इस सँचालक सेे पूछो, पिछले बार के रोल करने का मेहनताना इसने क्यों नहीं दिया?’’
प्रधान ने कहा, ‘‘ अच्छा, अभी तो मर जाओ फिर हिसाब कर लेंगे।’’ पर वह नहीं माना।
प्रधान ने अब सँचालक की ओर देखा, वह बोला, ‘‘ मालिक! बताओ पति के मरने के बाद उसके हिस्से का धन पैसा किसको मिलता है , वे बोले ‘‘उसकी पत्नी को।’’
सँचालक बोला, ‘‘ हाॅं ! ! ! तो बताओ रावण के मरने के बाद उसका मेहनताना किसे मिलना चाहिये ? प्रधान बोले मन्दोदरी को।’’
सँचालक बोला , ‘‘तो इसीलिये इसका पैसा मन्दोदरी को दे दिया इसमें क्या गलत है?’’
प्रधान बोले, ‘‘ बिलकुल ठीक किया, अब काहे का झगड़ा, चल रे रावण! जल्दी मर नहीं तो मैं तुझे मारता हॅूं। ’’
दोनों में हाथापाई होने की स्थिति देख ऊपर टँगी झूमर लहराते हुए बोली,
‘‘मर जाओ रावण! पूँजीवाद के इस शोषणकारी युग में गुणवत्ता, कला, ज्ञान और विद्वत्ता इसी प्रकार शिकार हो रहे हैं ।’’