Saturday, May 9, 2020

15 आज रावण नहीं मरेगा

(फंतासी शैली में लघुकथा)
आज रावण नहीं मरेगा
रामलीला के कार्यक्रम में एक बार निर्धारित किये गये स्टेप्स के बाद राम के वांण से रावण नहीं मरा। दर्शकों में बडा कौतूहल हुआ। स्थिति को भाॅंप कर सँचालक ने पर्दा गिराने का संकेत किया और उदघोषक ने दर्शकों  को बहलाने का मोर्चा सम्हाला। 
पर्दे के पीछे सँचालक ने पूँछा, ‘‘क्या बात है? स्टेप्स भूल गये क्या?’’
रावण का रोल करने वाला बोला, ‘‘ नहीं सब याद है तुम ही बहुत कुछ भूल गये हो, आज रावण नहीं मरेगा।’’
सँचालक बोला, ‘‘अरे यह क्या करते हो इतने दिनों की मेहनत बेकार हो जायेगी, चलो जाओ तीन स्टेप में ही मर जाओ, वह बोला नहीं आज रावण नहीं मरेगा।’’ 
अन्त में कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे गाॅंव के प्रधान को मध्यस्थता कर समझाने बुलाया गया। गाँव के प्रधान थे एक पहलवान सो आते ही बोले , ‘‘क्यों रे रावण! क्यों नहीं मरता? ’’
रावण बोला. ‘‘इस सँचालक सेे पूछो, पिछले बार के रोल करने का मेहनताना इसने क्यों नहीं दिया?’’
प्रधान ने कहा, ‘‘ अच्छा, अभी तो मर जाओ फिर हिसाब कर लेंगे।’’ पर वह नहीं माना। 
प्रधान ने अब सँचालक की ओर देखा, वह बोला, ‘‘ मालिक! बताओ पति के मरने के बाद उसके हिस्से का धन पैसा किसको मिलता है , वे बोले ‘‘उसकी पत्नी को।’’
सँचालक बोला, ‘‘ हाॅं ! ! ! तो बताओ रावण के मरने के बाद उसका मेहनताना किसे मिलना चाहिये ? प्रधान बोले मन्दोदरी को।’’ 
सँचालक बोला , ‘‘तो इसीलिये इसका पैसा मन्दोदरी को दे दिया इसमें क्या गलत है?’’
प्रधान बोले, ‘‘ बिलकुल ठीक किया, अब काहे का झगड़ा, चल रे रावण! जल्दी मर नहीं तो मैं तुझे मारता हॅूं। ’’
दोनों में हाथापाई होने की स्थिति देख ऊपर टँगी झूमर लहराते हुए बोली,
‘‘मर जाओ रावण! पूँजीवाद के इस शोषणकारी युग में गुणवत्ता, कला, ज्ञान और विद्वत्ता इसी प्रकार शिकार हो रहे हैं ।’’

Tuesday, May 5, 2020

14 जनरेशन गेप

जनरेशन  गेप  
 विश्वनाथ  मन्दिर के दर्शन कर सकरी गली में से लौटते हुए एक यात्री ने बनारस के बाजार की  मुख्य सड़क के किनारे  देखा कि एक हलवाई बड़ी कड़ाही से पूड़ी निकालते हुए चिल्ला रहा है , 
 ‘‘गर्मागर्म, गर्मागर्म, चार रुपये में गर्मागर्म छै पूड़ी, गर्मागर्म छै पूड़ी‘‘
सज्जन यात्री ने आवाज सुनी तो पास जाकर छै पूड़ी का ऑर्डर दिया, हलवाई ने तीन गर्म और तीन बासी पूड़ी तत्काल दे दी। 
सज्जन ने पूड़ियों को उलट पलट कर देखा और बोले, 
 ‘‘ये क्या? तीन पूड़ी तो बिलकुल बासी हैं?‘‘
हलवाई बोला, ‘‘गर्मागर्म हैं कि नहीं? लगता है बनारस में नए आये हो ? इतनी सी व्याकरण नहीं जानते?‘‘
‘‘क्या मतलब?’’
‘‘गर्मागर्म = गर्म + अगर्म,  होता  ही कि नहीं ?
इसलिए तीन पूड़ी गर्म और तीन पूड़ी अगर्म दी हैं, इसमें क्या गलत है?’’

Sunday, May 3, 2020

13 हमारे सरकारी स्कूल

हमारे सरकारी स्कूल 
 पिछले वर्ष  बुन्देलखँड के एक गाँव की यात्रा के समय   एक सकरी गली में पैदल जाते हुए देखा कि स्कूल में  पढ़ने वाली एक लड़की तेज चलते हुए मुझ से आगे  निकलने की कोशिश में है। इतने में सामने के घर के  चबूतरे पर पापड़ सुखाती एक महिला  लड़की से बोली ,
          ‘‘काय बिन्ना चंदा!  जा तो बताओ, तुम रोज नाँय डेरी तरप नीली डिरेस में जात  दिखात हो, फिर तनक देर में माँय दाँयनी तरप गुलाबी डिरेस पैर कें, जल्दी जल्दी  दौरत हो, जो काय ?‘‘ 
वह लड़की बोली, 
‘‘काकी! डेरी तरप है सरकारी स्कूल उते मिलत है खाना, किताबें और नीली डिरेस और पैसा। सो रोज खाना खाबे सरकारी स्कूल में जात हैं और नीली डिरेस पैरत है, किताबें पैलऊँ मिल गईं हैं। फिर तुरतै प्राइवेट स्कूले जात हैं पड़वे, सो उते की डिरेस पैरने परत हैं। ‘‘
महिला ने पूँछा, ‘‘काय, का सरकारी स्कूल में पड़ाई नईं होत ?‘‘
लड़की ने कहा, ‘‘नईं होत। मास्टर कैत हैं रेडिओ सुनो, ओ में कछु समज में  नईं आऊत। ‘‘
महिला ने फिर पूँछा, ‘‘प्राइवेट में तो फीस लगत है ? फिर ?‘‘
लड़की बोली,  ‘‘का करें  फीस तो देनेई परत है, मनों सरकार के स्कूल सें लड़कियों खों पैसा सोई मिलत है बा उते की फीस के कामे आ जात और दूसरी डिरेस सिला लेत हैं । ‘‘
इतना कहते हुए वह झट से स्कूल की ओर  दौड़ गई। 
महिला बड़बड़ाने लगी,
‘‘देखो तो, पड़ाई के लाने मोड़ी कितनी दौरा-पदौरी कर रइ है।‘‘
यह देख सुनकर, मुझे साठ साल पहले के अपने गाॅंव के सरकारी प्रायमरी स्कूल के षिक्षकों के, अध्यापन कार्य में तल्लीन चेहरे, रील की तरह दिखाई देने लगे।


221 चिंजा की शादी

5 वीं क्लास में पढ़ रहीं स्वभाव से सीधी सादी सहुद्रा और भोली सी चिंजा में गहरी दोस्ती थी। चिंजा की स्पष्टवादिता से क्लास के सभी लड़के लड़किय...