हमारे सरकारी स्कूल
पिछले वर्ष बुन्देलखँड के एक गाँव की यात्रा के समय एक सकरी गली में पैदल जाते हुए देखा कि स्कूल में पढ़ने वाली एक लड़की तेज चलते हुए मुझ से आगे निकलने की कोशिश में है। इतने में सामने के घर के चबूतरे पर पापड़ सुखाती एक महिला लड़की से बोली ,
‘‘काय बिन्ना चंदा! जा तो बताओ, तुम रोज नाँय डेरी तरप नीली डिरेस में जात दिखात हो, फिर तनक देर में माँय दाँयनी तरप गुलाबी डिरेस पैर कें, जल्दी जल्दी दौरत हो, जो काय ?‘‘
वह लड़की बोली,
‘‘काकी! डेरी तरप है सरकारी स्कूल उते मिलत है खाना, किताबें और नीली डिरेस और पैसा। सो रोज खाना खाबे सरकारी स्कूल में जात हैं और नीली डिरेस पैरत है, किताबें पैलऊँ मिल गईं हैं। फिर तुरतै प्राइवेट स्कूले जात हैं पड़वे, सो उते की डिरेस पैरने परत हैं। ‘‘
महिला ने पूँछा, ‘‘काय, का सरकारी स्कूल में पड़ाई नईं होत ?‘‘
लड़की ने कहा, ‘‘नईं होत। मास्टर कैत हैं रेडिओ सुनो, ओ में कछु समज में नईं आऊत। ‘‘
महिला ने फिर पूँछा, ‘‘प्राइवेट में तो फीस लगत है ? फिर ?‘‘
लड़की बोली, ‘‘का करें फीस तो देनेई परत है, मनों सरकार के स्कूल सें लड़कियों खों पैसा सोई मिलत है बा उते की फीस के कामे आ जात और दूसरी डिरेस सिला लेत हैं । ‘‘
इतना कहते हुए वह झट से स्कूल की ओर दौड़ गई।
महिला बड़बड़ाने लगी,
‘‘देखो तो, पड़ाई के लाने मोड़ी कितनी दौरा-पदौरी कर रइ है।‘‘
यह देख सुनकर, मुझे साठ साल पहले के अपने गाॅंव के सरकारी प्रायमरी स्कूल के षिक्षकों के, अध्यापन कार्य में तल्लीन चेहरे, रील की तरह दिखाई देने लगे।
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