Friday, October 2, 2020

200 कुल तारक

 अपने क्षेत्र में प्रभावी बुन्देला जी को आशा के विपरीत जब लगातार तीन पुत्रियाॅं उत्पन्न हुईं तो निराशा में घिरे उन्हें लगा कि उनका वंश अब आगे नहीं बढ़ पाएगा। उनकी मनोदशा को देख उनके दूर के निस्संतान रिश्तेदार ने उनकी बड़ी पुत्री को गोद लेकर उनकी पीड़ा को कम किया पर, पुत्र की चाहत में अनेक मन्नतें, पूजा पाठ और विधिविधान का पालन करते हुए जब उन्हें पुत्र प्राप्त हुआ तो उनकी प्रसन्नता आसमान छूने लगी । पूरे माह पुत्रजन्म का समारोह मनाया गया। किसी भी पुत्री के जन्म पर उन्हें प्रसन्न्ता ही नहीं हुई इसलिए उनका जन्म दिन मनाने का औचित्य ही नहीं समझा गया पर पुत्र का जन्मोत्सव प्रत्येक साल मनाया जाता । समयानुसार पुत्रियाॅं अपने पराक्रम से पढ़ लिख गईं, और भाग्य से अच्छे घरों में शादी कर सुख से अपने परिवार में रहने लगीं। इधर बुंदेला जी के सुपुत्र लाड़ प्यार में पलकर पच्चीस साल के  हुए पर बौद्धिक स्तर कमजोर रह गया इतना तक कि डाक्टरों ने कहा कि उन्हें मानसिक विकलाॅंगता है। वह छोटे बड़े हर काम में माॅं या पिता की सहायता बिना कुछ न कर पाता। उम्र के अन्तिम पड़ाव में गंभीर बीमारी से ग्रस्त बुदेला जी की पत्नी ने इच्छा व्यक्त की कि इस रक्षाबन्धन पर सभी पुत्रियों को बुलाकर त्योहार मनाया जाय। उन्होंने सभी को पत्र लिखकर आमंत्रित किया पर सभी ने किसी न किसी कारण से असमर्थता की सूचना दे दी। बड़ी पुत्री ने लिखा,

‘‘जिन्होंने मुझे पालपोस कर बड़ा किया और आत्मनिर्भर बनाया वही मेरे असली माता पिता हैं। फिर भी, यदि आपके अहंकार को ठेस न पहुंचे तो निवेदन करना चाहॅूंगी कि जिस पुत्र की चाह में आपने हम पुत्रियों को हेय समझा वह अपनी रक्षा स्वयं ही न कर सकता हो तो उससे रक्षाबंधन पर हमारी रक्षा का वचन दिये जाने का अभिनय क्यों? हाॅं, यदि वह मुझे रक्षासूत्र बाॅंधे, तो मैं अवश्य उसकी रक्षा करने का वचन और उपहार देने आ सकती हॅूं।’’




199 पिता की सीख

 

ट्रेन में दो अपंग बच्चे घसिटते हुए यात्री परिवार की सीट के पास आकर गिड़गिड़ाने लगे, 

‘‘ कुछ खाने को दे दो साब !’’

यात्री परिवार के खाना खा रहे दोनों बच्चे उन्हें अपने अपने पास से कुछ देने लगे तो पिता ने रोकते हुए कहा,

‘‘नहीं, नहीं, रुक जाओ’’ 

‘‘क्यों ? वे दोनों भूखे हैं, असहाय हैं ’’ बच्चों ने तर्क दिया।

‘‘ लेकिन बेटा! उन्हें भगवान ने ही इस प्रकार का बनाया है, वही उनकी सब व्यवस्था बनाते हैं। इतना ही नहीं, सारे संसार में जो कुछ अच्छा बुरा घटित होता है यह उनकी इच्छा से ही होता है, यदि हम उन्हें कुछ करेंगे तो भगवान के कार्य में बाधा पहॅुंचेगी और वे हमसे नाराज हो जाएंगे’’... पिता ने धीरे से समझाया।

दोनों ने अपने हाथ वापस खींच लिए और वे भिखारी बच्चे दुखित हो आगे खिसकते गए। अगले स्टेशन पर उतर, यात्री परिवार ने अपने निवास स्थान पर जाकर देखा कि ताले टूटे पड़े हैं, भीतर सामान बिखरा पड़ा है, मूल्यवान वस्तुएं और धन अलमारियों से गायब हैं। पिता चिल्ला पड़े,

‘‘ चोरी हो गई , हम लुट गए, सब कुछ बर्बाद हो गया’’ और बेहोश होकर वहीं गिर पड़े।

माॅं और बच्चों ने उन्हें मुश्किल से सम्हाला और अस्पताल लाए, होश में आते ही वे डाक्टर पर चिल्लाने लगे, 

‘‘ पुलिस को बुलाओ, हमारे घर में चोरी हुई है, हमें लूटा गया है ’’  

उनकी परेशानी देख छोटा बच्चा बोल उठा, 

‘‘ पिताजी! अभी आपने कहा था कि सभी व्यवस्था भगवान ने बनाई है, यदि हम उनकी व्यवस्था के विपरीत कुछ करते हैं तो भगवान नाराज तो नहीं होंगे?’’

इतना सुनते ही वे फिर बेहोश हो गए। डाक्टर कहते रहे कि पुलिस आ चुकी है, जाॅंच कर रही है, चोर पकड़े जाएंगे, चिन्ता मत करो, होश में आ जाओ... परन्तु उन्हें होश न आया।

यह देख माॅं रोते हुए छोटे बच्चे से बोली,

‘‘क्यों रे ज्ञानी की औलाद ! चुप नहीं रह सकता था?’’


198 ईमानदारी का बिल

गाॅंव में बिजली के आते ही लगभग सभी ने अपने अपने घरों में कनेक्शन करा लिए। बड़े  किसानों ने खेतों की सिंचाई करने के लिए पाॅच पाॅच हार्स पावर की मोटरें लगवा लीं। प्रारम्भ में एक दो माह तो सभी ने बिजली का बिल समय पर भरा फिर धीरे धीरे अधिकाॅंश लोगों ने बिल भरना बंद ही कर दिया। मैं नियमित रूप से अपने बिल को समय से भरता रहा। कुछ समय बाद तो अन्य लोग मुझे बिल जमा करते देख मेरी हॅसी उड़ाने लगे। जिन्होंने बिल जमा नहीं किया उनका बकाया निकाल कर बिजली कम्पनी ने अनेक नोटिस दिये पर वे लोग नहीं माने । अफसर लोग कनेक्शन काटने और बकाया रकम वसूल करने के लिए खेतों पर जाकर मोटर जब्त करने लगे। कुछ प्रभावी लोग स्थानीय विधायक से बोले,

‘‘ भैया! महिने में चार दिन भी पूरे समय बिजली नहीं आती पर, बिल जरूर आ जाता है। अब बताओ, हमारे गाॅंव भर के किसानों का कितना नुकसान हो रहा है और बिजली कम्पनी के अफसर हैं कि हजारों की बसूली के नोटिस दे रहे हैं; मोटरें जब्त कर रहे हैं, ये तो सरासर अन्याय है।’’

विधायक गाॅंव वालों के साथ ऊर्जामंत्री के पास पहॅुचे, उन पर दबाव बनाया, उन्होंने मुख्यमंत्री से सभी के बिल माफ करने की घेषणा करा दी।

कम्पनी ने सभी के बिल माफ करने संबंधी सूचना सब किसानों तक पहॅुचाई और जब्त की गई मोटरें भी बापस कर दीं।

मैं मानता रहा कि इस रियायत का फायदा जब सभी गाॅंव वासियों को मिला है तो मुझे भी मिलेगा और मेरे द्वारा भरे गए बिल का पैसा वापस किया जाएगा पर प्रयत्न करने पर भी कुछ नहीं मिला। 

अब सोच रहा हॅूं कि यदि ईमानदारी इतनी नुकसानदायक है तो इस माह से बिल जमा करूं या नहीं ! ! !


197 ट्राॅंस्फर

उत्तर पूर्वी मध्यप्रदेश के एक जिले के प्राईवेट कालेज का सरकारीकरण होते ही मिसेज सिंह, अब अपने नाम के आगे प्रोफेसर लिखने लगीं। शिक्षकों का ट्राॅसफर होने लगा। पर, सत्ताइस साल हो गए किसी की क्या हिम्मत कि मिसेज सिंह को हटा सके। प्रारम्भ में आये सभी प्रिंसिपल उनके राजनेता पति का लिहाज करते रहे जिससे मिसेज सिंह की अयोग्यता छिपी रही। नई सरकार में नियम बनाया गया कि जो लोग तीन वर्ष से अधिक एक ही कालेज में रहे हों उनका विषयमान से अन्य कालेजों में ट्राॅंस्फर कर दिया जाए और मिसेज सिंह का ट्राॅंस्फर उसी नगर के गल्र्स कालेज में कर दिया गया। मिसेज सिंह वहाँ की प्रिंसिपल के तेज और अनुशासित स्वभाव को जानती थीं अतः वहाँ उनकी लापरवाही नहीं चल सकती थी इसलिए अपने नेता पति और पुत्र के माध्यम से ट्राॅस्फर निरस्त कराने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाने लगीं। स्थानीय विधायक, विभागीय मंत्री और मुख्यमंत्री से स्थानान्तर निरस्त कराने के लिए टीप लगवाकर उनके पति और पुत्र सेक्रेटरी हायर एजूकेशन से मिले,

‘‘सर! मेरी पत्नी अस्वस्थ रहती हैं, चार पाॅंच साल ही रिटायर होने के लिए बचे हैं फिर भी उनका ट्राॅंसफर कर दिया है !! विधायकजी, मंत्रीजी और मुख्यमंत्रीजी चाहते हैं कि यह आदेश निरस्त कर दिया जाय, देखिए उनकी टीप...’’ 

और, सभी की टीप वाला आवेदन सेक्रेटरी के सामने रख दिया।

गंभीरता से सुनते हुए सेक्रेटरी ने पूछा,

‘‘ आपके घर से ये दोनों कालेज कितनी दूरी पर हैं?’’

‘‘ सर! ब्वाइज कालेज दो किलोमीटर और गल्र्स कालेज डेड़ किलोमीटर दूर है।’’

सेक्रेटरी ने अपने असिस्टेन्ट को बुलाकर पूछा,

‘‘ हिन्दी विषय के पद किन कालेजों में रिक्त हैं, बताइए?’’

‘‘ सर! सभी जगह सरप्लस में ही हैं केवल खरगोन में दो पद खाली हैं ।’’

‘‘ ठीक है, इस आवेदन को रिकार्ड में रखें और मिसेज सिंह को तीन दिन के भीतर खरगोन कालेज ज्वाइन करने का आदेश देकर सूचना मंत्रीजी को दे दें।’’

दोनों पिता पुत्र सेक्रेटरी को नेतागिरी दिखाते हुए धमकाने लगे,

‘‘ आप मंत्रीजी के लिखित आदेश का उल्लंघन कर रहे हैं, सोच लेना आगे क्या होता है।’’

सेक्रेटरी ने फाइल असिस्टेंट को देते हुए कहा,

‘‘ पढ़िए ! मंत्रीजी ने क्या लिखा है ‘ नियमानुसार कार्यवाही कर सूचित करें ’ हमने

इसी आदेश पालन किया है, कृपा कर अब जाइए।’’ 




196 बुद्धि बल

गरीबी की ठोकरों से लड़ते झगड़ते दिनेश ने मशीनिष्ट का काम सीखकर अपनी मोटर बाइंडिंग की दुकान तिवारी जी के मकान के दो कमरे किराए पर लेकर खोल ली और वहीं रहने लगा। स्वभाव से कृपण तिवारी जी मृदुभाषी थे और बेटा बेटा कहकर पुकारने के कारण दिनेश और उसकी पत्नी भी उन्हें समतुल्य आदर देते, समय पर किराया देते और अपने काम में लगे रहते। अचानक तिवारीजी के घर के सीलिंग फैन और कूलर खराब हुए तब उन्हें सुधारने के लिए दिनेश को उनके घर में प्रवेश मिला । दिनेश ने रीवाइंडिग कर उन्हें ठीक कर दिया। एक सप्ताह तक जब तिवारी जी से इस काम के पैसे नहीं मिले तब संकोचपूर्वक उसने पैसे मांग ही लिये।

 आश्चर्य दर्शाते तिवारी जी बोले ‘‘ काहे के पैसे बेटा?’’

‘‘पंखे और कूलर रिपेयरिंग के अंकल!’’

‘‘कितने हुये?’’

‘‘साढ़े तीन सौ।’’

‘‘क्या बेटा, मैं तो तुम्हें घर का लड़का मानता हूॅं और बताओ, तुम हो कि..... क्या कहें!’’

‘‘अरे, साॅरी अंकल, कोई बात नहीं।’’

अगले माह तारीख निकल जाने पर भी दिनेश किराया देने नहीं गया, दूसरे माह भी नहीं और तीसरे माह भी नहीं, प्रतीक्षा करते तंग आए तिवारी जी बोले,

‘‘दिनेश बेटा! क्या बात है किराया तीन माह से नहीं दिया, क्या कुछ... ?’’ 

‘‘ अरे नहीं अंकल! उस दिन आपने ही तो कहा था कि मैं आपके घर का लड़का ही हॅूं, अब यदि मैं किराया देता तो शायद आपको बुरा लगता इसीलिए..., आखिर, अपने बेटे से बाप किराया कैसे ले सकता है?’’

‘‘ अच्छा! तो रिपेयरिंग के कितने पैसे हुए तुम्हारे?’’

‘‘ अंकल! केवल साढ़े तीन सौ रुपए ’’

‘‘ और तीन माह का किराया हुआ साढ़े चार सौ रुपए? हुए कि नहीं? ’’

‘‘ जी अंकल !’’

‘‘ तो लाओ बकाया एक सौ रुपए?’’

‘‘ जी अंकल! ये लीजिए।’’

दरवाजे की ओट से पूरा दृश्य देख रही दिनेश की पत्नी बोल पड़ी,

‘‘ कौन कहता है कि वसूली केवल बल प्रयोग से ही हो सकती है’’


Thursday, October 1, 2020

195 त्रिकूट कालसर्प दोष

 सड़क के किनारे बोरा बिछाकर अपनी भुट्टे की दुकान लगाए बुड्ढा भु्ट्टे भून रहा था और उसका आठ दस साल का फटेहाल नाती हाथ में पंखा लिए हवा कर रहा था कि इतने में एक आलीशान कार आकर उसके सामने रुकी। 

‘‘भुट्टे कैसे दिये?‘‘

‘‘तीन रुपये का एक।‘‘

‘‘अरे लूटो मत, सही रेट लगाओ।‘‘

पंखा छोड़, हाथ से भुट्टा छीलकर दाने दिखाते हुए नाती बोला,

‘‘ देखिए ! एकदम नरम और ताजे हैं बाबू, ठेले पर तो ये पाँच रुपये के मिलते हैं।‘‘

कार में बैठी महिला ने भुट्टे की जाॅंच करते हुए खरीद लेने का इशारा किया,

 ‘‘ अरे ! अन्धेर न करो, दो रुपये का लगाओ, सब ले लूँगा।‘‘

‘‘चार महीने खेत में प्राण दिये हैं तब हुये हैं बाबू ! तीन का रेट वाजिब है। सब ले लें तो दो-चार रुपए कम दे दीजियेगा।‘‘ बुड्ढे ने दीनता से कहा।


‘‘बुड्ढा बड़ा बदमाष है, चलो यहाँ से।‘‘ कहते हुए कार वाले ने काँच ऊपर करने हाथ उठाया ही था कि  एक मोटा तगड़ा, ़ित्रपुण्डचन्दन मालाधारी आदमी आया और कार में बैठे बच्चे के सिर पर हाथ रखते हुए बोला,

‘‘अहोम, अहोम, अहोम, किड़किड ़किड़किड़ कलकराटधू, कलकराटधू! जय बाबा भूरमशाह धूनीवाले की ! बच्चा बड़ा भाग्यशाली है ’’

और, उसके पूरे माथे पर अजीब टाइप की काली सिन्दूरी सी राख मलते हुए कुछ बुदबुदाने लगा, बच्चे की माॅ ने हाथजोड़ लिये।

‘‘ शाँति कराओ, बच्चे के सिर पर षडकाल त्रिकूटकाल सर्पदोष की छाया है। मुष्यकूट पर्वतवाली माॅ काली के मन्दिर जा रहा हूॅं, ग्यारह सौ दीपदान बच्चे के नाम से करूँगा। अहोम, अहोम, अहोम!‘‘

माॅं ने पर्स से एक सौ ग्यारह रुपए उसे दे दिये, वह फौरन चलता बना। भुट्टे वाला बच्चा दौड़कर पीछे पीछे गया और कुछ पैसे लेकर वापस लौट आया। यह देखकर कार वाले व्यक्ति ने बच्चे को बुलाकर पूछा,

‘‘बाबा से पैसे किस बात के ले आये?‘‘

‘‘ये! बाबा नहीं, ये तो हमारे गाॅंव का झगड़ू अहीर है। सबेरे दद्दा से गाॅंजा पीने के लिये पाॅंच रुपये उधार ले गया था और मेरे दो भुट्टे खा गया, बोला था कि कमाई होने दो, चुका दूँगा सो वही लेने गया था। भुट्टा दूॅं साहब?‘‘

सुनते ही, गाड़ी इतनी तेजी से बाबा की ओर बढ़ी जैसे उड़ान भरनेवाली हो, पर वह अदृश्य ! ! !


194 सूतक

  किसी जरूरतमन्द व्यक्ति को नौकरी मिल सके यह सोचकर घर से सम्पन्न ठाकुर दुर्लभ सिंह ने स्वैच्छिक सेवानिवृत हो भजनपूजन करते हुए समाज सेवा करने का व्रत ले लिया। मंदिर के पुजारी से उन्होंने विधिवत त्रिकालसंध्या पूजन की विधि सीखी और नियमित रूप से इसे करने लगे। एक दिन जब वह प्रातःकालीन संध्या करने मंदिर पहॅंुचे तो मंदिर के पुजारी बोले,

‘‘ ठाकुर जी ! आज तो सूर्य ग्रहण है सबेरे से ही सूतक लगा है, ग्रहण के समय भगवान कष्ट में होते हैं अतः उनकी पूजा अर्चना करने का निषेध रहता है, अब तो ग्रहण समाप्त होने के बाद ही संध्या करना।’’

दुर्लभ सिंह लौटते हुए सोचने लगे,  अजीब बात है, मरने पर सूतक! जन्म लेने पर सूतक! भगवान को कष्ट ! कष्टों को दूर करने वाले को कष्ट? संध्या वर्जित, पूजा वर्जित, इतना तक कि कपाट भी बंद दर्शन भी वर्जित? दुखी हो, घर में भी वे इसी चिन्तन में लगे रहे कि आखिर ईश्वरीय कार्य में किसी भी प्रकार की वर्जना क्यांे? मंदिर ही क्यों? त्रिकाल संध्या ही क्यों? अपने दैनिक कार्य करते हुए सर्वकालीन ईश चिन्तन क्यों नहीं? 

और, अगले दिन से उन्होंने मंदिर न जाकर वर्जनारहित अपनी सर्वकालीन पूजा करना प्रारंभ कर दी। कई दिनों से मंदिर में न पहॅुचने पर पुजारी यह सोचकर कि शायद दुर्लभ सिंह बीमार हों, उनके घर पहुँचे । 

‘‘ ठाकुरजी ! आपका स्वास्थ्य तो ठीक ही दिखता है, पर संध्या करने कई दिनों से नहीं आए, क्या बात है?’’

‘‘ पुजारी महाराज ! मेरे घर में ‘ मोह रूपी ’ माता मर गई है और ‘ बोध रूपी ’ पुत्र ने जन्म लिया है, अब आप ही बताएं दो, दो सूतकों के होते संध्या करने का अवसर कहाॅं?’’ 


193 हे भगवान! मदद करो

 ‘‘ सर ! पुलिस वाले वाहनों को क्यों रोकते हैं हमारी बस को भी देर तक रोके रहे?’’

‘‘ जिनके इन्श्योरेंस, लाइसेंस, रजिस्ट्रेशन, हेलमेट आदि नहीं हैं उन्हे रोक कर उनका फाइन किया जाता है।’’

‘‘ ऐसा क्यों किया जाता है?’’

‘‘ सामाजिक व्यवस्था बनी रहे, यातायात सुरक्षित रहे, इसीलिए इस प्रकार के नियम कानून बनाए जाते हैं।’’ 

‘‘ यदि व्यवस्था अपने आप बनी रहे, तो फिर नियम कानून का कोई महत्व ही नहीं है?’’

‘‘ तुम्हारा तर्क तो सही है, लेकिन अनेक लोगों का स्वभाव इस तरह का होता है कि वे अन्याय, अत्याचार, शोषण, भ्रष्टाचार कर व्यवस्था को बिगाड़ने में ही अपनी बहादुरी समझते हैं इसीलिए कानून बनाए जाते हैं; उनका जो उल्लंघन करता है उसे कानून दंड देता है।’’

‘‘ परन्तु सुना है जिन अपराधियों को दंड मिलना चाहिए वे तो किसी न किसी प्रकार बच निकलते हैं और निरपराधी फॅस जाते हैं?’’

‘‘ समाज में जब इस प्रकार के अपराधियों की संख्या बढ़ जाती है और जनसामान्य का जीवन दूभर हो जाता है तो भगवान मनुष्य रूप में आकर उनसे संघर्ष करते हैं और मृत्यु दंड  देते हैं।’’

‘‘ परन्तु यह मेरी समझ में नहीं आता कि कोई भी व्यक्ति हमारे लिए अपने को संकट में डालने क्यों आएगा, इन दुष्टों को मारने और स्वयं मरने के लिए क्यों  आएगा? ’’

‘‘ शास्त्र तो यही कहते हैं।’’

‘‘ क्या इस प्रकार का सोच आलसी और अकर्मण्य लोगों का नहीं है? क्या हमें उसके आने की प्रतीक्षा ही करते रहना चाहिए? हमें अपनी रक्षा करने का निर्णय स्वयं क्यों नहीं करना चाहिए?’’


192 (संसार सागर )

निस्तेज रतन

पूर्वजों से प्राप्त विपुल सम्पदा को रतनचन्द ने अपने पराक्रम और व्यवसाय से कई गुना बढ़ा लिया। एरिया मेें उनकी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता और   क्रमशः तीन पुत्र पाकर तो वे अपने स्वप्नों के सम्राट हो गए। विवाहोपरान्त बड़े बेटे ने क्रमशः दो कन्याओं को जन्म दिया जिनसे उनकी प्रसन्नता में कमी आई और महालक्ष्मी का स्वरूप कहलाने वाली बड़ी बहु अब अशुभ लगने लगी। और, तब तो वह नागिन की तरह डसती लगने लगी जब बड़े बेटे का किसी दुर्घटना में असामयिक निधन हो गया। उनके इस व्यवहार से वह दोनों पुत्रियों सहित अपने मायके में सदा के लिए चली गई। समयानुसार दूसरे ने चार कन्याओं को और तीसरे ने एक कन्या और एक पुत्र को जन्म दिया । रतनचन्द की सम्पूर्ण दृष्टि अपने छोटे लड़के पर केन्द्रित हो गई क्योंकि उनके विचार में वही उनके कुलगोत्र को आगे बढ़ाने में सफल हुआ था। दूसरा लड़का जिसकी चार कन्याएं थीं  उसे रतनचन्द परमशत्रु मानते थे भले ही वही पूरे व्यवसाय को सम्हाले हुए था। अचानक बीमारी के आक्रमण से आसन्न मृत्यु के संकेत पाकर रतनचन्द ने अपने पूरे व्यवसाय और सम्पत्ति को अपने छोटे पुत्र के नाम कर दिया और अन्तिम साॅंस ले ली। अपने पिता के इस निर्णय के विरुद्ध दूसरे लड़के ने कोर्ट में चुनौती दी और छोटे भाई से अपना हिस्सा माॅंगा। कोर्ट में इस प्रकार के केस पीढ़ियों तक चलते हैं और वही हुआ, छोटे भाई की अचानक मृत्यु हो गई और उसका लड़का स्वभाविक रूप से पूरी जायदाद का स्वामी बन गया और अपने पिता पर चाचा द्वारा चलाये जा रहे केस में बकीलों के माध्यम से कार्यवाही में भाग लेने लगा। पिता की बरसी पर श्रद्धाँजली देने आए समाज के अन्य लोगों और रिश्तेदारों की उपस्थिति में चाचा ने कहा,

‘‘ सभी के सामने मैं निवेदन करता हॅूं कि आप लोग इस बच्चे को समझाएं। मेरा कोई पुत्र नहीं है, यदि यह मेरे पुत्र की तरह हमारे साथ रहे तो सभी कानूनी विवाद समाप्त कर शाॅंतिपूर्वक जीवन जिया जा सकता है।’’

भतीजा बोला, ‘‘ सभी जानते हैं कि मेरे दादाजी ने मेरे कारण ही मेरे पिता के नाम पूरी जायदाद की थी अतः अब उस पर मेरे अलावा और किसी का हक नहीं है, रही बात कोर्ट की तो वहाॅं तो आप ही गए थे, हम नहीं ।’’

अब, उनकी चारों बेटियाँ और दामाद कोर्ट में चल रहे सभी केसों को जारी रखे हुए हैं।      


191 घिनट्टे

कृषि मजदूर गफलु और उसकी पत्नी ने उत्साह से अपने लड़के का नाम रखा ‘दशरथ’, पर वे दोनों उसे ‘जसरत’ कहकर पुकारते। एक दिन जब वे दोनों अन्य मजदूरों के साथ खेतों में काम कर रहे थे और सभी के बच्चे मेड़ पर खेल रहे थे तभी जमीदार ने आकर जसरत के हाथ पैर गंदे और नाक बहते देख अपनी छड़ी से उसकी पींठ पर धीरे से स्पर्श करते हुए कहा, 

‘‘ क्यों रे घिनट्टे! इतना बड़ा हो गया नाक, हाथ पैर साफ नहीं रख सकता, किसका लड़का है?’’ 

यह सुनकर गफलु की पत्नी दौड़कर आई, जमीदार के दूर से ही पैर छूकर अपनी साड़ी के पल्लू से जसरत की नाक पोंछते हुए बोली,

 ‘‘आपका ही है मालिक!’’ 

जमीदार के वापस जाने के बाद अन्य सभी बच्चे उसे घिनट्टे कहकर पुकारने लगे, धीरे धीरे उसका पिता भी इसी नाम से पुकारने लगा। माॅं उसे जसरत ही कहा करती। जसरत की उलझन शुरु हो गई। उसकी रोज रोज की उदासी से तंग आकर माॅं ने उसे अपने भाई के गाॅंव भेज दिया। मामा के साथ रहकर उसने जंगल की जड़ीबूटियों से पशुओं की बीमारियाॅं ठीक करने का इतना अभ्यास किया कि आसपास के गाॅवों के लोग अपने बीमार पशुओं का इलाज कराने उसी को बुलाने लगे। वह इन्हीं जड़ीबूटियों का अल्प मात्रा में उपयोग कर गाॅंव के लोगों की छोटी मोटी बीमारियाॅं, मोच और हाथपैर की हड्डियाॅं ‘डिसलोकेट’ हो जाने पर उन्हें भी ठीक करने लगा। एक बार पशुओं में ऐसा रोग फैला कि वे चल ही न पाते और कुछ दिनों बाद मर जाते। जसरत ने उनका उपचार शुरु किया और सफलता मिलने लगी। उसके पिता ने भी अपने जमीदार के इस रोग से बीमार बैलों और भैंसों का इलाज करने के लिए जसरत को बुलाया और उसने जाकर अपनी दवा से उन्हें मरने से बचा लिया। गाॅंव के प्रतिष्ठित लोगों और जसरत के बचपन के मित्रों के सामने जमीदार बोले, 

‘‘गफलु! तुम्हारे लड़के ने हमारा बड़ा उपकार किया है, बताओ क्या चाहिए?’’

‘‘कुछ नहीं मालिक! जिन्दगी भर आपका ही नमक खाया है, बस घिनट्टे ने तो उसी का कर्ज उतारना चाहा है ’’ गफलु ने सकुचाते हुए कहा। 

अपने पैर के अंगूठे से जमीन को कुरेदते, नीचे देखते हुए जसरत बोला, ‘‘मालिक! मैं कुछ बोलूॅं’’

‘‘क्यों नहीं; बोलो, क्या चाहते हो?’’

‘‘उस दिन आपने भले ही प्यार से मुझे घिनट्टे कहा हो, पर था तो वह अपमानसूचक ही। मेरी माॅं के अलावा़ सभी लोग इसी नाम से पुकारने लगे जो मुझे कभी अच्छा नहीं लगा। मालिक! मुझे मेरा नाम वापस कर दो’’

पश्चाताप में रुंधे गले से जमींदार बोले, 

‘‘अरे, जो सबको जीवन देने का जस करने में जुटा रहता हो वह ‘‘जसरत’’ नहीं तो और क्या कहला सकता है रे!’’ और नोटों की गिड्डी देने हाथ आगे बढ़ाए पर, वह जमीदार के दूर से ही पैर छूकर वापस चला गया।


Tuesday, September 29, 2020

190 पका आम

 ‘‘वैसे ही इस साल आम कम फले हैं और ये तोते, गिलहरियाॅं सब खाए जा रहे हैं’’ कहते हुए सुलोचना ने लम्बा सा बाॅंस उठाया और  आंगन में लगे पेड़ पर कई बार ठोकर देकर सभी तोते और गिलहरियों को भगा दिया। पास में खड़ी उसकी चार पाॅंच साल की बेटी बोल पड़ी,

‘‘ माॅं ! तोते को क्यों भगा दिया, गिलहरी भी चली गईं, वे सब कितने अच्छे हैं, मैं उनके साथ खेल रही थी ...’’ 

‘‘ अरे! ये सब आम खा जाएंगे, हमें कुछ न बचेगा, इन्हें देखते ही भगा दिया करो’’

‘‘ तो अब वे क्या खाएंगे?’’

सुलोचना इसका उत्तर सोच ही न पाई कि बेटी बोल पड़ी,

‘‘ कोई बात नहीं, अब मैं अपने स्कूल के लंचवाक्स से उनको खिलाया करूंगी ’’

‘‘ नहीं नहीं... .. ’’ बोलते हुए सुलोचना कुछ और कह पाती कि एक पका आम टूट कर बेटी के पास गिरते हुए बोला,

‘‘ बेटी! जब तुम्हारी माॅं तुम्हारी तरह छोटी थी, वह भी ऐसा ही कहा करती थी, अब वह बड़ी हो गई है न! इसलिए कुछ स्वार्थी हो गई है।’’

‘‘ बड़ा होने पर मैं भी स्वार्थी हो जाऊॅंगी क्या?’’

‘‘ हो सकता है पर, नहीं, तुम स्वार्थी बिलकुल न होना, हम पेड़ों की तरह सबका हित चाहना, किसी को उनके अधिकार से वंचित न करना, सभी पेड़ पौधों, पशु पक्षियों को अपना मित्र बनाए रखना।’’

 झट से सुलोचना वह पका आम लपकते हुए बोली,

‘‘ बहुत गर्मी है, अन्दर चल, होमवर्क नहीं करना क्या? छुट्टियाॅं खत्म होने वाली हैं। ...’’


189 शनि महाराज

 ‘‘शनि महाराज आपके सभी कष्ट दूर करें ’’ कहते हुए एक व्यक्ति ने डिब्बे में शनि महाराज की तेल में अधडूबी काली मूर्ती दिखाते हुए एक यात्री के सामने उसे बढ़ाया।

‘‘क्यों भाई! शनि महाराज ही सभी कष्ट दूर करेंगे ऐंसा तुम किस आधार पर कहते हो?’’ यात्री ने पूछा।

‘‘साहब! शनि महाराज से सभी डरते हैं न! इसीलिए, लोग सरसों का तेल और रुपया पैसा हमको दान करते हैं, कुछ आप भी ...।’’ 

‘‘यार! लगता है आप शनि महाराज से भी पावरफुल हैं।’’ यात्री ने अपनी हॅंसी को दबाते हुए कहा।

‘‘क्यों मजाक करते हैं साब! ’’

‘‘अरे! जिन शनि महाराज से सब डरते हैं, वे तुमसे डरकर तुम्हारे डिब्बे में कैद हो गए हैं, यह क्या साधारण बात है ??’’


188 सत्यमेव जयते

 ‘‘ मैं कहता था न! कर्मफल स्वयं को ही भोगना पड़ता है, अब गया !! मृत्यु होने तक जेल में ही सड़ेगा ढोंगी।’’

‘‘ किसकी बात कर रहे हो? ’’

‘‘ जिसे तुमने गुरु बनाया था, भगवान मानकर पूजती थीं वही, आसूमल उर्फ आसाराम।’’

‘‘क्या कहते हो?’’

‘‘ लो, पढ़ लो आज का पेपर।’’

‘‘ नहीं, नहीं, जरूर कोई साजिश है, मैं नहीं मानती। जिसके पैरों में पड़े अधिकारी, नेता, मंत्री, व्यापारी सब गिड़गिड़ाते रहते थे, वह ऐसा नहीं हो सकता, हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट में स्थिति बदल जाएगी।

‘‘ भाई! तुम्हारे अंधविश्वास और अंधानुकरण से मैं तो क्या भगवान भी नहीं जीत सकते।’’

जोर जोर से हो रही बातें सुन पड़ौसी खोट्टामल घपलानी आकर बोले,

‘‘ साॅंईं! क्या बात है, सुवेरे सुवेरे किस बात का झगड़ा होने लगा?’’

‘‘ सत्य की विजय और न्याय की प्रतिष्ठा होने से कुछ लोगों को बड़ा दुख पहॅुचा है।’’

‘‘ मैं भी तो समझॅूं क्या हुआ?’’

‘‘ अरे, वही आसाराम जिसे तुम तो आदर्श मानते हो अब, मरते दम तक जेल में सड़ेगा।’’

जैसे मौत के मुॅंह से बचकर निकले हों, खोट्टामल गहरी साॅंस लेकर बोले,

‘‘ चलो, अच्छा ही हुआ’’

‘‘ लेकिन तुम क्यों खुश हुए? तुम ने तो दीक्षा ली थी, गुरु को सजा होने से तुम्हें तो दुखी होना चाहिए? उसके अरेस्ट होने पर तो प्रदर्शन कर रहे थे?’’

‘‘ दीक्षा नहीं, लोन लिया था पन्द्रह लाख का। अब, चुकाना नहीं पड़ेगा .. ..।’’

‘‘ अब समझा। इस फैसले से दो प्रकार के लोग ही खुश हैं; पहले, दुराचारी को दण्ड मिलने पर न्याय की प्रतिष्ठा होने से और दूसरे, आसाराम के कर्जदार। 


187 भारत !

 (फंतासी शैली में लघुकथा)

सभाकक्ष में श्रोताओं की उपस्थिति बता रही थी कि कथावाचक असाधारण ज्ञानी हैं। भारत के राम भक्तों के बीच यह अटूट विश्वास है कि जहाॅं कहीं भी रामकथा होती है वहाॅं हनुमानजी अवश्य ही पीछे की पंक्ति में कहीं बैठे कथा सुन रहे होते हैं। अशोक वाटिका का प्रसंग आने पर कथावाचक बोले,

‘‘ वाटिका में अशोक बृक्ष के नीचे सफेद साड़ी पहने हुए सीतामाता बैठी हैं, चारों ओर सफेद फूल खिले हैं, रावण अपनी हॅुकार भरते उन्हें धमका रहा है  ... ’’

आगे वे कुछ कह पाते कि पीछे से एक सज्जन ने खड़े होकर विनम्रता पूर्वक कहा,

‘‘ नहीं पंडितजी! सीतामाता सफेद नहीं, लाल साड़ी पहने हुए थीं और चारों ओर लाल ही फूल खिले थे।’’

‘‘ महानुभाव! आप कौन हैं? ’’ मुस्कराते हुए कथावाचक ने पूछा।

‘‘ मैं? अरे! मैं हनुमान। मैंने ही सीतामाता की खोज, अशोक वाटिका में की थी।’’

‘हनुमान’ नाम सुनकर सभी श्रोता उत्सुकता और आश्चर्य से पीछे की ओर देखने लगे। 

कथावाचक ने मोर्चा सम्हाला ,

‘‘ ओ हो! हनुमानजी, प्रणाम। लेकिन बताइए कि यह दृश्य देखकर क्या आपको क्रोध नहीं आया था?’’

‘‘ बिलकुल आया था, वो तो श्रीराम प्रभु की आज्ञा नहीं थी अन्यथा मैं वहीं पर रावण के सिर के टुकड़े टुकड़े कर देता।’’

‘‘ हाॅं! ये बात थी न! इसी क्रोध से आपके नेत्र लाल हो गए थे और सभी चीजें लाल लाल दिखाई देने लगीं थीं, समझे, बैठो! अब आगे की कथा सुनो।’’

हनुमानजी ने कुछ बोलना चाहा लेकिन श्रोताओं की ओर से जोरदार ध्वनि हो उठी,

‘‘वाह! वाह! अद्वितीय व्याख्या वाह!! वाह!!’’

और, जिस मच्छर का रूप धरकर उन्होंने लंकापुरी में प्रवेश किया था वही कान के पास भन्भनाया,

‘‘हनुमानजी! देखा! प्रत्यक्ष दृष्टा को भी गलत सिद्ध कर दिया न? यह राम का ‘भारत’ नहीं, कलियुगीन रावण का है! यहाॅं सीताओं का तो रोज अपहरण होता है पर उनकी खोज करने और अपहरणकर्ताओं को दंड देने वाला राम कहीं दिखाई नहीं देता!!’’ 


186 त्रिपुंडधारी

 पंडित दीनानाथ शास्त्री अपने क्षेत्र में कर्मकांडीय पुरोहित के रूप में देवताओं की तरह पूजे जाते थे क्योंकि दूर दूर के अनेक विद्वान पंडितों को शास्त्रार्थ में भी वह परास्त कर चुके थे। विवाह के अनेक वर्ष बाद उत्पन्न एकमेव पुत्र के लिए वह अपनी ही तरह उद्भट विद्वान बनाना चाहते थे इसलिए स्कूली शिक्षा के साथ साथ घर पर संस्कृत पढ़ने पर अधिक जोर देते। शास्त्री जी अपनी त्रिकाल संध्या के बाद प्रतिदिन कहा करते, 

‘‘ सियावर रामचंद्र की जय, पवनसुत हनुमान की जय, बृन्दावन विहारीलाल की जय, उमापति महादेव की जय, काशी विश्वनाथ की जय, उज्जयनी के महाकाल की जय, रामेश्वरम् की जय, जगन्नाथजी की जय, वैष्णव देवी की जय, सिद्धविनायक की जय ..... ’’

आदि, जब तक नाम याद आते गये तब तक उच्चारण करते जाते, फिर कहते  ..

‘‘  करोड़ों देवताओं में से सबके नामों को नहीं ले पा रहा हॅूं सो कृपया वे नाराज न होवें, उनकी भी जय।’’

एक दिन, संध्या करने के बाद शास्त्री जी ज्योंही पूजा स्थल से निकले कि पुत्र ने कहा, 

‘‘ पिताजी, रामरक्षास्त्रोत के एक श्लोक, 

.... माता रामो मत्पिता रामचंद्रः, स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्रः 

सर्वस्व मे रामचन्द्रो दयालु, नान्यं जाने नैव जाने न जाने। ....

में से अंतिम पद, नान्यं जाने नैव जाने न जाने,  को समझने में कठिनाई जा रही है ’’

शास्त्री जी तुरन्त बोले, ‘‘ इसका अर्थ है, हे राम! मैं तुम्हारे सिवा न तो किसी को जानता हूॅं, और न ही जानना चाहता हूॅं।’’ 

‘‘ तो, राम भक्त होते हुए आप रोज संध्या करने के बाद उनसे असत्य क्यों बोलते हैं ?’’

पसीने से स्नान करते हुए शास्त्री जी के मस्तक पर लगा त्रिपुंड कह उठा,

 ‘‘ तूने मुझे पराजित कर दिया वत्स। ’’ 


185 बून इन डिस्गाइस

बड़े ही उद्दण्डी और विगड़ैल छात्र प्रमोद के कारण क्लास ‘ग्यारहवीं बी ’  में जाने से शिक्षक डरने लगे थे और आए दिन प्राचार्य से शिकायत करते परन्तु स्थानीय प्रसिद्ध क्रिमिनल लायर का बेटा होने के कारण वे कुछ न कर पाते। एक दिन कुछ शिक्षक प्राचार्य से कह ही रहे थे कि प्रमोद को रेस्टीकेट कर दो नहीं तो हम उस क्लास में नहीं जाऐंगे कि इसी बीच एक नवयुवक ने प्राचार्य को अपना नवीन नियुक्ति पत्र दिखाते हुए भीतर आने की अनुमति चाही। पेपर्स जाॅंच करने के बाद प्राचार्य  बोले,‘‘ ठीक है, ज्वाइन करो और क्लास ‘इलेवन्थ बी’ में चले जाओ आप उसी क्लास के क्लास टीचर रहेंगे।’’ 

अपेक्षतया कम उम्र के नये शिक्षक को देख प्रमोद सहित उसके अन्य साथियों ने अपनी कलाएं दिखाना शुरु कर दी, शिक्षक कुछ भी बोर्ड पर लिखते उधर पीछे से अजीब प्रकार की आवाजें आने लगतीं। शिक्षक जब मुड़कर पीछे देखते, वे सब इतने शाॅंत और तल्लीन हो जाते कि शिक्षक आश्चर्य में पड़ जाते। वे जब पूछते कि यह आवाजें कौन करता है तो कोई भी छात्र नहीं बताता। प्रायः रोज ही यह घटित होता, युवा शिक्षक के मन में क्रोध तो आता पर नये होने के कारण क्रोध को दबा कर रह जाते। एक दिन वह कुछ भी पढ़ाने के बदले अपनी कुर्सी पर आॅंखों को दोनांे हथेलियों से बंद किए बैठकर क्लास की गतिविधियों को चुपचाप देखने का प्रयत्न करने लगे। अचानक प्रमोद ने अपने आगे बैठे छात्र की गर्दन पर जोर से फूंका, वह घबराकर पीछे देखने लगा, शिक्षक ने तत्काल उसके पास जाकर पूछा,

 ‘‘क्या बात है?’’

‘‘ सर! पीछे से प्रमोद ने कुछ कहा इसलिए... ’’

‘‘ कौन है प्रमोद, खड़े हो?’’

प्रमोद नाटकीय ढंग से, अट्टहास की मुद्रा में खड़ा हो गया मानो शिक्षक उसके सामने तुच्छ हों और बनावटी भर्राई आवाज में बोला, 

‘‘ मैं ने क्या किया, मैंने कुछ नहीं किया, क्यों रे राजेश! झूठ बोलता है, निकलना बाहर बताता हॅूं।’’

शिक्षक समझ गए कि असली कारण प्रमोद ही है, वे उसे समझाते हुए बोले, 

‘‘ प्रमोद! यदि तुम्हें नहीं पढ़ना है तो क्लास में आते ही क्यों हो; कम से कम उनको तो पढ़ने दो जो पढ़ना चाहते हैं, इस तरह तो तुम दस साल तक पास नहीं हो सकोगे, समझे? अब बैठो और ध्यान से पढ़ो परीक्षा आने वाली है।’’

‘‘ हमें फेल कर दोगे, धमकी दे रहे हो?’’

‘‘ बड़ा हॅूं इसलिए समझा रहा हॅूं, नहीं तो अभी सुधार देता।’’

सुनकर प्रमोद आगबबूला होकर क्लास के बाहर यह कहते हुए चला गया कि स्कूल के बाहर देखते हैं कौन किसको सुधारता है। शिक्षक ने प्राचार्य को घटना की जानकारी दी पर प्राचार्य हमेशा की तरह असमर्थ ही रहे अतः, शिक्षक स्वयं घर का पता लगाकर शाम को प्रमोद के घर पहॅुचे और उसके पिता को जानकारी दे ही रहे थे कि प्रमोद भी घर आ पहॅुचा। पिता ने उसे डाॅंटा और पूंछा कि वह शिक्षकों से दुव्र्यवहार क्यों करता है, इस पर वह बोला,

 ‘‘ ये फेल कर देने की धमकी देते हैं बार बार कहते हैं कि तुम दस साल तक  पास नहीं हो सकते।’’

‘‘अरे गधे! तू समझता है वह सचमुच फेल कर देंगे? वह इसलिए कहते हैं कि तू ठीक ढंग से पढ़कर अच्छे नंबरों से पास हो। यह कहना तो छिपा हुआ वरदान ही माना जाता है, कान खोलकर सुन ले, अगली बार स्कूल से कोई शिकायत आई तो घर से निकाल दूंगा।’’

‘‘ अच्छा! तो आप भी इन्हीं की तरह धमकी दे रहे हैं? ठीक है, आपके निकालने से पहले ही मैं निकल जाता हॅूं, भूखे तो नहीं मर जाऊंगा’’ और वह दौड़कर बाहर चला गया।

 पिता ने सोचा कि भूख लगेगी तो अपने आप वापस आ जाएगा, पर कई दिन हो गए वह नहीं लौटा। घर से जाते समय रास्ते में कुछ लड़कों से उसने सुना कि वे ‘एस ए एफ बटालियन’ में भरती होने जा रहे हैं; बस प्रमोद भी उन्हीं के साथ चला गया और सिपाही के लिए सिलेक्ट हो गया। ट्रेनिंग के दौरान वालीवाल का ऐसा खिलाड़ी बना कि बटालियन में पोस्टिंग के बाद प्रादेशिक स्तर पर ‘एस ए एफ’ की टीम का नेतृत्व कर ‘राज्य वालीवाल ट्राफी’ जीत ली। एकेडेमी में आयोजित सम्मान समारोह में आई जी पुलिस ने प्रमोद को सम्मानित करते हुए कहा,

‘‘ हमें गर्व है कि इस बटालियन को शिखर पर पहॅुंचाने में बहादुर लड़ाकू सिपाही ही नहीं उत्तम खिलाड़ी सिपाहियों का भी योगदान है। प्रमोद के पेरेंट्स महान हैं जिन्होंने अपने बहादुर और खिलाड़ी बेटे को देश की रक्षा के लिए सौंपा है, ऐसे बेटे ही इतिहास की रचना करते हैं।’’

जैसे ही स्टेज पर प्रमोद ट्राफी लेने पहॅुचा उसकी नजर आडिऐंस में बैठे अपने पिता पर जा टिकी, वह ‘आइजी’ से बोला,

‘‘सर! निवेदन है कि आपके द्वारा बटालियन को दी जाने वाली यह ट्राफी मेरे स्थान पर मेरे पिताजी के हाथों में सौंपी जाए।’’

यह एनाउंसमेंट सुनकर प्रमोद के पिता, अपनी आंखों में संकोचमिश्रित आंसुओं को जबरन रोकते दिखाई दे रहे थे।


184 आत्मबोध

 ‘‘ क्यों दादा! उस दूकान पर नौकरी करने वाले ये सज्जन कौन हैं, उम्र के  अंतिम समय में भी बड़ी तल्लीनता से जुटे रहते हैं, किसी से बातचीत भी नहीं करते और हमेशा प्रसन्न ही देखे जाते हैं।’’

‘‘ कौन? वो ‘किराने’ की दूकान पर ?

‘‘ हाॅं, वही ।’’

‘‘ जानकर क्या करोगे, मैं उन्हें अच्छी तरह पहचानता हॅूं परन्तु उन्होंने अपने बारे में किसी से कुछ भी बताने के लिए मना किया है।’’

‘‘ पर क्यों, क्या किसी का कत्ल करके छिपा हुआ है?’’

‘‘ नहीं, ऐसा तो स्वप्न में भी न सोचना, समझे? ’’

‘‘ तो ऐसा रहस्य क्या है जो गोपनीय रखा गया है?’’

‘‘ अरे क्यों कुरेदते हो, बात स्वाभिमान की है और कुछ नहीं।’’

‘‘ अरे भाई! मैं जान जाऊंगा तो कौनसी मुसीबत आ जाएगी, जानकर हम भी प्रोत्साहित होंगे और दूसरों को भी प्रोत्साहित करेंगे।’’

‘‘ यही तो डर है, उन्हें पता चल गया तो वे उसी क्षण चले जाएंगे और मैं नहीं चाहता कि वह यहाॅं से जाएं। ’’

‘‘ तो तुम अपने किसी स्वार्थ के लिए ... ?’’

‘‘ नहीं, नहीं, वह बात नहीं है वास्तविकता पता चल जाने पर यहाॅं उन्हें कोई भी व्यक्ति अपने घर में नहीं रखेगा; मैं नहीं चाहता कि इतना आदरणीय विद्वान व्यक्ति मुझ रिटायर्ड फौजी के कारण व्यर्थ ही कष्ट उठाए।’’

‘‘ अब तो आपने और अधिक उत्सुकता बढ़ा दी है, मैं कसम खाता हूॅं किसी को नहीं बताऊंगा परन्तु सच्चाई जानकर मैं अपने को धन्य ही समझूंगा।’’

‘‘ तो सुनो, जहाॅं मैं सैनिक था उसी राजदरवार में यह सज्जन मंत्री थे, बड़े ही विद्वान और सबके आदरणीय। अचानक उनके मन में यह बात आई कि केवल अपना पेट पालने के लिए मैं राजा की झूठी प्रशंसा कब तक करता रहॅूंगा; उसकी हाॅं में हाॅं कब तक मिलाता रहॅूंगा, जिस काम के लिए यह जीवन मिला है वह तो कभी कर ही न पाऊंगा और, अगले ही क्षण वे किसी को बिना बताए अपनी सम्पत्ति और उस राज्य दोनांे को छोडकर वेश बदलकर यहाॅं छः घंटे काम करने लगे, शेष समय में भग्वदचिंतन।’’ 


183 आश्चर्य !

  ‘‘तुम युद्ध जीतने वाले योद्धाओं को शूरवीर नहीं मानते, और न ही बहुत पढ़े लिखे लोगों को विद्वान पंडित, आखिर क्यों ?’’

‘‘ इतना ही नहीं, मैं तो उनको अच्छा वक्ता भी नहीं मानता जो लच्छे पुच्छेदार भाषा बोलकर प्रभावित करते हैं और, उन्हें दानदाता भी नहीं मानता जो बहुत धन का दान करते हैं।’’

‘‘ अजीब बात है! तो फिर तुम शूरवीर और विद्वान पंडित किसे कहते हो?’’

‘‘ जिसने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है वही शूरवीर है और जो मानवीय गुणों से भरपूर धर्माचरण करते हैं उन्हें मैं पंडित कहता हॅूं।’’

‘‘ अच्छा! तो वक्ता और दानदाता किसे कहोगे?’’

‘‘ जो दूसरों के हित की बात करे वही मेरी दृष्टि में वक्ता है और, जो दूसरों को सम्मान देता है वही दानदाता है।’’


182 टूटी बाउंडरी

प्रोफेसर साहब ने घर की टूटी बाउंडरी बाल को रिपेयर कराने के लिए एक मजदूर और मिस्त्री को लाकर काम कराना प्रारंभ कर दिया। मजदूरों से काम कभी कराया तो था नहीं इसलिए, वह उनको काम समझाकर अपने पढ़ने लिखने में लग जाते और बीच बीच में काम का निरीक्षण करने आ जाते। बीड़ी पीते देख वे उन्हें समझाते कि इससे शरीर को बहुत नुकसान होता है। मजदूर भी उनकी बातों से सहमत होते परन्तु तर्क भी देते कि साहब, क्या करें आदत है, थोड़ा सुस्ता लेते हैं। और, जोर से मुंह से धुआं  बाहर निकालते जिसे देख प्रोफेसर अन्दर चले जाते। दोपहर में मिस्त्री जब खाना खाने अपने घर चला जाता मजदूर वहीं पर बैठ कर साथ में लायी रोटियाॅं, नमक मिर्च के साथ खाने लगता। यह देख प्रोफेसर की दयालु पत्नी उसे अचार और सब्जी दे दिया करती।

काम पूरा होने पर प्रोफेसर ने उनकी मजदूरी के पैसों का भुगतान किया। मिस्त्री तो पैसे लेकर चला गया, मजदूर बैठा रहा। प्रोफेसर की पत्नी ने पूछा, 

‘‘ क्या बात है, पैसे कम हैं क्या? लो, बीस रुपये और ले लो।’’

सुनकर मजदूर जोर से रोने लगा इतना कि प्रोफेसर पति पत्नी दोनों को उसे शान्त करने में बहुत प्रयत्न करना पड़ा। शान्त होते ही वह सिसकते हुए बोला,

‘‘ माताजी! पता नहीं अब कहाॅं काम मिलेगा, किस किस की दुतकार, डाॅंट फटकार और गालियां सुनना पड़ेंगी। पिछले सात माह से यहाॅं वहाॅं मजदूरी करते करते पता नहीं क्यों पहली बार आपके यहाॅं अपने घर जैसा लगा।’’ 

‘‘क्यों? पहले क्या मजदूरी नहीं करते थे?’’ प्रोफेसर की पत्नी ने आश्चर्य से पूछा।

‘‘ नहीं माताजी! गाॅव में हमारी तीस एकड़ उपजाऊ जमीन है, माता पिता भी हैं। बारहवीं फेल हो जाने पर मैं ही घर की खेती सम्हालने लगा। परन्तु पिताजी  की रोज रोज की डाॅंट फटकार से ऊबकर मैं भाग आया और मजदूरी करने लगा। आपके यहाॅं आकर मुझे लगा कि अपना घर ही ठीक होता है। इसीलिए आंखे भर आईं। ’’

‘‘ अरे बेटा! अपने घर वापस लौट जाओ, मां बाप तो संतान के भले के लिए ही डाॅंटते हैं, इसका क्या बुरा मानना?’’ 


181 बाप का बाप

‘‘ हेलो, क्या मैं हीरालाल जी से बात कर सकता हॅूं?’’

‘‘ जी! मैं हीरालाल बोल रहा हॅूं, कहिए क्या बात है?’’

‘‘ हीरालाल जी ! मैं इन्श्योरेंस के हेड आफिस दिल्ली से विवेक बोल रहा हॅूं, आपकी इन्श्योरेंस पोलिसीज के संबंध में कुछ जानकारी देना चाहता हॅूं’’

‘‘ जी ’’

‘‘ पिछले माह जो पोलिसी मेच्योर हुई है, उसका बोनस एक लाख पन्द्रह हजार तीन सौ बारह रुपये बना है, आपके ऐजेंट ने आपको बताया या नही?’’

‘‘ नहीं। वैसे मुझे तो मालूम ही नहीं है सर, कि बोनस क्या होता है।’’

‘‘ अरे! इसी कारण तो सरकार ने हमें क्रास चैक करने के लिए हेड आफिस में बिठाया है कि कस्टोमर्स को सही समय पर मदद की जा सके। अभी लास्ट डेट समाप्त होने को तीन दिन शेष हैं, आप मुझे अपनी पोलिसी के डिटेल्स, बेंक खाता नंबर और पता बता दीजिए ताकि मैं आगामी कार्यवाही कर आपको सूचित कर सकॅूं।’’

‘‘ सर, बहुत धन्यवाद। मैं सभी कागजाद एक दो घंटे में ढूंड कर आपको बताता हॅूं, परन्तु मैं चाहॅूंगा कि आप अपना नाम, पिता का नाम, उम्र, पत्राचार का पता और फोन नम्बर आदि लिखा दें तो मुझे संपर्क करने में सुविधा होगी।’’

‘‘ लेकिन पिता के नाम, पता आदि की क्या जरुरत है, फोन नंबर तो यही है जिससे आप बात कर रहे हैं’’

‘‘ सर, बात ये है, कि पुलिस में एफ आई आर दर्ज कराते समय इनकी जरूरत पड़ती है।’’

‘‘ अबे साले! तू तो मेरे बाप का . . . .।’’ 


Sunday, September 27, 2020

180 मंत्री का आदमी

यों तो जिला अस्पताल में रोज ही मरीजों की भीड़ होती है पर आज तो पूरे कम्पाउंड में पैर रखने को जगह नहीं थी। दुर्घटनाग्रस्त मरीज ड्युटी पर उपलब्ध डाक्टर भगवान से गिड़गिडाते, साथीगण स्ट्रेचर और वार्डव्वाय को तलाशते, अन्य, स्टोर से दवा पाने के लिए अपनी बारी का इंतजार करते बेबसी पर चुप थे, अचानक डाक्टर के कक्ष से आवाज आई,

‘‘ राजू और दीनू! तुम दोनों उस मरीज को तीसरी मंजिल पर मेडीसन वार्ड में पहुंचाने के बाद इन दोनों मरीजों को पहली मंजिल के आपरेशन थिएटर में जल्दी ले चलो ’’ 

‘‘ सर! आप हमेशा हम लोगों को ही मरीजों को स्ट्रेचर पर लाने और ले जाने के लिए कहते हैं, एक काम पूरा नहीं हो पाता कि दूसरा आर्डर मिल जाता है। कालीचरण तो आपके पास ही बैठा रहता है, उसे क्यों नहीं भेजते ?’’

‘‘ उसको भी भेजते हैं’’

‘‘ लेकिन हम लोगों ने तो कभी उसे स्ट्रेचर ले जाते नहीं देखा ।’’

‘‘ तो क्या मुझे हर बार तुम लोगों को यह बताना होगा कि देखो कालीचरण स्ट्रेचर ले जा रहा है? ’’

‘‘ नहीं सर! हम लोगों को यह अच्छा नहीं लगता कि पूरे समय हमें  ही हर जगह दौड़ना पडे़ और वह कुछ न करे, जबकि वह भी हमारी तरह ही काम करने के लिए नियुक्त किया गया है।’’

‘‘ अरे भाई! जरा समझा करो, जो लोग अच्छा काम करते हैं, उन्हीं को काम के लिए कहा जाएगा कि नहीं ?’’

‘‘ सर! ये कहाॅं का न्याय है कि जो अच्छा काम करे उसे काम से लाद दिया जाय और जो खराब काम करे या कोई काम ही न करे उसे मुफ्त का वेतन दिया जाय? ’’

‘‘ तुम क्या जानते नहीं हो कि वह मंत्री जी का आदमी है? ’’ डाक्टर ने फुसफुसाते हुए कहा। 

‘‘ तो क्या हुआ, वह है तो हमारी तरह ही वार्ड व्वाय .. ?’’  कहते हुए वे भी कालीचरण के पास जा बैठे।



179 पात्र नाट्यमंच के

यह दैवयोग ही था कि दुर्योधन अधर्मी, दुष्ट और क्रूरता का पर्याय और इन सभी गुणों से विपरीत कर्ण सात्विक, धार्मिक और दयालुता की पराकाष्ठा होते हुए भी दोनों की घनिष्ट मित्रता आजीवन रही । कर्ण का, सदा ही यह प्रयास होता था कि किसी प्रकार दुर्योधन अपने असात्विक कार्य छोड़कर सन्मार्ग की ओर आ जाए। इसलिए, एक बार दुर्योधन को अत्यन्त प्रसन्न देख उसने कहा,

‘‘ मित्र! सभी लोग तुम्हें अच्छा नहीं कहते, यह मुझे अच्छा नहीं लगता। तुम क्यों नहीं सदाचरण और धर्मानुकूल कार्य करते हुए लोगों का मन जीत लेते ? इस प्रकार तुम्हारी यशकीर्ति युगों तक पूजित बनी रहेगी ।’’

‘‘ मित्र कर्ण! मैं स्वयं आश्चर्यचकित हूॅं कि मुझे सभी लोग दुष्ट, अनाचारी, अधार्मिक और न जाने क्या क्या कहते हैं, परन्तु मैं यह समझ ही नहीं पाता कि मेरा क्या दोष है ।’’

‘‘ मित्र दुर्योधन! धर्म का पालन करते हुए निवृत्ति मार्ग पर चलना प्रारम्भ कर दो ।’’

‘‘ मित्र कर्ण! मैं न तो धर्म जानता हॅूं और न ही अधर्म, न ही प्रवृत्ति जानता हॅूं न निवृत्ति। मैं तो केवल यह जानता हॅूं कि मेरे हृदय में कोई देवता बैठा है, वह मुझसे जो कुछ कहता है मैं वही करने के लिये विवश हो जाता हॅूं ।’’


178 परम्परा

 ‘‘ ये क्या ? पूर्वजों के प्रति तुम्हारा लेशमात्र भी सम्मान नहीं है ?’’

‘‘ क्यों ? मैंने क्या किया ?’’

‘‘ अरे ! क्या नहीं किया, तुमने तो पीढ़ियों से चली आ रही परम्पराओं को नष्ट ही कर दिया।’’

‘‘ ऐसी परम्पराओं का बोझ ढोने से क्या फायदा, जिनका कोई वैज्ञानिक आधार न हो’’

‘‘ तो क्या हमारे पूर्वज मूर्ख थे जिन्होंने इन्हें प्रारंभ किया ?’’

‘‘ नहीं, तात्कालिक परिस्थितियों के अनुसार जो उन्हें अच्छा लगा उसका ही उन्होंने पालन किया होगा । ’’

‘‘ तो तुम्हें उनका अनुसरण करने में लज्जा क्यों आती है ?’’

‘‘सभी जानते हैं कि देश, काल और पात्र के अनुसार परिस्थितियों के बदल जाने पर स्थापित मान्यताएं भी बदल जाती हैं। इसे ही प्रगति कहते हैं। आज की परिस्थितियों में वे सब औचित्यहीन हो गई हैं।’’

‘‘ अरे मूर्ख ! तू इतना पढ़ लिख गया है कि खानदानी परम्पराओं को ही नष्ट कर रहा है और कहता है इसे प्रगति कहते हैं ?’’

‘‘ अच्छा ! यह बताओ, पूर्वज धोती पहनते थे, पैदल या बैलगाड़ी में यात्रा करते थे, पेड़ पौधों की छाल, जड़ों और रस से उपचार किया करते थे लेकिन अब सभी लोग पेंट शर्ट पहनते हैं, बस, रेल और वायुयान में यात्रा करते हैं, आधुनिक विधियों से बनाई दवाएं और इंजेक्शनों  से अपना उपचार करते हैं, क्यों ?’’

‘‘ तू अपना तर्क ज्ञान आने पास रख और पूर्वजों की परम्परा के अनुसार जैसा मैं कहता हॅूं वही कर।’’

‘‘  नहीं! जो तर्क, विज्ञान और विवेक पर आधारित हो उसके अनुसार चलने ही पूर्वजों को प्रसन्नता मिलेगी न कि उनके द्वारा की गई त्रुटियों को दुहराते जाने  से।’’


177 संस्मरण

उस दिन बेंक से पैसे निकालने के लिए खिड़की पर लगी लम्बी लाइन में पीछे खड़े होकर अपने क्रम आने की प्रतीक्षा करने लगा। लाइन पीछे की ओर बढ़ती जा रही थी पर आगे टस से मस भी नहीं हो रही थी। जिसका क्रम आ जाता वह सोचता बस उसने जग जीत लिया। मुझसे आगे तीसरे क्रम पर खड़े सज्जन के साथ उनका चार पांच साल का बेटा भी उनका हाथ पकड़े लाइन में खड़े खड़े जब थक गया तब वहीं काऊंटर की दीवार से टिक कर बैठ गया, शायद वह अस्वस्थ था। इतने में तीन महिलायें आकर खिड़की के पास अलग से लाइन बना कर खड़ी हो गईं, देखते ही बन्दूकधारी गार्ड बोला,‘‘ महिलाओं की अलग से लाइन लगाना अब बंद हो चुका है आप लोग इसी लाइन में पीछे खड़ी हो जाइए ।’’ उनके साथ आए एक सज्जन ने उन महिलाओं की ओर से संक्षिप्त बकालत की परन्तु गार्ड की रोबदार मूछें देख वे चुप हो गए। मुझे तत्क्षण लगभग दो वर्ष पूर्व लिखी गई अपनी लघुकथा ‘‘लाइन’’ याद आ गई और यह घटना देखकर लगा जैसे समाज पर मेरी लघुकथा का प्रभाव पड़ने लगा हो।

मंदमंथर गति से घटती हुई लाइन में बहुत देर बाद मुझसे तीसरे क्रम में आगे खड़े व्यक्ति का क्रम आने पर उन्हें लगा कि अन्ततः ईश्वर ने उनकी सुन ही ली। उनकी पासबुक और विदड्राल फार्म लेकर बाबू ने ज्यों ही उनका एकाऊंट देखा तो उन्होंने कहा ‘‘ भाई साब! आपके खाते में केवल पन्द्रह सौ रुपये बचे हैं, नियमानुसार कम से कम तीन हजार रुपए खाते में बने रहना चाहिए, आप इतनी ही राशि और जमा कर दीजिए अन्यथा आपको फाइन देना पड़ेगा।’’ यह सुनकर सज्जन पसीने से नहा गये; वह कुछ कह ही न पाए कि पीछे वाले सज्जन बोले ‘‘ हटिए मेरा नंबर आ गया’’। वह एक कदम बाजू में हुए ही थे कि वहीं बैठा उनका बेटा बोल पड़ा‘‘ पापा! पैसे मिल गए?’’ 

पापा धीरे धीरे बाहर की ओर चलते हुए बड़बड़ाते जा रहे थे , ‘वाह री किस्मत! पैसे होते हुए भी मेरे किसी काम के नहीं हैं!’  और बेटा, उनका हाथ पकड़े बार बार कह रहा था, ‘‘ क्या कहा पापा! पैसे मिल गए?’’ इधर खिड़की पर मेरा जग जीतने वाला क्रम आ चुका था।


176 मूल्याॅंकन

स्थानीय प्रथम तिमाही परीक्षा के मूल्याॅंकन से असंतुष्ट बारहवीं कक्षा का छात्र विषय शिक्षक के पास जाकर बोला, ‘‘ सर! आपने इस प्रश्न के उत्तर पर मुझे शून्य अंक क्यों दिया?’’

‘‘ इसलिए कि तुम्हारे द्वारा दिया गया उत्तर बिलकुल गलत है’’

‘‘ सर! प्रश्न था, ‘ कहानी की सार्थकता पर अपनी टिप्पणी लिखें?’ मैं ने वही तो लिखा है ।’’

‘‘ परन्तु मैं ने उसका उत्तर क्या लिखवाया था ?’’

‘‘ वह तो आपका दृष्टिकोण था । ’’

‘‘ तो ठीक है, मैं ने भी उसका मूल्याॅंकन ही किया है । ’’

शिक्षक के स्पष्टीकरण से असंतुष्ट छात्र, प्राचार्य के पास अपनी समस्या लेकर पहुॅंचा। प्राचार्य ने विचारोपरान्त छात्र को पांच में से तीन अंक दे दिए। छात्र ने प्राचार्य की टीप सहित उत्तर पुस्तिका विषय शिक्षक को दिखाई। 

शिक्षक क्षुब्ध, छात्र मुग्ध। 


175 फरिश्ते या शिकारी ?

पिता के असामयिक निधन के बाद दिनेश को अपनी घरेलु जिम्मेवारियों के बीच आगे पढ़ाई जारी रखना असंभव था परन्तु, माॅं के प्रोत्साहन से अभावों के बीच भी उसने अपनी डिग्री पूरी कर अच्छी सरकारी नौकरी पा ली। रिश्तेदार या अन्य लोग जो कभी हाल चाल भी नहीं पूछते थे अब निकटता बढ़ाने लगे और, प्रायः रोज ही एक न एक, जाने अन्जाने लोग विवाह के लिए प्रस्ताव लाने लगे। दिनेश सभी से विनम्रता पूर्वक यह कह कर टालता जाता कि अभी उसे भाइयों को पढ़ाना है, घर की आर्थिक स्थिति को सुधारना है, इसके बाद ही कुछ निर्णय करेगा।

इसी क्रम में, धन और पद का प्रभाव डालते हुए उसके विभाग के एक अधिकारी ने भी यही प्रस्ताव दिया पर उसने अपनी पारिवारिक और आर्थिक स्थिति उनके समकक्ष न होने के विचार से मौन रहना चाहा तब, वे सज्जन बोले,

‘‘अरे, क्यों चिन्ता करते हो संबंध तो हो जाने दो, सब अनुकूल हो जाएगा’’

‘‘ नहीं सर! हमारा ग्रामीण परिवेश में ढला निम्न स्तरीय परिवार, आपकी प्रतिष्ठा और शहरी उच्च स्तर से बहुत छोटा है। आपकी बेटी मेरे घर में वह सुविधाएं नहीं पा सकेगी जो आपके घर में सहजता से उपलब्ध होती हैं इसलिए, यह संबंध उचित नहीं है।’’

‘‘ पर तुम्हें कौन सा गांव में ही रहना है, हमारे यहाॅं शहर में रहना, वहीं पर ट्रान्सफर करा देंगे ’’

‘‘ सर! अपने घर में उजाला करने के लिए आप, मेरे घर में अंधेरा क्यों करना चाहते हैं ?’’ 

‘‘ डियर फ्रेंड! अपने सुनहरे भविष्य को क्यों दुतकार रहे हो ?’’

‘‘ सर! आपकी दयालुता के लिये आभार। लेकिन, मेरा सीधा सादा मन कहता है कि मेरा सुनहला भविष्य मेरे पराक्रम की नीव पर ही स्थिर रह सकेगा किसी फरिश्ते की कृपा पर नहीं। ’’

सुनते ही, आफीसर की कार का हार्न जोर से बज उठा।


174 अस्थिर समय!


‘‘मेरे अनेक मित्र कहते हैं कि आप सभी प्रश्नों का उत्तर जानते हैं। ’’

‘‘ पता नहीं वे ऐसा क्यों कहते हैं।’’

‘‘क्या आप मेरे एक प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं?’’

‘‘ क्या आप मेरी परीक्षा लेने आए हैं?’’

‘‘ नहीं, जिज्ञासा वश ही आया हॅूं।’’

‘‘ तो पूछो,’’

‘‘ क्या आप वह एक वाक्य बता सकते हैं जिसे सुनकर वर्तमान में जो सुखी लोग हैं वे दुखी हो जाएं और जो दुखी हैं वे सुखी हो जाएं ?’’

‘‘ये दिन नहीं रहेेंगे। ’’


173 रोड टैक्स

 ‘‘ क्यों जयन्त ! तुम्हारे शहर में सड़क के किनारे खड़े होने पर भी टैक्स लगता है?’’

‘‘ क्या बात है नीरज! ’’

‘‘ अरे ! बस से उतरकर पिछले बीस मिनट से तुम्हारे आने की प्रतीक्षा यहाॅं कर रहा था, इतने में पाॅंच भिखारियों को एक एक रुपया दे चुका हॅूं’’

‘‘ अच्छा ! तो ये बात है, हः हः हः हः, हमारे देश ने भिखारी ही तो पैदा किये हैं ।’’

‘‘ देखो !  वह छठवाॅं इसी तरफ आ रहा है , अब मेरे पास खुले पैसे नहीं हैं, जल्दी स्कूटर स्टार्ट करो ... ’’

इसी बीच भिखारी ने अपने कटोरे को जयन्त की ओर बढ़ाया जिसे देख नीरज ने अपना मुॅंह दूसरी ओर करते हुए कनखियों से उसे देखा। 

वह मटमैला सा कटोरा हिलाते हुए कहने लगा, ‘‘ अरे साब, कुछ तो दे दो ! ! किसी को कुछ न देने के कारण ही मेरी यह दुर्दशा हुई है.... ’’

जयन्त ने एक्सीलरेटर घुमाया और स्कूटर फुर्र हो गया। लगभग पचास मीटर ही चला होगा कि अचानक उसने स्कूटर मोड़ा और उसी स्थान पर आकर उस भिखारी को खोजने चारों ओर नजर दौड़ाने लगा पर भिखारी वहाॅं से गायब हो चुका था।

अचरज में पड़े नीरज ने हड़बड़ा कर पूछा, ‘‘ क्या हुआ जयन्त ! बापस क्यों आ गए?’’

‘‘ अरे यार, उस भिखारी से मिलना था, वह पता नहीं कहाॅं चला गया’’

‘‘ लेकिन क्यों, ये सब तो घूमते ही रहते हैं, मैं तो इन लोगों से तंग आ चुका हॅूं’’

‘‘ तुम नहीं समझोगे’’

‘‘ पर कुछ बताओ तो सही ?’’

‘‘ उसने मेरी आखें खोल दी हैं।’’


221 चिंजा की शादी

5 वीं क्लास में पढ़ रहीं स्वभाव से सीधी सादी सहुद्रा और भोली सी चिंजा में गहरी दोस्ती थी। चिंजा की स्पष्टवादिता से क्लास के सभी लड़के लड़किय...