Thursday, April 22, 2021

217 स्लीपिंग डिवाइनिटी

 एक साथ पढ़ते पढ़ते रवि और किरण अपनी डिग्री पूरी करते ही अच्छी नौकरी भी पा गए पर अलग अलग क्षेत्रों में। इसे यौवन का उन्माद ही कहा जाएगा कि उन्होंने परिवार, रिश्ते और सामाजिक मान्यताओं को किनारे कर तथाकथित आधुनिक जीवन जीने की पद्धति ‘‘लिव इन’’ को चुना। ‘सेन्सुअल प्लेजर’ ही जिसका एकमात्र लक्ष्य हो उससे ‘मन’ ऊब का शिकार न हो, यह कैसे हो सकता है? अतः अनेक बार अपनी सीमाओं को लाॅंघता हुआ दोनों का मन अपनी मूल अवस्था में आ आकर थकान उतारने लगा। अलग अलग कार्यालयों में काम करने के कारण अब दोनों के मन में शंकाओं और आशंकाओं ने डेरा डालना प्रारंभ किया और मतभेदों ने जन्म ले लिया। लाख प्रयासों के बाद भी दोनों न तो एक ही विभाग में साथ साथ काम करने में सफल हो पाए और न ही मानसिक तरंगों के साथ झूलती कलह से और अन्ततः आरोपों, प्रत्यारोपों में लिपटे मतभेद, मनभेद में बदल गए। दोनों को अपने अपने परिवार और रिश्तेदार याद आने लगे पर उनको तो महत्वहीन मानकर छोड़ ही चुके थे वे, इसलिए उनका मनोद्वन्द्व कभी कभी वाक्युद्ध में, कभी कभी मौन में रूपान्तरित होता रहता। मन पर जब असीमित ‘प्रेशर’ पड़ने लगता है तब वह उन्मादित होकर असामान्य कदम उठाने को विवश होता है अतः इसी अवस्था में किरण एक दिन अपनी डाक्टर मित्र के पास इलाज के लिए पहुंची।

‘‘ आशा! मैं बहुत बीमार हॅूं, मेरा जल्दी इलाज कर दो’’ रोते हुए किरण ने कहा।

‘‘ अरे ! कैसी बातें करती है, तुझे क्या हो सकता है, सबसे न्यारा आनन्दित जीवन तुझे कुछ होने ही नहीं देगा।’’

‘‘ आशा! तू नहीं जानती, ये जीवन ही मेरी बीमारी है इसे ऐसी दवा दे दे जिससे मैं सदा के लिए रोगमुक्त हो जाऊं।’’

‘‘ क्या पागलों की तरह बातें करती है! तू तो कहती थी, जमाना हमसे है हम जमाने से नहीं, तो अब डरती क्यों है, जीवन तो जीने के लिए है विषमताओं से डरकर मरने के लिए नहीं।’’

‘‘ नहीं आशा! मेरा वह निर्णय गलत था, मैं बहुत दुखी हॅूं अब जीना नहीं चाहती, मैंने सब कुछ खो दिया, तू मुझे निराश न कर..।’’

आॅंसुओं की धार में स्नान करते किरण की व्यथाकथा के शब्द अन्त होने का नाम ही नहीं ले रहे थे कि आशा ने टोकते हुए कहा,

‘‘ अरे! कहाॅं गया तेरा वह आत्मविश्वास जिसके आधार पर तूने कभी मेरी निराशा को आशा में बदल दिया था?’’

‘‘ आशा! तू मेरी दुर्दशा को नहीं जानती।’’

‘‘ चल, मैं तेरे ही शब्द तुझे याद कराती हॅूं कि, इस प्रकार ठोकर से रोकर, जीवन हारने से अच्छा है अपने भीतर जन्मों से सोए हुए देवत्व को जगाना। याद आया? तो यही कर, फिर देखना रवि ही नहीं सारा समाज तेरी वन्दना करेगा।’’

किरण के आंसू अब रविकिरणों में चमक उठे।



216 विद्वान भिखारी

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विद्वान भिखारी

‘‘ बहुत दिनों में दिखे? कहीं बाहर गए थे क्या?’’

‘‘ नहीं तो। आजकल मंदिरों में भगवानों की रिसर्च में जुटा हॅूं।’’

‘‘ अजीब बात है, भगवानों की रिसर्च?’’

‘‘ जी हाॅं, पर आप नहीं समझेंगे।’’

‘‘ फिर भी, कुछ तो समझ में आएगा यदि आप जैसा विद्वान समझाएगा।’’

‘‘बात ये है कि सभी लोग मंदिर के भीतर जाते हैं और मैं बाहर ही बैठता हॅूं, भिखारियों के बीच।’’

‘‘ लेकिन इसमें रिसर्च की क्या बात है, भाग्य से प्रताड़ित बेचारे भिखारी।’’

‘‘ मैं ने पाया है कि वे विपन्न होते हुए भी विद्वान होते हैं।’’

‘‘ ये भी कोई नयी बात है? अधिकांश विद्वान, विपन्न ही होते हैं।’’

‘‘ नहीं, इनकी विपन्नता और विद्वत्ता अनूठी होती है, उनकी एक दिन की वार्ता सुनो-

 ‘काय रे! परों तें ओ तरप काय दौर लगाउत जा रव तो?’

‘ का तोय पता नई, ओ रिखबदास सेठ के लरका कीं तेरईं हती’

‘ हाॅं, बौई दारू ठेकेदार सेठ जे की तेज कार पुल पे लुड़क गई ती’

‘ हाॅं बौई, ओ के लरका ने सोई फांसी लगा लई ती’

‘ ठीकई तो है, जे के जैसे नदिया नारे, ऊंसई ओ के भरका, जे के जैसे बापमताई, ऊंसई ओ के लरका।’


(बुंदेली शब्द- काय/क्यों। परों/परसों। ओ तरप/ उस तरफ। दौर/दौड़। रव तो/रहा था। तोय/तुम्हें। नई/नहीं। लरका/पुत्र। हती/ती/ थी। बौई/वही। ऊंसई/उसीप्रकार। जेके/ जिसके। ओके/उसके। भरका/लंबी चैड़ी खाइयाॅं, खंदक। बापमताई/ माता पिता।)


221 चिंजा की शादी

5 वीं क्लास में पढ़ रहीं स्वभाव से सीधी सादी सहुद्रा और भोली सी चिंजा में गहरी दोस्ती थी। चिंजा की स्पष्टवादिता से क्लास के सभी लड़के लड़किय...