घर के पास लगे सरकारी नल पर पानी भरने आने वाली महिलाओं के बीच कुछ दिनों से रोज ही चर्चा होती कि, ‘‘देखो तो, पाॅंच पाॅंच बड़े बड़े बच्चों की माॅं को क्या सूझी‘‘। सुनते सुनते एक दिन जब चंदन से पूछे बिना न रहा गया तब उसे पता चला कि वह तो नन्दन की माॅं है, और उसके मन में फिल्म रील की तरह उस दिन की दृश्यावली क्रमशः आने लगी जब वह किसी किताब को लेने उसके घर गया था और घर पर पहुंचते ही सदा हंसमुख रहने वाले नन्दन ने किस प्रकार दुखी होकर बताया था कि उसकी माॅं अचानक बीमार हो गई है, और जब चंदन ने भीतर की ओर देखा था तो उसकी मां किस प्रकार पलंग पर लेटी हुई नन्दन के दोनों छोटे भाइयों से पैर दबवा रही थी।
चंदन को उनसे हुई अपनी इस वार्ता ने भी आ घेरा-
‘‘ माता जी क्या हुआ?‘‘
‘‘ बहुत दर्द हो रहा है‘‘
‘‘दर्द कहाॅं हो रहा है‘‘
‘‘ तुम्हें क्या बतायें‘‘ ।
‘‘मैं डाक्टर तो नहीं पर, यदि आपके दर्द का पता चल जावे तो उस प्रकार के डाक्टर का प्रबंध हम लोग कर सकते हैं जिससे आप जल्दी ठीक हो सकती हैं?‘‘
‘‘तुम नहीं समझोगे‘‘ .. .. ..।
अपने कल्पना लोक में विचरण करते हुए वह सोचने लगा कि नन्दन भी एक बच्चे का बाप है और उससे बड़ी दो बहिने भी बच्चों वाली हैं , उसके पिता भी मिल में काम करते है और अपनी खेती से घर का सरलता से खर्च उठाते ही हैं, शायद घरेलु कोई कठिनाई नहीं है फिर भी यह महिलायें कैसी विचित्र बातें कर रहीं हैं ? विश्वास नहीं होता..... सोचते सोचते वह कब नन्दन के घर जा पहुंचा पता ही न चला।
नन्दन उसे दूर से ही देखकर भीतर चला गया और अन्य लोग भी उससे नहीं मिले।
पडौस में रहने वालों ने उसे बताया कि नन्दन की माॅं किसी मिल में काम करने वाले के साथ भाग गयी है, पूरा एक सप्ताह हो गया कुछ पता नहीं है... ...
‘‘तुम नहीं समझोगे‘‘ .. .. ..का अर्थ, चंदन को अब समझ में आया।
No comments:
Post a Comment