Friday, June 5, 2020

37.आस्तिक और नास्तिक


चंदू  के हाथ में सोने का आभूषण देख राजू और रवि बहस करने लगे । कोई कहता नेकलेस, कोई लाकेट और कोई चेन कहता । शोर सुन कर बाबा बोले, "राजू ! पिछले दिन, मैंने तुम लोगों को हर प्रकार की बहस होने के पीछे मूल कारण क्या बताया था, बोलो ?" सभी चुप।
बाबा ने स्थिति को गंभीर जानकर कहा, "आओ तुम्हें एक किस्सा सुनाते हैं। इस पर चिंतन करना और निष्कर्ष हमें बताना....।"
एकबार गौतम बुद्ध के पास लोगों के दो अलग अलग ग्रुप परस्पर झगड़ते हुए आये।
एक ग्रुप में तथाकथित पंडित लोग अपनी दलील दे रहे थे कि ‘‘ईश्वर  है‘‘ और दूसरे ग्रुप में कुछ आधुनिक पढ़े लिखे थे जो कह रहे थेे  कि ‘‘ ईश्वर  नहीं है‘‘। 
पंडितों ने पूछा- "महात्मन्! किं ईश्वरः  अत्थि? (अर्थात् क्या ईश्वर  का अस्तित्व होता है?)"
गौतम बुद्ध चुप रहे।
इसके बाद दूसरे ग्रुप ने पूछा- "महोदय! किं ईश्वरः  नात्थि? ( अर्थात् क्या ईश्वर  का अस्तित्व नहीं होता है?)"
गौतम बुद्ध फिर चुप रहे।
इसपर बाद में, पंडितों का एक  ग्रुप यह तर्क देता रहा कि देखो! ईश्वर  है और चूंकि उसका वर्णन किसी भी प्रकार शब्दों में नहीं किया जा सकता, इसीलिये बुद्ध चुप रहे...।
दूसरा ग्रुप यह तर्क देता रहा कि ईश्वर  होता ही नहीं है इसलिये बुद्ध क्या कहते...। 

यह सुनते ही रवि बोला, "बाबा! मुझे याद आ गया, हर बहस के पीछे कारण होता है उसके मूल तत्व को भूल जाने का।"
चंदू बोली "क्या मतलब?"
"अरे! हमारी गलती यह है कि आभूषणों को दिये गये नाम और रूप के आधार पर उनके अस्तित्व को हम पृथक पृथक मानते हैं पर मूल तत्व ‘सोना‘ जिसके वे बने हुए हैं उसे भूल गये , यही विवाद की जड़ है।"
बाबा बोले, "तुमने सही समझा, यही कारण है कि बुद्ध चुप रहे। वे दोनों ग्रुप परस्पर अपना सापेक्षिक अस्तित्व तो मानते हैं पर उन सबका अस्तित्व जिस निर्पेक्ष सत्ता के सापेक्ष है उसे भूल जाते हैं। "

Thursday, June 4, 2020

36. प्रातः भ्रमण


 रवि प्रति दिन सूर्योदय से पहले बाबा के साथ एकान्त में घूमने जाता है । एक दिन उसके मित्र विनय ने पूछा कि क्या वह भी उनके साथ प्रातः घूमने जा सकता है?
रवि ने कहा कि यदि एक घंटे बिना बोले रह सकते हो तो भले चल सकते हो। विनय ने कहा, बिलकुल अनुशासन में रहॅूंगा, तुम लोग मेरे घर के सामने से ही तो निकलते हो, मैं पहले से ही तुम लोगों की प्रतीक्षा करता मिला करूंगा, तुम्हें पुकारना भी नहीं पडे़गा...। 
अगले दिन विनय यथानिर्धारित प्रतीक्षरत मिला और साथ में चल दिया । थोड़ी देर चलने के बाद पूर्वी क्षितिज में अरुणिमा के साथ सूर्य की मुस्कुराहट से नीरवता में डूबी प्रकृति को खिलखिलाते देख विनय बोल पड़ा ‘‘ वाह क्या सुन्दर दृश्य  है‘‘.....।
सभी चुपचाप। 
लौटते हुए विनय अपने घर चला गया और रवि बाबा के साथ अपने घर आ रहा था कि इसी बीच बाबा ने कहा
 ‘‘ तुम्हारा मित्र बहुत बोलता है‘‘।
अगले दिन रवि ने विनय को साथ चलने से मना कर दिया।   

Wednesday, June 3, 2020

35. दोहरे मापदण्ड



"पापा ! कोई अंकल मिलने आये हैं , कहते हैं  विधायक के पीए हैं। "
(तुरंत दौड़कर गेट की ओर जाते हुए )
"ओ ! हो! नमस्कार श्रीवास्तव साहब , आइये आइये , यहाँ बैठिये , इतनी गर्म दोपहरी में  क्यों कष्ट  किया , फोन कर देते , हम ही आ जाते  ...... राजू जा बढ़िया शर्वत   ले आ. . "
 एक घंटे बाद --
"पापा ! कोई अंकल मिलने  आये  हैं,  कहते हैं प्रोफेसर पाण्डे हैं।"
"ओह ! इनको चेन नहीं है--  राजू! बाहर बिठाओ , बोल दो कि  आ रहे हैं। "
-दस मिनट बाद -
"अरे ! आओ पाण्डे जी ! कहो सब ठीक तो है। ओफ् ओ !  गर्मी बहुत है आज , बोलो कैसे आये?  "

34 अपूर्णीय क्षति


"प्रभु! देखो तुम्हारे परम भक्त लंकाधीश  रावण कष्ट में हैं, वह तुम्हें मदद के लिये पुकार रहे हैं, उन्हें  मरणान्तक कष्ट हो रहा है, छटपटा रहे हैं, देखो! "
प्रभु ध्यानमग्न हैं, पार्वती बार बार ध्यानाकर्षित करने की चेष्टा कर रहीं हैं।

"प्रभो! मैं ने कई बार देखा है कि अनेक पापियों और दुष्टों ने जब भी हृदय से तुम्हें पुकारा है तुम सब काम छोड़कर उनकी मदद के लिये तुरंत पहॅुंचे हो। माना कि रावण पातकी है पर है तो तुम्हारा परमभक्त, तुमने उसकी मदद नहीं की तो यह तो उसके साथ बड़ा अन्याय होगा? "

प्रभु ने कुछ क्षणों के लिये आँखे  खोलीं और बोले.....
"पार्वती! रावण यदि पातकी होता तो भी मैं एक बार उसे मदद करने के लिये विचार कर सकता था परंतु वह तो महापातकी है, उसने एक नारी का अपहरण करने का अक्षम्य कृत्य तो किया ही है; परंतु वरानने! क्या तुम्हें ज्ञात नहीं है कि उसने यह कार्य साधु के वेश  में किया। उसके इस कार्य से अब सभी साधुओं पर संदेह किया जायेगा, उन पर कोई विश्वास  नहीं करेगा, यह तो समाज की अपूर्णीय क्षति है, इसका परिणाम उसे भोगना ही होगा। "
..... और, प्रभु फिर से ध्यानस्थ.....।




Monday, June 1, 2020

33 नई सोच..




"क्यों भाई! बहुत गंभीर सोचविचार में डूबे दिख रहे हो?"
"हाॅं यार, मैंने दो राजाओं के बारे में पढ़ा। बड़ा ही दुख हुआ। बस यही सोच रहा हॅूं कि जैसा उन्होंने किया, मैं तो विल्कुल न करूंगा।"
"वे राजा कौन थे?"
"अरे यार! वही, एक राजा हरिश्चंद्र और दूसरे राजा रामचंद्र।"
"और उन्होंने क्या किया जो तुम नहीं करना चाहते?"
"ओह! ये भी कोई पूछने की बात है? एक ने सत्य बोलकर अपना राजपाट सहित पूरा जीवन नष्ट कर लिया और दूसरे ने अपने माता पिता की आज्ञा मानकर।" 

32 . संन्यासी


 "जानते हो? मेरा भाई बनारस गया है।"
" क्यों?"
"संन्यासी की ट्रेनिंग लेने।"
"संन्यासी बनने के लिये ट्रेनिंग... ह ह ह।"
"तुम्हें तो मेरे मायके के सभी लोगों पर हंसने के अलावा कुछ आता ही नहीं है। तुम क्या जानो कि संन्यासियों को कितना कष्ट में रहना पड़ता है, भूखे प्यासे रहकर तपस्या करना, मांग कर खाने के लिये यहाॅं वहाॅं भटकना, क्या सरल होता है?"
"लेकिन इसमें ट्रेनिंग लेने की क्या जरूरत? संन्यासी तो स्वभाव से ही होते हैं उन्हें बनाया थोड़े ही जाता है।"
"अच्छा! खुद कुछ करके बताओ तब जाने।"
"अच्छा! गुड वाय.... नेवर सी यू अगेन...."

31 वैतरणी....

...
 विधिविधान से पिता की अस्थियों के विसर्जन हेतु बुजुर्गो ने समझाया कि प्रयाग में भागीरथी से वढ़कर दूसरा कोई स्थान नहीं हो सकता है। इसलिये मुकद्दम सिंह इलाहाबाद वाली रेल में जा बैठा। वहाॅं पहुंचने से पहले, नैनी से ही मुंडा सिर देख वैतरणी पार कराने वाले यमराज के तीन एजेंटों ने आ घेरा। अपने अपने बही खाते लेकर ये इस प्रकार पीछे पड़े कि उसे अपनी सीट पर बैठ  पाना मुश्किल  हो गया। वह  कुछ बोल ही नहीं पा रहा था कि वे आपस में ही उलझ पड़े और सामने बैठे हुए मुझे लगा कि अब मैं भी इनसे सुरक्षित नहीं रह पाऊंगा। मैं उन से बचने का उपाय सोच ही रहा था कि जीआरपी का एक सबइंस्पेक्टर और दो जवान डिब्बे में घुसते ही पूछने लगे  "यहाॅं पंडे तो नहीं आये?"
 एक यात्री ने आगे की ओर का इशारा किया।
 हमारी सीट पर जमे पंडे, कुछ समझ पाते कि पुलिस वाले उन पर टूट पड़े ।
 वे चिल्लाये "हम तो पंडा हैं हमने क्या किया?"
 इंस्पेक्टर बोला, "थाना चलो तीनों को पुरखों सहित वैतरणी पार कराना है।"

30 ऊर्ष्ट गर्दभ संवाद



 ‘‘वाह!! क्या रूप है! क्या लावण्य है! कामदेव भी इसे पाने के लिये तरसते हैं।’’

 ‘‘वाह!! क्या ध्वनि है! क्या लय, क्या तान है! वीणावादिनी भी इसे पाने के लिये लालायित हैं।’’

Sunday, May 31, 2020

29 भूत.....

29 भूत...
चलते चलते एक घंटा से तो अधिक हो गया, इतना समय तो लगता ही नहीं है, कितनी बार आये गये हैं इसी नहर के किनारे से, अधिक से अधिक पौन घंटा लगता है, अंधेरा बढ़ता जाता है और धरमपुरा अभी तक नहीं आया, आखिर बात क्या है, रास्ते में कोई राहगीर भी आता जाता नहीं दिखाई दे रहा जबकि यह रास्ता तो चालू रहता है, आदि आदि....   यह सोचते सोचते मैं आगे चला जा रहा हॅंू।
बड़ी जोर की प्यास लगी है, घर पता नहीं कब पहुचॅूंगा, चलो नहर का पानी ही पी लेते हैं,  और मैं पानी पीने के लिये नहर के किनारे किसी ठोस सतह को अंदाज से तलाषते आगे बढ़ा ही था कि दूसरी ओर से एक छोटी सी नाव में केवल दो लोग आते दिखे, मैंने उनसे पूंछा, ‘‘भैया! धरमपुरा कितनी दूर है? आज कुछ देर हो गयी और अंधेरे में समझ में नहीं आ रहा, मैं बाहर से आया हॅूं।’’ वे बोले, ‘‘अरे! उल्टी दषा में जा रहे हो, आगे तो मीलों तक कोई गाॅंव नहीं है, चलो लौट चलो दो ढाई घंटे में पहुंच जाओगे, उमरी तक तो हम ही जा रहे हैं।’’ जोर की प्यास वैसे ही लगी थी यह सुनकर मेरे तो प्राण ही सूख गये, क्या करूं क्या नहीं! सबेरे से चला हॅंू! थकान बहुत हो गई है! सोच में डूब गया। वे लोग बोले, ‘‘क्या कहते हो चलना है तो साथ साथ चलो, नहीं तो उन से मिलो।’’ और, दूसरे किनारे पर खड़े एक व्यक्ति की ओर इषारा करते वे आगे बढ़ गये।
उस व्यक्ति ने कहा, ‘‘चलो उधर पेड़ के नीचे हमारा खलिहान है जिसमें केवल भूसा ही बचा है, उसकी रखवाली के लिये मैं रुका हॅंू तुम वहां रात में रुक लो, सबेरे जल्दी उठकर सही दिषा में चले जाना।’’ थकान के कारण मैंने उसके साथ जाने का निष्चय किया, पुलिया से उस पार पहुंचे और भूसे के ढेर पर बैठ कर आराम करने लगा। इस बीच मैंने उससे पीने के लिये पानी माॅंगा, वह झोपड़ी के भीतर गया और तूम्बे में भरा पानी मुझे दिया। प्यास बहुत लगी थी, एक दो घूंट पिया तो बहुत ही कड़ुआ लगा, इसलिये रुक गया। इस बीच उसने एक कहानी सुनायी (जो मैंने पहले भी कभी सुनी थी) जिसका निष्कर्ष था कि सब कुछ ईष्वर की इच्छा से होता है हम अपनी इच्छा से कुछ नहीं कर सकते। वह बीच बीच में यह भी पूंछता जाता कि इतनी दूर से आये हो, रुपये पैसे भी लिये होगे आदि। मैं ने उसे अपने पास क्या क्या था सब कुछ बता दिया और कहा कि चाहो तो सब ले लो, वह बोला ‘‘नहीं यह बात नहीं है।’’
उसने आगे कहा, ‘‘इस बगल के खेत से एक खेत और आगे हमारी गायें हैं उनको चारा डालकर आता हॅूं तुम आराम करो फिर बात करेंगे।’’ वह चला गया मैं भूसे के ढेर पर ढेर हो गया, एक दो घंटे में वह आया और कहने लगा ‘‘खाना तो कुछ मिलेगा नहीं पर दूध मिल सकता है कहो तो मंगा दूॅं?’’ भूखा तो दिन भर से था, पर मैं ने कहा, ‘‘नहीं क्यों कष्ट करते हैं आराम कर लीजिये मेरे कारण आप बेकार परेषान हो रहे हैं।’’ वह भी भूसे पर मुझसे थोड़ी दूर बैठ गया और कहने लगा, ‘‘देखो वह उतनी दूर एक चमकीला प्रकाश, अभी वह धीरे धीरे आगे बढ़ेगा, वह है भूत, फिर वह अपना मुंह फैलायेगा और सामने की झाड़ियों में आग लगायेगा, उसके ये सब काम हम लोग रोज ही देखते हैं, तुम डरोगे तो नहीं।’’ मैंने कहा, ‘‘अरे! भूत को तो मैं कबसे देखना चाहता था पर कभी दिखा ही नहीं चर्चे जरुर सुने हैं। चलो आज देखने को मिल गया अब मैं सोऊंगा ही नहीं उससे ही मिलूंगा, आपने बताकर यह अच्छा काम किया।’’ वह आदमी पास में अन्य भूसे के ढेर पर सो गया। मैं लेटा हुआ उस प्रकाश को देखता रहा पर कुछ भी परिवर्तन दिखाई नहीं दिया । कृष्ण पक्ष की रात थी पूर्व में आधे से भी कम आकार का चंद्रमा उदित हुआ और थोड़ा थोड़ा प्रकाश फैलने लगा। वह आदमी जागा और मुझसे शत्रु की तरह कड़े शब्दों में कहने लगा ‘‘जाओ जल्दी उस पेड़ के नीचे से बाॅंयीं ओर मुड़ कर सीधे चले जाना धरमपुरा पहुंच जाओगे।’’ उसकी वाणी इतनी कड़क थी कि मुझे लगा यदि मैं कुछ भी कहता हॅंू तो शायद यह मुझे पीटने न लगे, मैं बिना कृतज्ञता ज्ञापित किये ही वहाॅं से चला और सूर्य निकलते ही अपने रिश्तेदार के घर धरमपुरा पहॅुंच गया।

221 चिंजा की शादी

5 वीं क्लास में पढ़ रहीं स्वभाव से सीधी सादी सहुद्रा और भोली सी चिंजा में गहरी दोस्ती थी। चिंजा की स्पष्टवादिता से क्लास के सभी लड़के लड़किय...