Saturday, April 4, 2020

5 टेड़ी खीर

  टेड़ी खीर
फुल्लु पटेल गरीबी के कारण मुश्किल से आठवीं तक  पढ़ पाये।  घर गृहस्थी चलाने के लिए बिजली फिटिंग करने वाले के साथ हेल्पर बन गए, पर पढ़ाई का महत्त्व समझते थे, इसलिए छठवीं में पढ़ रहे  अपने बच्चे को वे रोज पढ़ाने बैठ जाते। एक दिन वह विज्ञान की किसी बात की विवेचना कर रहे थे और बच्चा समझ नहीं पा रहा था अतः हर बात पर बार बार पूंछता, ‘‘ वह क्या ? वह कैसा ?  वह क्या?’’
फुल्लु बड़े परेशान !! पास में बैठे लगभग पचहत्तर साल के बुजुर्ग शर्माजी , (वैसे तो लग रहे थे कि  पेपर पढ़ रहे हैं, पर कान और आँखें फुल्लु की ओर ही थे,) यह सुनकर अचानक हुॅंफ्! करते हँसे और अपनी नकली बत्तीसी का आगे खिसक आया ऊपरी हिस्सा भीतर करते हुए बोले-
‘‘जैसे पढ़ने वाले , वैसे ही पढाने वाले’’ और फिर पूंछने लगे ,
‘‘फुल्लु ! ‘जन्माँध’ जानते हो किसे कहते हैं ?’’
फुल्लु बोला , ‘‘जो जन्म से ही अँधा हो। ’’
 ‘‘ हाँ, ऐसे ही एक जन्मांध के पास जाकर एक सज्जन ने पूंछा,
क्यों सूरदास ! खीर खाओगे?’’
  सूरदास बोले, ‘‘ यह खीर क्या है, कैसी होती है?’’
  सज्जन बोले, ‘‘ अरे वही , सफेद, सफेद’’
  सूरदास बोले ‘‘यह सफेद सफेद क्या?’’
  सज्जन बोले ‘‘बिलकुल बगुला  जैसी ’’ ।
  सूरदास ने पूंछा  ‘‘यह बगुला कैसा होता  है ?’’
             अब सज्जन ने अपने दायें हाथ के पंजे और केहुनी को बगुला के  आकार में मोड़ा और सूरदास के पास जा कर  अपना मुड़ा  हुआ हाथ समीप ला कर कहा ,
 ‘‘ऐंसा’’
            सूरदास ने अपने दोनों हाथों से उन सज्जन के मुड़े हुए हाथ को  पंजे की ओर से टटोलते हुए केहुनी तक छुआ और कहा,
‘‘ नहीं ! यह नहीं खा सकता!’’
सज्जन बोले ‘‘क्यों?’’
सूरदास बोले, ‘‘अरे! यह खीर तो बहुत टेड़ी है, मेरे गले में ही अटक  जाएगी, नहीं मुझे नहीं खाना ।’’
सभी हँसने लगे,
शर्माजी बोले, ‘‘फुल्लु!  इसी प्रकार तुम भी कर रहे हो, विज्ञान को प्रयोग करके,  सम्बंधित उचित उपकरण को दिखा कर और विवेकपूर्ण उदाहरण देकर  ही  समझाया जा सकता  है।’’

Monday, March 30, 2020

4 जी


मेरे पड़ोस में रहने वाले राजपूत जी के बुजुर्ग माता पिता तीर्थ यात्रा से लौटे। छठवीं में पढ़ने वाली मेरी बेटी ने उनसे मिलकर पूॅछा, ‘‘माताजी ! आप कहाँ कहाँ घूम आयीं ?’’
 वे बोलीं , ‘‘अजुद्याजी, काशीजी ,मथुराजी, द्वारकाजी। अब , जगन्नाथपुरी जी के दर्शन और करना हैं। ’’
वापस आकर बेटी मुझ से पूछने लगी , ‘‘पापा! ये अयोध्या , काशी, मथुरा, जगन्नाथपुरी आदि स्थानों के नाम हैं या आदमियों के?’’
  ‘‘ये सब स्थानों के नाम हैं और कहीं कहीं  आदमियों के भी , क्यों? क्या बात है ?’’ मैंने पूछा।
 ‘‘मैं भी भूगोल में इन्हें पढ़ती हूँ कि ये तो स्थान हैं ,पर यह समझ में नहीं आता कि माताजी इन स्थानों के नाम के साथ ‘जी ‘ क्यों लगातीं हैं । कोई व्यक्ति हो तो फिर भी आदर के लिए ‘जी’ कहना ठीक है जैसे, मेरी सहेली दिविंदर कौर हर बात में हाँ जी , हाँ जी करती है। परन्तु  कल मेरी सहेली असीमा जैन कक्षा में लेट आई, मेडम ने इसका कारण पूछा तो कहती है ‘मंदिरजी‘ में रुकना पड़ा, इसलिए देर हुई।  कितनी अजीब बात है ? है न ? ’’
 ‘‘ ये स्थान पवित्र होते हैं  इसलिए आदर से जी लगाते हैं।’’
  ‘‘ अरे! आदमियों तक तो ठीक है पर स्थानों , पत्थरों, भवनों को ‘जी‘ कहना अटपटा सा नहीं लगता ?, पता नहीं यह कहाँ से प्रचलन शुरु हुआ। 
हमारी वार्ता सुन रहे, पास में बैठे कम बोलने बाले, उसके बाबा बोल पड़े, 
‘‘ वैदिक युग में किसी पढ़े लिखे  वरिष्ठ व्यक्ति को आदर देने के लिए ‘आर्य‘ कहा जाता था , फिर यजुर्वेदीय काल में ‘आर्ज‘ कहने लगे क्योंकि इस समय में ‘य’ को ‘ज’ उच्चारित किया जाता था जैसे, ‘यज्ञ को जग्य’, ‘योग को जोग’। फिर अरबी फारसी का जमाना आया तो ‘आर्ज’ बदलकर ‘अजी‘ हो गया, अब और अपभ्रंश होकर केवल ‘जी‘ बचा है । पर यह हमेशा व्यक्तियों के लिए ही आदरसूचक शब्द रहा है, मंदिरों , पत्थरों , किताबों या स्थानों के लिए इस प्रकार सम्बोधित करना व्याकरण के अनुसार गलत है। ’’
पास में टंगे पिंजड़े में बैठा तोता यह सुनकर चहचहा उठा।

3 मनस्ताप

3 मनस्ताप 
     देश के बटवारे के समय बाल्यावस्था में ही सरदार अवतारसिंह विरदी अपने पिता के साथ लाहौर से पलायन करने को विवश हो गये और यहाँ वहाँ  भटकते हुए अंत में हमारे नगर में बस गए। इस भाग दौड़ की आपाधापी में पिता का साथ तो छूटा ही, अवतार सिंह को नियमित पढाई लिखाई  का मौका ही नहीं मिला । परन्तु , वे लकड़ी के मेजरमेंट और पैसे के हिसाब में इतने कुशल हुए कि क्षेत्र के प्रसिद्ध टिम्बर मर्चेंट हो गए। एक दिन मैं अपने मकान की दरवाजे खिड़कियों के लिए लकड़ी खरीदने की  सलाह लेने उनके पास पहुॅंचा। उनके तीन छोटे छोटे बच्चे, मेरे पहुँचने से पहले, धमाचौकड़ी मचाते हुए उनसे कोई बढ़िया कहानी सुनाने की रट लगाये थे। सरदारजी बरामदे में पड़ी चारपाई पर लेटे, बडे ही सोच विचार में पड़े थे कि इन्हें क्या सुनाऊँ, शायद अपढ़ होने का दुःख अनुभव कर रहे हों । मैं आवाज देनेवाला ही था परन्तु यह दृश्य देखने चुपचाप गेट के बाहर ही खड़ा रहा। सरदार जी बच्चों सेे बोले, 
‘आओ जी ! त्वानु मापारत दी कहानी  सुणावां। ‘‘
बच्चे झटपट चारपाई पर उनसे सट  कर वैठ गए। 
‘‘हाँ जी ! तुसीं मापारत दा नम सुणा, जा नईं ?‘‘ 
बच्चे कोई हाँ जी बोले कोई न।
 ‘‘चंगा जी , तँ... मापारत विचों सी... पंज पंडवा। ‘‘ 
 ‘‘किन्ने जी ‘‘ ? 
 ‘‘पंज।‘‘ 
 ‘‘हाँ जी ! ता... उना विचों सब तों बड्डा सी ‘दित्तर’, ते दूजा बड्डा तकड़ा सी ‘पिम्म’। हैं जी ! ते इक होर... ,  इक होर..... , ता...  इक दा नम मैं पुल गिया जी। ‘‘
सुनकर बड़ा बच्चा बोला, 
‘‘पापाजी! तुसी पंज विचों दो नम ही दस्से हन, और केन्दे हो इक दा नम पुल गिया ? "
 ‘‘ओ पुत्तर! मैं कोई पड्या वड्या नईं ना, इसलै पुलता वां "
 सरदारजी बड़े दुखी हो बोलते बोलते रुक गए।
  इतने में एक बच्चे ने गेट के पास मुझे देख कर उन्हें ध्यान दिलाया , वे जल्दी उठे और ‘सत्श्रीअकाल जी‘ कहते हुए अंदर आने को इशारा किया। ज्योंही मैं पहुंचा तो उन्होंने बड़ी ही विनम्रता से, अपने बच्चों को महाभारत की कहानी सुनाने को मुझसे कहा, मैंने अपनी कहानी बाद में, पहले महाभारत की कहानी सुनाना प्रारम्भ की। सरदारजी भी अपने बच्चों के साथ उन्हीं की तरह बड़ी तल्लीनता से सुनने लगे। अचानक उनके हाथ का कड़ा बोल पड़ा,
‘‘ अवतार! तुझे भी पढ़ने का मौका मिला होता तो आज, इन बच्चों को तेरी ओर से इतनी निराशा न होती !’’

Sunday, March 29, 2020

2 असली होली नकली होली

 2 असली होली नकली होली 

एक सेवानिवृत्त फिजिक्स के प्रोफेसर के घर, आसपास के आठ दस लड़के जिनमें तीन चार उच्छृंखल भी थे , होली का चंदा माँगने आये ।  प्रोफेसर ने सबको अपनी गृह वाटिका में बिठाया और समझाने लगे , ‘‘आपलोग होली का असली अर्थ जानते हैं?’’ लड़कों ने अपने अपने ढंग से वही पौराणिक किस्से सुनाते हुए बोले यह तो रंगों का त्यौहार है, आदि।  प्रोफेसर बोले नहीं , ये सब तो काल्पनिक  किस्से हैं सच्ची बात जानना हो तो सुनो,    
‘‘भौतिकवेत्ता ¼physicist½ कहते हैं कि किसी भी वस्तु का अपना कोई रंग नहीं होता , सभी रंग प्रकाश के ही होते हैं।  प्रकाश तरंगों की विभिन्न लम्बाइयां¼wave lengths½ ही रंग प्रदर्शित करती  हैं। जो वस्तु प्रकाश की जिन तरंग लम्बाइयों को परावर्तित करती है वह उसी रंग की दिखाई देती है अतः यदि कोई वस्तु प्रकाश विकिरण की  सभी तरंग लम्बाइयों को परावर्तित कर दे तो वह सफेद और सभी को शोषित कर ले तो काली दिखाई देती है। सफेद और काला कोई पृथक रंग नहीं हैं। ’’
लड़के शान्त।  
‘‘ मनोभौतिकीविद ¼psycho physicist½ कहते हैं कि मन के वैचारिक कम्पनों से बनने वाली  मानसिक तरंगें¼psychic waves½ भी व्यक्ति के चारों ओर अपना रंग पैटर्न बनाती हैं जिसे ‘‘आभामण्डल^^ ¼aaaaura कहते हैं। अनेक जन्मों के संस्कार भी इसी पैटर्न में विभिन्न परतों में संचित रहते हैं और पुनर्जन्म के लिए उत्तरदायी होते हैं।’’   
 ‘‘ मनोआत्मिक  विज्ञानी¼psycho spiritualists½   इन तरंगों (wave patterns½को वर्ण ¼colour½ कहते हैं।  यह लोग यह भी कहते हैं कि जिस परमसत्ता ¼cosmic entity½ ने यह समस्त ब्रह्माण्ड निर्मित किया है वह अवर्ण ¼colourless½ है परन्तु इस ब्रह्माण्ड में अस्तित्व रखने वाली सभी वस्तुओं के द्वारा प्रकाश तरंगों के परावर्तन करने के अनुसार ही वर्ण  ¼colour½ होते हैं क्योंकि ये सब उसी परमसत्ता की विचार तरंगें ही हैं।  अतः यदि उस परमसत्ता को प्राप्त करना है तो स्वयं को अवर्ण  बनाना होगा।  इसी सिद्धांत का पालन करते हुए अष्टांगयोगी प्रतिदिन अपनी त्रिकाल संध्या में  इन वर्णो को मनन, चिंतन ,कीर्तन और निदिध्यासन की विधियों द्वारा उस परमसत्ता को सौंपने का कार्य करते हैं जिसे वर्णार्घ्य  दान(offering of colours) कहते हैं। बोलचाल की भाषा में वे इसे ही असली होली खेलना कहते हैं। समझे ?’’
लड़के सुनते रहे।
‘‘हम लोगों ने काल्पनिक कहानियों के आधार पर कैसी विचित्र परम्पराएँ बना ली हैं कि होली के नाम पर एक दूसरे पर कीचड़/ रंग फेकते हैं , अकथनीय अपशब्द कहकर मन की भड़ास निकलते हैं और कहते हैं कि ‘‘बुरा न मानो होली है‘‘, होली के लिए चंदा बटोरकर रोड के बीचोंबीच टनों लकड़ियाँ  जलाकर कभी न सुधर पाने वाले रोड खराब तो करते ही हैं वातावरण में कार्बनडाई ऑक्साइड  मिलाकर प्रदूषण फैलाते हैं , तथाकथित रंगों / कीचड़ भरे शरीर और कपड़ों को धोने में पानी और समय भी नष्ट करते  हैं।’’  
‘‘यह सब गलत है कि नहीं बोलो?’’
 इतना बोलना खत्म ही नहीं हुआ था कि दो उद्दंडी  लड़के आगे आये और जेब में रखे रंगों के पेकेट खोलकर प्रोफेसर का मुह और वस्त्रों को रंग से पोत डाला और बोले, ‘‘ आप योगियों की होली मनाओ हम तो भोगी हैं हमें अपने ढंग से होली मानाने दो’’  ! 
और, ‘होली है, होली है‘ कहते शोर मचाते सभी लड़के भाग खड़े. हुए । 

221 चिंजा की शादी

5 वीं क्लास में पढ़ रहीं स्वभाव से सीधी सादी सहुद्रा और भोली सी चिंजा में गहरी दोस्ती थी। चिंजा की स्पष्टवादिता से क्लास के सभी लड़के लड़किय...