टेड़ी खीर
फुल्लु पटेल गरीबी के कारण मुश्किल से आठवीं तक पढ़ पाये। घर गृहस्थी चलाने के लिए बिजली फिटिंग करने वाले के साथ हेल्पर बन गए, पर पढ़ाई का महत्त्व समझते थे, इसलिए छठवीं में पढ़ रहे अपने बच्चे को वे रोज पढ़ाने बैठ जाते। एक दिन वह विज्ञान की किसी बात की विवेचना कर रहे थे और बच्चा समझ नहीं पा रहा था अतः हर बात पर बार बार पूंछता, ‘‘ वह क्या ? वह कैसा ? वह क्या?’’फुल्लु बड़े परेशान !! पास में बैठे लगभग पचहत्तर साल के बुजुर्ग शर्माजी , (वैसे तो लग रहे थे कि पेपर पढ़ रहे हैं, पर कान और आँखें फुल्लु की ओर ही थे,) यह सुनकर अचानक हुॅंफ्! करते हँसे और अपनी नकली बत्तीसी का आगे खिसक आया ऊपरी हिस्सा भीतर करते हुए बोले-
‘‘जैसे पढ़ने वाले , वैसे ही पढाने वाले’’ और फिर पूंछने लगे ,
‘‘फुल्लु ! ‘जन्माँध’ जानते हो किसे कहते हैं ?’’
फुल्लु बोला , ‘‘जो जन्म से ही अँधा हो। ’’
‘‘ हाँ, ऐसे ही एक जन्मांध के पास जाकर एक सज्जन ने पूंछा,
क्यों सूरदास ! खीर खाओगे?’’
सूरदास बोले, ‘‘ यह खीर क्या है, कैसी होती है?’’
सज्जन बोले, ‘‘ अरे वही , सफेद, सफेद’’
सूरदास बोले ‘‘यह सफेद सफेद क्या?’’
सज्जन बोले ‘‘बिलकुल बगुला जैसी ’’ ।
सूरदास ने पूंछा ‘‘यह बगुला कैसा होता है ?’’
अब सज्जन ने अपने दायें हाथ के पंजे और केहुनी को बगुला के आकार में मोड़ा और सूरदास के पास जा कर अपना मुड़ा हुआ हाथ समीप ला कर कहा ,
‘‘ऐंसा’’
सूरदास ने अपने दोनों हाथों से उन सज्जन के मुड़े हुए हाथ को पंजे की ओर से टटोलते हुए केहुनी तक छुआ और कहा,
‘‘ नहीं ! यह नहीं खा सकता!’’
सज्जन बोले ‘‘क्यों?’’
सूरदास बोले, ‘‘अरे! यह खीर तो बहुत टेड़ी है, मेरे गले में ही अटक जाएगी, नहीं मुझे नहीं खाना ।’’
सभी हँसने लगे,
शर्माजी बोले, ‘‘फुल्लु! इसी प्रकार तुम भी कर रहे हो, विज्ञान को प्रयोग करके, सम्बंधित उचित उपकरण को दिखा कर और विवेकपूर्ण उदाहरण देकर ही समझाया जा सकता है।’’