Saturday, May 16, 2020

18 सुसंस्कार


इन्जीनियर सुरेश के माता पिता ने उसकी शादी अपने मित्र और चिर परिचित, दूर के रिश्तेदार के संस्कारी परिवार में करने का निश्चय पहले ही कर लिया था । केवल, सुरेश को लड़की दिखाने की फार्मेलिटी ही निभाना थी सो एक दिन उनके घर जा पहुॅंचे और अपनी मनसा मित्र को बताई। मित्र की खुशी का अँदाज कोई भी लगा सकता है जिसे ईश्वर ने बिना परिश्रम कराये वर को ही घर पर भेज दिया हो अन्यथा, इस जमाने में बेटी की शादी करने से कठिन कार्य कुछ है ही नहीं । माता पिता द्वारा बार बार ईश्वर को धन्यवाद देते हुए लड़की को दिखाया गया । सुरेश ने अपनी माॅं के कान में पिता से आॅंख चुराते हुए फुसफुसाया,‘‘ माॅं! लड़की का रंग काला नहीं है क्या?’’ माॅं बोली, ‘‘इसे काला नहीं साॅवला कहते हैं?’’ ‘ हाॅं माॅं! पर  कम से कम मेरे रंग जैसा तो होना चाहिये, है कि नहीं?’ माॅं बोली, ‘‘पर लड़की बड़ी ही सुशील, सुसंस्कारी और कुलीन है, रंग से क्या होता है?’’
एक सुसंस्कृत परिवार के आज्ञाकारी पुत्र के लिये माता पिता तो भगवान की तरह होते हैं जिनके हर निर्णय को कर्तव्य समझकर वह प्राणपण से पूरा करते हैं; इसलिये सुरेश ने बेमन से ही सही, शादी के लिये हाॅं कर दी। दोनों परिवारों में सभी कुछ सन्तुलित और सन्तोषजनक चलते हुए एक साल हो गया पर सुरेश के मन में प्रारम्भ से ही पत्नी के रंग के प्रति असन्तोष बना रहता था जो किसी भी प्रकार दूर होना सम्भव नहीं था।  उसकी पत्नी, सुरेश के उपेक्षापूर्ण रूखे व्यवहार को अनुभव करने के वावजूद भी अपने सद् व्यवहार से, स्वाभाविक मधुर मुस्कान से, घर के काम काज और सास ससुर के प्रति लवलीनता से रिश्तेदारों और पड़ोसियों सभी की प्रशंसा पा रही थी। इतना ही नहीं सुरेश के मित्र भी उसकी तारीफ करते न थकते और कहते कि सुरेश तू बड़ा ही भाग्यशाली है, जबकि सुरेश को यह सब व्यंग और मजाक ही लगता।
कुछ दिनों बाद सुरेश की कम्पनी में ‘स्थापना दिवस‘ मनाने के कार्यक्रम में देश की प्रसिद्ध गायिका को आमंत्रित किया गया और पूरा आयोजन सुरेश के जिम्मे सौंपा गया। सभी जगह प्रचार हो गया, सभी लोग कार्यक्रम को देखने सुनने के लिये उत्सुक हो रहे थे अचानक कार्यक्रम के दिन सबेरे सबेरे गायिका ने अपने अस्वस्थ हो जाने की खबर भिजवाई और क्षमायाचना सहित एडवाँस की राशि भी वापस कर दी। अब तो सुरेश और उनके सभी साथियों पर पहाड़ टूट पड़ा, शाम को क्या होगा क्या नहीं इसी उधेड़बुन में समय निकलता जा रहा था और एक एक मिनट कैसा लगता था उसकी कल्पना नहीं की जा सकती। सुरेश ने दोपहर का भोजन भी नहीं किया और आफिस चला गया और मित्रों के साथ विकल्प की तलाश करने लगा पर कोई सफलता नहीं। इस बात का पता सुरेश के पिता को चला तो उन्होंने बहु को समस्या बतायी, वह जानते थे कि वह बहुत ही अच्छा गाती है। क्या था, उन्होंने सुरेश से फोन पर कहा चिंता न करो, आकर पहले भोजन करो, तुम्हारे कार्यक्रम का जिम्मा मैं लेता हॅूं , वह यथा समय प्रारम्भ हो जायेगा।
डरते डरते सुरेश ने पत्नी को कार्यक्रम के लिये आमंत्रित किया और जब मंच पर उसने ताल, छन्द और लय के साथ महादेवी वर्मा और जयशंकर प्रसाद की रचनायें सुनाई तो श्रोता झूम उठे और ‘वन्समोर’ की चाहतें करतल घ्वनि के साथ गूॅंजने लगी ।
सुरेश को सब लोग बधाइयाॅं दे रहे थे और सुरेश, पत्नी के प्रति बनायी हुई अपनी तुच्छ अवधारणा के लज्जाबोध से दबा जा रहा था।

Wednesday, May 13, 2020

17 कष्टदायी अनुपम कृति


'अच्छा, नमस्कार! अब चलते हैं, हम जल्दी ही सूचित करेंगे ' दल बल सहित लड़की देखने आये लड़के के पिता ने रामेश्वर  से कहा। रामेश्वर  और उनका परिवार आशाभरी निगाहों में आदर सहित उन्हें बाहर तक भेजकर वापस आया और अगले ही क्षण से लड़के वालों के अंतिम उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा। अनेक दिन प्रतीक्षा करते बीत जाने पर रामेश्वर  की पत्नी ने अपनी ओर से ही पूछ लेने का परामर्श  दिया। रामेश्वर  बोला, ‘‘क्या फायदा, इससे पहले भी तो सात लोग यही कहकर गये पर किसी ने जबाब दिया? यही समझ लो आगे हाथ पैर चलाना अभी जारी रखना है।’’
हर बार देखने दिखाने तक बात आकर रुक जाया करती, कभी दहेज के कारण, कभी ऊँचाई के कारण, कभी रंग के कारण, कभी नौकरी के कारण, कभी लड़की के अधिक पढ़ा लिखा होने के कारण, कभी अकारण। रामेश्वर  का परिवार दिन रात यह सोच कर मन बहलाये रहता कि उनकी तो एक ही लड़की है, जिनकी तीन चार होती हैं उनकी हालत क्या होती होगी , ईश्वर  की जो इच्छा होगी वही होगा, आदि आदि।
एक शाम को इसी सोच में रामेश्वर  को दुखित देख, मित्र विनोद ने कारण पूछा तो रामेश्वर  को जैसे अपना बोझ कुछ कम होने का आभास हुआ और उसने अपनी पिछले आठ सालों की खोजपूर्ण तपस्या का आद्योपान्त वर्णन कर दिया। विनोद ने भी सहृदयता दिखाई और जैसा कि सामान्यतः सभी लोग धैर्य और ईश्वर  पर भरोसा रखने का परामर्श  देकर चले जाते हैं, वह भी वहाँ से इस समस्या पर सोचते हुए अपने घर चला आया। घर आने पर उससे, तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली बेटी ने गणित के कुछ सवाल समझाने के लिये कहा, परन्तु वह, थोड़ी देर बाद समझा दूँगा, यह कहकर विस्तर पर लेट गया और उसे तेज नींद आ गयी।  वह स्वप्न में देखता है कि रामेश्वर  की तरह वह भी उन सभी परिस्थितियों से जूझ रहा है, लड़की की उम्र बहुत अधिक हो गयी  है, कहीं पर कोई आशा  दिखाई नहीं देती है, चारों ओर निराशा  और भय ने जाल बिछा रखा है, पड़ोसी और रिश्तेदार  सभी लोग , कुछ का कुछ कहने लगे हैं, घर से बाहर निकलने में लगता है जैसे  कोई अपराधी होऊँ , पत्नी भी मुझे अकर्मण्य मानने लगी है, लड़की भी अपनी माॅं की तरह मुझे ही दोष देने में नहीं हिचकिचाती, जीवन में अपने को इतना असहाय और असफल समझने लगता है कि वह छत से कूद कर जान देने के लिये ज्योंही नीचे की ओर देखता है तो अधिक ऊँचाई होने से  डर जाता है और हड़बड़ा कर चिल्लाते हुए जाग कर बैठ जाता है, पत्नी और वह छोटी सी बच्ची घबराकर उसके पास आकर पूछते हैं , क्या हुआ?
विनोद बच्ची को उठाकर छाती से लगाकर चिल्लाता है ‘‘ नहीं ! तू बिलकुल बड़ी न होना, मैं तुझे इतना सा ही देखते रहना चाहता हॅूं, तुझे गणित के सवाल ही समझते रहना चाहता हूॅ, तेरे साथ ही खेलते रहना चाहता हॅूं, नहीं ! नहीं! तुझे कहीं नहीं जाने दूँगा, तू मेरे पास ही रहेगी हमेशा ।‘‘
पत्नी और बच्ची दोनों डरे सहमे चुपचाप यह दृश्य  देखते रहे , देखते रहे और विनोद अपने स्वप्न संसार में विचरण करते इसका उत्तर ढूँड़ रहा था कि, ‘‘ प्रकृति की यह अनुपम कृति क्या सचमुच दुखदायी है? ’’

Tuesday, May 12, 2020

16 सिरदर्द का तिलक


ज्ञानी लोग सँख्या में अधिक हो गये तब उनमें पारस्परिक प्रतिद्वन्द्वता बढ़ने लगी। सभी अपनी अपनी प्रतिष्ठा और प्रभाव बढ़ाने के लिये नयी नयी उपासना पद्धतियाॅं सिखाकर लोगों को रिझाने लगे और अपनी पहचान बनाने के लिये माथे पर चन्दन का विशेष  आकार प्रकार का चिन्ह बनाने लगे। कोई गोल विन्दु, कोई लम्बवत एक रेखा, कोई आड़ी तीन रेखा, कोई लम्बवत यू आकार का, कोई लाल रंग, कोई सफेद, कोई पीला जाने कितने प्रकार से चिन्हाँकन होने लगा। अब तो इन आकारों के स्टेंसिल भी बाजार में मिलने लगे हैं । लोग पूजा उपासना तो जो भी करते हों पर इस चिन्हाॅंकन में अधिक समय लगाकर आकर्षक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। कुछ व्यावसायिक पंडित तो अपने इस चन्दन के रंगबिरंगे चिन्ह को सजाने के काम को ही पूजा कहते हैं  ।
हमारे यहाॅं के एक विद्वान व्याकरणाचार्य, संस्कृत पाठशाला में शिक्षक और धर्म के मर्मज्ञ पंडित जीवनलाल अग्निहोत्री इस चिन्हाॅंकन से चिढ़ते थे, इसलिये उन्होंने अपने माथे पर उन सभी प्रतीक चिन्हों को एक के ऊपर एक चिन्हित कर अपनी पहचान बनाने की पद्धति अपनाई । इस प्रकार उनके मस्तक पर कोई आड़ी, कोई तिरछी, कोई खड़ी और कोई वक्राकार रेखाओं के विचित्र चिन्ह बन जाते और वे शान से सभाओं में जाते, व्याख्यान देते, प्रवचन करते और वाहवाही लूटते। कुछ श्रोतालोग तो सब कुछ भूलकर उनके मस्तक की ओर देखते हुए इस चन्दन की आकृति पर ही सोचते रहते।
एक बार विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में आयोजित की गयी संगोष्ठी में अग्निहोत्री जी को बुलाया गया। कार्यक्रम में अनेक विद्वान, प्रोफेसर, शोधकर्ता अपनी अपनी बात कहते और प्रशंसा पाते। अग्निहोत्री जी के बोलने का क्रम आया तो एकत्रित हुए प्रोफेसरों ने उनकी साधारण वेषभूषा और खिचड़ीनुमा चन्दन की आकृति देख उपहास करने का मन बनाया। 
एक ने पूछा, ‘‘आपको कितनी तनख्वाह मिलती है?’’ वे बोले ‘‘अठारह सौ।’’ तत्काल दूसरे ने कहा ‘‘यह झूठ है, विश्वविद्यालय के प्रोफेसर को तो तेरह सौ मिलते हैं, तुम तो संस्कृत स्कूल के शिक्षक हो? यह कैसे हो सकता है?’’ वे बोले, ‘‘बात सही है, विश्वविद्यालय के प्रोफेसर को तेरह सौ रुपये हर माह मिलते हैं और मुझे अठारह सौ रुपये सालाना।’’ सभी लोग हॅसने लगे।
फिर एक ने उनके मस्तक की ओर इशारा कर कहा ‘‘यह चंदन इस प्रकार क्यों लगाते हो?’’ वे बोले ‘‘भैया! इससे दो फायदे हैं, एक तो हमारा सिरदर्द दूर हो जाता है और दूसरा ये कि दूसरों का सिरदर्द शुरु हो जाता है।’’ हाल में ठहाका लगा। अचानक फिर सब चुप।
इसके बाद, दिये गये विषय पर जब अग्निहोत्री जी ने अपना व्याख्यान प्रारम्भ किया तो लोग दाॅतों  तले अँगुली दबाये रह गये और वे जो उपहास कर रहे थे वे तो शर्म से गड़े जा रहे थे। कार्यक्रम के अध्यक्ष बोले, 
‘‘मैं दुखी हॅू, विश्वविद्यालय के विद्वानों ने भी बाहरी वेषभूषा को ही आभ्यान्तरिक लक्षणों का सूचक मान लिया है।’’

221 चिंजा की शादी

5 वीं क्लास में पढ़ रहीं स्वभाव से सीधी सादी सहुद्रा और भोली सी चिंजा में गहरी दोस्ती थी। चिंजा की स्पष्टवादिता से क्लास के सभी लड़के लड़किय...