इन्जीनियर सुरेश के माता पिता ने उसकी शादी अपने मित्र और चिर परिचित, दूर के रिश्तेदार के संस्कारी परिवार में करने का निश्चय पहले ही कर लिया था । केवल, सुरेश को लड़की दिखाने की फार्मेलिटी ही निभाना थी सो एक दिन उनके घर जा पहुॅंचे और अपनी मनसा मित्र को बताई। मित्र की खुशी का अँदाज कोई भी लगा सकता है जिसे ईश्वर ने बिना परिश्रम कराये वर को ही घर पर भेज दिया हो अन्यथा, इस जमाने में बेटी की शादी करने से कठिन कार्य कुछ है ही नहीं । माता पिता द्वारा बार बार ईश्वर को धन्यवाद देते हुए लड़की को दिखाया गया । सुरेश ने अपनी माॅं के कान में पिता से आॅंख चुराते हुए फुसफुसाया,‘‘ माॅं! लड़की का रंग काला नहीं है क्या?’’ माॅं बोली, ‘‘इसे काला नहीं साॅवला कहते हैं?’’ ‘ हाॅं माॅं! पर कम से कम मेरे रंग जैसा तो होना चाहिये, है कि नहीं?’ माॅं बोली, ‘‘पर लड़की बड़ी ही सुशील, सुसंस्कारी और कुलीन है, रंग से क्या होता है?’’
एक सुसंस्कृत परिवार के आज्ञाकारी पुत्र के लिये माता पिता तो भगवान की तरह होते हैं जिनके हर निर्णय को कर्तव्य समझकर वह प्राणपण से पूरा करते हैं; इसलिये सुरेश ने बेमन से ही सही, शादी के लिये हाॅं कर दी। दोनों परिवारों में सभी कुछ सन्तुलित और सन्तोषजनक चलते हुए एक साल हो गया पर सुरेश के मन में प्रारम्भ से ही पत्नी के रंग के प्रति असन्तोष बना रहता था जो किसी भी प्रकार दूर होना सम्भव नहीं था। उसकी पत्नी, सुरेश के उपेक्षापूर्ण रूखे व्यवहार को अनुभव करने के वावजूद भी अपने सद् व्यवहार से, स्वाभाविक मधुर मुस्कान से, घर के काम काज और सास ससुर के प्रति लवलीनता से रिश्तेदारों और पड़ोसियों सभी की प्रशंसा पा रही थी। इतना ही नहीं सुरेश के मित्र भी उसकी तारीफ करते न थकते और कहते कि सुरेश तू बड़ा ही भाग्यशाली है, जबकि सुरेश को यह सब व्यंग और मजाक ही लगता।
कुछ दिनों बाद सुरेश की कम्पनी में ‘स्थापना दिवस‘ मनाने के कार्यक्रम में देश की प्रसिद्ध गायिका को आमंत्रित किया गया और पूरा आयोजन सुरेश के जिम्मे सौंपा गया। सभी जगह प्रचार हो गया, सभी लोग कार्यक्रम को देखने सुनने के लिये उत्सुक हो रहे थे अचानक कार्यक्रम के दिन सबेरे सबेरे गायिका ने अपने अस्वस्थ हो जाने की खबर भिजवाई और क्षमायाचना सहित एडवाँस की राशि भी वापस कर दी। अब तो सुरेश और उनके सभी साथियों पर पहाड़ टूट पड़ा, शाम को क्या होगा क्या नहीं इसी उधेड़बुन में समय निकलता जा रहा था और एक एक मिनट कैसा लगता था उसकी कल्पना नहीं की जा सकती। सुरेश ने दोपहर का भोजन भी नहीं किया और आफिस चला गया और मित्रों के साथ विकल्प की तलाश करने लगा पर कोई सफलता नहीं। इस बात का पता सुरेश के पिता को चला तो उन्होंने बहु को समस्या बतायी, वह जानते थे कि वह बहुत ही अच्छा गाती है। क्या था, उन्होंने सुरेश से फोन पर कहा चिंता न करो, आकर पहले भोजन करो, तुम्हारे कार्यक्रम का जिम्मा मैं लेता हॅूं , वह यथा समय प्रारम्भ हो जायेगा।
डरते डरते सुरेश ने पत्नी को कार्यक्रम के लिये आमंत्रित किया और जब मंच पर उसने ताल, छन्द और लय के साथ महादेवी वर्मा और जयशंकर प्रसाद की रचनायें सुनाई तो श्रोता झूम उठे और ‘वन्समोर’ की चाहतें करतल घ्वनि के साथ गूॅंजने लगी ।
सुरेश को सब लोग बधाइयाॅं दे रहे थे और सुरेश, पत्नी के प्रति बनायी हुई अपनी तुच्छ अवधारणा के लज्जाबोध से दबा जा रहा था।