उस दिन प्राचार्य के कक्ष में एक नवनियुक्त केमिस्ट्री की लेक्चरर ज्वाइन करने सीधे ही पहुंच गई। भृत्य ने उसे समझाया कि आफिस में बाबू के पास ज्वाइनिंग दे दो पर, उसने एक न सुनी और यह कहते भीतर चली गई कि मैं तो अपनी ज्वाइनिंग प्राचार्य को ही दूंगी। प्राचार्य ने उसके हावभाव देखकर उसे अपना नियुक्तिपत्र दिखाने को कहा और अन्य मूल प्रमाण पत्र भी। उसने बडे़ गर्व के साथ सभी अभिलेख दिखाये और प्राचार्य ने अपनी टीप देकर कार्यालय को आगामी कार्यवाही के लिये आदेशित कर दिया।
कक्षाओं में जब वह अपना अध्यापन करती और छात्र छात्रााओं से प्रश्न करती तो एक से अधिक छात्र खड़े होकर बोलने लगते और उसे बार बार टोकना पड़ता कि जिससे पूछा जाये वही उत्तर दे। वास्तव में उसकी
शारीरिक संरचना में ही प्राकृतिक रूप से कुछ विचित्रता थी ही उस परआँखे भी तिरछी, अतः जब वह किसी छात्र से कुछ प्रश्न करती उसके अगल बगल के छात्र जबाब देने लगते और उसे टोकना पड़ता कि तुम से नहीं इस छात्र से पूछा गया था... और हंसी का दौर प्रारंभ हो जाता, वह बड़े ही दुखित मन से कैसे भी अपना पीरियड पूरा कर पाती। लगभग यही हाल स्टाफ के सदस्यों के साथ भी था। एक सप्ताह में ही वातावरण इस प्रकार बदला कि आस पास के लोग ही नहीं, बस से आने जाने वाले स्टाफ के सदस्य भी उसके साथ न जाते। कुछ लोगों ने बस वालों को भी भड़का दिया और वे उसे अपनी बस में ले जाने से ही परहेज करने लगे।
इस प्रताड़ना से तंग होकर एक दिन वह प्राचार्य के घर आयी और अपनी व्यथा सुनाकर रो पड़ी इतना कि प्राचार्य की पत्नी और बेटी को भी उसे चुप कराने का बहुत प्रयत्न करना पड़ा। अपनी कहानी में उसने बताया कि
शैषवावस्था में ही उसके पिता इस जगत से चल बसे, माॅं ने ही अपने पराक्रम से पच्चीस वर्ष तक पढ़ाया और उसने प्रथम श्रेणी में एमएससी पासकर यह अवसर पाया कि आत्मनिर्भर हो सके, पर मेरा क्या दोष है कि सब मेरा मजाक उड़ाने में ही संतुष्ठ होते हैं?
अनुभवी प्राचार्य ने वस्तुस्थिति समझी और कहा बेटी! तुम डरो नहीं, अपने ज्ञान की किरणों से छात्रों को और मृदुल व्यवहार से साथियों के मन को प्रकाशित करने का उपाय करो, एक दिन यही सब तुम्हारी प्रशंसा करेंगे। प्राचार्य के मुँह से ‘ बेटी ‘ का सम्बोधन सुनकर उसे लगा कि सचमुच वह अपने पिता से ही यह समझाइश पा रही है जो अब तक उसे अप्राप्त थी। इस एक शब्द ने उसके भीतर जन्म से ही सोया आत्मविश्वाश जाग्रित कर दिया और अब हर दिन अपने नये अंदाज में , अपने प्राचार्य पिता के मार्गदर्शन में छात्रों को प्रायोगिक प्रदर्शन करते हुए अध्यापन करने लगी। स्टाफ के साथ प्राचार्य ने मीटिंग लेकर इस प्रकरण में सभी का सहयोग चाहा और परोक्ष रूप में यह समझा दिया कि गुणों की कद्र करना चाहिये न कि रूप , रंग और आकार की।
कुछ दिनों में ही वातावरण अनुकूल हो गया, छात्रों को कुशल शिक्षक, साथियों को अच्छा मित्र और असहाय पुत्री को पिता का संरक्षण मिल गया। अब वह प्राचार्य को ‘सर‘ के सम्बोधन के स्थान पर ‘पापा‘ कहकर गर्वित होती है।