Monday, June 22, 2020

52 पापा


 उस दिन प्राचार्य के कक्ष में एक नवनियुक्त केमिस्ट्री की लेक्चरर ज्वाइन करने सीधे ही पहुंच गई। भृत्य ने उसे समझाया कि आफिस में बाबू के पास ज्वाइनिंग दे दो पर, उसने एक न सुनी और यह कहते भीतर चली गई कि मैं तो अपनी ज्वाइनिंग प्राचार्य को ही दूंगी। प्राचार्य ने उसके हावभाव देखकर उसे अपना नियुक्तिपत्र दिखाने को कहा और अन्य मूल प्रमाण पत्र भी। उसने बडे़ गर्व के साथ सभी अभिलेख दिखाये और प्राचार्य ने अपनी टीप देकर कार्यालय को आगामी कार्यवाही के लिये आदेशित कर दिया।
कक्षाओं में जब वह अपना अध्यापन करती और छात्र छात्रााओं   से प्रश्न  करती तो एक से अधिक छात्र खड़े होकर बोलने लगते और उसे बार बार टोकना पड़ता कि जिससे पूछा जाये वही उत्तर दे। वास्तव में उसकी 
शारीरिक संरचना में ही प्राकृतिक रूप से कुछ विचित्रता थी ही उस परआँखे  भी तिरछी, अतः जब वह किसी छात्र से कुछ प्रश्न  करती उसके अगल बगल के छात्र जबाब देने लगते और उसे टोकना पड़ता कि तुम से नहीं इस छात्र से पूछा गया था... और हंसी का दौर प्रारंभ हो जाता, वह बड़े ही दुखित मन से कैसे भी अपना पीरियड पूरा कर पाती। लगभग यही हाल स्टाफ के सदस्यों के साथ भी था। एक सप्ताह में ही वातावरण इस प्रकार बदला कि आस पास के लोग ही नहीं, बस से आने जाने वाले स्टाफ के सदस्य भी उसके साथ न जाते। कुछ लोगों ने बस वालों को भी भड़का दिया और वे उसे अपनी बस में ले जाने से ही परहेज करने लगे।
इस प्रताड़ना से तंग होकर एक दिन वह प्राचार्य के घर आयी और अपनी व्यथा सुनाकर रो पड़ी इतना कि प्राचार्य की पत्नी और बेटी को भी उसे चुप कराने का बहुत प्रयत्न करना पड़ा। अपनी कहानी में उसने बताया कि 
शैषवावस्था में ही उसके पिता इस जगत से चल बसे, माॅं ने ही अपने पराक्रम से पच्चीस वर्ष तक पढ़ाया और उसने प्रथम श्रेणी में एमएससी पासकर यह अवसर पाया कि आत्मनिर्भर हो सके, पर मेरा क्या दोष है कि सब मेरा मजाक उड़ाने में ही संतुष्ठ होते हैं?
अनुभवी प्राचार्य ने वस्तुस्थिति समझी और कहा बेटी! तुम डरो नहीं, अपने ज्ञान की किरणों से छात्रों को और मृदुल व्यवहार से साथियों के मन को प्रकाशित  करने का उपाय करो, एक दिन यही सब तुम्हारी प्रशंसा करेंगे। प्राचार्य के मुँह  से ‘ बेटी ‘ का सम्बोधन सुनकर उसे लगा कि सचमुच वह अपने पिता से ही यह समझाइश  पा रही है जो अब तक उसे अप्राप्त थी। इस एक शब्द ने उसके भीतर जन्म से ही सोया आत्मविश्वाश  जाग्रित कर दिया और अब हर दिन अपने नये अंदाज में , अपने प्राचार्य पिता के मार्गदर्शन  में छात्रों को प्रायोगिक प्रदर्शन  करते हुए अध्यापन करने लगी।  स्टाफ के साथ प्राचार्य ने मीटिंग लेकर इस प्रकरण में सभी का सहयोग चाहा और परोक्ष रूप में यह समझा दिया कि गुणों की कद्र करना चाहिये न कि रूप , रंग और आकार की।
कुछ दिनों में ही वातावरण अनुकूल हो गया, छात्रों को कुशल शिक्षक, साथियों को अच्छा मित्र और असहाय पुत्री को पिता का संरक्षण मिल गया। अब वह प्राचार्य को ‘सर‘ के सम्बोधन के स्थान पर ‘पापा‘ कहकर गर्वित होती है।      

51आय का श्रोत


हमारे यहाॅं की हजारों साल पुरानी सुंदर प्राकृतिक झील कभी पेड़ पौधों, पशु  पक्षियों और मनुष्यों की बारहों मास प्यास बुझाया करती थी।  पर अब, नगर निगम को जगह जगह लिखकर सूचित करना पड़ रहा है कि इस झील का पानी पीने योग्य नहीं है। नगर की पहचान इस झील में सभी नालियों, गोशालाओं और किनारे बने अस्पतालों का हर प्रकार का अपसृष्ट बहाया जाने लगा। वह प्रदूषित होने के साथ साथ वर्षा के पानी के साथ बहकर आयी गई मिट्टी से उथली भी होती गई और जलकुंभी ने अपना साम्राज्य जमा लिया। 
एक समय तो ऐसा आया था कि अधिकांश  जल सूख गया था और रिक्त स्थान पर लड़के क्रिकेट खेलते दिखाई देते थे। इतना ही नहीं नगर के कुछ बिल्डर्स ने तो उस जमीन पर कालोनियाॅं बनाये जाने तक का प्रस्ताव नगर प्रशासन को देने की योजना बना ली थी।
यूनीर्विर्सटी और स्कूलों  के छात्रों की पहल पर श्रमदान कर सभी ने अनेक बार जलकुंभी हटाने का कार्य किया और नगर प्रशासन को झील बचाने के लिये नींद से जगाया। कलेक्टर की अध्यक्षता में इस संबंध में पंद्रह वर्ष पूर्व मीटिंग हुईं थी जिसके सुझाव के अनुसार सफाई और गहरीकरण के लिये शासन से धन मांगने का सिलसिला चल रहा है, हर वर्ष लाखों का बजट आता है और व्यय हो जाता है पर झील में प्रदूषण और उथलापन यथावत है। 
नगर के एक वयोबृद्ध सज्जन ने उसी मीटिंग में  कलेक्टर को सुझाव दिया था कि झील की मिट्टी को अत्यंत कम कीमत जैसे दस पैसा प्रति घनमीटर के हिसाब से नीलाम कर दिया जाय तो किसान इसे खोद खोद कर ले जायेंगे और खेतों में खाद के रूप में उपयोग करेंगे। इससे मुफ्त में ही गहरीकरण हो जायेगा और प्राप्त आय को घाटों के पुनर्निर्माण में लगाया जा सकेगा, परंतु नेताओं और अधिकारियों को यह सुझाव निरर्थक लगा क्योंकि फिर प्रदूषण दूर करने के लिये शासन से हर साल मिलने वाली धनराशि  से होने वाली स्थायी आय कहाॅं से पा सकते?  

Sunday, June 21, 2020

50 विपदा


पिछले दिनों चली जोर की आंधी  में एक झोपड़ीनुमा घर के ऊपर, पास में लगे मोटे पेड़ की बड़ी सी डाली टूट कर गिर गयी। आंधी  में सब अपने अपने में व्यस्त थे।  इस प्रभावित मकान में रहने वाला परिवार भी बच्चों सहित अपने को बचाने में लग गया। थोड़ी ही देर में एक महिला आई और प्रभावित परिवार से पूछने लगी कि अधिक नुकसान तो नहीं हुआ? और इसी बीच इशारे से अपने लड़के को कुल्हाड़ी लेकर बुला लिया और कहने लगी , चल रे ! इस डाली को काट कर घर पर से अलग कर दे।
वह डाली काटता जाता और महिला कटी हुई छोटी बड़ी टहनियों को इकट्ठा कर घसीटते हुए उन्हें अपने घर ले जाने लगी। उसे देख पड़ौस के अन्य लोग भी अपनी अपनी कुल्हाड़ी लेकर डाली काटने दौड़े और अपने अपने लाभ के भाग को चुन कर काटने लगे। कुछ लोग एक ही भाग को अपना अपना कह कर झगड़ने लगे और बातचीत बढ़ते हुए गालियों तक और गालियों से मारपीट और मारपीट से थाने तक जा पहुंची। 
अन्य लोग अपने अपने भाग को काट कर ले जा चुके थे । काटी गई लकड़ी से दस घरों के लिये ईधन की व्यवस्था बन गई थी, प्रभावित परिवार का उस दिन चूल्हा ही न जला, वह तो बच्चों सहित इस सोच में डूबा था कि अब घर के टूटे भाग को ठीक कराने के लिये कर्ज लेना होगा और बरसात के पहले यह सुधर भी पायेगा या नहीं! 

49 भिखारी कौन?


तत्वेश और नित्येश अपने अपने सपनों को पूरा करने हेतु उच्च अध्ययन करने के लिये गाॅंव से शहर आकर विश्वविद्यालय में अध्ययन करने लगे। दोनों ने बहुत पराक्रम किया और योग्यता के अनुसार तत्वेश अपने पिता के व्यवसाय को सम्हालने लगा  और नित्येश करने लगा सरकारी स्कूल मेें शिक्षक की नौकरी।
समय समय पर दोनों मिलते और अपनी अपनी उपलब्धियों की चर्चा करते। तत्वेश  कहता इस वर्ष उसे व्यवसाय में लाखों का लाभ हुआ है इससे अब एक और फेक्टरी प्रारंभ कर रहा हॅूं, नित्येश कहता इस वर्ष मेरे सभी छात्र अच्छे अंकों से पास हो गये, चार का इंजीनियरिंग और एक का मेडीकल कालेज में चयन हो गया, ...आदि आदि...।
अबकी बार दोनों अनेक वर्षों के बाद मिले जब तक दोनों के बाल बच्चे भी अपने अपने काम में लग चुके थे , नित्येश रिटायर होकर नाती पोतों को सुसंस्कारों की शिक्षा देता और समाज के हितकारक कामों में अपना समय व्यतीतकर आनन्दित रहता और तत्वेश भी अपने पोते पोतियों को नये नये प्रोजेक्ट समझाने और आर्थिक लाभ कमाने के उपायों पर निर्देशन करता ।  मिलने पर तत्वेश ने नित्येश से कहा- "नित्येश! इतना अधिक समय बीतने के बाद भी तू तो फटीचर का फटीचर ही रहा, मैंने, देख! एक फेक्टरी से दस बना डाली और अनेक प्रोजेक्ट विचाराधीन हैं, अरबों की प्रापर्टी है, अभी इसी वर्ष न्यूयार्क में एक होटल प्रारंभ कर रहा हूॅं "और अपनी विभिन्न इच्छाओं का बखान करता रहा....।
नित्येश ने कहा, "यार तू तो इतना सब पाकर भी, अभी भी बहुत ही गरीब भिखारी जैसा है, जिसकी इच्छायें कभी समाप्त होने का नाम ही नहीं लेती वरन् बर्षाऋतु की नदियों की भाॅंति हमेशा उफनाती रहती हैं फिर भी कभी तृप्त नहीं होतीं।"

221 चिंजा की शादी

5 वीं क्लास में पढ़ रहीं स्वभाव से सीधी सादी सहुद्रा और भोली सी चिंजा में गहरी दोस्ती थी। चिंजा की स्पष्टवादिता से क्लास के सभी लड़के लड़किय...