पिछले दिनों चली जोर की आंधी में एक झोपड़ीनुमा घर के ऊपर, पास में लगे मोटे पेड़ की बड़ी सी डाली टूट कर गिर गयी। आंधी में सब अपने अपने में व्यस्त थे। इस प्रभावित मकान में रहने वाला परिवार भी बच्चों सहित अपने को बचाने में लग गया। थोड़ी ही देर में एक महिला आई और प्रभावित परिवार से पूछने लगी कि अधिक नुकसान तो नहीं हुआ? और इसी बीच इशारे से अपने लड़के को कुल्हाड़ी लेकर बुला लिया और कहने लगी , चल रे ! इस डाली को काट कर घर पर से अलग कर दे।
वह डाली काटता जाता और महिला कटी हुई छोटी बड़ी टहनियों को इकट्ठा कर घसीटते हुए उन्हें अपने घर ले जाने लगी। उसे देख पड़ौस के अन्य लोग भी अपनी अपनी कुल्हाड़ी लेकर डाली काटने दौड़े और अपने अपने लाभ के भाग को चुन कर काटने लगे। कुछ लोग एक ही भाग को अपना अपना कह कर झगड़ने लगे और बातचीत बढ़ते हुए गालियों तक और गालियों से मारपीट और मारपीट से थाने तक जा पहुंची।
अन्य लोग अपने अपने भाग को काट कर ले जा चुके थे । काटी गई लकड़ी से दस घरों के लिये ईधन की व्यवस्था बन गई थी, प्रभावित परिवार का उस दिन चूल्हा ही न जला, वह तो बच्चों सहित इस सोच में डूबा था कि अब घर के टूटे भाग को ठीक कराने के लिये कर्ज लेना होगा और बरसात के पहले यह सुधर भी पायेगा या नहीं!
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