हमारे यहाॅं की हजारों साल पुरानी सुंदर प्राकृतिक झील कभी पेड़ पौधों, पशु पक्षियों और मनुष्यों की बारहों मास प्यास बुझाया करती थी। पर अब, नगर निगम को जगह जगह लिखकर सूचित करना पड़ रहा है कि इस झील का पानी पीने योग्य नहीं है। नगर की पहचान इस झील में सभी नालियों, गोशालाओं और किनारे बने अस्पतालों का हर प्रकार का अपसृष्ट बहाया जाने लगा। वह प्रदूषित होने के साथ साथ वर्षा के पानी के साथ बहकर आयी गई मिट्टी से उथली भी होती गई और जलकुंभी ने अपना साम्राज्य जमा लिया।
एक समय तो ऐसा आया था कि अधिकांश जल सूख गया था और रिक्त स्थान पर लड़के क्रिकेट खेलते दिखाई देते थे। इतना ही नहीं नगर के कुछ बिल्डर्स ने तो उस जमीन पर कालोनियाॅं बनाये जाने तक का प्रस्ताव नगर प्रशासन को देने की योजना बना ली थी।
यूनीर्विर्सटी और स्कूलों के छात्रों की पहल पर श्रमदान कर सभी ने अनेक बार जलकुंभी हटाने का कार्य किया और नगर प्रशासन को झील बचाने के लिये नींद से जगाया। कलेक्टर की अध्यक्षता में इस संबंध में पंद्रह वर्ष पूर्व मीटिंग हुईं थी जिसके सुझाव के अनुसार सफाई और गहरीकरण के लिये शासन से धन मांगने का सिलसिला चल रहा है, हर वर्ष लाखों का बजट आता है और व्यय हो जाता है पर झील में प्रदूषण और उथलापन यथावत है।
नगर के एक वयोबृद्ध सज्जन ने उसी मीटिंग में कलेक्टर को सुझाव दिया था कि झील की मिट्टी को अत्यंत कम कीमत जैसे दस पैसा प्रति घनमीटर के हिसाब से नीलाम कर दिया जाय तो किसान इसे खोद खोद कर ले जायेंगे और खेतों में खाद के रूप में उपयोग करेंगे। इससे मुफ्त में ही गहरीकरण हो जायेगा और प्राप्त आय को घाटों के पुनर्निर्माण में लगाया जा सकेगा, परंतु नेताओं और अधिकारियों को यह सुझाव निरर्थक लगा क्योंकि फिर प्रदूषण दूर करने के लिये शासन से हर साल मिलने वाली धनराशि से होने वाली स्थायी आय कहाॅं से पा सकते?
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