29 भूत...
चलते चलते एक घंटा से तो अधिक हो गया, इतना समय तो लगता ही नहीं है, कितनी बार आये गये हैं इसी नहर के किनारे से, अधिक से अधिक पौन घंटा लगता है, अंधेरा बढ़ता जाता है और धरमपुरा अभी तक नहीं आया, आखिर बात क्या है, रास्ते में कोई राहगीर भी आता जाता नहीं दिखाई दे रहा जबकि यह रास्ता तो चालू रहता है, आदि आदि.... यह सोचते सोचते मैं आगे चला जा रहा हॅंू।
बड़ी जोर की प्यास लगी है, घर पता नहीं कब पहुचॅूंगा, चलो नहर का पानी ही पी लेते हैं, और मैं पानी पीने के लिये नहर के किनारे किसी ठोस सतह को अंदाज से तलाषते आगे बढ़ा ही था कि दूसरी ओर से एक छोटी सी नाव में केवल दो लोग आते दिखे, मैंने उनसे पूंछा, ‘‘भैया! धरमपुरा कितनी दूर है? आज कुछ देर हो गयी और अंधेरे में समझ में नहीं आ रहा, मैं बाहर से आया हॅूं।’’ वे बोले, ‘‘अरे! उल्टी दषा में जा रहे हो, आगे तो मीलों तक कोई गाॅंव नहीं है, चलो लौट चलो दो ढाई घंटे में पहुंच जाओगे, उमरी तक तो हम ही जा रहे हैं।’’ जोर की प्यास वैसे ही लगी थी यह सुनकर मेरे तो प्राण ही सूख गये, क्या करूं क्या नहीं! सबेरे से चला हॅंू! थकान बहुत हो गई है! सोच में डूब गया। वे लोग बोले, ‘‘क्या कहते हो चलना है तो साथ साथ चलो, नहीं तो उन से मिलो।’’ और, दूसरे किनारे पर खड़े एक व्यक्ति की ओर इषारा करते वे आगे बढ़ गये।
उस व्यक्ति ने कहा, ‘‘चलो उधर पेड़ के नीचे हमारा खलिहान है जिसमें केवल भूसा ही बचा है, उसकी रखवाली के लिये मैं रुका हॅंू तुम वहां रात में रुक लो, सबेरे जल्दी उठकर सही दिषा में चले जाना।’’ थकान के कारण मैंने उसके साथ जाने का निष्चय किया, पुलिया से उस पार पहुंचे और भूसे के ढेर पर बैठ कर आराम करने लगा। इस बीच मैंने उससे पीने के लिये पानी माॅंगा, वह झोपड़ी के भीतर गया और तूम्बे में भरा पानी मुझे दिया। प्यास बहुत लगी थी, एक दो घूंट पिया तो बहुत ही कड़ुआ लगा, इसलिये रुक गया। इस बीच उसने एक कहानी सुनायी (जो मैंने पहले भी कभी सुनी थी) जिसका निष्कर्ष था कि सब कुछ ईष्वर की इच्छा से होता है हम अपनी इच्छा से कुछ नहीं कर सकते। वह बीच बीच में यह भी पूंछता जाता कि इतनी दूर से आये हो, रुपये पैसे भी लिये होगे आदि। मैं ने उसे अपने पास क्या क्या था सब कुछ बता दिया और कहा कि चाहो तो सब ले लो, वह बोला ‘‘नहीं यह बात नहीं है।’’
उसने आगे कहा, ‘‘इस बगल के खेत से एक खेत और आगे हमारी गायें हैं उनको चारा डालकर आता हॅूं तुम आराम करो फिर बात करेंगे।’’ वह चला गया मैं भूसे के ढेर पर ढेर हो गया, एक दो घंटे में वह आया और कहने लगा ‘‘खाना तो कुछ मिलेगा नहीं पर दूध मिल सकता है कहो तो मंगा दूॅं?’’ भूखा तो दिन भर से था, पर मैं ने कहा, ‘‘नहीं क्यों कष्ट करते हैं आराम कर लीजिये मेरे कारण आप बेकार परेषान हो रहे हैं।’’ वह भी भूसे पर मुझसे थोड़ी दूर बैठ गया और कहने लगा, ‘‘देखो वह उतनी दूर एक चमकीला प्रकाश, अभी वह धीरे धीरे आगे बढ़ेगा, वह है भूत, फिर वह अपना मुंह फैलायेगा और सामने की झाड़ियों में आग लगायेगा, उसके ये सब काम हम लोग रोज ही देखते हैं, तुम डरोगे तो नहीं।’’ मैंने कहा, ‘‘अरे! भूत को तो मैं कबसे देखना चाहता था पर कभी दिखा ही नहीं चर्चे जरुर सुने हैं। चलो आज देखने को मिल गया अब मैं सोऊंगा ही नहीं उससे ही मिलूंगा, आपने बताकर यह अच्छा काम किया।’’ वह आदमी पास में अन्य भूसे के ढेर पर सो गया। मैं लेटा हुआ उस प्रकाश को देखता रहा पर कुछ भी परिवर्तन दिखाई नहीं दिया । कृष्ण पक्ष की रात थी पूर्व में आधे से भी कम आकार का चंद्रमा उदित हुआ और थोड़ा थोड़ा प्रकाश फैलने लगा। वह आदमी जागा और मुझसे शत्रु की तरह कड़े शब्दों में कहने लगा ‘‘जाओ जल्दी उस पेड़ के नीचे से बाॅंयीं ओर मुड़ कर सीधे चले जाना धरमपुरा पहुंच जाओगे।’’ उसकी वाणी इतनी कड़क थी कि मुझे लगा यदि मैं कुछ भी कहता हॅंू तो शायद यह मुझे पीटने न लगे, मैं बिना कृतज्ञता ज्ञापित किये ही वहाॅं से चला और सूर्य निकलते ही अपने रिश्तेदार के घर धरमपुरा पहॅुंच गया।
चलते चलते एक घंटा से तो अधिक हो गया, इतना समय तो लगता ही नहीं है, कितनी बार आये गये हैं इसी नहर के किनारे से, अधिक से अधिक पौन घंटा लगता है, अंधेरा बढ़ता जाता है और धरमपुरा अभी तक नहीं आया, आखिर बात क्या है, रास्ते में कोई राहगीर भी आता जाता नहीं दिखाई दे रहा जबकि यह रास्ता तो चालू रहता है, आदि आदि.... यह सोचते सोचते मैं आगे चला जा रहा हॅंू।
बड़ी जोर की प्यास लगी है, घर पता नहीं कब पहुचॅूंगा, चलो नहर का पानी ही पी लेते हैं, और मैं पानी पीने के लिये नहर के किनारे किसी ठोस सतह को अंदाज से तलाषते आगे बढ़ा ही था कि दूसरी ओर से एक छोटी सी नाव में केवल दो लोग आते दिखे, मैंने उनसे पूंछा, ‘‘भैया! धरमपुरा कितनी दूर है? आज कुछ देर हो गयी और अंधेरे में समझ में नहीं आ रहा, मैं बाहर से आया हॅूं।’’ वे बोले, ‘‘अरे! उल्टी दषा में जा रहे हो, आगे तो मीलों तक कोई गाॅंव नहीं है, चलो लौट चलो दो ढाई घंटे में पहुंच जाओगे, उमरी तक तो हम ही जा रहे हैं।’’ जोर की प्यास वैसे ही लगी थी यह सुनकर मेरे तो प्राण ही सूख गये, क्या करूं क्या नहीं! सबेरे से चला हॅंू! थकान बहुत हो गई है! सोच में डूब गया। वे लोग बोले, ‘‘क्या कहते हो चलना है तो साथ साथ चलो, नहीं तो उन से मिलो।’’ और, दूसरे किनारे पर खड़े एक व्यक्ति की ओर इषारा करते वे आगे बढ़ गये।
उस व्यक्ति ने कहा, ‘‘चलो उधर पेड़ के नीचे हमारा खलिहान है जिसमें केवल भूसा ही बचा है, उसकी रखवाली के लिये मैं रुका हॅंू तुम वहां रात में रुक लो, सबेरे जल्दी उठकर सही दिषा में चले जाना।’’ थकान के कारण मैंने उसके साथ जाने का निष्चय किया, पुलिया से उस पार पहुंचे और भूसे के ढेर पर बैठ कर आराम करने लगा। इस बीच मैंने उससे पीने के लिये पानी माॅंगा, वह झोपड़ी के भीतर गया और तूम्बे में भरा पानी मुझे दिया। प्यास बहुत लगी थी, एक दो घूंट पिया तो बहुत ही कड़ुआ लगा, इसलिये रुक गया। इस बीच उसने एक कहानी सुनायी (जो मैंने पहले भी कभी सुनी थी) जिसका निष्कर्ष था कि सब कुछ ईष्वर की इच्छा से होता है हम अपनी इच्छा से कुछ नहीं कर सकते। वह बीच बीच में यह भी पूंछता जाता कि इतनी दूर से आये हो, रुपये पैसे भी लिये होगे आदि। मैं ने उसे अपने पास क्या क्या था सब कुछ बता दिया और कहा कि चाहो तो सब ले लो, वह बोला ‘‘नहीं यह बात नहीं है।’’
उसने आगे कहा, ‘‘इस बगल के खेत से एक खेत और आगे हमारी गायें हैं उनको चारा डालकर आता हॅूं तुम आराम करो फिर बात करेंगे।’’ वह चला गया मैं भूसे के ढेर पर ढेर हो गया, एक दो घंटे में वह आया और कहने लगा ‘‘खाना तो कुछ मिलेगा नहीं पर दूध मिल सकता है कहो तो मंगा दूॅं?’’ भूखा तो दिन भर से था, पर मैं ने कहा, ‘‘नहीं क्यों कष्ट करते हैं आराम कर लीजिये मेरे कारण आप बेकार परेषान हो रहे हैं।’’ वह भी भूसे पर मुझसे थोड़ी दूर बैठ गया और कहने लगा, ‘‘देखो वह उतनी दूर एक चमकीला प्रकाश, अभी वह धीरे धीरे आगे बढ़ेगा, वह है भूत, फिर वह अपना मुंह फैलायेगा और सामने की झाड़ियों में आग लगायेगा, उसके ये सब काम हम लोग रोज ही देखते हैं, तुम डरोगे तो नहीं।’’ मैंने कहा, ‘‘अरे! भूत को तो मैं कबसे देखना चाहता था पर कभी दिखा ही नहीं चर्चे जरुर सुने हैं। चलो आज देखने को मिल गया अब मैं सोऊंगा ही नहीं उससे ही मिलूंगा, आपने बताकर यह अच्छा काम किया।’’ वह आदमी पास में अन्य भूसे के ढेर पर सो गया। मैं लेटा हुआ उस प्रकाश को देखता रहा पर कुछ भी परिवर्तन दिखाई नहीं दिया । कृष्ण पक्ष की रात थी पूर्व में आधे से भी कम आकार का चंद्रमा उदित हुआ और थोड़ा थोड़ा प्रकाश फैलने लगा। वह आदमी जागा और मुझसे शत्रु की तरह कड़े शब्दों में कहने लगा ‘‘जाओ जल्दी उस पेड़ के नीचे से बाॅंयीं ओर मुड़ कर सीधे चले जाना धरमपुरा पहुंच जाओगे।’’ उसकी वाणी इतनी कड़क थी कि मुझे लगा यदि मैं कुछ भी कहता हॅंू तो शायद यह मुझे पीटने न लगे, मैं बिना कृतज्ञता ज्ञापित किये ही वहाॅं से चला और सूर्य निकलते ही अपने रिश्तेदार के घर धरमपुरा पहॅुंच गया।
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