जनकरानी की गाय ने पूर्णिमा के दिन एक बछिया को जन्म दिया वह उस को ‘पूना’ कहकर पुकारने लगी। बड़ी होकर बछिया सात आठ वर्ष तक दूध देती रही फिर दूध देना बंद कर दिया। अब, फिर भी वह यथावत उसकी देखभाल करती, चारा पानी देती और अन्य गायों के साथ चरने के लिए भेजती। एक दिन पड़ौस की कलाबाई आकर बोलीं,
‘‘ काय जिज्जी! तुमाई पूना तो बिलकुल बूढ़ी हो गई है ए खों बेंच काय नईं देत? ऊंसई चारे भुसा को खर्च उठा रईं?’’
‘‘ अरे! तें सोई नोनी बुलयाबे आ गई, कोउ बूढ़ी गइया काय खों खरीद है? जहाॅं चार गइंयाॅ खात हैं उते पांच खा रई हैं सो का नुकसान है? कछू नई, गोबर तो मिलतई है।’’
‘‘ अरे! ए खों बेंच कें नई कलुरिया लै हो तो दूध दै है और बच्छा बछियाॅं अलग, पूना तो ऊंसई जगा रूंद रई के नईं? हमने तो अपनी दो बूढ़ी गईयां भूरा खों बेंच र्दइं, बौ उनें इतवार के ढोर बजार में शहर में बेंच आव।’’
कलाबाई की सलाह पर जनकरानी ने भूरा के हाथ पूना को पचहत्तर रुपयों में बेच दिया। इतवार को भूरा खरीदी गई अन्य गायों के साथ पूना को शहर में बेचने ले जा रहा था उसी समय गांव के कुए पर जनकरानी पानी भर रही थी। उसने गायों को जाते देखा तो पूना की ओर ध्यान चला गया और वह जोर से चिल्लाई ‘‘पू ... ना...’’।
पूना झट से रंभाती हुई उसकी ओर दौड़ी, भूरा ने बहुत ललकारा, उस पर पत्थर भी फेके पर वह नहीं मानी और जनकरानी के पास जा पहुॅंची। जनकरानी ने उसे दो बाल्टी पानी पिलाया। उसने अनुभव किया कि जब से भूरा उसे ले गया है उसने शायद पानी भी नहीं पिलाया। भूरा दौड़कर पास आ गया। जनकरानी बोली,
‘‘ ए भज्जा! तुम अपने पचहत्तर रुपैया वापस लै लिइयो, हम अपनी पूना खांे वापस लै जा रय हें।’’
( बुंदेली शब्द-काय क्यों, ऊंसई व्यर्थ, तें सोई तू भी, बुलयाबे मजाक करने, खों को, कलुरिया नवयौवना गाय, जगा जगह,रूंद रई घेरे है, बौ उनें वह उनको, आव आया, रय हें रहे हैं। )