Saturday, October 10, 2020

215 पूना

जनकरानी की गाय ने पूर्णिमा के दिन एक बछिया को जन्म दिया वह उस को ‘पूना’ कहकर पुकारने लगी। बड़ी होकर बछिया सात आठ वर्ष तक दूध देती रही फिर दूध देना बंद कर दिया। अब, फिर भी वह यथावत उसकी देखभाल करती, चारा पानी देती और अन्य गायों के साथ चरने के लिए भेजती। एक दिन पड़ौस की कलाबाई आकर बोलीं,

‘‘ काय जिज्जी! तुमाई पूना तो बिलकुल बूढ़ी हो गई है ए खों बेंच काय नईं देत? ऊंसई चारे भुसा को खर्च उठा रईं?’’

‘‘ अरे! तें सोई नोनी बुलयाबे आ गई, कोउ बूढ़ी गइया काय खों खरीद है? जहाॅं चार गइंयाॅ खात हैं उते पांच खा रई हैं सो का नुकसान है?  कछू नई, गोबर तो मिलतई है।’’

‘‘ अरे! ए खों बेंच कें नई कलुरिया लै हो तो दूध दै है और बच्छा बछियाॅं अलग, पूना तो ऊंसई जगा रूंद रई के नईं? हमने तो अपनी दो बूढ़ी गईयां भूरा खों बेंच र्दइं, बौ उनें इतवार के ढोर बजार में शहर में बेंच आव।’’

कलाबाई की सलाह पर जनकरानी ने भूरा के हाथ पूना को पचहत्तर रुपयों में बेच दिया। इतवार को भूरा खरीदी गई अन्य गायों के साथ पूना को शहर में बेचने ले जा रहा था उसी समय गांव के कुए पर जनकरानी पानी भर रही थी। उसने गायों को जाते देखा तो पूना की ओर ध्यान चला गया और वह जोर से चिल्लाई ‘‘पू ... ना...’’।

पूना झट से रंभाती हुई उसकी ओर दौड़ी, भूरा ने बहुत ललकारा, उस पर पत्थर भी फेके पर वह नहीं मानी और जनकरानी के पास जा पहुॅंची। जनकरानी ने उसे दो बाल्टी पानी पिलाया। उसने अनुभव किया कि जब से भूरा उसे ले गया है उसने शायद पानी भी नहीं पिलाया। भूरा दौड़कर पास आ गया। जनकरानी बोली,

‘‘ ए भज्जा! तुम अपने पचहत्तर रुपैया वापस लै लिइयो, हम अपनी पूना खांे वापस लै जा रय हें।’’

( बुंदेली शब्द-काय क्यों, ऊंसई व्यर्थ, तें सोई तू भी, बुलयाबे मजाक करने, खों को, कलुरिया नवयौवना गाय, जगा जगह,रूंद रई घेरे है, बौ उनें वह उनको, आव आया, रय हें रहे हैं। )


214 सबसे बड़ा गुण

 सम्पन्नता और राजसी ठाटबाट में पले बढ़े ठाकुर वीरविक्रम सिंह को नौकरी की आवश्यकता ही नहीं थी पर शौक पूरा करने के लिए राज्य सेवा में चयनित हो अधिकारी बन गए। पहली पोस्टिंग में ही उन्हें महिला बाॅस के आधीन कार्य करना पड़ा जो उनकी शान के खिलाफ था पर किसी प्रकार काम चलने लगा। अपनी आदतों के अनुसार ठाकुर साहब कार्यालयीन भृत्यों को ही नहीं बाबुओं को भी अपने घरेलु नौकरों की तरह आदेश दिया करते, महिला अधिकारी को भी वह तुच्छ समझते। प्रारंभ में सभी कर्मचारी यह सोच कर कि नये नये अधिकारी हैं आगे सब ठीक हो जाएगा काम करते रहे। पर, जब कई माह निकलने के बाद भी स्थिति वही बनी रही तब एक दिन किसी भृत्य ने उन्हें उन्हीं की स्टाइल में जबाब दे दिया। अब क्या था ठाकुर साहब ने उसे दो तीन थप्पड़ जड़ दिए। उनकी वरिष्ठ महिला अधिकारी के द्वारा बीच बचाव करने के बावजूद भी यूनियनबाजी, नारेबाजी और अंततः पुलिस प्रकरण बन गया। पुलिस ने भी ठाकुर साहब की पोजीशन भांपकर मामला विभागीय मानकर विभाग के संचालक को भेज दिया। संचालक ने महिला अधिकारी से पुलिस की रिपोर्ट पर टिप्पणी चाही। 

महिला ने ठाकुर साहब को बुलाकर समझाया कि गलती आपकी है, आपने सरकारी सेवा के आचरण नियमों का उल्लंघन किया है। आपकी नई नई नौकरी है इसलिए मैं नहीं चाहती कि आपको कोई दंड मिले अतः सुझाव देती हॅूं कि आप लम्बी छुट्टी पर चले जाएं। उनके लम्बी छुट्टी पर चले जाने से कार्यालय में यथावत कार्य चलने लगा। लोग सोचते थे कि प्रभावशाली परिवार के होने से शायद वह अपना ट्रांस्फर करा लें।

घर पर ठाकुर साहब की बड़ी बहिन अपने बच्चों सहित आई हुई थी। एक दिन फोर्थ स्टेंडर्ड के छात्र उनके भानजे ने कहा, 

‘‘मामा! मैंने हिन्दी का यह लेसन तो पढ़ लिया है, एक क्वेश्चन को छोड़ सभी के आन्सर बन गए हैं, क्या आप मुझे इसका आन्सर सर्च करने में हेल्प कर सकेंगे?’’

‘‘ क्या क्वेश्चन है बताना?’’ ठाकुर साहब बोले।

‘‘ वह कौन सी चीज है जो स्वयं तो मुफ्त में मिलती है पर उससे सभी कुछ खरीदा जा सकता है?’’

ठाकुर साहब सोच में पड़ गए, बोले जरा बताओ देखूं लेसन क्या है? और पूरा पाठ पढ़ डाला। उन्होंने भानजे को प्रश्न का उत्तर लिखवाया,

‘‘विनम्रता मुफ्त में मिलती है, पर उससे सभी कुछ खरीदा जा सकता है।’’

 और, सब छुट्टियां केंसिल कर अगले ही दिन वे अपनी ड्युटी ज्वाइन करने चल पड़े।


213 कोरोना का रोना

 ‘‘ यार! दुष्ट कोरोना के विश्वव्यापी आक्रमण से सारा संसार त्रस्त है, पता नहीं इसका कभी अन्त होगा कि नहीं।’’

‘‘ सच कहा, बेचारे डाक्टर लोग तो उससे खूब लड़ रहे हैं पर वह हार मानने को तैयार ही नहीं, बल्कि उन्हें ही अपनी चपेट में लेता जा रहा है!’’

‘‘यार! तुम्हारे वो ‘चमत्कारी त्रिकालदर्शी गुरु’ कहाॅं गए जो नेताओं के लिए बड़ी बड़ी भविष्यवाणियां किया करते थे? उनसे कहना कि जनकल्याण के लिए कुछ चमत्कार कर दिखाओ।’’ 

‘‘ पता नहीं, आजकल दिखते ही नहीं हैं, लाकडाउन है न। वे तो क्या बड़े बड़े प्रवचनकर्ता और तथाकथित भगवानों के एजेंट भी भगवानोें के घरों में ताला लगा कर भूमिगत हो गए हैं। सचमुच इस दुष्ट कोरोना ने सबको परास्त कर दिया है, शायद इसका कोई इलाज ही नहीं है।’’

‘‘ दुष्टों से निबटने के लिए हजारों साल पहले ‘‘चाणक्य’’ ने दो उपाय बताये थे, मेरे विचार से वही करगर हो सकते हैं, पर दुख है कोई उनका उपयोग ही नहीं करना चाहता।’’

‘‘वे उपाय क्या हैं?’’

‘‘खलानां कंटकानाम् च द्विविधैव प्रतिक्रिया, उपमान्मुखभंगो वा दूरतो वा विसर्जनम्। अर्थात् दुष्टों और कांटों से बचने के दो ही उपाय हैं, पहला जूतों से उनका मुंह तोड़ देना और दूसरा उनसे दूरी बनाए रखना। पहला उपाय तो प्रयुक्त नहीं हो सकता क्योंकि कोरोना का मुंह तोड़ने के लिए जूता (अर्थात् दवा या वैक्सीन) अभी नहीं बन पाया है, इसलिए वर्तमान में उससे ‘दूरी बनाए रखने’ वाला दूसरा उपाय ही सुरक्षा दे सकता है।’’


212 चश्मे बहार

कोविड-19 के घातक संक्रमण ने जब संसार के कोने कोने में कहर ढाया तो विदेश में सेवारत अपने इकलौते पुत्र से फोन पर उसने कुशलक्षेम पूछी। सकुशल होने की सूचना पाकर मानो उसे संतोष की सांस लेने का फिर से मौका मिल गया। अगले दिन फिरसे उसने वहाॅं के अपडेट लेने, फोन किया। उत्तर मिला,‘‘पापा! हमने कहा न हम तो ठीेक हैं, बार बार एक ही बात क्यों? आप अपनी फिकर करो’’ और फोन कट गया। दो तीन दिन तक वार्ता बंद रही, आखिर सब्र का बांध तोड़ पितृत्व फिर उमड़ा और मोबाइल उठाने के प्रयास में ‘पेन और कागज’ हाथ आया और झरने लगा वर्षों से दबा झरना-

मेरे वज़ूद पर तुम रह रह कर मुस्कराते हो,

घड़ी घड़ी मुझे इतना क्यों डराते हो।

 

किसी ने खून पसीने की रोशनाई से लिखा पहला हरुफ,

फिर लिखे लफ्ज, सफहे, सफहे से किताब बने,

पन्ने पन्ने बिखर जाओगे आंधियों के मौसम में,

जिल्द पे लिखे नाम को यूं क्यूं मिटाते हो।

      

बरसात की कागज की कश्ती कभी याद कर लेना,

रात कटती थीं आंखों में वो सिसकी याद कर लेना,

जानता हूं अब समंदर चीरने की कूवत है तुममें,

साहिल पे खड़ी मेरी सफीना क्यों डुबाते हो।

 

बूढ़े हाथों में तुम्हारी अंगुश्त की जुम्बिश है मौजूद,

मेरे दिल के आइने में तुम्हांरा अक्स है महफूज,

मैंने मुस्तकबिल के लिये ख़्वाब बोये कि परवान चढ़ेंगे,  

ख़्वाबों के ताबूत में कीलें क्यूं गड़ाते हो।

 

मैं राहबर था तीरगी में, ताबिश में आबसार था,

संगदिल था नाजुकी में, ख़जां में मौसमे बहार था,

इस गुलशन का जर्रा जर्रा पहचानता है मुझको,

हरे शज़र गुलशन के यूं क्यूं गिराते हो।

 

एहतिशाम की इतनी तश्नगी अच्छी नहीं,

पंख नाजुक हैं, हद से ऊंची परवाज अच्छी नहीं,

तंगदस्ती में भी मेरा वजूद सहरा में चश्मे बहार था

जमाने से यूं मुझको रुसवा क्यूं कराते हो।  

  

(वज़ूद . अस्तित्व। रोशनाई . स्याही। हरुफ़ . अक्षर। लफ़्ज . शब्द। सफ़हे . पन्ने। कूव्वत . सामथ्र्यए ताकत। साहिल . किनारा। सफ़ीना . नाव। अंगुश्त . उंगली। जुम्बिश . कंपन। अक्स . छविए चिन्ह। महफ़ूज़ . सुरक्षित। मुस्तकबिल . भविष्य। परवान चढ़ना .उन्नत होनाए विकसित होना। राहबर . पथप्रदर्शक। तीरगी . अंधकारमयए विपत्ति। ताबिश . गर्मीए तपन। आबसार . झरना। संगदिल . पत्थर समान कठोर दिल। नाजुकी . कोमलता। ख़ज़ां . पतझड़। शज़र . पेढ़। गुलशन . बाग बगीचा। एहतिशाम . ऐश्वर्यए वैभव। तश्नगी . तीव्रध्उत्कट इच्छा। परवाज़ . उड़ान। तंगदस्ती . गरीबीए फटेहाली। सहरा . रेगिस्तान। चश्म.ए.बहार . बहार का सोता। रुसवा . अपमान।)


211 पाप-पुण्य

 नगरसेठ लक्ष्मीचंद्र ने व्यापार से अपार धन कमाया, अनेक भूमियों, भवनों-अट्टालिकाओं के स्वामी बने। स्वभाव से सीधे व प्रकृति से धार्मिक तो थे परंतु वणिकपुत्र होने के कारण अपनी स्वाभाविक वणिकवृत्ति से विवश होकर मिलावट करने, कम तौलने आदि से परहेज न करते थे। पत्नी की असमय मृत्यु से दुःखी रहते थे अतः इकलौते पुत्र का विवाह कुछ जल्दी कर बहू घर ले आये पर दुर्भाग्यवश पुत्र भी ज्वर से पीड़ित हो चल बसा। बहू थी तो वणिकपुत्री परंतु वह आडंबरयुक्त धार्मिक सोच से विपरीत तार्किक सोच रखती थी। दुःखों से मुक्ति हेतु लक्ष्मीचंद्र किसी साधू की सलाह पर वर्ष में एक बार विशाल यज्ञ एवं भंडारा आयोजित करने लगे। बहू से व्यापार में नैतिकता एवं शुद्व आचरण करने की सलाह पाने पर लक्ष्मीचंद्र ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि यदि मुझसे कोई पाप हो भी जाता है तो उसका कुफल यज्ञ-भंडारे के आयोजन से अर्जित पुण्य से निष्प्रभावी हो जाता है।

एक रोज बहू ने लक्ष्मीचंद्र को स्वल्पाहार में अन्य सामग्री के साथ-साथ दही व शहद भी दिया। लक्ष्मीचंद्र ने बहू को समझाते हुये उनका सेवन नहीं किया कि दही एवं शहद दोनों ही स्वास्थ्य के लिये तो उत्तम हैं पर इनका संयोग विषतुल्य होता है। बहू ने कहा कि स्वल्पाहार में गर्म जल एवं नींबू भी है जो विष का शमन कर देगा। बात आयी गयी हो गयी। कुछ काल पश्चात पुनः बहू ने रात्रिकालीन भोजन में उड़द की दाल के बने स्वास्थ्यवर्धक पकवान दही में फुलोकर परोसे एवं श्वसुर को बताया कि साथ में बाजरे की रोटी व पुराने नींबू का अचार भी है जो विष का शमन कर देंगे। लक्ष्मीचंद्र ने दुःखी होकर पुनः उक्त सामग्री अलग कर दी। अनेक बार पुनरावृत्ति होने पर एक दिन लक्ष्मीचंद्र ने बहू से पूछ ही लिया कि वह उत्तम व स्वास्थ्यवर्धक भोज्य सामग्री का विषोत्पादक संयोग बनाकर एवं साथ में उसका शमन भी क्यों देती है? बहू ने उत्तर दिया कि संतान माता-पिता से ही सीखती है, आप मेरे पितातुल्य हैं, मैंने यह आपसे ही सीखा है। पहले आप पाप पर पाप करते हैं एवं उसके शमन हेतु पुण्य कमाने के उद्देश्य से वर्ष में एक बार यज्ञ-भंडारा आयोजित कर देते हैं। जबकि ‘कर्म विज्ञान’ कहता है कि मनुष्य को उसके द्वारा किए गए पाप का दंड एवं पुण्य का लाभ अलग-अलग मिलता है, दोनों अलग-अलग संचित होते हैं, उनके प्रभाव भी क्रमानुसार यथासमय स्वयं को भोगना ही पड़ते हैं,। पाप कर्म को पुण्य कर्म उदासीन नहीं कर सकते न ही उनका एक दूसरे से शमन होता है। यदि आपके पापों का शमन यज्ञ-भंडारे से हो जाता तो आपकी पत्नी एवं पुत्र की असमय मृत्यु क्यों होती?      

जीवन की पुस्तक के मैले पृष्ठों को धोने, निरुत्तर लक्ष्मीचंद्र की आंखों से आंसू उमड़ पडे़। 


210 कोरोना गुरु

‘‘क्यों सेठ! क्या हाल चाल हैं?

‘‘क्या पूछते हो भैया! देखते नहीं ‘कोरोना’ के कहर का रोना घर घर में पसरा है।’’

‘‘ काहे को रोना? वह तो हमें सही ढंग से जीने का रास्ता सिखा रहा है।’’

‘‘ ये भी कोई शिक्षा हुई? स्कूल कालेज बंद, न मंदिर, न मस्जिद! न मिलना जुलना! न चहलपहल! न आना जाना। अरे! इसने तो देवमूर्तियों के दर्शन कर पाना भी दुर्लभ कर दिया है? सब धंधा चैपट हो गया, लोग मर रहे हैं?’’

‘‘ लेकिन यह भी सोचो जरा, अपने शरीर और घर के भीतर बाहर इतनी स्वच्छता रखने का काम इससे पहले कब करते थे? तथाकथित पवित्र स्थानों में भीड़ की भक्ति क्या देखी नहीं है? ’’

‘‘लेकिन देवदर्शन बिना कोई काम शुरु करना! नहीं नहीं ये तो बिलकुल ही गलत है।’’

‘‘ सेठ जी! पत्थरों और सप्तधातुओं से बनी मूर्तियों में तथाकथित देवता को खोजते हो पर अपने भीतर बैठे देवों के देव की अनदेखी करते हो। इसीलिए ‘कोरोना’ सिखा रहा है कि आडम्बर ओढ़े बाहर मत भटको और न ही व्हीआईपी बनकर अलग से दर्शन कर लेने का भ्रम पालो, मन का मैल हटा कर स्वच्छ बना लो देवता दिखाई देने लगेंगे।’’

‘’ अरे यार! क्या घर से बाहर भी न निकले कोई?’’

‘‘ क्यों नहीं, काम से ही बाहर निकलो, अनावश्यक भीड़ के अंग न बनो, वाहनों की होड़ में न पड़ो, अपने परिवार के साथ शेष समय बिताओ, यही ‘कोरोना’ कह रहा है।’’

‘‘ पर कितने लोग उसके प्रकोप से यों ही मरते जा रहे है, वह क्या?’’

‘‘ सही है, उचित स्वच्छता, सात्विक भोजन, यम नियम का पालन और संयमित जीवन से दूर रहने वाले लोग ही ‘कोरोना’ का भोजन बनते हैं।’’

‘‘तो क्या कोई आदमी काम धाम भी न करे? घर में ही बैठा रहे? दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति कौन करेगा?’’

‘‘ भैया! यह प्रकृति का नियम है कि जब जब असंतुलन उत्पन्न होता है वह अपने आप संतुलन बनाती है। यह अस्थायी अवस्था है जब हम स्वच्छता से रहने और सात्विक जीवन पद्धति को अपना कर सामाजिक संतुलन बना लेंगे ‘कोरोना’ गुरु प्रसन्न होकर स्वयं अन्तर्ध्यान  हो जाएंगे।’’


209 संस्मरण:: शनि का प्रकोप

 शहर के सबसे नामी स्कूल की प्रवेश परीक्षा का रिजल्ट आया, बेटा एक नंबर से चूक गया। उसी रात को दोस्त की लड़की की शादी में भोपाल नहीं जा सका क्योंकि रिजर्वेशन वेट लिस्ट तीस से आकर एक में अटक गयी। सोचा कि सिनेमा ही देख लिया जाये, पार्किंग करते-करते टिकिट लेने पहुंचे तो काउंटर वाला बोला, “हाऊसफुल हो गया साहब, लास्ट टिकट भी बिक गयी!”  लौटते समय अपनी प्रिय मैगजीन लेने बुक स्टाल पहुंचा, दुकानदार ने बताया कि अंतिम प्रति अभी-अभी बिकी है। ये हो क्या रहा है मेरे साथ इन दिनों, चाही हुई हर चीज बस मिलते-मिलते, हर काम बस होते-होते रह जाता है। पत्नी ने बताया कि उनके साथ भी कई दिनों से कुछ ऐसा ही हो रहा है और जैसी कि उम्मीद थी, उनके मुताबिक हमें जल्दी से जल्दी पूजा-पाठ करानी चाहिये। खानदानी पंडितजी ने फोन पर बताया कि शनि का प्रकोप है, उन्हें प्रसन्न करना होगा, पूजा के लिये उनका दूसरे दिन ट्रेन से आना तय हुआ। यहां पूजा की पूरी तैयारी थी, उधर से पंडितजी का फोन आया कि पकड़ते-पकड़ते ट्रेन छूट गयी। पूजा धरी की धरी रह गई, पत्नी बुरी तरह डर गयी, न जाने क्या होने वाला है!

पत्नी बोली, पूजा की पूरी तैयारी है, शनि के प्रकोप से विघ्न पड़ रहे हैं इसलिये भले ही किसी लोकल पंडित से ही सही पर अब पूजा हर हाल में करा ही ली जाना चाहिये। उनका सोचना था कि खानदानी पंडितजी के मार्फत शनि को प्रसन्न जब करेंगे तब करेंगे, अभी अस्थायी रुप से हल्का-फुल्का शांत तो कर ही लें। एक लोकल पंडित को लेने के विचार से मंदिर पहुंचा, पंडितजी के चेले ने बताया कि आप थोड़ा लेट हो गये, अभी एक ही मिनट पहले कोई और यजमान आधे घंटे के लिये पंडितजी को ले गया है। दिमाग तो खराब हो गया पर बाहर आकर स्कूटर में बैठ गया, ठान लिया कि आधे घंटे यहीं इंतजार करुंगा पर पंडितजी को लेकर ही जाऊंगा। यह सूचना पाकर पत्नी ने सुझाव दिया कि कब तक इंतजार करोगे, देर न करो, पंडितजी के चेले को ही ले आओ, शनि को शांत जब करेंगे तब करेंगे, अभी उनकी हल्की-फुल्की नाराजगी तो दूर कर ही लें। जूनियर पंडित को लेने वापस मंदिर में घुसा ही था कि अचानक जोर का धमाका हुआ, एक ब्रेक फेल हाइवा सड़क पर खड़ी मेरी स्कूटर को पूरी तरह रौंदकर नाली में घुस गया। मैं सिहर उठा, अभी कुछ सेकंड पहले ही तो मैं उस स्कूटर पर बैठा था और उसी स्कूटर पर बैठकर पंडितजी की प्रतीक्षा करने का निश्चय किया था! 

             शनि के प्रकोप से अंत-अंत में क्या छूटा, यह तो मुझे याद नहीं पर अंतिम समय में यदि मैं वापस भीतर न गया होता तो प्राण छूटने का पूरा दोष बेचारे शनि के सिर अवश्य आता!


208 जीनियस

भारत आने पर अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प को महात्मागांधी के आश्रम ले जाकर प्रधानमंत्री ने उन्हें तीन बंदरों को दिखाते हुए गांधीजी का सिद्धान्त समझाया -

‘‘ सी मिस्टर प्रेसीडेंट , दिस क्लोजिंग आईड मंकी सेज नाट टू सी बैड, द सेकेंड मंकी क्लोजिंग माउथ इनफार्मस् नाट टू से बैड, एन्ड दा थर्ड क्लोजिंग ईयर्स सेज नाट टू हीयर बैड। दिस इज ग्रेट थ्योरी आफ ए सिंपल मैन।’’

ट्रम्प दम्पति ने उन संगमरमर के बंदरों के पुतलों को आश्चर्य से छू कर देखा और बार बार उनकी ओर देखते हुए आश्रम की अन्य चीजों को देखने लगे। शाम को, जहाॅं पर वे अपने परिवार सहित रुके थे वहाॅं अचानक ट्रम्प को विचारमग्न देखकर उनकी पत्नी ने पूछा,

‘‘ यू सीम टू बी भेरी सीरियस?’’

‘‘ यस, आइ एम थिंकिंग एवाउट ‘थ्री मंकी’ सिंपल थ्योरी आफ ए वंडरफुल ग्रेट मैन।’’

‘‘ यस आई टू कन्टेम्प्लेटेड बट फाउंड इट टू बी इनकमप्लीट।’’

‘‘ हाउ?’’

‘‘ देयर शुड हेव बीन ए फौर्थ मंकी, सेइंग नाट टू डू बैड।’’

‘‘ बट हाउ ए पर्सन नाट सीइंग, हीयरिंग आर स्पीकिंग बैड, कैन डू बैड?’’

‘‘ बट हू केन प्रिवेंट ए पर्सन टू डू बैड इवन इफ ही डजन्ट सी, हीयर आर से बैड?

‘‘ ओ मेलेनिया! यू आर रीयली जीनियस!’’


Thursday, October 8, 2020

207 धन्ना सेठ

पारिवारिक समस्याओं और आर्थिक संकट से जूझते हुए रवि, जैसे तैसे अपनी डिग्री पूरी कर बेरोजगारों की भीड़ में सम्मिलित हो गया। नौकरी की तलाश में चलते चलते एक दिन रास्ते के किनारे एक वृक्ष के नीचे कुछ सुस्ताने के लिए बैठा ही था कि साइकिल से जाते हुए एक अधेड़ व्यक्ति को दूसरी ओर से आते हुए दो युवकों ने धक्का देकर गिरा दिया और साइकिल पर टंगा बैग छीनकर भागने लगे। रवि उनके पीछे दौड़ा और कुछ दूर जाकर उनमें से एक युवक जिसके पास बैग था उसे पकड़ लिया, तीनों में संघर्ष हुआ । रवि के मुंह पर कुछ खरोंचें आईं पर वह बैग लेकर वापस देने उस व्यक्ति के पास पहुॅंचा। 

व्यक्ति गदगद होकर बोला, ‘‘ भैया! तुमने यह बैग लौटाकर मेरा जीवन ही नहीं नौकरी भी वापस दिलाई है, मैं आजीवन आपका अहसानमन्द रहॅूंगा।’’

रवि निर्विकार भाव से पेड़ की ओर जाने लगा पर अचानक मुड़कर बोला,

‘‘जरा दिखाना इस बैग में क्या है?’’

व्यक्ति ने फौरन बैग उसके हाथ में दे दिया। बैग में छोटे बड़े नोटों के अनेक बंडलों में से उसने पाॅंच पाॅंच रुपयों के नोटों का एक बंडल निकाल कर बैग उसे बापस दे दिया। व्यक्ति बोला,

‘‘ भैया! तुम्हारे इस बहादुरी भरे कार्य और ईमानदारी के लिए यह इनाम तो बहुत कम है, इस बैग में हमारे सेठ के कर्मचारियों का वेतन है जिसे मैं बैंक से निकाल कर ले जा रहा था। मैं उनका मुनीम हॅूं, तुम मेरे साथ चलो मैं उनसे तुम्हें बहुत बड़ा इनाम दिलाऊंगा।’’

‘‘ क्या नाम है तुम्हारे सेठ का?’’

‘‘धन्ना सेठ’’

‘‘वही जो धन्ना ब्राॅंड दूध की डेयरी भी चलाता है?’’

‘‘जी हाॅं, ठीक कहा, वह डेयरी भी उन्हीं की है।’’

‘‘ अरे! वह तो दूध में डिटर्जेंट और केमिकल मिलाकर बच्चों,  युवकों और बूढ़ों सभी के जीवन से खिलवाड़ कर रहा है, मैं तो उसका पानी भी नहीं पी सकता’’ 

‘‘मुनीम साब! यह नोटों की गिड्डी वापस रख लो नहीं तो धन्ना सेठ तुम्हारे वेतन से काट लेगा’’।


206 घड़ी

 उस समय की 4थी क्लास तक पढ़े ‘भदईं’, गाॅंव के कुछ इने गिने पढ़े लिखे लोगों में माने जाते थे। शहर के किसी बीड़ी उद्योगपति ने गाॅंव में खोली कंपनी की ब्राॅंच में भदईं को मुनीम के सहायक के काम में लगा लिया। रोज सही समय पर कंपनी में पहुंच सकें इसलिए भदईं ने एक कलाई घड़ी खरीदी जो गांव में शायद उन्हीं के पास सबसे पहले आई थी। घर से कंपनी तक जाते आते समय भदईं से रास्ते भर बुजुर्ग और बच्चे सभी पूछा करते, ‘‘काय भदईं! कित्ते बज गए?’’ और भदई बड़ी शान से घड़ी को देखते, थोड़ी देर कुछ गणना करते फिर समय बता दिया करते। जबसे भदईं ने घड़ी खरीदी लोग रास्ते में तो समय पूछते ही थे कभी किसी के यहाॅं किसी बच्चे का जन्म होता तो उसी समय दौड़कर भदईं के घर जाकर समय पूछता। इसी क्रम में एक दिन, रास्ते में ‘‘गिल्ली डन्डा’’ खेल रहे लड़कों में से एक ने, वहीं से जाते हुए भदईं से पूछा, ‘‘काय भदईं! कित्ते बज गए?’’ भदईं समय बताने के लिए अपनी घड़ी देख ही रहे थे कि खेल देख रहे एक बुजुर्ग बोले, ‘‘काय रे! का तोय कोरट में पेशी पे जाने है जो कित्ते बजे हैं, पूछ रव  है?’’ 

यह सुनते ही अन्य लड़के हंसने लगे और भदईं भी हंसते हुए आगे बढ़ गए। लड़का तुरंत घर आकर अपनी माॅं से बोला,

‘‘काय बउ! जा कोरट की पेशी का कहाउत?’’

माॅं इसे सुनते ही दस साल पहले हुई घटना को चलचित्र की तरह देखने लगी जिसमें भाइयों में जमीन के बंटवारे संबंधी झगड़े में कोर्ट कचहरी और बकीलों के चक्कर लगाते उसके पति को शादी के जेवर बेचना पड़े और इतना तक कि गांव के धनी लोगों से कर्जा लेना पड़ा फिर भी उसे अपना हक नहीं मिला तब आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ा था। आंखों में उमड़ती आंसुओं की धारा को रोकने का प्रयास करते हुए उसने लड़के को अपने पास खींचकर कहा,

‘‘देख रे! कोरट और पेशी के चक्कर में नें परिए और नें कबऊं बकीलों के फेर में रइए। मेंनत मंजूरी करकें आदे पेट रइए मनों कबऊं कर्जा नें करिए, समज रव है के नईं?’’

इसी बीच भदई बापस लौटते हुए वहाॅं से निकले। वह लड़के के पिता से उम्र में थोड़ा बड़े थे इसलिए लड़के की माॅं ने घूंघट की ओट लेते हुए कहा, 

‘‘दाउ जू! तनक ए लरका खों समजाव और कौनउं काम में लगा ले, कहॅुं दंद फंद नें कर बैठे?’’

भदईं घड़ी वाले हाथ से कान खुजलाते अपने स्वभावानुसार कुछ सोचकर बोलने वाले ही थे कि ‘‘घड़ी’’ चमकते हुए बोल पड़ी,

‘‘ गम्म खाव बहु! तनक पढ़ लिख कें मोंड़ा खों कछु बड़ो तो हो जान दे फिर हिल्ले सें लगई जैहे।’’

(बुंदेली शब्द, काय. क्यों। कित्ते.कितने। कोरट. कोर्ट। बउ. माॅं। जा. यह। नें. नहीं । मेंनत मंजूरी. मेंहनत और मजदूरी। आदे पेट रइए. भर पेट भोजन न भी मिले तब भी। मनों कबऊं. लेकिन कभी। करिए. करना। समज. समझ। रव. रहा। तनक. थोड़ा। मोंड़ा. लड़का। दंद फंद. झगड़ा झंझट। गम्म खाव. धीरज रखो। हिल्ले. स्थाई काम। लगई जैहे. लग ही जाएगा)


Monday, October 5, 2020

205 समाधान ?

 ‘‘बड़ी मुसीबत है, पैदल चलना भी मुश्किल हो गया है । रोड पर हर जगह दिनरात वाहनों की भीड़ रहती है। ’’

‘‘ सच कहा यार! फुटपाथ तो बचे ही नहीं हैं, उन पर दूकानें सजी रहती हैं या फिर अव्यवस्थित वाहन खड़े रहते हैं और रोड पर तेज गति से वाहन चलते हैं।’’

‘‘ लोगों में ‘सिविक सेंस’ बचा ही नहीं, ट्रेफिक पुलिस भी उनकी लापरवाही को अनदेखा करती है। कोई बड़ी बात नहीं है, पुलिस चाहे तो सब कुछ ठीक हो जाए।’’

पार्क में बैठे बुजर्गों के बीच चल रही इस वार्ता को सुन सामने बैठा नवयुवक पास आकर बोला,

‘‘‘‘ अंकल! मैं अभी सिलेक्ट हुआ नया पुलिस इंस्पेक्टर हॅूं, मैंने एक ओवरलोड ट्रक को पकड़ कर कानूनी कार्यवाही करना चाही, दस मिनट के भीतर ही परिवहन मंत्री ने फोन किया, इंस्पेक्टर! ट्रक को छोड़ दो  ये अपने आदमी हैं। मैंने कहा,

‘‘लेकिन सर! ओवरलोड के अलावा इसमें तो कुछ संदिग्ध माल भी भरा है, बिना जाॅंच कराए छोड़ना कानून का उल्लंघन होगा, कैसे छोड़ दॅूं? ’’

‘‘ भेरी गुड, नया नया है न! तू कानून का रखवाला है और मैं कौन हॅूं जानता है? मैं हॅूं कानून का बाप, कानून बनाने वाला, मैं जो कहता हॅूं वही कानून होता है, समझा?’’

‘‘ परन्तु सर! ट्रेनिंग के बाद हमने कानून की रक्षा की शपथ ली है, क्या मैं आपके कहने पर उसे तोड़ दॅूं?’’

‘‘ कितनी बहस करता है रे! अब, तू ही निर्णय कर ले, शपथ तोड़कर ट्रक को छोड़ता है या फिर कुर्सी?’’

मैंने शपथ नहीं तोड़ी, अब मैं सस्पेंडेड हॅूं’’’’

‘‘ बेटा! यही हो रहा है, लालैसनेस बढ़ती जा रही है, जनता को कानून का पाठ पढ़ाने वाले नेता स्वयं कानून का पालन नहीं करते। अब तो लोग कहने लगे हैं कि कानून के विपरीत काम न करा पाए तो नेता काहे के?’’


204 फिंगर प्रिंट्स

 ‘‘ क्यों मिस्त्री! ये पीले रंग वाली वही बिल्डिंग है जिसे हमलोगों ने दिनरात काम करके बनाया था’’

‘‘ हाॅं, इसकी ही नहीं इस कालोनी के अनेक मकानों की ईंट ईंट पर हमारी अंगुलियों के निशान मिलेंगे। पर तुम क्यों पूछ रहे हो?’’

‘‘ कुछ नहीं, बहुत साल बाद यहाॅं आया हॅूं इसलिए भूल सा रहा रहा था। वाह! वे भी क्या दिन थे, अपनी मर्जी के बिना इसके भीतर पत्ता भी नहीं हिल सकता था।’’

‘‘ जरा अब अन्दर जाकर देखो, वाचमेन गेट के पास भी नहीं फटकने देगा।’’

‘‘ अन्दर जाने की क्या जरूरत मिस्त्री! यही क्या कम है कि इसे हमने बनाया था।’’


203 चिलम

मुख्य सड़क से तीन चार किलोमीटर दूर बसे गाॅंव में आयोजित यज्ञकार्य के लिए मुख्य पुरोहित के रूप में आमंत्रित किए गए पंडितजी को सड़क से गाॅंव तक ले जाने के लिए यजमान ने बैलगाड़ी का प्रबंध किया। बस से उतरकर पंडितजी बैलगाड़ी पर सबार हो थोड़ी दूर ही आगे बढ़े थे कि एक नाले के समीप पेड़ के नीचे बैठे दो चरवाहे चिलम पीते दिखे। पंडितजी उन्हें देखते हुए चलते चलते मुश्किल से पाॅंच मिनट ही अपने मन पर नियंत्रण रख पाए और बैलगाड़ी चालक से बोले,

‘‘ भैया! आपके पास चिलम है क्या?’’ 

‘‘ नहीं महाराज! मैं चिलम नहीं पीता’’

‘‘ अच्छा, तो थोड़ी देर रुको, मैं अभी आया’’ कहकर वे उन चरवाहों के पास पहॅुचे और बोले ,

‘‘मुझे चिलम पिलाओगे?’’

‘‘ लेकिन महाराज! हम लोग छोटी जाति के चरवाहे हैं’’ अचरज सहित डरते हुए वे बोले।

‘‘ अच्छा! तो बोलो शिव, शिव, शिव।’’

उनमें से एक झट से बोला, ‘‘महाराज! बिना बताए आपने मेरा नाम जान लिया आप तो बहुत पहुॅंचे हुए लगते हैें’’ और दोनों शिव शिव बोलते हुए दूर से ही जमीन पर लेटकर उन्हें प्रणाम करने लगे। पंडितजी ने उनके हाथ से चिलम लेकर दो तीन कश लगाए और बैलगाड़ी की ओर चल पड़े। उधर पूरे दृश्य को बैलगाड़ी चालक आश्चर्य से देखता रहा। गाॅंव पहुॅंचकर पंडितजी के स्वागत में स्थानीय पंडितों सहित यजमान खड़े थे; पर बैलगाड़ी चालक ने धीरे से उनके कानों में देखे गए दृश्य का वर्णन कह सुनाया। सभी पंडित और समाज के अन्य लोग आगन्तुक पंडित को प्रधान पुरोहित बनाने तो क्या यज्ञमंडप में भी प्रवेश नहीं करने देने पर अड़ गए। स्थिति को समझ आगंतुक पंडित सबसे बोले,

‘‘ यह ठीक है कि चिलम पीना बहुत हानिकारक है, पर क्या शिव को श्मशान में बैठकर साधना करने से उन्हें अपवित्र और पतित माना जा सकता है?’’

‘‘ अरे! शिव को तो यज्ञ का देवता माना ही नहीं गया है जो उनका उदाहरण दे रहे हो? यदि मान भी लेें तो शिव, शिव हैं उनकी आप अपने से तुलना कैसे कर सकते हैं?’’ सभी एकसाथ चिल्ला उठे।

‘‘ मित्रो! शिव का नाम ही सबको पवित्र करने वाला होता है फिर वे लोग तो अनेक बार शिव शिव बोल चुके थे, उनमें से एक शिव ही था। जब सब कुछ शिवमय हो गया तो अपवित्रता कहाॅं रही?’’

सब स्तब्ध।


202 चेतना

 मैट्रिक पास प्रायमरी के शिक्षक मेहताजी को, सच्चे दार्शनिक ज्ञान की पिपासा ने प्राइवेट बीए और एमए करने के बाद पीएचडी करने का मनोबल दिया और वे विश्वविद्यालय के एक धुरंधर प्रोफेसर के मार्गदर्शन में शोधकार्य करने की इच्छा से उनसे मिलने पहुॅंचे। उनका निवेदन सुनकर प्रोफेसर बोले,

‘‘ आप मेरे साथ ही शोधकार्य करने के लिए पंजीकरण क्यों कराना चाहते हैं?’’

‘‘ सर! आपका नाम उच्च स्तर के दार्शनिकों में माना जाता है, आपके लिखे अनेक ग्रंथ प्रकाश में हैं और आपके अनेक शिष्य पीएचडी प्राप्त कर आपका ही कीर्तिगान करते हैं।’’

‘‘ अच्छा!तो किस विषयवस्तु पर शोध करने की इच्छा है आपकी?’’

‘‘सर! अनेक ग्रंथों से सन्तों और मंदिरों से तीर्थों तक की दौड़ ने मुझे पराज्ञान अर्थात् आत्मा और परमात्मा के संबंध में केवल सैद्धान्तिक ज्ञान दिया है। मेरा विश्वास है कि आपने अपनी लम्बी साधना के बल पर इस संबंध में व्यावहारिक ज्ञान पाकर अवश्य ही इनकी अनुभूति कर ली होगी, इसलिए मैं आपका शिष्यत्व ग्रहण करने का इच्छुक हॅूं।’’

‘‘ देखिए मेहताजी! आत्मा और परमात्मा से संबंधित ज्ञान की सैद्धान्तिक व्याख्या करने पर ही विश्वविद्यालय मुझे अच्छा वेतन देता है इसलिए मैंने भी अपने को यहीं तक सीमित कर रखा है।’’

‘‘ सर! मैं आपकी स्पष्टवादिता को प्रणाम करता हॅूं, परन्तु अन्य अनुभवों की तरह आपसे मिलकर भी मैं निराश ही हुआ हॅूं’’ मेहताजी ने गहरी सांस लेते हुए कहा और नमस्कार कर वापस आ गए। 

धाराप्रवाह व्याख्यानों के लिए विख्यात प्रोफेसर उस दिन एमए की कक्षा में अपना व्याख्यान बार बार भूले।      


201 मेड इन इन्डिया

 ‘‘ चलो अच्छा हुआ, सरकार ने बच्चों के बस्ते का बोझ डेड़ से पाॅंच किलो तक निर्धारित कर दिया। ’’

‘‘ हाॅं, शायद हल्का बस्ता लेकर अब वे तेज चल सकेंगे।’’

‘‘ क्या मतलब?’’

‘‘ इतने सालों में सरकार को लगने लगा था कि हम भारी बोझ उठाने वाली भीड़ को तैयार रहे हैं।’’

‘‘ आखिर तुम क्या कहना चाहते हो?’’

‘‘ यही, कि सरकारें सत्तर साल से आज तक यह पता नहीं लगा पाई हैं कि बस्तों में रखी मोटी पुस्तकें ज्ञान भी देती हैं या केवल जानकारियाॅं। परीक्षा में अधिकतम अंक लाने की दौड़  में अपने साथियों को कैसे पछाड़ा जाय बस यही सिखाना रह गया है अब तो। कुकुरमुत्तों की तरह यत्र तत्र ऊगे ट्रेनिग कालेजों से जिस प्रकार के शिक्षक निकल रहे हैं यह भी सरकारों का नया कमाल है। ’’

‘‘ यार बात तो तुम्हारी बिलकुल सही है, बार बार पाठ्यक्रम बदला जा रहा है, गाॅंव हो या  शहर जगह जगह दीवारों पर कोचिंग क्लासों के विज्ञापनों की भरमार है। भारत के निर्माता, स्कूलों कालेजों में नियुक्त पूर्णकालिक शिक्षक, वहाॅं केवल समय निकालते हैं और अलग से कोचिंग क्लासों में यही दावपेंच सिखाते देखे जाते हैं।’’ 

‘‘ हाॅं, शायद यही कहलाता हो, मेक इन इन्डिया।’’ 


221 चिंजा की शादी

5 वीं क्लास में पढ़ रहीं स्वभाव से सीधी सादी सहुद्रा और भोली सी चिंजा में गहरी दोस्ती थी। चिंजा की स्पष्टवादिता से क्लास के सभी लड़के लड़किय...