उस समय की 4थी क्लास तक पढ़े ‘भदईं’, गाॅंव के कुछ इने गिने पढ़े लिखे लोगों में माने जाते थे। शहर के किसी बीड़ी उद्योगपति ने गाॅंव में खोली कंपनी की ब्राॅंच में भदईं को मुनीम के सहायक के काम में लगा लिया। रोज सही समय पर कंपनी में पहुंच सकें इसलिए भदईं ने एक कलाई घड़ी खरीदी जो गांव में शायद उन्हीं के पास सबसे पहले आई थी। घर से कंपनी तक जाते आते समय भदईं से रास्ते भर बुजुर्ग और बच्चे सभी पूछा करते, ‘‘काय भदईं! कित्ते बज गए?’’ और भदई बड़ी शान से घड़ी को देखते, थोड़ी देर कुछ गणना करते फिर समय बता दिया करते। जबसे भदईं ने घड़ी खरीदी लोग रास्ते में तो समय पूछते ही थे कभी किसी के यहाॅं किसी बच्चे का जन्म होता तो उसी समय दौड़कर भदईं के घर जाकर समय पूछता। इसी क्रम में एक दिन, रास्ते में ‘‘गिल्ली डन्डा’’ खेल रहे लड़कों में से एक ने, वहीं से जाते हुए भदईं से पूछा, ‘‘काय भदईं! कित्ते बज गए?’’ भदईं समय बताने के लिए अपनी घड़ी देख ही रहे थे कि खेल देख रहे एक बुजुर्ग बोले, ‘‘काय रे! का तोय कोरट में पेशी पे जाने है जो कित्ते बजे हैं, पूछ रव है?’’
यह सुनते ही अन्य लड़के हंसने लगे और भदईं भी हंसते हुए आगे बढ़ गए। लड़का तुरंत घर आकर अपनी माॅं से बोला,
‘‘काय बउ! जा कोरट की पेशी का कहाउत?’’
माॅं इसे सुनते ही दस साल पहले हुई घटना को चलचित्र की तरह देखने लगी जिसमें भाइयों में जमीन के बंटवारे संबंधी झगड़े में कोर्ट कचहरी और बकीलों के चक्कर लगाते उसके पति को शादी के जेवर बेचना पड़े और इतना तक कि गांव के धनी लोगों से कर्जा लेना पड़ा फिर भी उसे अपना हक नहीं मिला तब आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ा था। आंखों में उमड़ती आंसुओं की धारा को रोकने का प्रयास करते हुए उसने लड़के को अपने पास खींचकर कहा,
‘‘देख रे! कोरट और पेशी के चक्कर में नें परिए और नें कबऊं बकीलों के फेर में रइए। मेंनत मंजूरी करकें आदे पेट रइए मनों कबऊं कर्जा नें करिए, समज रव है के नईं?’’
इसी बीच भदई बापस लौटते हुए वहाॅं से निकले। वह लड़के के पिता से उम्र में थोड़ा बड़े थे इसलिए लड़के की माॅं ने घूंघट की ओट लेते हुए कहा,
‘‘दाउ जू! तनक ए लरका खों समजाव और कौनउं काम में लगा ले, कहॅुं दंद फंद नें कर बैठे?’’
भदईं घड़ी वाले हाथ से कान खुजलाते अपने स्वभावानुसार कुछ सोचकर बोलने वाले ही थे कि ‘‘घड़ी’’ चमकते हुए बोल पड़ी,
‘‘ गम्म खाव बहु! तनक पढ़ लिख कें मोंड़ा खों कछु बड़ो तो हो जान दे फिर हिल्ले सें लगई जैहे।’’
(बुंदेली शब्द, काय. क्यों। कित्ते.कितने। कोरट. कोर्ट। बउ. माॅं। जा. यह। नें. नहीं । मेंनत मंजूरी. मेंहनत और मजदूरी। आदे पेट रइए. भर पेट भोजन न भी मिले तब भी। मनों कबऊं. लेकिन कभी। करिए. करना। समज. समझ। रव. रहा। तनक. थोड़ा। मोंड़ा. लड़का। दंद फंद. झगड़ा झंझट। गम्म खाव. धीरज रखो। हिल्ले. स्थाई काम। लगई जैहे. लग ही जाएगा)
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