प्याज और ब्याज
हमारे पड़ोसी सिसोदिया जी ने अपने लड़के के पुलिस सबइंस्पेक्टर पद पर चयन हो जाने की खुशी में सभी पड़ोसियों को एक छोटी सी पार्टी दी। सभी लोग शुभकामना और आशीष देने एकत्रित होकर कागज की प्लेटों में नाश्ते की सामग्री, समोसा, भजिये, गुजिये, मिठाई आदि खाते हुए सिसोदिया जी और उनके लड़के को बधाइयाँ दे रहे थे, खुशी का माहौल था, कुछ लोग छुटपुट मजाक भी कर रहे थे। इतने में सराफा और गेंहू के थोक व्यापारी सेठ ऋषभ जैन भी बधाई देने आ पहुंचे। स्वागतकर्ताओं ने सभी की भाँति उन्हें भी नाश्ते की प्लेट दी।
जैन साहब बोले, ‘‘यार! इसमें से समोसा और भजिये हटा दो।’’
सर्व करने वाले ने कहा ‘‘क्यों? साहब! ये सब बिल्कुल ताजे हैं, घर पर ही बनवाए गए हैं, स्वच्छता का ध्यान रखने के लिए ही होटल से बनी बनाई सामग्री नहीं लाए हैं। ’’
वे बोले, ‘‘वह बात नहीं, हमारे मुनि महाराज कहते हैं की आलू नहीं खाना चाहिए इससे जीव हिंसा होती है और प्याज नहीं खाना चाहिए यह तामसिक है। तुम तो जानते ही हो कि समोसे में आलू और भजियों में प्याज होता है। नहीं, नहीं, इनके खाने से हिंसा होती है । ’’
इतने में बगल में खड़े प्रीतम पटेल बोले ‘‘वाह ! मुनि महाराज ने कितनी उम्दा बात कही है। लगता है हमारे रोजगार को चैपट करने की ठान ली है; आलू नहीं खाना, प्याज नहीं खाना परन्तु ब्याज जरूर खाना, वह भी दस पर्सेंट से पंद्रह पर्सेंट तक।’’
‘‘ अरे! यह धर्म की बात है, सब्जी भाजी बेचनेवालों की समझ के बाहर है।’’
‘’बहुत अच्छा! बहुत अच्छा!आपका धर्म सिखाता है कि विपत्तिग्रस्त लोगों की परिस्थिति का लाभ उठाना, उन्हें मनमाने ब्याज पर रुपया देकर खून चूसना, यह हिंसा नहीं है? ’’