Friday, April 17, 2020

(8) प्याज और ब्याज

 प्याज और ब्याज
हमारे पड़ोसी  सिसोदिया जी ने अपने लड़के के पुलिस सबइंस्पेक्टर पद पर  चयन हो जाने की खुशी में सभी पड़ोसियों को एक छोटी सी पार्टी दी। सभी लोग शुभकामना और आशीष देने एकत्रित होकर कागज की प्लेटों में नाश्ते की सामग्री, समोसा, भजिये, गुजिये, मिठाई आदि खाते  हुए सिसोदिया जी और उनके लड़के को बधाइयाँ दे रहे थे, खुशी का माहौल था, कुछ लोग छुटपुट मजाक भी कर रहे थे। इतने में सराफा और गेंहू के थोक व्यापारी सेठ ऋषभ जैन भी  बधाई देने आ पहुंचे। स्वागतकर्ताओं ने सभी की भाँति उन्हें भी नाश्ते की प्लेट दी। 
 जैन साहब बोले, ‘‘यार!  इसमें से समोसा और भजिये हटा  दो।’’  
सर्व करने वाले ने कहा ‘‘क्यों? साहब! ये सब बिल्कुल ताजे हैं, घर पर ही बनवाए गए हैं, स्वच्छता का ध्यान रखने के लिए ही होटल से बनी बनाई सामग्री नहीं लाए हैं। ’’ 
वे बोले, ‘‘वह बात नहीं, हमारे मुनि महाराज कहते हैं की आलू नहीं खाना चाहिए इससे जीव हिंसा  होती है और प्याज नहीं खाना चाहिए यह तामसिक  है। तुम तो जानते ही हो कि समोसे में आलू और भजियों में प्याज होता है। नहीं, नहीं, इनके खाने से हिंसा होती है । ’’
इतने में बगल में खड़े प्रीतम पटेल बोले ‘‘वाह ! मुनि महाराज ने कितनी उम्दा बात कही है। लगता है हमारे रोजगार को चैपट करने की ठान ली है; आलू नहीं खाना, प्याज नहीं खाना परन्तु ब्याज जरूर खाना, वह भी दस पर्सेंट से पंद्रह पर्सेंट तक।’’
‘‘ अरे! यह धर्म की बात है, सब्जी भाजी बेचनेवालों की  समझ के बाहर है।’’
‘’बहुत अच्छा! बहुत अच्छा!आपका धर्म सिखाता है कि विपत्तिग्रस्त लोगों की परिस्थिति का लाभ उठाना, उन्हें मनमाने ब्याज पर रुपया देकर खून चूसना, यह हिंसा नहीं है? ’’

Thursday, April 16, 2020

(7) कँजूस

 कँजूस 
अपने धनाढ्य मातापिता की लाड़ली राजलक्ष्मी यह जानकर खुश थी कि उसकी शादी उसके पिता से भी अधिक सम्पन्न घर में हो रही है। पर, उसको चिन्ता सताने लगी जब किसी ने बताया कि उसके होने वाले ससुर बहुत ही कन्जूस हैं।  बार बार वह यह सोचती कि यहाँ तो हमें आजादी है जो भी चाहें, मँहगा या सस्ता कभी भी खरीद सकते हैं किसी को कोई हिसाब नहीं देना पड़ता पर ससुराल में क्या होगा।       
ससुराल में, राजलक्ष्मी जैसी बहु को पाकर सभी बहुत खुश थे , पर राजलक्ष्मी को एक यही चिंता सता रही थी। एक दिन ससुर जी द्वारा  पति से सब्जी लाने  के लिए दिए गए पचास रुपयों का हिसाब पूँछते सुना तो और डर गई पर, किससे क्या कहे बड़ी ही विकट स्थिति में थी। एक दिन उसने सबेरे से ही सास और पति को बता दिया कि  उसका सिर जोर से दर्द कर रहा है  इसलिए कोई उससे न बोले, आराम करने पर ठीक हो जायेगा तो बता देंगे। दोपहर में ससुरजी खाना खाने आये और बहु खाना परोसने नहीं आई तो उन्होंने कारण पूछा।  जब सिर दर्द होने के बारे में उन्हें पता लगा तो तत्काल नौकर को भेज कर वैद्य बुलाया और दवा दिलाई।  शाम को आये तो फिर पूछा बहु की तबियत कैसी है, पता चला की कोई प्रभाव नहीं हुआ।  दूसरे वैद्य को बुलाया उन्होंने दूसरी दवा दी , सवेरे फिर पूंछा, पता चला सिर दर्द और बढ़ गया।  
       अबकी बार ससुरजी बहु के पास गए और पूँछा कि क्या  इस प्रकार का दर्द पहले भी कभी  हुआ था ? वह बोली हाँ। तो उस समय कैसे दूर हुआ था? वह  बोली, मेरे पिताजी ने अनवेधे मोतियों  को पीस कर लगाया था। 
        ससुरजी गए और भीतर से एक टोकनी भर कर अनवेधे  मोती लाये और सिल लोढ़ा पर रख कर पीसने लगे। राजलक्ष्मी तत्काल उठी और ससुर जी का हाथ पकड़ कर कहने लगी , रुक जाइये पिताजी, अब तो दर्द दूर हो गया।  वह बोले अरे ! अभी तो जोरों का दर्द हो रहा था , मोतियों का लेप लगाया ही नहीं फिर दूर कैसे हो गया?  वह बोली, मैंने आपकी कँजूसी के किस्से सुने थे इससे डर रही थी कि क्या अब मेरी स्वतन्त्र जरूरतों की पूर्ती पर पाबंदी लग जाएगी? पर अब मेरा भ्रम  दूर  हो गया।  
        उन्होंने समझाया कि लोग मेरे कंजूस होने के बहुत किस्से सुनाते हैं इससे मुझे कोई बुरा नहीं लगता । मैं तो सभी से कहता  हूँ कि फिजूल खर्च कम कर  एक एक पैसा भी  बचाते रहना चाहिए ताकि जरूरत के समय उसे पानी की तरह बहाया जा सके। विपत्ति  के समय वही काम आता है जो अपने पास होता है , दूसरों से कुछ नहीं मिलता , यदि मिलता है तो केवल कर्ज की चिंता और उपकार का बोझ।  
        राजलक्ष्मी उनके पैरों में गिर कर क्षमा मांगने लगी कि उसने उनके बारे में कितना गलत समझा। 

221 चिंजा की शादी

5 वीं क्लास में पढ़ रहीं स्वभाव से सीधी सादी सहुद्रा और भोली सी चिंजा में गहरी दोस्ती थी। चिंजा की स्पष्टवादिता से क्लास के सभी लड़के लड़किय...