Friday, June 19, 2020

48 मजदूर नेता



मजदूरों और कृषि मजदूरों के बीच एक नेताजी भाषण दे रहे थे-
‘‘मेरे भाइयो इस देश  में सबसे अधिक संख्या मजदूरों और कृषि मजदूरों की  है और धनवानों तथा जमींदारों की संख्या अंगुलियों पर गिनने लायक परंतु सबसे अधिक शोषण मजदूरों और कृषि कार्य में लगे मजदूरों का ही होता है, उन्हें उनकी मेहनत का उचित मेहनताना नहीं मिलता। इनकी मेहनत पर ये सब ऐश  करते हैं और मजदूर भरपेट भोजन को तरसते हैं। क्या आप लोग इसी प्रकार लुटते रहना चाहते हैं? मैं कहता हॅूं कि सभी मजदूर एक होकर इस अधिकार की माॅंग क्यों न करें कि जो खेतों में काम करता है जमीन उसी की होना चाहिये न कि उनकी जो एसी में बैठे हमारे ऊपर हुुकुम चलाते हैं कि जाओ खेतों में काम करो, और हमारे पराक्रम पर कृषि पंडित कहलाते हैं।‘‘
’’ भीड़ में कुछ लोग कानाफूसी करने लगे, वाह! हमने इतना तो कभी सोचा ही नहीं, नेताजी सही कहते हैं, हमारे लिये यही करना चाहिये...‘‘
फिर, नेता जी ने प्रश्न  किया "अब बोलिये आप लोगों का क्या कहना है?"
 यह सुनकर भीड़ में से एक शिक्षित बेरोजगार युवा बोला-
‘‘ इस प्रकार तो म्युनीसिपल के सभी स्वीपर कहने लगेंगे कि जो सड़कें  वे साफ करते हैं उन पर उनका ही अधिकार है, वे किसी को उन पर क्यों चलने दे?... या  कि बाल बनाने वाले नाई कहने लगें के ये सिर तो हमारे हैं क्योंकि........‘‘
नेता जी की हालत.....? ? ?

47 करोड़पति


अनेक वर्षों से शहर से बाहर एक पेड़ के चारों ओर बने चबूतरे पर एक वयोबृद्ध भिखारीनुमा फकीर अपनी पूरी गृहस्थी  को एक फटे  पुराने  कंबल में लपेटे रहा करते थे। एक करोड़पति सेठ ने उस पेड़ के सामने की जमीन को खरीद लिया और  अपना शानदार भवन बनवाकर  रहने लगे। 
पेड़ बहुत पुराना था और उसे काटने पर प्रतिबंध था इसलिये भिखारी महोदय भी शान से अपने चबूतरे पर यथावत निर्विघ्न रहने के लिये निश्चिन्त  थे। परंतु सेठ जी के परिवार वालों को भिखारी की गृहस्थी ठीक नहीं लगती थी क्योंकि भिखारी तो दिन में भीख मांगने चला जाता पर वह चबूतरा जिस पर कथरी रखी रहती उनके मुख्यद्वार के बिलकुल सामने पड़ने से उन्हें बुरी लगती। उन्होंने  अनेक प्रलोभन देकर उसे वहाॅं से अन्यत्र जाने को कहा पर वह टस से मस नहीं हुआ।  एक दिन जब भिखारी भीख मांगने चला गया तो गुस्साये सेठ ने नौकरों से कहकर कंबल की कथरी कहीं दूर फिकवा दी।
वापस आने पर जब भिखारी को अपनी गृहस्थी  यथावत न मिली तो उसने थाने में जाकर रिपोर्ट लिखाई कि मेरी एक दरी, एक कंबल, एक तकिया एक छत्ता , एक गद्दा चोरी चला गया और मुझे अमुक सेठ पर आशंका है यह उन्हीं की कारस्तानी हो सकती है। सेठ का नाम लेने पर पहले तो थाने का मुंशी  रिपोर्ट ही नहीं लिख रहा था पर यह सोचकर कि सेठ से इसी बहाने कुछ जेब में आ सकता है उसने रिपोर्ट लिख ली। थानेदार ने छानबीन प्रारंभ की और सेठ को थाने में हाजिर होने का संदेश  भिजवाया और रिपोर्ट में दर्ज चोरी की चीजों में उन्हें संदेहास्पद होने के बारे में बतलाया। 
सेठ के थाने पहुंचने के साथ ही भिखारी भी थानेदार के समक्ष उपस्थित हुआ, चोरी की लिस्ट में वस्तुओं के नाम सुनते ही सेठ को इतना गुस्सा आया कि उसने वह कथरी जहाॅं फिकवाई थी वहाॅं से उठाकर थानेदार के सामने भिखारी के सिर पर दे मारी और कहा ‘‘ ले , तेरे बाप ने कभी गद्दे , तकिये , कंबल, दरी , रजाई देखी है? ’’

‘‘थानेदार साब ! केवल यह चिथड़ी ही इसकी है जो मेरे घर के सामने के चबूतरे पर दिनरात पड़ी रहती है।’’
भिखारी बोला, ‘‘हाॅं साब ! यही है जो मेरी लिस्ट में दी गई सभी चीजों को प्रदर्शित  करती है’’, और एक एक कर किस प्रकार वह इन वस्तुओं की तरह उसका उपयोग करता है दिखा दिया। 
अपनी कथरी को पाकर प्रसन्नता से ले जाते हुए कहता गया,  
‘‘ सेठ जी! जो प्रसन्नता और सुख आपको करोड़ों की गृहस्थी में पलंग, गद्दे और रजाई देते हैं उससे कहीं अधिक सुख मुझे अपनी इस गृहस्थी में मिलता है। अब इसे न चुराना....।’’

Thursday, June 18, 2020

46. बड़ा कौन?





"ये लड़का कौन है सुधीर? तुम्हारे पास इसे मैंने कई बार घर पर आते देखा है?.".

"भैया! ये श्याम  है, मेरी कक्षा में ही है, मजदूरी करने के कारण रेगुलर स्कूल नहीं जा पाता इसलिये बीच बीच में मेरे नोट्स लेने यहाॅं आ जाता है।"

"स्कूल में भले ही मद करो पर घर पर बुलाना और प्रश्रय देना ठीक नहीं, ये छोटे लोग आगे बड़ी समस्या बन जाते हैं।" सुधीर के बड़े भैया बोलते हुए भीतर चले गये।

कुछ दिन बाद फिर बड़े भैया ने सुधीर और श्याम  को घर पर मिलते देखा, उन्होंने गुस्से में श्याम  से कहा कि वह यहाॅं सुधीर से मिलने न आया करे। अब घर पर उनका मिलना बंद हो गया।

आठ साल बाद सुधीर के बड़े भैया सरकारी दौरे से लौट रहे थे कि एक गाॅंव के बीहड़ में उनकी जीप में कुछ खराबी आ गई , ड्राइवर ने अनेक प्रकार से कोशिश  की पर चालू नहीं हुई और शाम से रात होने लगी ।
ड्राइवर ने कहा, साहब इसे तो धक्का देकर ही आगे के गाॅंव तक ले जाना पड़ेगा वहाॅं पर ही कोई मेकेनिक मिल सकता है। खैर, दौनों धक्का लगाते हुए आगे चलते जा रहे थे कि सामने से एक लड़का खेतों की ओर से आता दिखा, उसे बुलाने पर पता चला कि वहाॅं से एक किलोमीटर दूरी पर उसके भाई का गेरेज है वह इसे ठीक कर सकते हैं और मदद करने के लिये साथ में ही धक्का लगाने लगा। गेरेज पर पहुंचकर गाड़ी ठीक हो गई  और चलते हुए सुधीर के बड़े भैया मेकेनिक को रुपये देने लगे । मेकेनिक बोला " नहीं सर ! मैं यह नहीं ले सकता।"

बड़े भैया ने पूछा "क्यों? तुमने मुझे इस विपत्ति में मदद की है ,तुम्हारे छोटे भाई ने भी सहायता की है तो तुम्हारा ही नहीं तुम्हारे छोटे भाई का भी अधिकार है इन पर, इन्हें ले लो ,ये कम हों तो बताओ?"

मेकेनिक  बोला , "भाई साहब! कभी विपत्तिकाल में आपके छोटे भाई ने मेरी मदद न की होती तो शायद ही मुझे यह अवसर देखने को मिल पाता। हाॅं ,यदि हो सके तो सुधीर को मेरा नमस्कार अवश्य  कह दीजिएगा....."

बड़े भैया की स्मृति में वह पुराना दृश्य जीप की तरह पूरे रस्ते में गतिमान बना रहा तथा  मन में अपनी अफसरी और बड़े होने का दम्भ धीरे धीरे दृगजल  में धुलता रहा।

Wednesday, June 17, 2020

45 ठेकेदारी प्रथा


-क्यों राधेश्याम! अपना बबलू कई दिनों से दिखा नहीं, कहीं बाहर गया है?
-हाॅं, सीताराम! उसने एक कम्पनी बनाई है उसी के काम से अनेक शहरों में जाता आता रहता है।
-कौन सी कंपनी?
-मैन पावर सपलाइंग कंपनी।
-यह क्या है?
-अरे! ये तो तुम्हें मालूम ही होगा कि आजकल का जमाना ठेके पर चल रहा है, इसलिये बबलू ने ‘मैन पावर सप्लाइंग कंपनी‘ बनाकर जिसे जितने आदमी /कार्यकर्ता चाहिये होते हैं उन्हें उस कार्य के लिये, उतने समय के लिये , उतने लोग एकमुश्त  राशि  लेकर भेज देता है यही उसकी कंपनी का कार्य है।
-पर ये आते कहाॅं से हैं?
-अरे! कहाॅं भूले हो? कम से कम दो दिन पहले आर्डर तो दो, कितने चाहिये? बेरोजगारी कितनी है? दैनिक मजदूरी पर सैकड़ों मिल जाते हैं। खेतों की जुताई कराना हो या कटाई, मकानों को बनवाना हो , चुनाव प्रचार कराना हो, नेताओं की सभाओं में भीड़ जुटाना हो, सभाओं में तालियाॅं बजवाना हो या हूट कराना हो, धरने पर बैठना हो या जुलूस मेें हो हल्ला कराना हो सब कुछ ठेके पर ही होता है। इतना ही नहीं अब तो स्कूलों / कालेजों की पढ़ाई लिखाई भी ठेके पर ही कराई जाती है, समझे?

44 आओ ...जाओ


  एक व्यापारी ने अपने दोनों पुत्रों को बुला कर कहा तुम लोगों के जिम्में सभी काम काज सौपकर मैं लम्बे समय के लिये तीर्थाटन पर जाना चाहता हॅूं। छोटे लड़के ने कहा ठीक है हमें अपना अपना हिस्सा दे दीजिये ताकि अपना अपना काम काज स्वयं ही सम्हालें।
बटवारा कर व्यापारी तीर्थ यात्रा पर चला गया । बड़ा लड़का कर्मठ था इसलिये अपने सभी सहयोगियों से कहता आओ! हम सब मिलकर यह काम इस प्रकार से करें ; और सब के साथ वह स्वयं काम करता और दूसरों से भी काम कराता। उसके कार्य व्यवहार से लोग इतने प्रसन्न थे कि व्यापार कुछ ही समय में पहले से और अधिक क्षेत्रों में फैलने लगा।
छोटा लड़का आलसी किस्म का था वह अपने कर्मचारी सहयोगियों से कहता जाओ! तुम वहाॅं जाकर इस काम को करो , जाओ तुमसे यह काम नहीं हो सकता... और स्वयं कुछ भी नहीं करता । कुछ समय में ही उसके व्यापार में हानि होने लगी, इस पर वह कर्मियों को और डाॅंटता, बार बार कहता जाओ तुम वह काम करो... धीरे धीरे उसका व्यापार इस तरह नष्ट हुआ कि उसे अपने लिये कर्ज में गुजारा करने के दिन आ गये।
यात्रा से वापस आने पर व्यापारी ने देखा कि बड़े लड़के ने तो कई गुना प्रगति कर ली और छोटे ने सब कुछ गंवा दिया जबकि वह दोनों को ही बराबर बराबर हिस्सा देकर गया था।
दोनों भाइयों ने जब पिता के तीर्थयात्रा से वापस आने पर स्वागत समारोह आयोजित किया तो उपस्थित गणमान्य लोगों में से एक ने छोटे ल़ड़के का धंधा असफल होने का कारण जानना चाहा। इस पर उन्होंने कहा कि छोटा कहता था जाओ, इसलिये छोटे का धन चला गया और बड़ा कहता था आओ, इसलिये बड़े के पास धन आता गया।

Tuesday, June 16, 2020

43 अयोग्य कौन?


गौरीशंकर चौबे  स्वयं सातवीं तक पढे़ थे पर तात्कालिक समय के नियमानुुकूल एक गाॅंव के सरकारी प्रायमरी स्कूल में शिक्षक हो गये।
स्कूल में शिक्षकों की कमी होने से हेडमास्टर ने उन्हें दूसरी, तीसरी, और छठवीं कक्षा की हिन्दी और गणित पढ़ाने का काम दे दिया। दूसरी और तीसरी कक्षा को पढ़ाने में अधिक कठिनाई नहीं थी उन्हें, पर छठवीं में तो गणित क्या हिन्दी में ही पसीना में तर हो जाया करते । इसलिये कि बच्चे शांत  बैठे रहें और दूसरों को कोई डिस्टर्बेंस न हो, वे अपने पीरियड में उन्हें कोई न कोई कहानी सुना दिया करते और रोज ही मन में प्रार्थना करते कि जल्दी ही किसी शिक्षक की पोस्टिंग हो जाये और इस छठवीं कक्षा की बेगार से मुक्ति मिले। 
एक दिन जब वे तीसरी कक्षा में गणित पढ़ा रहे थे, छठवीं कक्षा के दो छात्र किसी कारण झगड़ पड़े और 
शिकायत उनके माता पिता तक पहुंची। अगले दिन दोनों पक्षों के अभिभावक हेडमास्टर के पास समस्या का निराकरण कराने आये। हेडमास्टर ने चौबेजी  को जाॅंचकर्ता अधिकारी बनाकर रिपोर्ट एक घंटे में सौपने का निर्देश  दिया । चौबेजी  वैसे ही छठवीं कक्षा से डरते से थे कि एक और बला आ गयी ।
जाॅंच प्रारंभ की गई। जिस लड़के को चोट लगी थी उसने बताया कि देखो, मेरे हाथ में इसने स्केल पट्टी से मारा है। जिस लड़के ने मारा था उसने मारना स्वीकार किया पर साथ ही यह भी कहा कि मैंने पहले इसे तीन बार समझाया था कि मेरे बस्ते में अपनी स्लेट न रखे, पर यह नहीं माना। परसों ही तो आपने एक कहानी के माध्यम से यह पढ़ाया था कि ‘‘अपने दुश्मन  को तीन बार समझाना चाहिये, समझाने पर न माने तो लड़ जाना चाहिये‘‘ इसलिये मैंने इसे मार दिया। 
चौबे  जी को लगा कि अब तो मेरी पोल खुलने वाली है और सबके सामने बेइज्जती होने वाली है पर फिर भी साहस कर वे पूरी सच्चाई के साथ अपनी जाॅंच रिपोर्ट तैयार कर हेडमास्टर के पास बैठे अभिभावकों के सामने ले गये।
सब के सामने रिपोर्ट पढ़ी गयी जिसमें इस घटना के लिये चौबेजी  ने अपने को दोषी माना और कहा कि उन्हें ही दंडित किया जाये। रिपोर्ट में  यह भी लिखा था कि मारने वाला छात्र निर्दोष है क्योंकि उसने तो शिक्षक द्वारा दी गई शिक्षा का पालन कर अपनी योग्यता ही सिद्ध की है ।

42आभूषण प्रियता


किसी बात पर बंगाली दम्पति इतने झगड़े कि पत्नी, डूबकर जान देने की धमकी देती हुई, गहनों का वाक्स लेकर तालाब की ओर दौड़ पड़ी। पीछे पीछे पति महाशय भी चल दिये। पत्नी, खूब गहरे पानी की ओर न जाकर उस ओर गई जहाॅं पानी केवल पिडुलियों तक डूबने का था। पानी में जाकर अपने गहनों का बाक्स बगल में दबाये चिल्लाने लगी...
‘‘ले देख ले! अब, बस डूब ही जाऊंगी!... अब तो डूब ही मरूंगी ! देखती हॅूं तुम्हें अन्न पानी कौन देता है !’’
किनारे पर खड़े पति ने कहा...
‘‘ ए प्यारी! मैंने रग रग में महसूस किया है कि तुम न रहो तो एक दिन क्या, एक सेकेंड भी मैं जीवित नहीं रह सकता। तुम न रहो तो इस विश्व  ब्रह्माॅंड में प्रलय मच जायेगा। तुम मेरे लिये न सही इस विश्व  ब्रह्माॅंड के लिये ही पानी से बाहर आ जाओ और गहनों का बक्सा भी साथ ही लेती आओ। मैं एक चीज किसी भी तरह नहीं समझ पाया प्यारी! कि तुमने जब मरने जैसा एक मनहूस काम करने का निर्णय ले ही लिया है तो इस गहने के बाक्स को किसके लिये अपने साथ ले जा रही हो? अरे, इसे तो देती जाओ।‘‘

Sunday, June 14, 2020

41 बाबा की क्लास (प्रार्थना...)


"बाबा! ये गुप्ता अंकल रोज मंदिर में कहते हैं हे भोलेनाथ! मुझे खूब धन, दौलत , नौकर चाकर दे दो ताकि शान से रह सकें।  क्या भगवान उनकी बात पर ध्यान देंगे?"  रवि ने पूंछा।
 चंदु बोली, "भगवान के पास सब कुछ है, वे क्या नहीं दे सकते हैं?"
बाबा बोले " तुम लोग ठीक कहते हो, जब भगवान ही सब कुछ देते हैं तो उन्होंने सभी को मनुष्य के शरीर के साथ योग्यतानुसार अन्य वाॅंछित सभी चीजें देकर एक निर्धारित समय में , निर्धारित लक्ष्य की पूर्ति  के बाद वापस लौटने का कार्यक्रम दिया है। इसे भूलकर यदि कोई उनसे धन , सफलता, यश , कीर्ति या अन्य भौतिक सुख सुविधाओं की माॅंग करता है तो क्या इसका अर्थ यह नहीं माना जायेगा कि भगवान ने यहाॅं भेजते समय दूसरों की तुलना में उसके साथ न्याय नहीं किया अथवा वाॅंछित वस्तुओं को देते समय उसके साथ कृपणता की? बताओ?"
"बाबा! यह तर्क तो अकाट्य है, पर हमें भगवान से कुछ माॅंगना भी चाहिये या नहीं?" रवि ने पूछा।
"हाॅं, हमें उनसे, अपनी बुद्धि को शुद्ध करने और उचित रास्ते पर चलते रहने का आत्मनिवेदन करते रहना चाहिये और कुछ नहीं", बाबा ने कहा।
" तो क्या हमें भगवान को कुछ देना चाहिये?" चंदु बोली।
 बाबा बोले, "नहीं, जब तुम लोग जानते हो कि सभी कुछ उन्होंने ही बनाया है और उनका ही है तो उन्हें तुम क्या दे सकते हो? यदि देना ही है तो उन्हें अपना मन भेंट करना चाहिये जो सभी प्रकार के भ्रमों को  उत्पन्न करता है।"

40 आँसू


इसी वर्ष तीसरी कक्षा में अपने स्कूल की टापर अनु को आज घर के एक कोने में चुपचाप बैठे देख मैंने पूछा, 
क्या बात है ‘‘अनु! आज तो बड़ी गुमसुम सी लग रही हो, क्या किसी ने कुछ कहा है?’’ 
वह बोली, ‘‘पापा! दादी रो रही है, बुआ अपने घर चली गई है, इसलिये।’’
मैंने कहा, ‘‘यह कौन सी नई बात है? पाॅंच दिन पहले जब बुआ आई थी तब भी दोनों को रोते हुए क्या तुमने नहीं देखा?’’ 
वह बोली, ‘‘हाॅं यह भी सही है, पर आज की बात कुछ और ही है.....’’
.......

221 चिंजा की शादी

5 वीं क्लास में पढ़ रहीं स्वभाव से सीधी सादी सहुद्रा और भोली सी चिंजा में गहरी दोस्ती थी। चिंजा की स्पष्टवादिता से क्लास के सभी लड़के लड़किय...