"बाबा! ये गुप्ता अंकल रोज मंदिर में कहते हैं हे भोलेनाथ! मुझे खूब धन, दौलत , नौकर चाकर दे दो ताकि शान से रह सकें। क्या भगवान उनकी बात पर ध्यान देंगे?" रवि ने पूंछा।
चंदु बोली, "भगवान के पास सब कुछ है, वे क्या नहीं दे सकते हैं?"
बाबा बोले " तुम लोग ठीक कहते हो, जब भगवान ही सब कुछ देते हैं तो उन्होंने सभी को मनुष्य के शरीर के साथ योग्यतानुसार अन्य वाॅंछित सभी चीजें देकर एक निर्धारित समय में , निर्धारित लक्ष्य की पूर्ति के बाद वापस लौटने का कार्यक्रम दिया है। इसे भूलकर यदि कोई उनसे धन , सफलता, यश , कीर्ति या अन्य भौतिक सुख सुविधाओं की माॅंग करता है तो क्या इसका अर्थ यह नहीं माना जायेगा कि भगवान ने यहाॅं भेजते समय दूसरों की तुलना में उसके साथ न्याय नहीं किया अथवा वाॅंछित वस्तुओं को देते समय उसके साथ कृपणता की? बताओ?"
"बाबा! यह तर्क तो अकाट्य है, पर हमें भगवान से कुछ माॅंगना भी चाहिये या नहीं?" रवि ने पूछा।
"हाॅं, हमें उनसे, अपनी बुद्धि को शुद्ध करने और उचित रास्ते पर चलते रहने का आत्मनिवेदन करते रहना चाहिये और कुछ नहीं", बाबा ने कहा।
" तो क्या हमें भगवान को कुछ देना चाहिये?" चंदु बोली।
बाबा बोले, "नहीं, जब तुम लोग जानते हो कि सभी कुछ उन्होंने ही बनाया है और उनका ही है तो उन्हें तुम क्या दे सकते हो? यदि देना ही है तो उन्हें अपना मन भेंट करना चाहिये जो सभी प्रकार के भ्रमों को उत्पन्न करता है।"
No comments:
Post a Comment