Sunday, August 16, 2020

64 हठधर्मिता


- सर! मैं परेशान हॅूं, कई चक्कर लगाने के बाद आप से मुलाकात कर पाया हॅूं मेरा ट्रान्सफर कर दीजिये, मेरा आवेदन मंत्रीजी की अनुशंसा सहित आपके आफिस में यथा समय आ गया था पर अभी तक आर्डर नहीं मिला।

- नहीं, अभी तो शासन ने ट्रान्सफरों पर बैन लगा रखे हैं जब बैन हट जायेगा तब हो जायेगा, अभी जाओ और उसी स्थान पर काम करो।

- अरे सर! अब तक तो बहुत लोगों के ट्रान्सफर हो चुके हैं ... वे कैसे हो रहे हैं जब बैन लगा है?

- बेकार की बहस मत करो, जाओ अपना काम करो और मुझे अपना काम करने दो।

- मैं अपना ही काम कराने आपके पास आया हॅूं और आपको ही वह काम करना है तो टालते क्यों हैं?

- तुम सीधी तरह जाते हो या निलंबित कर दूॅं?

-  तो, अब तो आप निलंबित ही कर दीजिये, और मैं निलंबन आदेश लेकर ही जाऊंगा, जब तक वह नहीं मिलेगा मैं आपके पास यहीं बैठता हॅूं, ... ...

  ... ... देखें, मुझे कौन माई का लाल यहाॅं से हटाता है।


63 युवा सोच


भीड़ वाले रास्ते में दाॅंयी ओर से चलते हुए एक बाइक पर तीन नवयुवक मस्ती करते जा रहे थे। आने जाने वाले लोग डरते, बचते, बड़बड़ाते, चलते जाते। थोड़ी दूर चलने पर एक ट्रेफिक पुलिस के कान्सटेबिल ने उन्हें टोका और चेताया कि राॅंग साइड जा रहे हो राइट चलो? 

उनमें से एक बोला, ‘राइट ही तो चल रहे हैं? '

आगे चैराहे पर भी वे दायीं ओर से ही मुड़े, ट्रेफिक पुलिस के हवलदार ने रोका और कहा, ‘आपलोग पढ़े लिखे हैं? राइट साइड से चलना चाहिये, क्या यह नहीं जानते यह राॅंग साइड है? '

वे बोले ‘अंकल! आप क्या यह नहीं जानते कि ‘‘आरआइजीएचटी, राइट " राइट माने दायाॅ '। तो, हम लोग क्या गलत हैं? हवलदार आगे कुछ कहता कि वे तत्काल फुर्र हो गये।

वे कुछ दूर चले ही थे कि सामने से आते हुए एक सबइंस्पेक्टर से टकराते टकराते बचे। इंस्पेक्टर ने उन्हें रोककर पूंछा कि क्या उन्हें देश का कानून नहीं मालूम? उन्होंने जबाब दिया , ‘कैसा कानून? राइट को राॅंग और राॅंग को राइट सिखाते हो? इसीलिये तो  देश में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है? यह कितना उचित है? हम ऐंसे कानून को बदलना चाहते हैं।'

इंस्पेक्टर अपनी बाइक से उतर कर एक युवक की कालर पकड़ने के लिये अपना हाथ बढ़ा ही रहा था कि वे तेजी से फिर भाग निकले, इंस्पेक्टर उनकी बाइक का नंबर लिखने का प्रयास ही करता रहा। 


62 शक्ति

 

- यह नहीं हो सकेगा, महोदय आप जो कह रहे हैं वह नियम विरुद्व है।

- अच्छा! क्या मंत्री जी की बात मानोगे? उनसे बात करोगे?

- लेकिन जब आप मंत्री जी तक पहुृच रखते हैं तो उन्हीं के पास जाकर अपने पुत्र के ट्रान्सफर का आदेश सीधे ही क्यों नहीं निकलवा लेते, आपका काम भी हो जायेगा और हमें नियमों के पालन करने में कोई बाधा भी नहीं आयेगी?

- बहुत बड़ा अफसर है रे तू! सारे नियम तू ही पालन करता है? चल तू भी देख मैं क्या हूॅं.... ... 

...... आधी रात को जब अफसर अपने परिवार के साथ सो रहा था अचानक बिजली गुल हो गई और एक जीप में आठ दस लोग उसके घर पहॅुंचे और अफसर को नींद से जगाकर अपने साथ पकड़कर ले गये, घर के लोग चिल्लाये पर किसी ने नहीं सुना ...  उन लोगों ने मनचाहे पेपर्स पर साइन करा लिये और धमकाया ... कोई होशियारी अर्थात् पुलिस में रिपोर्ट आदि करने की... दिखाई तो समझ लेना आगे क्या हो सकता है। हमारी शक्ति को पहचान लो यदि इस इलाके में रहना है तो?

..... घटना से विक्षिप्त से अफसर ने अपने स्थानान्तर का आवेदन शासन को भेज दिया है।


61 मानव धर्म


जयेन्द्र को अपना मकान बनाते समय अनेक मजदूरोें को रोज बदलना पड़ा। कुछ तो उनके व्यवहार से अधबीच में ही छोड़कर चले जाते और कुछ जो उस दिन किसी प्रकार शाम तक टिके रहते अपना मेहनताना लेकर दूसरे दिन आते ही नहीं। होता यह था कि वह प्रत्येक मजदूर के काम में कुछ न कुछ कभी बता देता और फिर अपशब्द कहकर उन्हें प्रताड़ित करता मजदूरी के पैसे भी काट लेता। एक दिन एक मजदूर जयेन्द्र की अपेक्षा के अनुकूल काम करता रहा और उसकी झिड़की भी सुनता रहा और अगले दिनों भी काम करने आता रहा । अब जयेन्द्र सप्ताह के अंत में उसके मेहनताने का एक दिन का पैसा कम देता ताकि वह बराबर अगले दिन काम पर आ जाया करे। एक माह में काम समाप्त हो गया और उस मजदूर को एक माह में चार दिन की जो मजदूरी कम दी गई थी उसे भुला कर जयेन्द्र ने मजदूर को जाने के लिये कहा। मजदूर ने बिना कुछ कहे अपना रास्ता पकड़ा। जयेन्द्र भी मन में यह सोचकर प्रसन्न था कि इसको मैंने चार दिन के पैसे तो दिये ही नहीं और इसने भी नहीं मांगे, चलो अच्छा ही हुआ।

दो चार माह बाद, जयेन्द्र अपनी कार से कहीं जाते हुए  रेत से भरे एक ट्रक से आगे निकलने के प्रयास में सामने से आ रही जीप से टकरा कर पलट गया और बेहोश हो गया। पास की एक बिल्डिंग में काम कर रहे मजदूर दौड़े जिनमें पूर्व वर्णित मजदूर भी था, और दोनों वाहनों के प्रभावित लोगों को मदद करने लगे । संयोग यह हुआ कि वही मजदूर जयेन्द्र की कार की ओर दौड़ा और बेहोश अवस्था में रहे जयेन्द्र को पहचान कर अन्य लोगों की मदद से उस के घर तक लाया। उपचार के बाद जयेन्द्र और उसके संबंधी तलाशते हुए उस मजदूर के पास आभार व्यक्त करने के लिये आये और उसे पाॅंच पाॅंच सौ रुपये के दो नोट देकर धन्यवाद दिया। 

दोनो नोट लेते हुए मजदूर बोला, महोदय! क्या आपके पास पाॅंच सौ रुपये खुले नहीं हैं? व्यक्ति के साथ आये अन्य संबंधी ने पाॅंच सौ के एक नोट के बदले सौ सौ के पाॅंच नोट दे दिये। मजदूर ने उनमें से तीन सौ रखकर दो सौ रुपये उस व्यक्ति को वापस कर दिये। उस व्यक्ति ने कहा भाई साब! कम लग रहे हों तो और माॅंग लो मैं तो खुशी से दे रहा हॅूं। वह मजदूर बोला महोदय! मेरे पराक्रम के जो रुपये आपकी जेब में थे उन्हीं पर मेरा अधिकार है वे अधिक देर तक आपकी जेब में कैसे रहते, उन्हें तो मेरे पास आना ही था। चार दिन की मजदूरी के आठ सौ रुपये मेरे हैं, वह मेरे पास आ गये, अन्य का मुझे क्या काम?

जयेन्द्र बोला, परंतु तुमने तो मेरी जान बचाई है उसका क्या ? वह मजदूर बोला वह तो मेरा मानव धर्म था।


221 चिंजा की शादी

5 वीं क्लास में पढ़ रहीं स्वभाव से सीधी सादी सहुद्रा और भोली सी चिंजा में गहरी दोस्ती थी। चिंजा की स्पष्टवादिता से क्लास के सभी लड़के लड़किय...