Saturday, September 5, 2020

72 शिक्षा व्यवस्था

 

‘‘नमस्कार सर! क्या मैं आपसे पाॅंच मिनट चर्चा कर सकता हॅूं?‘‘

- ‘‘क्यो‘‘?

- ‘मैं एक रिसर्चस्कालर हॅूं और वर्तमान शिक्षा की दुर्दशा पर अध्ययन कर रहा हॅू।‘

-‘ बोलो क्या कहना चाहते हो?‘

- ‘‘सर! आप तो अपने जमाने के प्रभावी और प्रतिष्ठित अध्यापक रहे हैं, क्या बता सकते हैं कि वर्तमान में शिक्षा की दुर्दशा के लिये इनमें से उत्तरदायी कौन है, ‘‘शिक्षा व्यवस्था,‘‘ ‘‘शिक्षक,‘‘ ‘‘विद्यार्थी‘‘ या ‘‘सरकार‘‘?‘‘

- ‘‘भाई साहब! शायद आपको यह ज्ञात हो कि हमारे जमाने में शिक्षक को ‘पेन‘ ‘‘pen  ’’ और ‘केन’ ‘‘cane ’’ द्वारा ही पहचाना जाता था। अब यह दोनों ही नहीं हैं तो शिक्षा की दुर्दशा तो होगी ही।‘‘

- ‘‘सर ! थोड़ा और स्पष्ट करें ?‘‘

- ‘‘अरे! सीधी सी बात है,‘केन‘ (अर्थात् अनुशासन) सरकार ने छुड़ा लिया और ‘पेन‘ (अर्थात् ज्ञान) शिक्षक ने स्वयं छोड़ दिया, बस, यही है तुम्हारी थीसिस का सार, जाओ लिख डालो, सर्वे में व्यर्थ क्यों भटकते हो?‘‘




 71 चुनाव 

 नयी नगरपालिका घोषित किये गये इस क्षेत्र में वार्ड मेंम्बर और अध्यक्ष के चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों में प्रतिस्पर्धा ऐंसी है जैसे वे लोक सभा या विधान सभा का चुनाव लड़ रहे हों। गाड़ियों पर हो हल्ला करते, जोर जोर से गाने बजाते और लाउडस्पीकर से वोट माॅंगने का प्रचार करते दिनरात जुटे हैं।

हमारे पड़ोस में रहने वाले कुरेषी जी की लगभग अस्सी वर्ष आयु की माता जी को इस शोरगुल से कष्ट पहॅुंचा तो चिल्लाने वाले प्रचारक से बोलीं, भैया धीमें बोलो हमारी तबियत ठीक नहीं है, वह बोला कोई बात नहीं हम दूर चले जाते हैं पर बोट का ध्यान रखना हमें ही देना। 

थोड़ी देर में दूसरा प्रचारक आया और उनके घर के सामने खड़े होकर जोर जोर से गाने बजाता और बोट देने के लिये नारे लगाने लगा। माताजी से फिर नहीं रहा गया, वे आकर फिर से बोलीं भैया क्यों बार बार चिल्लाते हो एक बार समझाने से समझ में क्यांे नहीं आता? प्रचारक बोला, अम्माजी ! आपके मुल्ला जी तो रोज ही इससे भी ज्यादा जोर से दिन में अनेक बार कभी भी चिल्लाने लगते हैं तब हम लोग तो कुछ नहीं कहते, दो तीन दिन की तो बात है हम लोग फिर पाॅंच साल बाद ही चिल्ला पायेंगे, कुछ सब्र कर लो? अम्मा जी बोलीं वे तो अल्ला का नाम लेते हैं तुम लोग तो केवल हल्ला करते हो, हमें तकलीफ होती है यहाॅं से जाओ। 

वह हल्ला करते चला गया परंतु एक घंटे बाद तीसरा आया, फिर से वही वार्ता, कोई प्रभाव पड़ते न देख उनकी बहु ने पुलिस को फोन लगाया और शिकायत की कि चुनाव वाले बड़ा हल्ला गुल्ला कर रहे हैं, मना करने पर लड़ने को तैयार हो जाते हैं, कुछ उपाय कीजिये यहाॅं मरीज लोग रहते हैं। पुलिस वाले का उत्तर था, मेडम चुनाव का माहौल है हम किस किस का मुंह बंद करें , दो तीन दिन की ही तो बात है हमारी सलाह है कि हल्ला होते वक्त आप लोग ही अपने कान बंद कर लें, और फोन रख दिया ।

अभी अभी अम्मा जी को जिला अस्पताल की आईसीसीयू में भरती कराया गया है, डाक्टरों के अनुसार उन्हें दस दिन तक वहाॅं रहना पड़ेगा। 


70 हमारी जमीन

 70 हमारी जमीन

‘‘ जगदीश ! दो बजे तक इतनी दीवार बनाकर इस मजदूर के साथ दीनदयालनगर की साइट पर पहॅुच जाना और गंगाराम! तुम इस बीम और कालम को भर कर उन दोनों मजदूरों को लेकर अंकुर कालोनी पहुंचना समझे ? दो बजे तक इतना काम पूरा हो जाना चाहिये ?‘‘ 

(जगदीश और गंगाराम  ठेकेदार के बंधुआ मजदूर हैं जिनसे वह मजदूर और मिस्त्री, अंगरक्षक और चपरासी सभी तरह का काम लेता है, जब जितना काम कहा जाता है उसे करना ही पड़ता है उन्हें।)

ठेकेदार के चले जाने के बाद अन्य मजदूर बड़बड़ाने लगे-

‘‘एक जगह कहीं भी लगातार काम नही कर पाते, फिर यहाॅं दौड़ो, वहाॅं दौड़ो, जहाॅं जाओ वहीं डाॅंट खाओ कि कितनी देर कर दी , आने जाने में क्या समय नहीं लगता,  मजदूरी के नाम पर सबसे कम देंगे, काम सबसे अधिक करायेंगे, .... ..   ‘‘  

‘‘गुस्सा तो मुझे भी बहुत आता है पर क्या करें सब सुन कर रह जाते हैं, इस बार पानी नहीं बरसा, फसल नहीं हुई, हमारी तो सात एकड़ जमीन है खूब पैदावार हो जाती है , पर क्या करें सोयावीन भी नहीं हुआ और गेंहॅंू भी नहीं, इसीलिये इनकी बातें सुनकर यहाॅं से वहाॅं दौड़ रहे हैं।‘‘ 

(अन्य मजदूर भी इसी तरह बातें करते और अपना अपना काम करते जा रहे थे।)

 सुनते सुनते गहरी साॅंस लेते हुए जगदीश बोला, भैया! हमारी जमीन तो ‘बाबू’ अर्थात् ठेकेदार ही हैं वही हमें काम देते रहते हैं, जरूरत पड़ने पर उधार पैसे भी दे देते हैं, कोई झंझट हो तो मदद करते हैं, इसलिये चाहे जो करना पड़े हम तो करते रहते हैं इसमें भला बुरा क्या मानना? यदि तुम लोगों की तरह हम भी कहने लगें तो कल से ही भूखे रहना पड़ेगा, रोज रोज काम  मिलता ही कहाॅं है?.....


69 ब्रिंग ब्रिंग टेलेंट

 


  - पापा, पापा! ‘ वहाॅं गुप्ता अंकल से कुछ लोग झगड़ रहें हैं, गणेशजी का चंदा मांग रहे हैं। कहते हैं 100 रुपयों की रसीद ही लेना पड़ेगी, हल्दी में पीली मिट्टी और काली मिर्च में पपीते के बीज मिलाते हो और गनेश जी के नाम पर दस रुपये दिखाते हो? ‘

- ‘‘वे लोग अभी किस ओर गये हैं पिन्टू ? जरा नजर रखना , अपने घर की ओर आयें तो तत्काल बताना।‘‘

- ‘ देखो जी! तुम तो उन्हें, जो कुछ माॅंगे दे देना 100 रुपयों के पीछे झगड़ा क्यों करना,‘ श्रीमती सकसेना ने पिन्टू के पापा को समझाइस दी।

- ‘‘ तुम धीरज तो रखो.‘‘...  सकसेना जी ने मोर्चा सम्हाला। पिंटू की कामेंन्ट्री जारी रही....

- ‘‘माॅं! अभी वे लोग पान्डे अंकल के घर पर हैं शायद उन से भी बहस हो रही है, अब वे अपनी ओर ही मुड़ रहे हैं, दो तीन मिनट में आ ही जायेंगे यहाॅ, कहो तो पापा को बुला लॅूं? 

- ‘‘ठीक है।‘‘

- ‘‘पापा! वे लोग आने वाले ही हैं ‘‘

- ‘‘अच्छा, जब वे लोग आ जायें और मुझे बुलाने को कहें तो तुम वहीं से आवाज लगाते रहना जब तक मैं आ न जाऊं।‘‘

- पापा ! ....पापा! .... पापा! ....पापा!..........  ...... .....

............ इतने में सकसेना जी ने अपने आंगन में गणेशजी की मूर्ति सजा ली और पुरानी रसीद बंदी लेकर चंदा मांगने वालों के पास पहुंचे..........

- ‘नमस्कार भाइयो! अच्छा हुआ आपलोग यहीं मिल गये, मैं तो आपके पास ही आ रहा था।‘

- ‘‘ तो निकालो झटपट 100 रुपये? यह लो रसीद‘‘ वे लोग बोले ।

- ‘‘ हें....हें..... हें .... मित्रो, हमने भी अपने आंगन में गणेश जी का सिंहासन लगाया है दर्शन तो कर लो ‘‘

- आओ.... आओ देखो , क्या सुन्दर झांकी है। हाॅं, अपनी अपनी श्रद्धा के अनुसार चढ़ावा  

भी चढ़ाते जाना, बस कम से कम 10 रुपया।

..... चंदा मागने वाले बिना चंदा लिये दिये उल्टे पाॅंव वापस भागे, उनमें से कुछ कहते जा रहे थे , ये ब्रिंग ब्रिंग ;‘‘अर्थात् लाला’’ तो बड़ा तिकड़मबाज निकला..


68 चलते हैं...

 

‘‘ जा...  रहे हो??.. यह भी कोई बात हुई?’’

‘‘क्यों ? मैं तो जाने के लिये ही आया था।’’

‘‘ इतनी जल्दी क्या है?’’

‘‘जल्दी ? पेंतालीस वर्ष हो चुके हैं साथ साथ चलते ?’’

‘‘ तुम भी ! क्या व्यर्थ की बातें करते हो?’’

‘‘ तुमने सत्य कहा, प्रकृति के द्वारा मुफ्त में मिली चीजें महत्वहीन लगती हैं और जिन्हें हम अपने पराक्रम से अर्जित करते हें वे मूल्यवान।’’

‘‘ तुम्हारी यह फिलासफी समझ से परे है?’’

‘‘ अरे! समय और स्थान से बंधे ‘हम’ इनकी गतिशीलता  पर कभी ध्यान ही नहीं देते, सोचते हैं वे तो स्थिर हैं हमारे साथ हमेशा   हैं। जबकि प्रत्येक ‘क्षण’ हमारे हाथों से फिसलता जा रहा है, वैसे ही, देखो ! जैसे ट्रेन आगे बढ़ती जा रही है स्थान पीछे हटते जा रहे हैं। नया स्टेशन आने वाला है, वहाॅं से अब इस बर्थ पर किसी और की पात्रता है।

‘‘ लेकिन मैं अकेली...?’’

‘‘ परमपिता की अंतरंगता का अनुभव करो, कोई भी, कभी भी, अकेला नहीं है . .

....देखो! स्टेशन आ गया, 

अच्छा.... तो..... हम.... च...ल...ते... हैं... ... ..! ! ! ’’


67 चाणक्य


"कौटिल्य"  अर्थात  चाणक्य से मिलने आये एक विद्वान ने उनसे पूछा .

"आपके कितने बँधु  बांधव हैं और वे कहाँ रहते  हैं?"

चाणक्य बोले," छह बंधु बांधव हैं और वे मेरे साथ ही रहते हैं। "

विद्वान ने फिर कहा ," यहाँ तो  छह हाथ लम्बी और छह हाथ चौड़ी झोपड़ी ही दिखाई दे रही है वे सब कहाँ है ?

 परिचय  तो कराओ ?"

चाणक्य बोले ,

"सत्यम  माता पिता ज्ञानं बुद्धिर्भ्राता  दया सखा 

शांतिः पत्नी क्षमा पुत्रो षष्ठेते मम बान्धवा। "


अर्थात सत्य मेरी माता हैं, पिता ज्ञान हैं, बुद्धि भाई और दया सखा हैं,  शांति पत्नी और क्षमा पुत्र है,  यही मेरे छह बांधव हैं।  


विद्वान महोदय ,  साधो! साधो! साधो! कहते अश्रुपात करते रहे।  


Wednesday, September 2, 2020

66 पतिव्रता

 66 पतिव्रता

जोधन सिंह अपने लापरवाह परंतु ग्रेजुएट पुत्र को एक दिन अपने पास वैठा कर बड़े प्रेम से समझा रहे थे-

-" देखो निरंजन! पहला सुख, निरोगी काया । दूसरा सुख, घर में माया । तीसरा सुख, पतिव्रता नारी । 

4था सुख, सुत.... आज्ञाकारी.... "

" उनके, यह वाक्य पूरा बोलने से पहले ही निरंजन बोल पड़ा..."

- पिताजी! मैंने तो पढ़ा है कि प्रत्येक मनुष्य की दो पतिव्रतायें होती हैं जो जन्म से मृत्यु तक उसका साथ निभाती है फिर आप केवल एक मानकर उनको तीसरा नम्बर क्यों दे रहे हैं ? उन्हें तो पहले स्थान पर होना चाहिये ?

- किस प्रकार?

- अरे ! एक ‘आशा‘ जो हमेशा आगे आगे चलती है और दूसरी ‘दुर्दशा‘ जो हमेशा पीछे पीछे चलती है।

- अरे सौभाग्यवती ! ! जरा देखो , तुम्हारा सुपुत्र क्या पढ़ रहा है! ! !

- पिताजी ! माॅं को बीच में क्यों लाते हो..., शास्त्र कहते हैं कि, 

‘‘ सर्वासामेव नारीणाॅं नार्ये द्वेति पतिव्रते, ‘आशा‘ मे पुरतो याति ‘दुर्दशा‘ याति पृष्ठतः‘‘

 मैं तो वही कह रहा हॅूं.... ।


65 विद्यार्थी

 65 विद्यार्थी

- मे आइ कम इन सर! ... एक प्राइवेट संस्था के प्राचार्य कक्ष में प्रवेश करते समय लड़के ने पूछा।

- नो, अभी नहीं, बाहर बैठो, थोड़ी देर में आ सकते हो।

- अरे सर!! मुझे अपने भाई का मोबाइल चाहिये है वह दे दो , और कोई काम नहीं है...

- कहा न!  अभी गेस्ट बैठे हैं, थोड़ी देर बाद मिलना।

- सीधी तरह देते हो या नहीं ? हमें दूसरे उपाय भी आते हैं? ?

प्राचार्य मुस्कुराये, पूछा, तुम किस स्कूल में , किस कक्षा में पढ़ते हो? अपने से बड़ों के साथ किस प्रकार बात की जाती है? क्या वहाॅं यही सिखाया गया है?

लड़का झुका और प्राचार्य के पैर छूकर कहने लगा, सरकारी स्कूल की कक्षा नवमी में पढ़ता हॅूं, सर! क्षमा कर दो, इस स्कूल की छठवीं कक्षा में पढ़ने वाला मेरा छोटा भाई कल कक्षा में मोबाइल लाया था जिसे आपने जब्त कर लिया है वही लेने आया हूॅं।

- मोबाइल मेरे पास सुरक्षित है अपनी माता या पिता में से कोई भी आकर उसे ले जा सकता है,उन्हें लिख कर देना होगा कि अब वह कक्षा में मोबाइल नहीं लायेगा।

- तो अब हमें दूसरे उपाय ही करना होंगे... कहते हुए लड़का बाहर चला गया।

थोड़ी देर में वह अतिथि प्राचार्य कक्ष से बाहर आये , वह लड़का उनके पास जाकर बोला सर! आप ही प्राचार्य जी से कह दीजिये कि वह मेरे भाई का मोबाइल वापस कर दें? अतिथि ने पूछा कि माता या पिता क्यों नहीं आ सकते, वह बहाने बनाने लगा, अतिथि ने कहा तुम लगातार झूठ का सहारा ले रहे हो, इसलिये तुम्हें अपने पेरेंट्स को ही लाना पड़ेगा, तुम्हें मैं कोई मदद नहीं कर सकता।

- ठीक है तो हमें अब अन्य उपाय करना ही होंगे... कहते हुए लड़का बाजू वाली गली में गुम हो गया।


221 चिंजा की शादी

5 वीं क्लास में पढ़ रहीं स्वभाव से सीधी सादी सहुद्रा और भोली सी चिंजा में गहरी दोस्ती थी। चिंजा की स्पष्टवादिता से क्लास के सभी लड़के लड़किय...