70 हमारी जमीन
‘‘ जगदीश ! दो बजे तक इतनी दीवार बनाकर इस मजदूर के साथ दीनदयालनगर की साइट पर पहॅुच जाना और गंगाराम! तुम इस बीम और कालम को भर कर उन दोनों मजदूरों को लेकर अंकुर कालोनी पहुंचना समझे ? दो बजे तक इतना काम पूरा हो जाना चाहिये ?‘‘
(जगदीश और गंगाराम ठेकेदार के बंधुआ मजदूर हैं जिनसे वह मजदूर और मिस्त्री, अंगरक्षक और चपरासी सभी तरह का काम लेता है, जब जितना काम कहा जाता है उसे करना ही पड़ता है उन्हें।)
ठेकेदार के चले जाने के बाद अन्य मजदूर बड़बड़ाने लगे-
‘‘एक जगह कहीं भी लगातार काम नही कर पाते, फिर यहाॅं दौड़ो, वहाॅं दौड़ो, जहाॅं जाओ वहीं डाॅंट खाओ कि कितनी देर कर दी , आने जाने में क्या समय नहीं लगता, मजदूरी के नाम पर सबसे कम देंगे, काम सबसे अधिक करायेंगे, .... .. ‘‘
‘‘गुस्सा तो मुझे भी बहुत आता है पर क्या करें सब सुन कर रह जाते हैं, इस बार पानी नहीं बरसा, फसल नहीं हुई, हमारी तो सात एकड़ जमीन है खूब पैदावार हो जाती है , पर क्या करें सोयावीन भी नहीं हुआ और गेंहॅंू भी नहीं, इसीलिये इनकी बातें सुनकर यहाॅं से वहाॅं दौड़ रहे हैं।‘‘
(अन्य मजदूर भी इसी तरह बातें करते और अपना अपना काम करते जा रहे थे।)
सुनते सुनते गहरी साॅंस लेते हुए जगदीश बोला, भैया! हमारी जमीन तो ‘बाबू’ अर्थात् ठेकेदार ही हैं वही हमें काम देते रहते हैं, जरूरत पड़ने पर उधार पैसे भी दे देते हैं, कोई झंझट हो तो मदद करते हैं, इसलिये चाहे जो करना पड़े हम तो करते रहते हैं इसमें भला बुरा क्या मानना? यदि तुम लोगों की तरह हम भी कहने लगें तो कल से ही भूखे रहना पड़ेगा, रोज रोज काम मिलता ही कहाॅं है?.....
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