- पापा, पापा! ‘ वहाॅं गुप्ता अंकल से कुछ लोग झगड़ रहें हैं, गणेशजी का चंदा मांग रहे हैं। कहते हैं 100 रुपयों की रसीद ही लेना पड़ेगी, हल्दी में पीली मिट्टी और काली मिर्च में पपीते के बीज मिलाते हो और गनेश जी के नाम पर दस रुपये दिखाते हो? ‘
- ‘‘वे लोग अभी किस ओर गये हैं पिन्टू ? जरा नजर रखना , अपने घर की ओर आयें तो तत्काल बताना।‘‘
- ‘ देखो जी! तुम तो उन्हें, जो कुछ माॅंगे दे देना 100 रुपयों के पीछे झगड़ा क्यों करना,‘ श्रीमती सकसेना ने पिन्टू के पापा को समझाइस दी।
- ‘‘ तुम धीरज तो रखो.‘‘... सकसेना जी ने मोर्चा सम्हाला। पिंटू की कामेंन्ट्री जारी रही....
- ‘‘माॅं! अभी वे लोग पान्डे अंकल के घर पर हैं शायद उन से भी बहस हो रही है, अब वे अपनी ओर ही मुड़ रहे हैं, दो तीन मिनट में आ ही जायेंगे यहाॅ, कहो तो पापा को बुला लॅूं?
- ‘‘ठीक है।‘‘
- ‘‘पापा! वे लोग आने वाले ही हैं ‘‘
- ‘‘अच्छा, जब वे लोग आ जायें और मुझे बुलाने को कहें तो तुम वहीं से आवाज लगाते रहना जब तक मैं आ न जाऊं।‘‘
- पापा ! ....पापा! .... पापा! ....पापा!.......... ...... .....
............ इतने में सकसेना जी ने अपने आंगन में गणेशजी की मूर्ति सजा ली और पुरानी रसीद बंदी लेकर चंदा मांगने वालों के पास पहुंचे..........
- ‘नमस्कार भाइयो! अच्छा हुआ आपलोग यहीं मिल गये, मैं तो आपके पास ही आ रहा था।‘
- ‘‘ तो निकालो झटपट 100 रुपये? यह लो रसीद‘‘ वे लोग बोले ।
- ‘‘ हें....हें..... हें .... मित्रो, हमने भी अपने आंगन में गणेश जी का सिंहासन लगाया है दर्शन तो कर लो ‘‘
- आओ.... आओ देखो , क्या सुन्दर झांकी है। हाॅं, अपनी अपनी श्रद्धा के अनुसार चढ़ावा
भी चढ़ाते जाना, बस कम से कम 10 रुपया।
..... चंदा मागने वाले बिना चंदा लिये दिये उल्टे पाॅंव वापस भागे, उनमें से कुछ कहते जा रहे थे , ये ब्रिंग ब्रिंग ;‘‘अर्थात् लाला’’ तो बड़ा तिकड़मबाज निकला..
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