Saturday, September 12, 2020

100 कन्यादान


‘‘ क्यों रागिनी! सुना है तुम, महिलाओं पर कोई रिसर्च कर रही हो? कहाॅं तक काम हो गया?‘‘ 

‘‘ जी हाॅं अंकल, ‘वर्तमान भारतीय समाज में महिलाओं की विवाहोत्तर स्थिति‘ पर काम कर रही हॅूं।‘‘ 

‘‘ अरे वाह! बढ़िया टापिक है, कितना काम हो गया?‘‘

‘‘ पूरा ही हो गया है अंकल, कुछ दिनों में थीसिस की टाइपिंग पूरी होने वाली है, बस फिर सबमिट कर देंगे।‘‘

‘‘ बहुत अच्छा! रिसर्च के कुछ परिणाम हमें अभी बता सकती हो या थीसिस जमा होने के बाद ही कहोगी?‘‘

‘‘ क्यों नहीं, मैं ने पाया है कि परंपरागत विवाहों में महिला को हारी हुई पार्टी का सदस्य माना जाता है, अनेक स्थानों पर उसके परिवार के सदस्यों को वैवाहिक कार्यक्रमों में अपमानित किया जाता है और महिला को पूरे कार्यक्रम में स्वतंत्रता नहीं दी जाती। उनका ‘कन्यादान‘ किया जाता है जैसे वे उपहार हों। कई स्थानों पर तो उनके भविष्य की कोई सुरक्षा नहीं होती, पुरुष महिला को मामूली धन देकर विवाह को विच्छेदित कर लेता है और महिला अपने को भौतिक रूप से कमजोर  और  अशिक्षित मानकर सिर झुकाये यह सब अन्याय सहन करती है।‘‘ 

‘‘ तो तुमने इसका कारण क्या बताया है और इसे दूर करने का क्या उपाय सुझाया है?‘‘

‘‘ मेरे विचार से महिलाओं के साथ अव्यवस्थायें, शोषण, क्रूर व्यवहार और झगड़े होने के लिये अब परंपरागत शादियों में ‘‘कन्यादान‘‘ शब्द ही अधिक घातक हो गया है। इसका अर्थ अब वैसा ही लगाया जाता है जैसे महिलायें कोई भौतिक उपयोग में आने वाली वस्तुएं जैसे गाय, कपड़े या अन्य पदार्थ हों, जिन्हें उपहार में दिया जाना हो। जब तक महिलायें साहस और बुद्धि से काम न लेंगी तब तक उनके साथ गुलामों की तरह व्यवहार होता रहेगा। उन्हें सोचना चाहिये कि वे कपड़ों का बंडल नहीं हैं जिसे धोबी के घर भेजा जाना है। महिलाओं का दमन रोकना होगा और समाज में पुरुषों की प्रधानता को कम करते हुए ‘विवाह‘ को परस्पर सहयोगी सामाजिक व्यवस्था का अंग बनाना होगा जिसे कोआर्डीनेटेड कोआपरेटिव लीडरशिप ,(co-ordinated co-operative leadership)  कह सकते हैं।‘‘ 


99 तस्वीर


‘‘ हाॅं, बताओ छात्रो! कल क्या होमवर्क दिया गया था?‘‘

‘‘ सर! आपने, बलों के त्रिभुज नियम पर आधारित उदाहरण लिख कर लाने को कहा था ।‘‘

‘‘ अच्छा, राकेश! तुमने क्या लिखा, पढ़कर बताओ?‘‘

‘‘ सर! दीवार पर टंगी तस्वीर बलों के त्रिभुज नियम के आधार पर ही संतुलित रह पाती है, दो बल रस्सियों में लगने वाले तनाव से प्रकट होते हैं और तीसरा दीवार में से अदृश्य रूप में सक्रिय रहकर इन दोनों को संतुलित कर लेता है और तस्वीर टंगी रहती है।‘‘

‘‘ सर! इसने तो पुस्तक की नकल कर ली है, मैंने इसकी व्याख्या दूसरे प्रकार से की है।‘‘

‘‘ बहुत अच्छा, विनोद! सुनाओ तुमने क्या लिखा है?‘‘

‘‘ सर! हमारे देश   की तस्वीर क्रिकेट, फिल्में और राजनीति इन तीनों बलों से संतुलित रहती है जिनमें फिल्में और क्रिकेट ये दोनों बल तो लगते हुए सक्रिय दिखाई देते हैं पर तीसरा अदृश्य बल राजनीति, इन दोनों के बीच में सक्रिय रहकर संतुलन स्थापित करता रहता है।‘‘


98 आलोचक


‘‘ कल सिटी में एक पान के टपरे पर आपके आफिस के कुछ लोग आपकी बहुत बुराई कर रहे थे। मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगा, पर उतनी देर तक तो सब कुछ सुनना ही पड़ा जब तक पान खरीद रहा था।‘‘

‘‘ लेकिन मैं ने तो कभी उनका कुछ अच्छा किया ही नहीं, तो फिर वे लोग क्यों बुराई कर रहे थे? बड़ा आष्चर्य है।‘‘

‘‘ क्या मतलब? आपने कुछ भी अच्छा नहीं किया?‘‘

‘‘ हाॅं, संसार का नियम है न ? कि अच्छा करो तो बुरा मिलता है, इसीलिये कह रहा हॅूं।‘‘

‘‘ नहीं! मैं ने कानों से सुना है, आपको उनके विरुद्ध कार्यवाही करना चाहिये, आखिर यह आपकी कर्तव्यनिष्ठा और प्रतिष्ठा की बात है।‘‘

‘‘ यदि मैं उन लोगों पर बहुत अधिक ध्यान देता हॅूं जो मेरी तारीफ करते हैं या निंदा करते हैं तो मैं अपना वास्तविक काम नहीं कर पाऊंगा। चॅंूकि मैं यहाॅं बहुत कम समय के लिये आया हॅूं इसलिये मैं समझता हॅूं, मुझे केवल उस काम पर ध्यान देना चाहिये जो करने के लिये ईश्वर ने मुझे भेजा है।‘‘

‘‘अरे ! वह तो ठीक है पर अपनी पोजीशन का भी तो.... ‘‘

‘‘ भाईसाब! मैं तो केवल यह जानता हॅूं कि अपने निर्धारित कार्य को करते हुए मुझे यह ध्यान रखना चाहिये कि मैं परमसत्ता से संबंधित हॅूं और उन्हीं से आया हॅूं तथा वापस उन्हीं के पास जाना हैे अतः अपना काम पूरी गुणवत्ता के साथ जल्दी ही सम्पन्न कर लेना चाहिये, चाहेे कोई बुराई करे या प्रशंसा ।‘‘


97 पिंडदान


‘‘ ओह, दीनू! बड़े ही दुख की बात है कि मेरे सबसे अच्छे मित्र और तुम्हारे पिता जी असमय ही चले गये, अब परिवार में सबसे बड़े होने के कारण तुम पर ही जिम्मेवारी आ गयी है, हमारी जरूरत हो तो निःसंकोच बताना‘‘ ।

‘‘ परिवार की देखरेख तो बाद की बात है ठाकुर चाचाजी! अभी तो त्रयोदषी और पिंडदान के कार्य को सम्पन्न करने में ही कठिनाई जा रही है।‘‘

‘‘क्यों? क्या बात है, किस प्रकार की कठिनाई जा रही है?‘‘

‘‘ परिवार के बुजुर्गो और अन्य रिश्तेदारों का कहना है कि इसमें पूरे गाॅंव के अधिक से अधिक लोगों को भोजन कराना पड़ता है, और पूजन कराने के लिये पंडित जी के अनुसार स्वर्ग में नन्दनवन के भीतर लगे पारिजात बृक्ष के नीचे तक मृत आत्मा को पहुंचाने की दक्षिणा पाॅंच हजार रुपये, स्वर्ग के गेट के बाहर तक पहुंचाने के तीन हजार रुपये और गेट से पच्चीस किलोमीटर दूर छोड़ने के एक हजार रुपये लगेंगे। बस इन्हीं बातों ने समस्या बना दी है।‘‘

‘‘ अरे! तुम भी किस जमाने में रहते हो? मृत्युभोज पूरे गाॅंव के लोगों को देने का कोई विधान नहीं है, अपनी श्रद्धा और सामथ्र्य के अनुसार ही इसे करना चाहिये, इसकी भी अनिवार्यता नहीं है।‘‘

‘‘ यह तो मैं समझता हॅूं पर घर के बुजुर्गो को समझाना बड़ा कठिन है, वे सब तो इन पंडितों के कहे अनुसार ही चलते हैं‘‘

‘‘ देखो भाई! मेरे विचार से तो अपने सामथ्र्य से बाहर कोई भी काम नहीं करना चाहिये, तुम तो साइंस के विद्यार्थी हो, स्वर्ग नर्क की बातों में क्यों भ्रमित होते हो? सोचो, उन्हें भोजन कराने का क्या अर्थ है जो दिन में तीन बार खाते हैं, अच्छा तो यह होगा कि गाॅंव के सबसे गरीब तेरह लोगों को भोजन करा दो और पंडित जी से कहो कि हमारे पिताजी पच्चीस नहीं पचास किलोमीटर पैदल चल कर वहाॅं पहुंच जायेंगे, बस इतनी पूजा करने की जो दक्षिणा वे कहें सो दे देना। रुपयों पैसों की जितनी आवश्यकता हो मुझसे ले लेना, चिंता न करना। बुजुर्गो को मैं भी समझाने का प्रयत्न करूंगा, मैं तुम्हारे साथ हॅूं।‘‘

‘‘ ठाकुर चाचा! मुझे तो लग रहा है कि जैसे साक्षात मेरे पिता ही आपके रूप में आकर मेरे मन का बोझ उतार रहे हैं, उनकी भी इसी प्रकार की विचारधारा थी। ‘‘

‘‘ बिलकुल। हमलोग स्कूल में साथ पढ़ते समय अपने षिक्षकों से इन विंदुओं पर खूब बहस किया करते थे और अपने तर्कों से सभी को सहमत कर लिया करते थे। एक बात और ध्यान रखना, संस्कृत में कही गई हर बात वेदवाक्य नहीं होती, पंडित लोग जो संस्कृत के कुछ ष्लोक सुनाकर पूजा सम्पन्न कराते हैं यदि उनके अर्थ के अनुसार भावनायें न हों तो उसका कोई प्रभाव नहीं होता। इस अवसर पर की जाने वाली पूजा के मंत्रों का सार यह होता है कि हे प्रभो! जबतक यह आत्मा हमारे साथ थी तब तक हमने यथाशक्ति उसकी सेवा की परंतु अब वह अपके आधीन और नियंत्रण में है, अब उस पर अपनी कृपादृष्टि बनाये रखना। इसलिये इस प्रकार की भावना से ही सभी कर्म सम्पन्न करना, यही असली पिंडदान है, अन्य सब तो कर्मकाॅंडीय प्रदर्शन ही है।‘‘


96 कुंठित महात्वाकाॅंक्षा


‘‘ क्यों संजय! जानते हो, एक समय था जब परीक्षाओं को उत्सव की तरह माना जाता था। फिर, परीक्षा में पास हो जाने वाले उत्सव और फेल होने वाले दुख मनाने लगे। इसके बाद परीक्षाओं में फेल होने वाले आत्महत्या करने लगे। पर, अब तो विचित्र जमाना आ गया है, परीक्षा देने से पहले ही छात्र आत्महत्या करने लगे हैं?‘‘

‘‘ हाॅं सुशील! बात तो तुमने सही पकड़ी है यार ! पता नहीं इन छात्रों को कौन इतना भयभीत कर देता है कि वे परिणाम की प्रतीक्षा करने के पहले ही जीवन समाप्त करने लगे हैं, जैसे मेरिट में न आ पाना या किसी विषय में कमजोर होना, या परीक्षा में फेल हो जाना कोई गंभीर अपराध होता हो।‘‘

‘‘ मेरे विचार से तो इसमें बच्चों की तुलना में उनके माता पिता का ही अधिक दोष होता है जो अपनी संतान से उनकी बौद्धिक क्षमताओं और अभिरुचियों का विश्लेषण किये बिना ही अपनी उन अपेक्षाओं को मूर्तरूप देने के सपने देखने लगते हैं जो उनसे स्वयं कभी पूरी नहीं हो सकीं ।‘‘ 

‘‘ हाॅं, यही मुझे भी लगता है, क्योंकि बोर्ड या यूनीवर्सिटी की परीक्षाओं में मेरिट पाना या बहुत अधिक प्राप्ताकों का आना अब उतना विश्वसनीय नहीं रह गया जितना कभी माना जाता था। इसके अनेक उदाहरण तब देखने को मिलते हैं जब किसी प्रतियोगी परीक्षा के परिणाम में बोर्ड/विश्वविद्यालय की परीक्षा के मेरिट होल्डर प्रारंभिक परीक्षा में भी पास नहीं हो पाते जबकि सामान्य प्रथम श्रेणी लाने वाले अंतिम रूपसे चयनित हो जाते हैं।‘‘

‘‘ अरे! क्या तुमने देखा नहीं, इस पास फेल और मेरिट के चक्कर में नकल करने और कराने की प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है, मूल्याॅंकन का कार्य  अपात्रों के द्वारा कराया जाने लगा है, इतना ही नहीं नकल कराने, पास कराने, मेरिट दिलानें के ठेकेदारों का व्यवसाय भी जोरशोर से चलने लगा है।‘‘

 ‘‘ अच्छा ये बताओ कि यूपीएससी या पीएससी की परीक्षाओं में परीक्षार्थी नकल क्यों नहीं कर पाते? उन परीक्षाओं का मूल्याॅंकन विश्वसनीय क्यों माना जाता है? क्या बोर्ड और यूनीवर्सिटीज की परीक्षाओं तथा मूल्याॅंकन कार्य को इनकी तरह ही विश्वसनीय नहीं बनाया जा सकता? हम ज्ञान और कौशल केन्द्रित अध्ययन/अध्यापन का लक्ष्य छोड़कर केवल पास होने के लिये कब तक पढ़ते पढ़ाते रहेंगे? क्या इस प्रकार हम केवल साक्षर बेरोजगारों की भीड़ में लगातार बृद्धि नहीं करते जा रहेे?‘‘


95 साथी


 मुहल्ले वालों ने अनेक वर्षों से किसी को न तो शर्मा जी के घर जाते देखा और न ही उन्हें किसी के साथ कभी कहीं भी आते जाते। वह अकेले ही अपने घर में रहते और प्रतिदिन प्रातःकालीन भ्रमण के लिये अवष्य 6 से 7 वजे के बीच मुहल्ले की ही सड़कों पर अकेले ही धीरे धीरे घूम कर अपने घर आ जाते। पड़ौसी उन्हें आदर से नमस्कार करते तो वे अपनी लाठी सहित दोनों हाथ जोड़कर उन्हें अपने मस्तक तक अंगूठों को छूने की स्थिति तक ले जाते और फिर हृदय के पास लाकर आगे की ओर सामान्य से अधिक झुककर प्रत्युत्तर देते। उनका मानना था कि वह  किसी के शरीर को नमस्कार नहीं करते, उसके भीतर स्थित परमपुरुष को अपने मन और हृदय की षुद्धता से उचित मुद्रा के साथ करते हैं। उनकी आयु को ध्यान में रख, उन्हें आदर करने वाले अधिकाॅंष लोग उन्हें सामने जाकर नमस्कार न कर दूर से ही प्रणाम करना उचित समझने लगे ताकि उन्हें अनावश्यक झुकने में कष्ट न हो। एक दिन प्रातः भ्रमण के समय, सामने से आते हुए एक यात्री ने मुहल्ले में किसी का पता पूछने की इच्छा से उन्हें नमस्कार किया। शर्माजी ने अपनी मुद्रा के साथ ज्यों ही लाठी सहित अपने दोनों हाथ जोड़कर प्रत्युत्तर देना चाहा कि उनके पैरों का संतुलन खो गया और वह नीचे गिर पड़े। यात्री ने अपना सामान तत्काल नीचे पटका और उन्हें सहारा देकर उठाते हुए कहने लगा-

‘‘ दादाजी ! इस अवस्था में प्रातः भ्रमण के समय अपने साथ किसी को ले लिया करें, ओह! व्यर्थ ही मेरे कारण आपको कष्ट पहुंचा‘‘

‘‘ नहीं , इसमें आपका कोई दोष नहीं और न ही इस लाठी का, वह तो मेरी ही असावधानी थी कि मैं अपने पैरों को संतुलन में नहीं रख पाया। भाई साब! पिछले सतत्तर सालों से अनेक ‘जीव‘ यथा समय साथ देने आते रहे और क्रमशः जाते रहे, अन्त में यह ‘निर्जीव‘ लकड़ी (अर्थात् लाठी) आयी और, मुझे इसकी निष्ठा पर पूरा विश्वास है कि वह मेरी अंतिम साॅंस तक साथ देगी।‘‘..... ...

कहते कहते शर्माजी आगे चलते गये और यात्री उनकी साधुता, सौम्यता और निद्र्वन्द्वता को मन ही मन प्रणाम करता अपने गन्तव्य की तलाश में आगे बढ़ गया।


94 कथा


‘‘ पंडित जी महाराज! आपकी कथा में लगभग रोज ही इस बात की चर्चा होती है कि वह परमसत्ता परमेश्वर अनन्त है, असीम है अमाप्य है, अद्वितीय है, परंतु कृपा कर यह बतायें कि उसे इन मनुष्यों के द्वारा मंदिरों में कैद कर सीमित स्थान में कैसे बाॅंध दिया जाता है?‘‘

‘‘ यह तो बिलकुल सही है, ‘वह‘ अनन्त है। और, उसे पूरी तरह कोई भी आज तक जान ही नहीं पाया, षास्त्र कहते हैं कि केवल ‘वही‘ अपने आप को पूरी तरह जानते हैं।‘‘

‘‘ वही तो मैं पूछ रहा हॅूं कि अनन्त सत्ता का मंदिर तो उनकी सीमाओं से बड़ा ही होना चाहिये, अन्यथा वे उसके भीतर कैसे बैठ सकेंगे?‘‘

 ‘‘इस बहस में अपना समय और बुद्धि खर्च न करो। हमलोग, ‘उनके‘ लिये क्या मंदिर बनायेंगे जिन्होंने हमें ही नहीं इस समग्र ब्रह्माॅंड को अपनी कल्पना से ही बना रखा है। यह सभी कुछ ‘उनके‘ ही भीतर है। यथार्थतः मंदिर तो उन स्थानों को कहा जाता है जहाॅं पर कुछ देर के लिये सामूहिक रूपसे शान्तिपूर्वक बैठ कर हम  परमार्थ पर चिंतन कर सकें , पारस्परिक इस विषय पर चर्चा कर सकें  कि क्या केवल जन्म से मृत्यु तक ही जीवन सीमित है, या इसके अलावा भी कुछ है?‘‘

‘‘ तो फिर यह देवी देवताओं के अलग अलग अनेक मंदिर, नियम कानून, निषेध, प्रतिरोध, भेदभाव, संघर्ष और तनाव किस कारण से उत्पन्न हुए हैं?‘‘

‘‘ यह सब, सच्चाई से दूर रहने वाले स्वार्थी तत्वों द्वारा अच्छी तरह बनाया गया व्यवसाय है जो अपनी अलग अलग आभासी दुनिया के निर्माण में दिन रात लगे हैं।‘‘


93 युगपुरुष


‘‘ क्या हुआ? दो दिन से देख रही हॅूं तुम न्यूजपेपर लेकर थोड़ी देर में उदास होकर बैठ जाते हो?‘‘

‘‘ अरे, परसों अनाथालय को एक हजार रुपया दान में दिया था, पेपर वालों ने फोटो भी लिया था, पर अभी तक समचार पत्र में छापा नहीं है।‘‘ 

‘‘ अब समझी, दानवीर बनने के चक्कर में दो दिन से नींद नहीं आ रही?‘

‘‘ तुम्हें तो मेरा मजाक उड़ाने के अलावा कुछ नहीं सूझता ।‘‘

‘‘ नहीं तो और क्या कहॅूं? दान दे दिया बस भूल जाओ, अब यह क्या सोचना कि पेपर वाले नाम और फोटो छापकर दानवीर घोषित करते हैं कि नहीं?‘‘

‘‘ तुम से तो कोई जीत ही नहीं सकता‘‘

‘‘जीतने और पेपरों में छाये रहने वाले लम्बे खेल खेलते हैं, देखा नहीं चोट्टामल खोट्टामल घपलानी ने राजनैतिक पार्टी को पाॅंच लाख रुपये चंदा देकर अगले चुनाव के लिये विधायक का टिकिट बुक करा लिया है। चुनाव में भी इतने ही खर्च कर जीत जायेगा और फिर पाॅंच साल में करोड़ों कमायेगा, मान, यश प्रतिष्ठा और जीवन भर की पेंशन पायेगा वह अलग।‘‘

‘‘ इस राजनीति के पचड़े में पड़ना ही बेकार है, अपना तो छोटा मोटा धंधा ही ठीक है, मन की शाॅंति तो रहती है। मैंने तो इनकम टेक्स में रिवेट पाने के लिये ही दान दिया था।‘‘

‘‘ अच्छा! थोडे़ से इनकम टेक्स वचाने के चक्कर में दो दिन से नींद खोये बैठे हो, कहते हो कि मन की शाॅंति चाहिये?  अरे, यह व्यवसाय का युग है, अच्छी लागत लगाओ, लम्बे खेल खेलो और फिर सब कुछ पाओ धन, पद, सम्मान, प्रतिष्ठा और कहलाओ युगपुरुष।‘‘ 


92 मेवा

 

एक मिठाई की दूकान के प्रवेश द्वार पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था ‘‘ आपकी सेवा में लगातार चालीस वर्षों से संलग्न, उत्कृष्ट मिष्ठान्न भंडार‘‘ जिसे पढ़कर एक सज्जन भीतर जा पहुंचे और एक खाली सीट पर बैठ गये।

‘‘ बोलिये सर! आपकी क्या सेवा करूं ‘‘

‘‘ आपकी जो इच्छा हो‘‘

‘‘ सर! आप आदेश दीजिये सेवक पालन करने के लिये उपस्थित है‘‘

‘‘ सेवा पूंछ कर नहीं स्वाभाविक रूप से की जाती है, चालीस वर्षों से सेवा कर रहे हो और इतना भी नहीं मालूम?‘‘

‘‘ सर ! यदि आप बता दें कि आप को क्या पसंद है, वर्फी, गुजिया, गुलाबजामुन, रसमलाई, जलेबी , पेड़ा ...... हम वही सेवा में प्रस्तुत कर दें‘‘

‘‘ अजीब बात है, सेवा, सेवा, सेवा!  जाओ रसमलाई , वर्फी, गुजिया और जलेबी सब कुछ लाओ‘‘ 

‘‘ सर ! और कुछ?‘‘

‘‘ बस‘‘

‘‘ सर ! यह बिल, ‘व्यासी रुपये‘ काउंटर पर दे दीजिये‘‘

‘‘ ये किस बात के?‘‘

‘‘ अरे! जो मिठाइयाॅं आपकी सेवा में अभी परोसी गई थी, उनकी कीमत‘‘

‘‘ क्या बात है! बाहर लिखे हो और बार बार सेवा, सेवा, सेवा कह भी रहे हो फिर यह पैसे क्यों मांग रहे हो? सेवा तो निःषुल्क होती है? सेवा में तो केवल देना ही होता है लेना कुछ नहीं समझे? यदि पैसे लेना है तो यह तो व्यापार हुआ, इस हाथ ले उस हाथ दे, सेवा कहाॅं हुई? तुम लोग सेवा षब्द का दुरुपयोग कर रहे हो? तुम्हें मातृ भाषा की कद्र करना सीखना चहिये... ....  ?‘‘ 

‘‘ तो शासकीय सेवक , बड़े बड़े अफसर, विधायक , साॅंसद, मंत्री ये सब सरकार की सेवा नहीं करते?‘‘

‘‘ नहीं । सभी लोग काम करते हैं और वेतन पाते हैं, यह तो नौकरी कहलाती है सेवा नहीं , सेवा में केवल देना और केवल देना ही होता है, कुछ भी लेने की कोई अपेक्षा नहीं होती।‘‘

‘‘ अरे!!! ए भाई साब! क्या लेक्चर दे रहे हो, यहाॅं सुनो.... बुजुर्गो ने कहा है कि सेवा करोगे तो मेवा मिलेगा, बोलो कहा है कि नहीं?‘‘

‘‘ हाॅं‘‘‘

‘‘ तो हमारी सेवा का ही मेवा है एट्टीटू रुपीज, ... दीजिये प्लीज?‘‘ 


91 परीक्षा

 91 परीक्षा

‘‘राजू! इस साल तुम्हारी बोर्ड से परीक्षा होना है, क्या तुम्हें मालूम है? इस लापरवाही से पढ़ोगे तो तुम्हें पास होने के लिये वाॅंछनीय न्यूनतम 33 परसेंट नंबर भी नहीं आ सकेंगे?‘‘

‘‘ परंतु पापा! मैं तो अब तक की सभी परीक्षायें 33 परसेंट से अधिक प्राप्तांकों से पास होता आया हॅूं?‘‘

‘‘ अरे, वे तो घर की परीक्षायें थीं, यह परीक्षा कठिन होती है, अधिक मेहनत करना होती है। कठिन मेहनत करने का अभ्यास अभी से करोगे तब तो सबसे कठिन यूपीएससी परीक्षा पास कर  कलेक्टर हो पाओगे।‘‘

‘‘ इस परीक्षा में प्रवेश पाने के लिये कम से कम किस कक्षा को पास करने तक परीक्षयें देते रहना होगा‘‘

‘‘ कम से कम ग्रेजुएशन तो पास करना ही होगा‘‘  

‘‘ पापा! क्या कलेक्टर से और बड़ा कोई पद नहीं होता‘‘?

‘‘ होता है, हमारे देश में तो प्रधानमंत्री का पद सबसे बड़ा और प्रभावशली होता है।‘‘

‘‘ प्रधानमंत्री पद पाने के लिये कम से कम किस परीक्षा को पास करना पड़ता है?‘‘

‘‘ इसके लिये न्यूनतम शैक्षिक योग्यता का कोई निर्धारण नहीं है। जनता के बीच जाकर बोट माॅंगकर पहले संसद सदस्य का चुनाव जीतना होता है, फिर सभी संसद सदस्य जिसे चाहें उसे अपना वोट देकर प्रधान मंत्री बनाते हैं।‘‘

‘‘ ओह! कितना आश्चर्य है, देश के सबसे बढ़े पद पर जाने के लिये न्यूनतम शैक्षिक योग्यता कुछ नहीं है जबकि हम दिन रात मेहनत इसलिये करते हैं कि छोटी से छोटी परीक्षा पास करने के लिये 33 परसेंट से अधिक अंक लायें ,नौकरी पाने के लिये लगातार केवल परीक्षायें ही देते रहें फिर भी पाने की गारंटी भी नहीं?.... 

पापा! अच्छा तो यह होगा कि मैं पढाई छोड़कर अभी से चुनाव लड़ने के लिये बोट पाने की कला की प्रेक्टिस करना शुरु कर दूॅ इन परीक्षाओं की झंझट से तो मुक्ति मिलेगी ? ‘‘

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90 राधा का डमरू


‘‘क्या बात है, आज तो बहुत ही उदास लग रहे हो, ऐसा तो कभी नहीं देखा?‘‘

‘ हाॅं, पिछले सत्तर वर्षों का लेखा जोखा देख रहा था, कुल उपलब्धियाॅं शून्य ही आईं हैं।‘‘

‘‘कैसे? मैं कुछ समझी नहीं ।‘‘ 

‘‘देखो न! खूब मेहनत कर अफसर बना, कितने लोग सेल्यूट करने लाइन में लगे रहते, कितना रुतवा था, बच्चों को भी अपने से अधिक अच्छा बनाया, धन भी खूब कमाया, पर आज रिटायर हुए दस वर्ष हो गये अब लगता है कुल उपलब्धियाॅं कुछ नहीं हैं।‘‘ 

‘‘इतना सब क्या कम है?‘‘

‘‘ किसे इतना सब कहती हो? आज भूल से भी कोई नमस्कार नहीं करता, बच्चे सब विदेश में बस गये, दोस्त भी बिछुड़ते जा रहे, नौकर चाकर भी उतने लवलीन नहीं रहे, यह धन भी बीमारियों के कष्ट को तत्काल दूर नहीं कर पाता! क्या मैं गलत कहता हॅूं?‘‘ 

‘‘ अच्छा! अब समझी। शिवजी का डमरू यह समझने लगा कि शिवजी को प्रणाम करने वाले लोग उसे प्रणाम कर रहे हैं ।‘‘

‘‘क्या मतलब?‘‘

‘‘ तुम्हारे दुख का कारण है तुम स्वयं हो जो बार बार कहते हो मैं ऐंसा था, मैंने यह किया, वह किया, मैं, मैं, मैं । यह सबसे बड़ी भूल है उसी डमरू की तरह।‘‘

‘‘ तो क्या मैं गलत कहता हॅूं?‘‘

‘‘बिलकुल। सुनो! कक्षा दसवीं में वादविवाद प्रतियोगिता हार जाने पर बड़े दुख पूर्वक विलाप करते हुए मैं, माॅं के सामने यही कह रही थी कि मैं ने कितना पराक्रम किया , कितनी पुस्तकें पढ़ी , दिन रात एक कर दिये, सभी श्रोताओं ने मेरे प्रदर्शन को कितना सराहा आदि, पर सब कुछ शून्य में बदल गया। इस पर पिताजी बोले, राधा! जब तक तुम किसी अपेक्षा को लेकर कार्य करती रहोगी तुम्हें दुख ही मिलेगा, पर जब तुम नाटक के कलाकार की तरह यह सोचकर कार्य करोगी कि वह तो निर्देशक के निर्देशों से बंधा है इसलिये अपनी प्रत्येक  भूमिका उसी को प्रसन्न करने के लिये है चाहे उसमें उसे रोना पड़े, हॅंसना पड़े, भीख माॅंगना पड़े, झाड़ू लगाना पड़े या लड़ना भिड़ना पड़े । जिस प्रकार कलाकार को नाटक में जैसी भूमिका दी जाती है उसे वैसा ही प्रदर्शन करना पड़ता है उसी प्रकार इस सृष्टि मंच के हम सब कलाकार हैं और सृजनकर्ता परमात्मा निर्देशक । हमें निर्पेक्ष होकर, उसी की प्रसन्नता के लिये, उसका कार्य समझकर , जीवन के सभी कार्य करना चाहिये तभी सच्चा आनन्द मिलता है, अन्यथा डमरू की तरह दंभ भरते रहो पर अंत में रह जाता है केवल खड़ खड़ खड़ करना।‘‘

‘‘यह क्या दार्शनिकों की तरह बात करती हो?‘‘

‘‘ हाॅं ! यही सच्चा जीवन दर्शन है, मैं ने तो तभी से हर कार्य, ईश्वर  की प्रसन्नता के लिये उन्हीं का कार्य समझते हुये, बिना किसी अपेक्षा के करने का प्रण कर लिया था, चाहे पढ़ना लिखना हो, बालबच्चे पालना हो, घर गृहस्थी सम्हालना हो, या सामाजिक नाते रिश्ते निभाना हो। बस मैं तो सदा यही सोचती हॅूं कि मेरी प्रत्येक भूमिका से उन्हें लगातार प्रसन्नता मिले भले मुझे कितना ही कष्ट क्यों न उठाना पड़े।‘‘

‘‘ ओह, राधा! तुम तो सचमुच की राधा निकलीं परंतु मैं ही शायद अपने को श्याम नहीं बना पाया! ! !‘‘


89 गुड आइडिया

 

 ‘‘ क्यों ! ! तुम लोगों ने घंटी नहीं सुनी? क्लास शुरु हो चुकी है और तुम लोग यहाॅं क्या कर रहे हो?‘‘

‘‘ साॅरी सर! हमलोग विचारों में इतने खो गये कि कब घंटी बज गई पता ही नहीं चला‘‘

अच्छा! हम भी तो जाने किन विचारों में खो गये थे? क्लास अटेंड न करने का यह कौन सा प्लान चल रहा था?‘‘

सर! हम लोग यह सोच रहे थे कि पिछले तीन वर्षों से हमारे इस ग्राॅउंड के चारों ओर फारेस्ट डिपार्टमेंट बृक्षारोपण करता है और देखभाल की जिम्मेवारी लेता है पर उन सैकड़ों रोपे गये पौधों में से केवल दो ही जीवित हैं उनकी भी न तो छाया का लाभ होता है और न ही फूलों की सुगंध, ये लोग इस प्रकार के अनुपयोगी पौधे क्यों बार बार लगाते हैं?‘‘

‘‘ तुम लोगों का सोच तो सही है, पर यह सब हमारे देश के नेताओं और उनके सलाहकार अफसरों की सनक का प्रभाव ही कहा जायेगा जो हर काम को यह सोचकर करते कराते हैं कि उसमें उनको कितना आर्थिक लाभ होगा ‘‘

‘‘ सर ! कल हमलोगों को विज्ञान की क्लास में पढ़ाया गया है कि पीपल का पेड़ पर्यावरण के प्रदूषण को दूर करने में बहुत सहायक है, वह दिन रात जीवनदायनी आक्सीजन देता है और प्रदूषण कारक कार्बनडाईआक्साइड सोखता है, जबकि अन्य पेड़ पौधे केवल दिन में ही आक्सीजन दे पाते हैं। पीपल को अधिक खाद पानी की भी जरूरत नहीं होती, कहीं भी उग आता है, तो इस प्रकार के बहुउपयोगी और कम लागत पर उपलब्ध होने वाले पीपल के पौधे का सभी जगह रोपण क्यों नहीं किया जाता?‘‘

‘‘ मैंने कहा न! देश के कर्णधार पहले प्रदूषण फैलाने के लिये बड़े बड़े उद्योग लगायेंगे फिर, हो हल्ला मचायेंगे कि जीवन को खतरा है.... और एक ही जगह बार बार अनुपयोगी अल्पजीवी पौधों का रोपण करायेंगे.... जैसा कि तुम लोगों ने देखा भी है‘‘

‘‘सर! क्या देश के सभी उद्योगिक परिसरों में अधिक से अधिक पीपल के पेड़ लगाने का सुझाव नहीं दिया जा सकता ताकि प्रदूषण फैले ही नहीं?‘‘ 

‘‘क्यों नहीं ! परंतु उस पर ध्यान कौन देता है? हमारी सुनता कौन है?‘‘

‘‘ अच्छा सर! तो क्या पीपल के पेड़ लगाने का काम हम लोग अपने परिसर से ही प्रारंभ नहीं कर सकते? उसकी तो कलम भी लग जाती है, कुछ दिनों तक ही पानी देना पड़ता है फिर तो वह अपने आप बढ़ने लगता है , कहीं भी पनप जाता है और सैकड़ों वर्ष जीवित रहता है, छाया भी खूब घनी होती है, उसके फल और छाल आयुर्वेदिक औषधियाॅं बनाने के काम आती हैं, यह हमने पढ़ा है।‘‘

‘‘ क्यों नहीं, गुड आइडिया, परिसर में ही क्यों ? सड़कों के किनारे और गाॅंव के आस पास रिक्त स्थानों पर भी उन्हें क्यों न लगाया जाये, हमें देखकर अन्य स्कूलों में भी पीपल के पेड़ लगाने का विचार आयेगा। आज शाम को ही हम लोग चारों ओर एक एक पीपल का पेड़ लगायेंगे और पूरा बढ़ चुकने तक उसकी देखरेख करेंगे, गाॅंव के अन्य स्थानों के संबंध में ग्राम प्रधान से मैं आज ही बात करता हॅूं।‘‘


88 यादों के रंग

 

सदा हॅंसते रहने वाले रवि को देर तक फोन पर किसी पुराने मित्र से बड़ी मस्ती भरी बातें पूरी करते करते अचानक बहुत सीरियस हो जाने पर सुनीता ने पूछा, 

‘‘ क्या बात है? फोन पर तो बड़ा रंग बरसा रहे थे अब अचानक क्या हुआ? कौन था या थी?‘‘

रवि जैसे तन्द्रा से जाग गया हो, सुनते ही बोला,

 ‘‘ ओह सुनीता! सब तारतम्य बिगाड़ दिया, तुमने तो रंग में भंग ही कर दिया।‘‘

‘‘अच्छा!  तो क्या मैं जान सकती हॅूं कि यह भंग हो जाने वाला रंग किसका था?‘‘

‘‘ अरे! यूनीवर्सिटी में पढ़ते समय एक सुंदर गीत के कारण हुई दोस्ती याद आ गयी और वे रंगीले दिन भी। अनेक वर्षों बाद आज फोन पर उससे बात हुई , लग रहा था जैसे बाॅटनी गार्डन में मित्रमंडली के साथ बैठा वह, वही गीत सुना रहा है।‘‘

'‘ तो क्या तुम मुझे वही गीत सुनाते हुए अपनी उन्हीं यादों को फिर से ताजा नहीं कर सकते? ‘‘

‘‘ मैं तुम्हें गीत के केवल बोल ही सुना सकता हॅूं, लय और तान का गायक तो वही है, मैं तो श्रोता ही रहा हॅूं हर समय।‘‘

‘‘ चलो वही सुना दो, रंग तो वापस आये‘‘

‘‘बुंदेली में गाये उस गीत के बोल हैं,  

.....पिया मोय भूल जिन जैयो, पिया मोय बिसर जिन जैयो, 

  मोरी चुरियन के रखवारे मोरे ऐंगर रैयो, पिया मोय.... ‘‘

ये लाइनें सुनते ही सुनीता अपने स्कूल के दिनों में खेले गये नाटक ‘‘ढोला मारु‘‘ की याद में खो गई जिसमें ‘ढोला‘ बनी उसने, अपने पति ‘मारु‘ बने सहपाठी ‘ज्ञान‘ को रिझाने के लिये यही गीत गाया था और अभिनय इतना आकर्षक बना था कि साथ पढ़ने वाले लड़के/लडकियाॅं उन्हें पति पत्नी कहकर ही बुलाने/ चिढ़ाने लगे  थे, जिससे तंग आकर दोनों ने एक दूसरे से बात न करने और भविष्य में कभी न मिलने की कसम खाई थी।

सुनीता को सीरियस देख रवि ने ताना दिया, 

‘‘क्या बात है? कहाॅं खो गईं?‘‘

सुनीता अपनी भाव भंगिमा छिपाते हुए बोली, 

‘‘कुछ नहीं ! गीत में प्रेमिका के भय मिश्रित संदेह को कितनी अच्छी तरह मेरी बुंदेली भाषा में प्रकट किया गया है, बस मैं तो यही सोच रही थी, लेकिन तुम अचानक उदास क्यों हुए?‘‘ 

‘‘इसलिये कि मैंने अनेक बार उसे अपने घर बुलाकर अपने अन्य सहपाठियों के साथ उसके गीतों का आयोजन करने का प्रस्ताव दिया पर किसी न किसी कारण से वह टालता गया और अब, मेरे उस मित्र ‘ज्ञान‘ ने अमेरिका जाकर वहीं  बसने का निश्चय कर लिया है‘‘

सुनते ही रंगहीन हुई स्तब्ध सी सुनीता, एक ओर तो मन ही मन ज्ञान को अपनी निरर्थक कसम देने के लिये क्षुब्ध थी और दूसरी ओर उसकी सात्विक वचनबद्धता के प्रति कृतज्ञता आंखों में छलकने को उत्सुक आंसुओं को रोकने का प्रयत्न कर रही थी। 



Thursday, September 10, 2020

87 परम्परा

 हाथ में लटकाये टीन के डिब्बे में एक काले रंग की तेल में अधडूबी मूर्ति की ओर इशारा करते हुए एक किशोरवय के लड़के ने श्रीमती गुप्ता से कहा-

‘‘ माताजी ! शनिदेव को सरसों का तेल चढ़ाइये, सब कष्टों से मुक्ति मिल जायेगी’’ 

श्रीमती गुप्ता आठ दस ग्राम सरसों का तेल डिब्बे में डालकर एक रुपये का सिक्का उस लड़के को देने को उत्सुक हुई ही थीं कि पास आकर गुप्ताजी उस लड़के से बोले-

‘‘ क्यों रे ! मैंने पिछले शनिवार को भी डाॅंट कर भगाया था आज फिर भी तू आ गया? भाग यहाॅं से नहीं तो बहुत पीटूंगा और पुलिस के हवाले कर दूंगा ‘‘

लड़का डर कर भागा......,

श्रीमती गुप्ता बोलीं-

‘‘ खुद तो कोई भजनपूजन करते नहीं, कोई दूसरा करे तो तुम्हें उसी पर आपत्ति होती है, तुम्हारा क्या नुकसान कर दिया उसने? शनिदेव न्याय के देवता हैं, व्यर्थ ही नाराज हो जायेंगे’’

" अरे ! तुम महिलाओं को सिर्फ अंधविश्वास और आडम्बर प्रिय होता है इसी कारण वे आदिकाल से लुटती चली आ रही हैं‘‘

‘‘ ऐंसा नहीं है। तुम पुरुष लोग चाहते ही नहीं कि स्त्रियाॅं शनिदेव का आशीर्वाद पाकर अपना न्यायसंगत महत्व स्थापित कर सकें। पुरुषवर्ग यह चाहता है कि केवल वही उनके कोप से बचे रहें ताकि घर और समाज दोनों जगह अपना वर्चस्व बनाये रख सकें। देखा नहीं, महाराष्ट्र के एक शनि मंदिर में तो महिलाओं को घुसने पर भी पुरुषों ने प्रतिबंध लगा रखा है’’ 

‘‘ हाॅं ! अच्छा याद कराया, उसी मंदिर में अभी अभी हुये मेनेजमेंट कमेटी के अध्यक्ष के चुनावों में एक महिला को ही चुना गया है जिसने कहा है कि वह महिलाओं को शनिमंदिर में नहीं घुसने देगी क्योंकि यह तो सैकड़ों वर्ष पुरानी परम्परा है जिसे कैसे तोड़ा जा सकता है। उसका कहना है कि भले ही सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को मंदिर में प्रवेष पर लगाये गये प्रतिबंध को समाप्त कर दिया है, परंतु वह उसे नहीं मानेगी। इसे क्या कहोगी?’’ .... .... 

‘‘ यही न! कि महिलाओं को तो अंधविश्वासों और आडम्बरों के मायाजाल में उलझकर लुटने, पिटने और मिटने की परंम्परा का ही पालन करना है?’’ 

 


86 सबसिडी

"‘क्यों वर्मा जी! फोन पर किसे इस तरह डाॅंट रहे हो? जीने दो बेचारे को?’’

‘‘ कुछ नहीं शर्मा जी! ये गैस डिस्ट्रीव्यूट करने वाले एजेंट इतने बदमाश हो गये हैं कि कुछ न पूछो, दो सप्ताह हो गये हैं पेमेंट किये हुए, पर अभी तक सबसिडी की रकम खाते में ट्राॅंसफर नहीं की।’’

‘‘अच्छा ! ये बात है, मैंने तो प्रधानमंत्री जी की इस अपील पर कि किसी गरीब का चूल्हा जल सके, अपनी सबसिडी लेना छोड़ ही दी।’’

‘‘ हाॅं ठीक कहा , इस अपील पर देश के साठ प्रतिशत से अधिक मध्यमवर्ग के परिवारों ने ही गैस पर सबसिडी लेना बंद किया है बड़े बड़े नेताओं और धनाड्यों ने तो अपील को सुना भी नहीं है।’’

‘‘ क्या कहते हो वर्माजी ! पेपर में तो कुछ मंत्रियों और विधायकों के नाम तक छपे थे जिन्होंने सबसिडी को छोड़ दिया है।’’

‘‘अरे शर्माजी! मैं ने अपनी नौकरी के आधे से अधिक समय को इन मंत्रियों और विधायकों के आफिस असिस्टेंट के रुप में काम करते हुए बिताया है, मैं इन्हें अच्छी तरह जानता हॅूं जनता द्वारा दिये गये टैक्स पर ऐश करने वाले इन चोरों को। ये अपने नाम के सिलिंडर पर सबसिडी छोड़कर धर्मात्मा बनने का ड्रामा करते हैं और चैकीदार, माली, रसोइया, हरवाहों , कुत्ते, बिल्ली आदि के नाम पर लिये गये दस दस सिलिंडरों पर सबसिडी लेते हैं।’’


85 लाल साब


‘‘ क्यों राजपूत साब! आज तो बड़े निश्चिन्त बैठे हो! आफिस नहीं जाना क्या?’’

‘‘हाॅ’’

‘‘ पर क्यों? पेपर में तो न्यूज है कि आज तुम्हारे नये डीडी ज्वाइन कर रहे हैं। क्या इसीलिये निश्चिंत हो कि अब डीडी के  प्रभार से मुक्त हो जाओगे?’’

‘‘ हाॅं, यही बात है’’

‘‘ कोई ‘ एन. लाल साहब’ का नाम लिखा है पेपर में’’

‘‘हाॅं, आफिस में तो आर्डर कई दिन पहले आ गया था। ये वही ‘नन्हेंलाल’ है जो कभी हमारा असिस्टेंट हुआ करता था, अब ‘लाल साहब‘ कहलाता है’’

‘‘ अरे वही नन्हेंलाल! जिसे रोज डाॅंटते थे, समझाते थे फिर भी कुछ न कुछ गलती कर ही देता था’’

‘‘ बिलकुल सही समझा, कभी मेरे सामने घुटनाटेक रहने वाला नन्हेंलाल अब डीडी के सिंहासन पर बैठकर मुझे असिस्टेंट की तरह काम करने का आदेश देगा! इसीलिये मैंने वालंटरी रिटायरमेंट ले लिया है, अब कोई और दूसरा काम धंधा करेंगे, आज से आफिस का चक्कर ही खत्म।’’

‘‘ लेकिन वह तो तुम से बहुत जूनियर है, तुम्हारा अफसर कैसे हो गया?’’

‘‘ हम अपने पूर्वजों के कर्मों का फल भोग रहे हैं जिनके कारण उसे सरकार का आरक्षण और संरक्षण दोनों प्राप्त हैं , इसलिये।’’

‘‘ यह तो....  ?’’


84 गंगा स्नान

 

‘‘सभी लोग अपने अपने टिकिट चैक करा लें’’

चलती ट्रेन में टीटीई ने जोर से कहा और चेकिंग शुरुकर दी। टिकिट चेक करते हुए कुछ देर के बाद एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति के पास पहुंच कर उससे पूछा, 

‘‘आपका टिकिट?’’

‘‘गंगा स्नान के लिये जा रहे हैं, टिकिट की क्या जरूरत?’’

‘‘अरे दादाजी! ट्रेन में यात्रा करते हुए चाहे गंगा स्नान करने जाओ या अपने किसी अन्य काम से टिकिट तो लेना ही पड़ता है, बिना टिकिट यात्रा करने का पाप अपने ऊपर व्यर्थ क्यों लेतेे हो?’’

‘‘ हमारी गंगा मैया सब पाप धो देंगी’’

‘‘ तो क्या गंगा मैया पाप धो देगीं इसलिये जितने चाहो पाप करते जाना चाहिये?’’ 

‘‘तुम लोगों को शास्त्र का ज्ञान ही नहीं है, उनमें कहा गया है कि गंगा मैया की पाप धोने की इतनी अधिक शक्ति है कि मनुष्य के पास पाप करने की उतनी शक्ति ही नहीं है, वह उतनें पाप नहीं कर सकता कि गंगा मैया की धोने की ताकत से अधिक हो जायें’’

‘‘दादाजी! आपके इस तर्क को तो शायद चीफ जस्टिस भी नहीं ठुकरा सकते, परंतु फिल हाल आप चालीस रुपये किराये के और चालीस रुपये फाइन के देकर रसीद ले लीजिये अन्यथा अगले स्टेषन पर आपको हम जीआरपी के हवाले कर देंगे, अपने शास्त्रों के ज्ञान का वहीं बखान करना।’’


 

83 अपने आदमी

‘‘ दाउ साब ! गजब हो गया, आपके रहते इस थानेदार ने तो भूरा और हीरा को गिरफ्तार कर लिया और सभी सातों भट्टियों पर सीलबंदी कर सारा माल जब्त कर लिया है , सभी जगहों के सप्लाई आर्डर रुक गये हैं’’

‘‘ बाबू ! जरा थानेंदार से बात कराना’’

‘‘ जी भैया’’ 

‘‘ हेलो! थानेदार साहब! लीजिये विधायक जी बात करेंगे.. .... 

भैया! थानेदार लाइन पर... ’’

‘‘ काय थानेदार साब! ओ, भूरा और हीरा खों काय परेशान कर रय हौ, छोड़ दो अपने आदमी हैं’’

‘‘  सर! ये तो अवैध शराब की  सात भट्टियों को चलाते हैं और इस क्षेत्र में अवैध शराब बनाकर पूरे एरिया में सप्लाई करते हैं’’

‘‘ अरे झूठ है सब, छोड़ दो, हम बोल रहे हैं’’

‘‘ लेकिन भैया! वो एस पी साहब नये आये हैं न, उन्हीं के दल ने रेड की थी, हम क्या कर सकते हैं, जरा उन्हीं से बात कर लेते तो.... .... ’’

‘‘ ए! लगा रे, एसपी खों फोन लगा!’’

‘‘ हाॅं, एस पी साब! मैं इस क्षेत्र का विधायक बोल रहा हॅूं, आपने भूरा और हीरा नाम के दो लोगों को पकड़ लिया है,  वह अपने आदमी हैं, उन्हें किसी ने झूठा फंसा दिया है,  थानेदार से बोलकर उन्हें छुड़वा  दो’’  

‘‘ लेकिन विधायक जी! मेरी पोस्टिंग इस जिले में करते समय माननीय गृहमंत्री जी ने यही कहा था कि इस क्षेत्र से शराब का अवैध धंधा बंद होना चाहिये’’

‘‘ अच्छा! वो तो मैं ने ही मंत्री जी को कह रखा था कि मेरे क्षेत्र में अवैध षराब की सत्ताइस भट्टियाॅं चलती हैं, उन्हें बंद कराओ।श् 

‘‘ ठीक है विधायक जी! बाकी बीस को भी जल्दी ही कब्जे में लेता हॅूं।’’ 

‘‘लेकिन मेरे आदमी तो छोड़ दो? कहो तो मंत्री जी से कह दें? उनकी बात तो मानोगे?, ठहरो अभी कहता हॅूं ।’’

‘‘ प्रणाम, माननीय मंत्री जी! ये किस एसपी को हमारे एरिया में भेज दिया माननीय! सब धंधा चैपट हो गया, लगता है अब आप के राज्य में हम भी चैन से न रह पायेंगे ’’

‘‘ क्या बात है विधायक जी, इतने परेशान तो कभी नहीं रहे, बताओ क्या हुआ है,’’ 

‘‘ अरे! वो जो नये एसपी को हमारे क्षेत्र में आपने भेजा है उसने सब कुछ बंटाढार कर दिया है, हमारे आदमियों को पकड़ कर धंधा ही खत्म कर दिया है, उसे आज ही हटा दो, किसी अपने आदमी को भेजो , कहाॅं कहाॅं के अकड़ू मिल जाते हैं आपको भी?’’

‘‘ ठीक है विधायक जी! चिंता न करो, वो भी अपने ही आदमी हैं अभी बोलता हॅूं, सब ठीक हो जायेगा।’’


82 सहिष्णुता


‘‘सर! ये सहिष्णुता क्या होती है?’’

‘‘ सहिष्णुता माने सहनशीलता, अंग्र्रेजी में टालरेंस ’’

‘‘ तो असहिष्णुता का मतलब हुआ असहनशीलता यानि इनटालरेंस?’’

‘‘ हाॅं’’ 

‘‘ अच्छा, अब समझा सर !’’

‘‘क्या समझे?’’

‘‘ यही, जब इस देश के नेताओं को वोट लेकर सीटें हथियाना होती है तो वे अपने  भाषणों में अन्याय, अत्याचार , अशिक्षा, हर प्रकार के शोषण और अपराध के प्रति असहिष्णुता का पाठ पढ़ाते हैं, और सत्ता हाथ में आते ही इन सबके प्रति सहिष्णुता भरी संस्कृति का अमृत पिलाने लगते हैं।’’  







Wednesday, September 9, 2020

 81 संकल्प

  ‘‘ अभी तक जितनी लड़कियाॅं देखीं हैं उनमें से जिसे कल देख कर आये हैं मुझे तो वह सबसे अच्छी व सुंदर लगी, अपने ‘हर्ष’ को भी पसंद आई, दोनों इंजीनियर हैं एक ही कंपनी में काम भी करते हैं, एक सी सेलरी भी है, मैं तो कहती हॅूं आज ही लड़की वालों से आगे की बात कर  षुभ लग्न देखकर विवाह सम्पन्न कर दो, देरी करना उचित नहीं है’’

‘‘ मैं भी यही सोचता हॅूं , यदि ‘हर्ष’ का भी यही विचार है तो फिर मैं बात आगे बढ़ाता हॅूं।’’

‘‘ हेलो, पाॅंडे जी ! मैं त्रिपाठी,  हमें लड़की पसंद है, अब आगे की रूपरेखा के संबंध में बात करना है, यदि आप यहाॅं आ जायें तो अच्छा होगा’’

‘‘ ओहो, नमस्कार त्रिपाठी जी!, मैं आपके आदेष का पालन करने हेतु अभी आपके पास हाजिर होता हॅूं । ... ... ...

‘‘   आइये, आइये पाॅंडे जी! बैठिये। वास्तव में, मैं यह जानना चाह रहा था कि आपका संकल्प क्या है?’’

‘‘ आदरणीय! मेरा संकल्प तो यह है कि भगवान ने मुझे लड़कियाॅं ही दी हैं इसलिये उन्हें लड़कों के समान ही षिक्षित कर आत्मनिर्भर बना दॅूं, बस, धीरे धीरे वही पूरा करता जा रहा  हॅूं।’’

‘‘ अरे पाॅंडे जी! वह तो सभी करते हैं, मैं तो इस विवाह के संबंध में किये गये आपके संकल्प के बारे में पूछ रहा था अर्थात् कितना खर्च करने का विचार है?’’

‘‘आप ही बता दें कि आप कम से कम कितना खर्च करना चाहते हैं’’

‘‘  इस जमाने में दस से पन्द्रह लाख तो साधारण लोग भी खर्च कर देते हैं फिर हमारा स्तर तो,,, आप जानते ही हैं’’

‘‘ महोदय! जहाॅं तक मैं जानता हॅूं, ‘संबंध‘ का अर्थ है ‘सम प्लस बंध‘, अर्थात् दोनों परिवारों की ओर से प्रेम और आकर्षण के एक समान बंधन, इक्वल बाॅडस् आफ लव एन्ड अफेक्षन, इसलिये आप जो भी खर्च निर्धारित करेंगे हम दोनों परिवार बराबर बराबर बाॅंट लेंगे, ठीक है?’’

‘‘ अच्छा, पाॅंडे जी! फिर तो हमें इस विकल्प पर पुनः विचार करना पड़ेगा, नमस्कार!’’


80 आतंक


‘‘तुम कितने निर्दयी हो! अमानवीय हो! तुमने उन्हें गोलियों से छलनी बना डाला! उन्होंने तुम्हारा क्या  बिगाड़ा था?’’

‘‘ वाह! तुम भी क्या बात करते हो, कैसे आदमी हो? उनकी चिंता तो कर रहे हो पर मेरी बिलकुल परवाह नहीं?’’

‘‘क्या मतलब ?’’

‘‘अरे! क्या तुमने देखा नहीं, कि अकेले इनमें ही मेरी कितनी गोलियाॅं खर्च हो गईं?’’ 


79 आकाॅंक्षा


 ‘‘क्यों ठेकेदार साहब! मिल आये? क्या कहा ‘जी साब‘ ने ?’’

 ‘‘आप तो सब जानते हैं ‘एजी‘ साब! फिर क्यों जले पर नमक छिड़कते हैं? आपसे मदद करने को रिक्वेस्ट किया था पर आपने भी ......’’

‘‘लेकिन भाई साब! टेंडर पास कराने के समय तो बड़ा उत्साह दिखा रहे थे? कहते थे सब कुछ हो जायेगा और अब बदल रहे हो, तो ‘जी साब’ नाराज तो होंगे ही।’’

‘‘ उस समय यह कहाॅं मालूम था कि कीमतें इतने जल्दी आसमान छूने लगेंगी, हमारा तो दिवाला ही निकल गया.....।’’

 ‘‘लेकिन जब तब चर्चा में तो यही सुना जाता है कि पृथ्वी पर यदि कोई बुद्धिमान हैं तो वह हैं एमईएस के कान्ट्रेक्टर्स, बोलो गलत कहा क्या? टेंडर के पास कराने के समय जो परसेंटेज निर्धारित हुई थी वह तो उनकी , मेरी और एकाऊंटेन्ट की , देना ही पड़ेगी ... ... ।’’

 ‘‘परंतु सर! मुझे बहुत ‘लाॅस’ हुआ है इस काम में, आगे कभी समझ लेंगे पर अभी कुछ तो मानवीयता दिखाईये, आफटर आल हमारे वर्षों पुराने संबंध है?’’

 ‘‘यार! क्या तुम्हारी यह आकाॅंक्षा वैसी ही नहीं है जैसे कोई पुत्र अपने पिता की हत्या करने के बाद बकील के माध्यम से जज के सामने गिडगिड़ाये कि उसकी सजा माफ कर दी जाये क्योंकि वह अनाथ हो गया है? ’’


78 परिग्रह


फटे वस्त्रों में जीर्ण देह को लपेटे, रोड के एक किनारे बैठे, ललचायी आंखों से प्रत्येक राहगीर को देख रहे व्यक्ति की ओर मैं अचानक ही कुछ मदद करने की इच्छा से जा पहुंचा। 

कुछ भी देने से पहले मैं ने उससे, उसकी इस दशा के लिये कौन उत्तरदायी है यह जानना चाहा।

वह, बहुत गहराई में डूबी अपनी व्यथित हॅंसी को सप्रयास प्रकट करते हुए बोला, 

‘‘साहब! यदि घर में केवल एक दर्जन केले हों और खाने वाले दस लोग हों तो विवेकपूर्ण निर्णय क्या होगा ?’’

मैंने कहा, ‘‘ कम से कम श्एक केला प्रत्येक को ले लेना चाहिये और बचे हुए दो केलों को सर्वानुमति से उन्हें देना चाहिये जिन्हें सबसे अधिक भूख लगी हो’’

‘‘ परंतु, साहब! यदि सभी बारह केले एक ही व्यक्ति खा ले तो ? बाकी नौ लोग तो मेरे जैसे ही हो जायेंगे, है कि नहीं?’’

इस एक प्रश्न के साथ जुड़ी लंबी आभासी प्रश्नावली की आहट पा, मैं निरुत्तर हो गया।


77 सावधान

 

‘‘ अरे, देखो! ये क्या सर्कस का आदमी है, अपने जीवन को खिलौैना समझता है!  किस प्रकार वाहन चलाता है , जरा भी सावधान नहीं हैै’’!

‘‘नहीं सर! वह सावधानी पूर्वक असावधान रहता है’’ ।

‘‘ अच्छा! जरा उससे पूछना, क्या वह असावधानी से भी सावधान रहता है?’’


76 अभ्यागत


फूला और मूला दोनों बहनों के आठवीं कक्षा पास करते ही उनके माता पिता ने क्रमशः उनका विवाह कर दिया । फूला के पति का फूलों का व्यवसाय था, बड़े से फूलों के बगीचे में ही उनका घर था और घर भी फूलों से भरा रहता था। मूला के पति का मछली पालन का व्यवसाय था और उनका घर छोटे छोटे तालाबों के बीच था और घर मछलियों से भरा रहता था।

 15/20 वर्षों बाद किसी काम से मूला के पति को फूला के गाॅंव जाना पड़ा, तब मूला ने भी साथ चलने का आग्रह किया ताकि वह बहुत वर्षों बाद अपनी बहिन से मिल सकेेगी और साथ में ही लौट भी आयगीे। 

मूला और उसके पति को अचानक आये देख फूला और उसके पति अपना सब काम दूसरों को सौंप कर उनके स्वागत में जुट गये  और उन्हें मना लिया कि अब कम से कम दो दिन तो उन्हें वहीं रुककर उनका आतिथ्य ग्रहण करना ही होगा। रात में सभी लोग विश्राम करने लगे। फूला दम्पति तो चैन से सो गये पर मूला दम्पति को क्षण भर भी नींद नहीं आई। सोच रहे थे कि एक रात काटने में जब इतनी मुश्किल है तो दो दिन कैसे कटेंगे? उन्हें लगता था कि कब सवेरा हो और वे अपने घर पहुंचें। 

उन्हें, वहाॅं इतनी घुटन हो रही थी कि सवेरा होने से बहुत पहले वे दोनों, फूला और उसके पति से बिना मिले ही अपने गाॅंव चल दिये और वहीं फर्श पर फूलों को अक्षरों का आकार देकर लिख दिया, ‘‘स्वागत के लिये धन्यवाद, कभी फिर मिलेंगे‘‘।


75 असर प्रवचन का


 आटोरिक्शा में  बैठे दो सज्जन चर्चा करते जा रहे थे,

 ‘‘वाह भाई! मान गये आज की कथा में तो मजा आ गया, भीड़ भी बहुत थी।‘‘

‘‘हाॅं यार! मैं भी यही सोच रहा था कि यहाॅं आना सार्थक हो गया‘‘

एक अन्य सहयात्री ने पूछा,

‘‘भाई साब! क्या हुआ थोड़ा हमें भी बताना, हम वहाॅं नहीं जा पाये तो कम से कम आप लोगों के द्वारा ही सही, हमें भी धर्म लाभ मिल जाये‘‘

‘‘अरे साब क्या बतायें, ऐसा प्रवचन हमने पहले सुना ही नहीं और न देखा, लोग उछल उछल कर नाच रहे थे, सुन सुन कर रो रहे थे, भाई वाह!‘‘

‘‘ तो, कुछ तो संक्षेप में उस वार्ता को बताइये‘‘

‘‘ वही, जैसे , सच बोलना चाहिये, किसी को कष्ट नहीं देना चाहिये, दूसरों की मदद करना चाहिये ‘‘ आदि आदि...... 

इसी बीच उन में से एक ने कहा ‘‘रोकना भाई हमारा स्थान आ गया‘‘

आटोवाले ने  कहा ‘ पाॅंच रुपये ‘

वे बोले, ‘‘अबे! चार कदम के पाॅंच रुपये? बाहर से आया है क्या? ले रख, दो रुपये तो लगते ही हैं तू तीन ले ले... ..‘‘

और वे चलते बने, आटो वाला चिल्लाता रहा.... 

‘‘भाई साब ! भाई साब ! दो रुपये और देते जाइये....?‘‘ 

उन्होंने एक न सुनी ।

आटोवाला बड़बड़ाता रहा , ‘‘ यही प्रवचन सुनकर आये हैं, ढोंगी कहीं के.... ‘‘


Tuesday, September 8, 2020

75 असर प्रवचन का


आटोरिक्षा में वैठे दो सज्जन चर्चा करते जा रहे थे,

 ‘‘वाह भाई! मान गये आज की कथा में तो मजा आ गया, भीड़ भी बहुत थी।‘‘

‘‘हाॅं यार! मैं भी यही सोच रहा था कि यहाॅं आना सार्थक हो गया‘‘

एक अन्य सहयात्री ने पूछा,

‘‘भाई साब! क्या हुआ थोड़ा हमें भी बताना, हम वहाॅं नहीं जा पाये तो कम से कम आप लोगों के द्वारा ही सही, हमें भी धर्म लाभ मिल जाये‘‘

‘‘अरे साब क्या बतायें, ऐसा प्रवचन हमने पहले सुना ही नहीं और न देखा, लोग उछल उछल कर नाच रहे थे, सुन सुन कर रो रहे थे, भाई वाह!‘‘

‘‘ तो, कुछ तो संक्षेप में उस वार्ता को बताइये‘‘

‘‘ वही, जैसे , सच बोलना चाहिये, किसी को कष्ट नहीं देना चाहिये, दूसरों की मदद करना चाहिये ‘‘ आदि आदि...... 

इसी बीच उन में से एक ने कहा ‘‘रोकना भाई हमारा स्थान आ गया‘‘

आटोवाले ने  कहा ‘ पाॅंच रुपये ‘

वे बोले, ‘‘अबे! चार कदम के पाॅंच रुपये? बाहर से आया है क्या? ले रख, दो रुपये तो लगते ही हैं तू तीन ले ले... ..‘‘

और वे चलते बने, आटो वाला चिल्लाता रहा.... 

‘‘भाई साब ! भाई साब ! दो रुपये और देते जाइये....?‘‘ 

उन्होंने एक न सुनी ।

आटोवाला बड़बड़ाता रहा , ‘‘ यही प्रवचन सुनकर आये हैं, ढोंगी कहीं के.... ‘‘


74 वासना


 घर के पास लगे सरकारी नल पर पानी भरने आने वाली महिलाओं के बीच कुछ दिनों से रोज ही चर्चा होती कि, ‘‘देखो तो, पाॅंच पाॅंच बड़े बड़े बच्चों की माॅं को क्या सूझी‘‘। सुनते सुनते एक दिन जब चंदन से पूछे बिना न रहा गया तब उसे पता चला कि वह तो नन्दन की माॅं है, और उसके मन में फिल्म रील की तरह उस दिन की दृश्यावली  क्रमशः आने लगी जब वह किसी किताब को लेने उसके घर गया था और घर पर पहुंचते ही सदा हंसमुख रहने वाले नन्दन ने किस प्रकार दुखी होकर बताया था कि उसकी माॅं अचानक बीमार हो गई है, और जब चंदन ने भीतर की ओर देखा था तो उसकी मां किस प्रकार पलंग पर लेटी हुई नन्दन के दोनों छोटे भाइयों से पैर दबवा रही थी। 

चंदन को उनसे हुई अपनी इस वार्ता ने भी आ घेरा-   

‘‘ माता जी क्या हुआ?‘‘ 

 ‘‘ बहुत दर्द हो रहा है‘‘ 

 ‘‘दर्द कहाॅं हो रहा है‘‘ 

 ‘‘ तुम्हें क्या बतायें‘‘ ।

 ‘‘मैं डाक्टर तो नहीं पर, यदि आपके दर्द का पता चल जावे तो उस प्रकार के डाक्टर का प्रबंध हम लोग कर सकते हैं जिससे आप जल्दी ठीक हो सकती हैं?‘‘

 ‘‘तुम  नहीं समझोगे‘‘ .. .. ..। 

अपने कल्पना लोक में विचरण करते हुए वह सोचने लगा कि नन्दन भी एक बच्चे का बाप है और उससे बड़ी दो बहिने भी बच्चों वाली हैं , उसके पिता भी मिल में काम करते है और अपनी खेती से घर का सरलता से खर्च उठाते ही हैं, शायद  घरेलु कोई कठिनाई नहीं है फिर भी यह महिलायें कैसी विचित्र बातें कर रहीं हैं ? विश्वास नहीं होता..... सोचते सोचते वह कब नन्दन के घर जा पहुंचा पता ही न चला। 

नन्दन उसे दूर से ही देखकर भीतर चला गया और अन्य लोग भी उससे नहीं मिले।

पडौस में रहने वालों ने उसे बताया कि नन्दन की माॅं किसी मिल में काम करने वाले के साथ भाग गयी है, पूरा एक सप्ताह  हो गया कुछ पता नहीं है... ...  

‘‘तुम  नहीं समझोगे‘‘ .. .. ..का अर्थ, चंदन को अब समझ में आया।


73 यस सर !

नये अफसर ट्रास्फर पर आये। आफिस में सब जगह चर्चा होने लगी ....  

‘‘बड़ा कड़क आदमी है, खाता पीता नहीं है, नियम का पक्का, किसी से दबता नहीं चाहे कोई नेता या मंत्री ही क्यांे न हो,‘‘ आदि आदि।

 हर आफिस में कुछ न कुछ ऐंसे कर्मचारी अवष्य पाये जाते हैं जो  ‘‘बाॅस‘‘ के निकट होकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते रहते हैं। अफसर के ज्वाइन होते ही कुछ लोग, आदत से मजबूर बार बार अपनी अपनी फाइलें लेकर ‘बाॅस‘ के पास जाते और कोषिष करते कि वह उन्हें निष्ठावान समझने लगे। उनकी इस प्रकार की कृत्रिम सक्रियता को अफसर भी जल्दी ही ताड़ गये। एक दिन उन्होंने इन हाॅं में हाॅं मिलाने वालों से अलग अलग बुलाकर कहा- 

‘‘आज आफिस की छुट्टी के बाद तुम्हारे साथ बाजार चलेंगे।‘‘ 

सभी उत्साहित, यथासमय एक एक कर अफसर के पास जा पहुंचे और एक दूसरे को देखकर मन ही मन बेचैन भी हुए, पर क्या करते ‘बाॅस‘ के साथ तो संबंध बनाना ही थे इसलिये चुपचाप वह अवसर देखने लगे जिसमें तत्परता से ‘बाॅस‘  के आदेष का पालन कर सकें।

बाजार में अफसर के साथ साथ हाॅं में हाॅं मिलाते, अगल बगल पैदल चलते हुए उन्हें अचानक एक भिखारी सामने से आता दिखा। 

अफसर बोले, ‘‘अरे! देखो! लगता है इसने तो कई दिनों से भर पेट खाया ही नहीं होगा।‘‘  

सभी एक साथ बोले ‘‘‘जी सर‘ ।‘‘ 

-‘‘अरे! इसके तो कपड़े भी बिलकुल फट गये।‘‘

 फिर सभी बोले ‘‘‘यस सर‘ ।‘‘

-‘‘ लगता है बीमार भी है... .‘‘.  

‘‘यस सर!‘‘

- ‘‘अच्छा तो, इसको अभी पाॅंचसौ रुपये दे दो ...‘‘

 सभी उसी लहजे में बोल गये ‘‘यस सर! ‘‘ फिर अचानक सोच में पड़ गये , कौन दे? 

- ‘‘क्या हुआ? निकालो रुपये और दे दो उसे।‘‘

अब क्या था... ...  सब ने मिलकर उसे पाॅंच सौ रुपये दे दिये ... ...। 

- ‘‘अब तुम लोग अपने अपने घर जा सकते हो मुझे बाजार में अन्य कार्य करना है।‘‘


221 चिंजा की शादी

5 वीं क्लास में पढ़ रहीं स्वभाव से सीधी सादी सहुद्रा और भोली सी चिंजा में गहरी दोस्ती थी। चिंजा की स्पष्टवादिता से क्लास के सभी लड़के लड़किय...