‘‘ क्यों रागिनी! सुना है तुम, महिलाओं पर कोई रिसर्च कर रही हो? कहाॅं तक काम हो गया?‘‘
‘‘ जी हाॅं अंकल, ‘वर्तमान भारतीय समाज में महिलाओं की विवाहोत्तर स्थिति‘ पर काम कर रही हॅूं।‘‘
‘‘ अरे वाह! बढ़िया टापिक है, कितना काम हो गया?‘‘
‘‘ पूरा ही हो गया है अंकल, कुछ दिनों में थीसिस की टाइपिंग पूरी होने वाली है, बस फिर सबमिट कर देंगे।‘‘
‘‘ बहुत अच्छा! रिसर्च के कुछ परिणाम हमें अभी बता सकती हो या थीसिस जमा होने के बाद ही कहोगी?‘‘
‘‘ क्यों नहीं, मैं ने पाया है कि परंपरागत विवाहों में महिला को हारी हुई पार्टी का सदस्य माना जाता है, अनेक स्थानों पर उसके परिवार के सदस्यों को वैवाहिक कार्यक्रमों में अपमानित किया जाता है और महिला को पूरे कार्यक्रम में स्वतंत्रता नहीं दी जाती। उनका ‘कन्यादान‘ किया जाता है जैसे वे उपहार हों। कई स्थानों पर तो उनके भविष्य की कोई सुरक्षा नहीं होती, पुरुष महिला को मामूली धन देकर विवाह को विच्छेदित कर लेता है और महिला अपने को भौतिक रूप से कमजोर और अशिक्षित मानकर सिर झुकाये यह सब अन्याय सहन करती है।‘‘
‘‘ तो तुमने इसका कारण क्या बताया है और इसे दूर करने का क्या उपाय सुझाया है?‘‘
‘‘ मेरे विचार से महिलाओं के साथ अव्यवस्थायें, शोषण, क्रूर व्यवहार और झगड़े होने के लिये अब परंपरागत शादियों में ‘‘कन्यादान‘‘ शब्द ही अधिक घातक हो गया है। इसका अर्थ अब वैसा ही लगाया जाता है जैसे महिलायें कोई भौतिक उपयोग में आने वाली वस्तुएं जैसे गाय, कपड़े या अन्य पदार्थ हों, जिन्हें उपहार में दिया जाना हो। जब तक महिलायें साहस और बुद्धि से काम न लेंगी तब तक उनके साथ गुलामों की तरह व्यवहार होता रहेगा। उन्हें सोचना चाहिये कि वे कपड़ों का बंडल नहीं हैं जिसे धोबी के घर भेजा जाना है। महिलाओं का दमन रोकना होगा और समाज में पुरुषों की प्रधानता को कम करते हुए ‘विवाह‘ को परस्पर सहयोगी सामाजिक व्यवस्था का अंग बनाना होगा जिसे कोआर्डीनेटेड कोआपरेटिव लीडरशिप ,(co-ordinated co-operative leadership) कह सकते हैं।‘‘