‘‘तुम कितने निर्दयी हो! अमानवीय हो! तुमने उन्हें गोलियों से छलनी बना डाला! उन्होंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था?’’
‘‘ वाह! तुम भी क्या बात करते हो, कैसे आदमी हो? उनकी चिंता तो कर रहे हो पर मेरी बिलकुल परवाह नहीं?’’
‘‘क्या मतलब ?’’
‘‘अरे! क्या तुमने देखा नहीं, कि अकेले इनमें ही मेरी कितनी गोलियाॅं खर्च हो गईं?’’
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