Wednesday, September 9, 2020

79 आकाॅंक्षा


 ‘‘क्यों ठेकेदार साहब! मिल आये? क्या कहा ‘जी साब‘ ने ?’’

 ‘‘आप तो सब जानते हैं ‘एजी‘ साब! फिर क्यों जले पर नमक छिड़कते हैं? आपसे मदद करने को रिक्वेस्ट किया था पर आपने भी ......’’

‘‘लेकिन भाई साब! टेंडर पास कराने के समय तो बड़ा उत्साह दिखा रहे थे? कहते थे सब कुछ हो जायेगा और अब बदल रहे हो, तो ‘जी साब’ नाराज तो होंगे ही।’’

‘‘ उस समय यह कहाॅं मालूम था कि कीमतें इतने जल्दी आसमान छूने लगेंगी, हमारा तो दिवाला ही निकल गया.....।’’

 ‘‘लेकिन जब तब चर्चा में तो यही सुना जाता है कि पृथ्वी पर यदि कोई बुद्धिमान हैं तो वह हैं एमईएस के कान्ट्रेक्टर्स, बोलो गलत कहा क्या? टेंडर के पास कराने के समय जो परसेंटेज निर्धारित हुई थी वह तो उनकी , मेरी और एकाऊंटेन्ट की , देना ही पड़ेगी ... ... ।’’

 ‘‘परंतु सर! मुझे बहुत ‘लाॅस’ हुआ है इस काम में, आगे कभी समझ लेंगे पर अभी कुछ तो मानवीयता दिखाईये, आफटर आल हमारे वर्षों पुराने संबंध है?’’

 ‘‘यार! क्या तुम्हारी यह आकाॅंक्षा वैसी ही नहीं है जैसे कोई पुत्र अपने पिता की हत्या करने के बाद बकील के माध्यम से जज के सामने गिडगिड़ाये कि उसकी सजा माफ कर दी जाये क्योंकि वह अनाथ हो गया है? ’’


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