Friday, May 1, 2020

12 मदन मर्दन

मित्रो! इस घटना के सत्य होने का दावा मैं नहीं करता परन्तु इसे मेरे नानाजी ने मुझे पचास वर्ष पहले (जब मैं विश्वविद्यालय की B.Sc. कक्षाओं का छात्र था) तब इस प्रकार सुनाई थी कि उसके सत्य होने में मुझे कोई शंका नहीं हुई। इसके साथ जुड़े अन्य उपाख्यानों और उनकी शब्दावली को मैं ने संपादित कर बुंदेली की एक अलंकारिक रचना से जोड़ दिया है जिसके रचियता का नाम ज्ञात नहीं है; इसे कक्षा नौ में पढ़ते समय मेरे हिंदी विषय के शिक्षक ने "सवैया छंद" की मात्राओं की गणना करने का अभ्यास करने के लिए दी थी। कहानी के साथ इसका रसास्वादन कीजिए।
मदन मर्दन
एक संस्कार सम्पन्न सेठ की अचानक मृत्यु हो जाने पर ब्यापार का पूरा काम उसके इकलौते लड़के के ऊपर आ गया।  वह भी अपने पिता के अनुसार बनाई गई ब्यवस्था का पालन करते हुए सफलता पाने लगा। उसकी योग्यता के कारण एक अत्यन्त सम्पन्न घराने की सुन्दर कन्या से उसका विवाह हो गया। एक बार लड़के को ब्यापार के सिलसिले में 10-15 दिन के लिए दूरस्थ शहर जाना पड़ा। दोनों यौवनावस्था के उस दौर में थे कि एक दूसरे से एक दिन भी दूर नहीं रह सकते थे फिर इतने दिन की दूरी तो साक्षात् मौत ही थी। लड़के की पत्नी बोली ‘‘आप इतने दिन के लिये हमसे दूर जा रहे हो, मैं अकेली कैसे रह पाऊंगी?’’ वह बोला ‘‘घर में सबकुछ है, नौकर चाकर हैं, कोई कठिनाई नहीं आयेगी, काम पूरा होते ही आ जाऊँगा।’’ उसकी पत्नी  कामुक प्रकृति की थी और उस पर नई नई शादी, फिर इतना लम्बा बिछोह कैसे सहेगी, उसकी यही समस्या थी। 
वह बोली, ‘‘ जिस आवश्यकता की पूर्ति केवल आप ही कर सकते हों वह इन नौकरों और सब साधनों से क्या सम्भव हो सकेगी? यदि किसी दिन कामुकता ने प्राणघातक हमला कर दिया तो मैं क्या करूंगी?’’ 
लड़का बोला ‘‘चिन्ता की बात नहीं, उस दिन तुम छत पर जाकर सूर्योदय से पहले दक्षिण दिशा में देखना जो व्यक्ति सबसे पहले उस इमली के पेड़ के पास दिखे उसे बुलाकर अपनी इच्छा की पूर्ति कर लेना, यह मेरी सहमति है।’’ 
यह कहकर वह  यात्रा पर चला गया। इधर तीन चार दिन ही मुश्किल से बीते होंगे कि उसकी पत्नी  कामाग्नि से प्रताड़ित  हुई। बार बार सबसे ऊपर की छत पर जाती, नीचे आती और सोचती, 
‘‘ परसों कहि कन्त विदेश गए, अजहॅूं न भई परसों नरसों,
इत निष्ठुर यौवन बैरि परो, उत मेघ कहें बरसों बरसों’’
हौं बारहिं बार अटारि चढ़ों, और ठाड़ि रहों तरसों तरसों,
जिय होत उड़ाय के जाय मिलों, पै उड़ो नहिं जात बिना परसों।’’

बहुत प्रयत्न करने पर भी जब रहा न गया तो अगले दिन उसने सूर्योदय से पहले ही छत पर पहुँचकर दक्षिण दिशा  में दृष्टि दौड़ाई; उसे एक आदमी केबल अन्तः वस्त्र पहिने, हाथ में  एक मिट्टी का करवा (लोटा) लिए जाता दिखाई दिया। उसने फौरन नौकर को उस ओर दौड़ाया और कहा ‘‘ उन सज्जन को आदरपूर्वक, यहाँ आने के लिये मेरा निवेदन पहुँचा दो।’’  
नौकर उस आदमी के पास पहुँचा और सेठ जी की बहु  का सन्देश  पहुँचाया, वह भी तत्काल साथ आ गये। बहु  ने उन्हें नमस्कार करते हुए ऊपर चलने के लिये सीढ़ियों की ओर इशारा किया। वह बिना झिझक ऊपर चढ़ने लगे, चार पाँच सीढ़ियाँ चढ़ ही पाये थे कि उनके हाथ का करवा (मिट्टी का लोटा) जमीन  पर गिर कर चूर चूर हो गया। 
वे तत्काल मुड़े और वापस लौटने लगे, बहु  बोली, ‘‘महोदय! क्या हुआ, वह तो मिट्टी का था इसलिए टूट गया; मैं आपको सोने, चाँदी, जैसा कहें बढ़िया लोटा दे दूँगी पर बापस न लौटिए, मेरे साथ चलिये।’’ सज्जन बोले, ‘‘उस मिट्टी के करवे ने ही मुझे साँगोपाँग देखा था, अब दूसरा कोई देखे इससे पहले मैं अपना अस्तित्व करवे की भाँति छिन्न भिन्न कर देने में ही भलाई समझता हूँ।’’ 
इतना कहकर वह चले गए पर सेठ की बहु का मस्तिष्क सक्रिय कर गये। वह सोचने लगी कि ‘‘जब यह आदमी एक निर्जीव वस्तु के साथ अपनी एकनिष्ठता नहीं तोड़ सकता तो मैं अपने प्राणप्रिय के साथ यह क्या करने जा रही थी?’’
उसने अपने को धिक्कारा और ईश्वर को धन्यवाद दिया कि उसने इस आदमी के माध्यम से सद्ज्ञान देकर पतन होने से बचा लिया।   

Thursday, April 30, 2020

11 निर्विवेकी

 निर्विवेकी 
मोहन टेलर और सोहन मिस्त्री की पक्की दोस्ती थी। दोनों दिन भर अपने अपने काम में तल्लीन रहते और शाम को अपनी दूकान/गेरेज से घर जाने के पहले ‘जनता टी हाउस‘  में चाय पीते हुए कम से कम आधा घँटा जरूर बिताते चाहे कुछ भी हो जाये। 
एक बार सोहन मिस्त्री बहुत बीमार पड़  गए। दो दिन हो गए वे टी हाउस में नहीं मिले, मोहन टेलर बड़े चिंतित। अगले दिन मोहन ने आने जाने वालों से सोहन की गैरिज का हाल चाल पता लगाया तब मालूम हुआ कि गेरेज तो बँद है सोहन की तबियत ठीक नहीं है बहुत बीमार है। मोहन  सोच बिचार में पड़ गए कि उसे, सोहन के घर जाकर देखना चाहिए या नहीं क्योंकि अगले ही क्षण यह बिचार भी आ जाता था कि वहाँ जाने पर कहीं अन्य लोग, कम सुनाई देनें के कारण मुझ पर हँसने न लगें। 
बड़ी उधेड़ बुन के बाद मोहन ने निर्णय लिया कि घर जा कर देखना ही चाहिए आखिर दोस्त ही तो है वह भी पक्का। बहरेपन के कारण हँसी होने का जो डर था उसे दूर करने का उपाय भी खोज लिया, वह यह, कि दो तीन दिन तो हो ही गए हैं, किसी  न किसी डाक्टर ने जरूर जाँच कर दवा दी ही होगी और अवश्य कुछ आराम होगा, इसलिए मैं जाकर हाल चाल पूछूँगा,वह डाक्टर का नाम लेगा, दवा का नाम लेगा, मैं डाक्टर की तारीफ करूँगा, कुछ ऐसी एक्टिंग से बातें  करूँगा कि लोग समझ ही न पाएंगे कि  मैं बहरा हूँ और जल्दी ठीक होने की कामना करते हुए जल्दी वापस आ जाऊँगा। 
आखिर अपनी योजना के अनुसार मोहन, सोहन के घर पहुँचे और देखा कि उसके परिवार वाले उसकी सेवा में लगे थे। वास्तव में सोहन की तबियत बहुत खराब थी, मोहन को देख कर उसके मन में तनाव हुआ कि  अब इसके साथ जोर जोर से बोलना पड़ेगा, कैसी मुसीबत है। खैर , उन दोनों का वार्तालाप इस प्रकार हुआ -
मोहन, ‘‘सुना है  दुश्मनों की तबियत खराब है?’’
सोहन, ‘‘अरे! ! मर रहा हूँ ,बहुत तेज बुखार है-तीन  दिन से।’’ 
मोहन, ‘‘कोई बात नहीं, मामूली है फिर भी  किसी डाक्टर को दिखाया या नहीं ?
सोहन, ‘‘ ये भी कोई पूछने की बात है ? ’’ 
मोहन, ‘‘ अच्छा! अरे साब ! वह डॉक्टर तो साक्षात धन्वन्तरि हैं,उनकी दवा तुरन्त असर करती है। अच्छा , कौन सी दवा दी है?’’
सोहन, ‘‘ जहर !’’
मोहन, ‘‘वाह! बहुत बढ़िया ! यह दवा तो रामवाण ही है, उन्होंने यही दवा मेरे एक रिश्तेदार को भी दी थी वे घँटे भर में ही ठीक हो गए थे, देखना तुम भी जल्दी ठीक हो जाओगे। ’’
उधर सोहन परेशान होकर कोस रहा था कि ये बहरा कहाँ से आ गया, ये जल्दी क्यों नहीं  चला जाता, और मोहन अपनी योजना में स्वयँ को सफल मानते हुए अपने को धन्य समझ रहा था । 

221 चिंजा की शादी

5 वीं क्लास में पढ़ रहीं स्वभाव से सीधी सादी सहुद्रा और भोली सी चिंजा में गहरी दोस्ती थी। चिंजा की स्पष्टवादिता से क्लास के सभी लड़के लड़किय...