निर्विवेकी
मोहन टेलर और सोहन मिस्त्री की पक्की दोस्ती थी। दोनों दिन भर अपने अपने काम में तल्लीन रहते और शाम को अपनी दूकान/गेरेज से घर जाने के पहले ‘जनता टी हाउस‘ में चाय पीते हुए कम से कम आधा घँटा जरूर बिताते चाहे कुछ भी हो जाये।
एक बार सोहन मिस्त्री बहुत बीमार पड़ गए। दो दिन हो गए वे टी हाउस में नहीं मिले, मोहन टेलर बड़े चिंतित। अगले दिन मोहन ने आने जाने वालों से सोहन की गैरिज का हाल चाल पता लगाया तब मालूम हुआ कि गेरेज तो बँद है सोहन की तबियत ठीक नहीं है बहुत बीमार है। मोहन सोच बिचार में पड़ गए कि उसे, सोहन के घर जाकर देखना चाहिए या नहीं क्योंकि अगले ही क्षण यह बिचार भी आ जाता था कि वहाँ जाने पर कहीं अन्य लोग, कम सुनाई देनें के कारण मुझ पर हँसने न लगें।
बड़ी उधेड़ बुन के बाद मोहन ने निर्णय लिया कि घर जा कर देखना ही चाहिए आखिर दोस्त ही तो है वह भी पक्का। बहरेपन के कारण हँसी होने का जो डर था उसे दूर करने का उपाय भी खोज लिया, वह यह, कि दो तीन दिन तो हो ही गए हैं, किसी न किसी डाक्टर ने जरूर जाँच कर दवा दी ही होगी और अवश्य कुछ आराम होगा, इसलिए मैं जाकर हाल चाल पूछूँगा,वह डाक्टर का नाम लेगा, दवा का नाम लेगा, मैं डाक्टर की तारीफ करूँगा, कुछ ऐसी एक्टिंग से बातें करूँगा कि लोग समझ ही न पाएंगे कि मैं बहरा हूँ और जल्दी ठीक होने की कामना करते हुए जल्दी वापस आ जाऊँगा।
आखिर अपनी योजना के अनुसार मोहन, सोहन के घर पहुँचे और देखा कि उसके परिवार वाले उसकी सेवा में लगे थे। वास्तव में सोहन की तबियत बहुत खराब थी, मोहन को देख कर उसके मन में तनाव हुआ कि अब इसके साथ जोर जोर से बोलना पड़ेगा, कैसी मुसीबत है। खैर , उन दोनों का वार्तालाप इस प्रकार हुआ -
मोहन, ‘‘सुना है दुश्मनों की तबियत खराब है?’’
सोहन, ‘‘अरे! ! मर रहा हूँ ,बहुत तेज बुखार है-तीन दिन से।’’
मोहन, ‘‘कोई बात नहीं, मामूली है फिर भी किसी डाक्टर को दिखाया या नहीं ?
सोहन, ‘‘ ये भी कोई पूछने की बात है ? ’’
मोहन, ‘‘ अच्छा! अरे साब ! वह डॉक्टर तो साक्षात धन्वन्तरि हैं,उनकी दवा तुरन्त असर करती है। अच्छा , कौन सी दवा दी है?’’
सोहन, ‘‘ जहर !’’
मोहन, ‘‘वाह! बहुत बढ़िया ! यह दवा तो रामवाण ही है, उन्होंने यही दवा मेरे एक रिश्तेदार को भी दी थी वे घँटे भर में ही ठीक हो गए थे, देखना तुम भी जल्दी ठीक हो जाओगे। ’’
उधर सोहन परेशान होकर कोस रहा था कि ये बहरा कहाँ से आ गया, ये जल्दी क्यों नहीं चला जाता, और मोहन अपनी योजना में स्वयँ को सफल मानते हुए अपने को धन्य समझ रहा था ।
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