Saturday, July 18, 2020

56 प्रगति


बस में दो बुजुर्ग यात्री चर्चा कर रहे थे, 
"देखो! कोई कह सकता है कि कभी यहाॅं खेतों में अन्न पैदा होता था, पेड़ पौधों की हरियाली से भरा यह एरिया कितना अच्छा लगता था, अब तो गगनचुंबी भावनों में बदल गया है।"
पास की अन्य सीट पर वैठे दो नवयुवकों ने यह सुनकर कहा, 
"दादाजी! अगली शताब्दि में देखना खेत तो इतिहास बन जायेंगे, फोटो में ही देख पायेंगे । "
बुजुर्ग यात्री बोले, "तो फिर अन्न कहाॅं से आयेगा? "
नवयुवक बोले, "अन्न की जरूरत ही कहाॅं पड़ेगी भोजन को दवा जैसी गोलियों में बदलकर खाया जायेगा जैसे अन्तरिक्षयात्री खाते हैं। "
बुजुर्ग यात्री बोले, "क्या यह सचमुच संभव होगा? "
"अरे! सब काम यंत्र ही करेंगे ।" नवयुवकों ने कहा, 
"यही नहीं , प्रयोगशाला में प्रत्येक चीज पैदा की जा सकेगी इतना तक कि इच्छानुसार गुणों और योग्यता वाली सन्तान भी । अवाॅंछनीय लोग रह ही नहीं पायेंगे।"
आश्चर्य  में डूबे बुजुर्ग बोले,
 "अच्छा है, तब तक हम नहीं रहेंगे ।"
 वे बोले, " इससे क्या फर्क पड़ेगा अन्य लोग तो रहेंगे, धरती पर जगह न मिलेगी तो किसी अन्य ग्रह पर जायेंगे,  सब  संबंध समाप्त होकर आनन्ददायी मित्रता के संबंध ही रहेंगे..., प्रगति बड़ी तेज गति से हो रही है.....।"
 अगले स्टाप पर लड़के बस से उतर गये.....बुजुर्गों की  अंगुली बरबस दाँतों तले जा पहुँची।     

Wednesday, July 15, 2020

55 लाइन


बिजली के बिल की राशि  जमा करने आईं तीन लड़कियाॅं हाथों में दो दो, तीन तीन बिल लिये, लम्बी लाइन  में न लग कर सीधे ही आगे वाले व्यक्ति के बगल में खड़ी हो गई ताकि उसकी राशी  जमा हो जाने के बाद उन तीनों का बिल भरा जा सके। ज्योंही आगे वाले व्यक्ति के बिल का भुगतान हो चुका, एक लड़की ने अपने तीन बिल भुगतान करने के लिये अपना हाथ खिड़की के अंदर कर दिया। जिस व्यक्ति का क्रम था उसने आपत्ति की, कि हम लोग एक घंटे से लाइन में लगे हैं और आप अभी अभी आईं हैं, आप भी लाइन में लगकर बिल भरें जैसा अन्य लोग कर रहे हैं......।
वे लड़कियाॅं जो आजकल की वेषभूषा में गमछे से आतंकियों की तरह मुंह ढाॅंके थी एकदम बोलीं, अरे! महिलाओं को प्राथमिकता दी जाती है, यह क्या आपको मालूम नही है? लाइन में लगे अन्य लोग बोले, आप लोग महिलायें तो किसी प्रकार नहीं लगतीं , हाॅं आतंकियों की तरह जरूर....? इस पर वे बोलीं क्या बदतमीजी है? काउंटर क्लर्क भी बोला , ठीक तो है लाइन में क्यों नहीं लगतीं?.....
बहस बढ़ते देख ड्युटी पर तैनात एक महिला कान्सटेबिल आई और वस्तुस्थिति की जानकारी ली।
वह लड़कियों से बोली, " तुम लोग, बिजली का बिल जमा करने के लिये लाइन में लगना न पड़े इसलिये महिला कहलाना चाहती हो, अन्य कामों में कहती हो हम पुरुषों से कम नहीं ?  जब महिलायें अन्तरिक्ष में जा सकती हैं, एवरेस्ट पर चढ़ सकती हैं, सीमा पर लड़ सकती हैं तो लाइन में लग कर बिजली का बिल जमा करने में क्यों डरती हैं?."..
इसके बाद...! ...! ...!

54 कुटिलता


एक कर्मकाॅंडी विद्वान जब दार्शनिक  विद्वान से तर्क में नहीं जीते तब उन्होंने कपट का सहारा लिया । अपने गाॅंव में ही शास्त्रार्थ का आयोजन कर कुछ समर्थकों को अपने पक्ष में बार बार समर्थन करने और वाहवाही करने के लिये सहमत कर लिया तथा निर्णयक भी उन्हीं में से बना दिया। 
चालाक विद्वान ने मंच पर पहुंचते ही कहा, जनता जनार्दन! मैं तो हूँ  बहुत ही छोटा और सब प्रकार से कमजोर, इसलिये चाहॅूंगा कि मैं ही पहले बोलॅूं। श्रोताओं में पृथक पृथक बैठे उसके समर्थकों ने कहा हाॅं ! अवश्य  ही तुम्हें पहले प्रश्न  पूछने का अवसर मिलना चाहिये। 
उसने, प्रतिद्वन्द्वी विद्वान से पूछा ‘‘ मैं नहीं जानता‘‘ इसका मतलब क्या है?
विद्वान ने कहा ‘‘मैं नहीं जानता‘‘ ।
चालाक विद्वान के समर्थक भीड़ में से चिल्ला उठे, हः  हः हः!  कितना सरल प्रश्न था  पर कैसा विद्वान है, कहता है, मैं नहीं जानता।
चालाक विद्वान ने श्रोताओं से कहा, भद्र महिलाओ और पुरुषो! मुझे लगता है कि हमारे आदरणीय महोदय को एक अवसर और मिलना चाहिये क्यों कि कभी कभी सरल प्रश्नों  पर प्रकाॅंड महानुभाव ध्यान ही नहीं देते, अतः यदि अब आप लोग अनुमति दें तो उनकी प्रतिभा के अनुकूल प्रश्न  पूछता हॅूं।
श्रोता बोले अवश्य ..... अवश्य ....... ।
उसने फिर पूछा, अच्छा ‘‘विवाह‘‘ के लिये क्या होना आवश्यक  है? असली विद्वान बोला, प्रश्न  बहुत ही सरल है‘, उपसर्ग ‘वि‘ + ‘वाह‘ + प्रत्यय ‘घई‘ = ‘विवाह‘ । अतः स्पष्ट है कि प्रत्यय ‘घई‘ के बिना ‘विवाह’ नहीं बन सकता।
कुटिल के समर्थक चिल्ला उठे, कैसी विचित्र बात है! हमने तो कभी भी विवाह के समय ‘घई‘ को नहीं देखा! न सुना! !
कुटिल विद्वान ने श्रोताओं से कहा,  देखिये महानुभावो! सभी जानते हैं कि विवाह में वर ,वधु ,पंडित, बराती, घराती, देवता की मूर्ति, नये कपड़े, पकवान, टोकनियाॅं ....  आदि का होना आवश्यक  है,  इनके बिना विवाह नहीं हो सकता। पर ये महाशय ‘घई‘ को अनिवार्य मान रहे हैं?
श्रोता बोले वाह!....वाह!... और कुटिल विद्वान को विजेता घोषित कर दिया गया।
सच है, जहाॅं सीमित सोच वाले पक्षपाती निर्णायक हों वहाॅं ज्ञान की गुणवत्ता तिरस्कृत ही होती है।

53 दृष्टिकोण


एक आकर्षक नवयौवना अपने घर से गन्तव्य तक जाने के लिये निकली। रास्ते में अनेक लोगों ने उसे दूर/पास से देखा।
समवयस्क नवयुवतियों ने उसके श्रंगार को, नवयुवकों ने  उसके शारीरिक सौष्ठव की तीक्ष्णता को, व्युटीशियन ने चेहरे और केश सज्जा को, फैशन डिजायनर ने वस्त्रों को, चोरों ने आभूषणों को, मोची ने चप्पलों को।
समीप से जाते हुए एक फक्कड़ संन्यासी ने भी उसे देखा परंतु वैसे ही जैसे वह कोई मिट्टी का ढेर हो।

221 चिंजा की शादी

5 वीं क्लास में पढ़ रहीं स्वभाव से सीधी सादी सहुद्रा और भोली सी चिंजा में गहरी दोस्ती थी। चिंजा की स्पष्टवादिता से क्लास के सभी लड़के लड़किय...