बस में दो बुजुर्ग यात्री चर्चा कर रहे थे,
"देखो! कोई कह सकता है कि कभी यहाॅं खेतों में अन्न पैदा होता था, पेड़ पौधों की हरियाली से भरा यह एरिया कितना अच्छा लगता था, अब तो गगनचुंबी भावनों में बदल गया है।"
पास की अन्य सीट पर वैठे दो नवयुवकों ने यह सुनकर कहा,
"दादाजी! अगली शताब्दि में देखना खेत तो इतिहास बन जायेंगे, फोटो में ही देख पायेंगे । "
बुजुर्ग यात्री बोले, "तो फिर अन्न कहाॅं से आयेगा? "
नवयुवक बोले, "अन्न की जरूरत ही कहाॅं पड़ेगी भोजन को दवा जैसी गोलियों में बदलकर खाया जायेगा जैसे अन्तरिक्षयात्री खाते हैं। "
बुजुर्ग यात्री बोले, "क्या यह सचमुच संभव होगा? "
"अरे! सब काम यंत्र ही करेंगे ।" नवयुवकों ने कहा,
"यही नहीं , प्रयोगशाला में प्रत्येक चीज पैदा की जा सकेगी इतना तक कि इच्छानुसार गुणों और योग्यता वाली सन्तान भी । अवाॅंछनीय लोग रह ही नहीं पायेंगे।"
आश्चर्य में डूबे बुजुर्ग बोले,
"अच्छा है, तब तक हम नहीं रहेंगे ।"
वे बोले, " इससे क्या फर्क पड़ेगा अन्य लोग तो रहेंगे, धरती पर जगह न मिलेगी तो किसी अन्य ग्रह पर जायेंगे, सब संबंध समाप्त होकर आनन्ददायी मित्रता के संबंध ही रहेंगे..., प्रगति बड़ी तेज गति से हो रही है.....।"
अगले स्टाप पर लड़के बस से उतर गये.....बुजुर्गों की अंगुली बरबस दाँतों तले जा पहुँची।