Tuesday, September 8, 2020

73 यस सर !

नये अफसर ट्रास्फर पर आये। आफिस में सब जगह चर्चा होने लगी ....  

‘‘बड़ा कड़क आदमी है, खाता पीता नहीं है, नियम का पक्का, किसी से दबता नहीं चाहे कोई नेता या मंत्री ही क्यांे न हो,‘‘ आदि आदि।

 हर आफिस में कुछ न कुछ ऐंसे कर्मचारी अवष्य पाये जाते हैं जो  ‘‘बाॅस‘‘ के निकट होकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते रहते हैं। अफसर के ज्वाइन होते ही कुछ लोग, आदत से मजबूर बार बार अपनी अपनी फाइलें लेकर ‘बाॅस‘ के पास जाते और कोषिष करते कि वह उन्हें निष्ठावान समझने लगे। उनकी इस प्रकार की कृत्रिम सक्रियता को अफसर भी जल्दी ही ताड़ गये। एक दिन उन्होंने इन हाॅं में हाॅं मिलाने वालों से अलग अलग बुलाकर कहा- 

‘‘आज आफिस की छुट्टी के बाद तुम्हारे साथ बाजार चलेंगे।‘‘ 

सभी उत्साहित, यथासमय एक एक कर अफसर के पास जा पहुंचे और एक दूसरे को देखकर मन ही मन बेचैन भी हुए, पर क्या करते ‘बाॅस‘ के साथ तो संबंध बनाना ही थे इसलिये चुपचाप वह अवसर देखने लगे जिसमें तत्परता से ‘बाॅस‘  के आदेष का पालन कर सकें।

बाजार में अफसर के साथ साथ हाॅं में हाॅं मिलाते, अगल बगल पैदल चलते हुए उन्हें अचानक एक भिखारी सामने से आता दिखा। 

अफसर बोले, ‘‘अरे! देखो! लगता है इसने तो कई दिनों से भर पेट खाया ही नहीं होगा।‘‘  

सभी एक साथ बोले ‘‘‘जी सर‘ ।‘‘ 

-‘‘अरे! इसके तो कपड़े भी बिलकुल फट गये।‘‘

 फिर सभी बोले ‘‘‘यस सर‘ ।‘‘

-‘‘ लगता है बीमार भी है... .‘‘.  

‘‘यस सर!‘‘

- ‘‘अच्छा तो, इसको अभी पाॅंचसौ रुपये दे दो ...‘‘

 सभी उसी लहजे में बोल गये ‘‘यस सर! ‘‘ फिर अचानक सोच में पड़ गये , कौन दे? 

- ‘‘क्या हुआ? निकालो रुपये और दे दो उसे।‘‘

अब क्या था... ...  सब ने मिलकर उसे पाॅंच सौ रुपये दे दिये ... ...। 

- ‘‘अब तुम लोग अपने अपने घर जा सकते हो मुझे बाजार में अन्य कार्य करना है।‘‘


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