‘‘ क्यों ! ! तुम लोगों ने घंटी नहीं सुनी? क्लास शुरु हो चुकी है और तुम लोग यहाॅं क्या कर रहे हो?‘‘
‘‘ साॅरी सर! हमलोग विचारों में इतने खो गये कि कब घंटी बज गई पता ही नहीं चला‘‘
अच्छा! हम भी तो जाने किन विचारों में खो गये थे? क्लास अटेंड न करने का यह कौन सा प्लान चल रहा था?‘‘
सर! हम लोग यह सोच रहे थे कि पिछले तीन वर्षों से हमारे इस ग्राॅउंड के चारों ओर फारेस्ट डिपार्टमेंट बृक्षारोपण करता है और देखभाल की जिम्मेवारी लेता है पर उन सैकड़ों रोपे गये पौधों में से केवल दो ही जीवित हैं उनकी भी न तो छाया का लाभ होता है और न ही फूलों की सुगंध, ये लोग इस प्रकार के अनुपयोगी पौधे क्यों बार बार लगाते हैं?‘‘
‘‘ तुम लोगों का सोच तो सही है, पर यह सब हमारे देश के नेताओं और उनके सलाहकार अफसरों की सनक का प्रभाव ही कहा जायेगा जो हर काम को यह सोचकर करते कराते हैं कि उसमें उनको कितना आर्थिक लाभ होगा ‘‘
‘‘ सर ! कल हमलोगों को विज्ञान की क्लास में पढ़ाया गया है कि पीपल का पेड़ पर्यावरण के प्रदूषण को दूर करने में बहुत सहायक है, वह दिन रात जीवनदायनी आक्सीजन देता है और प्रदूषण कारक कार्बनडाईआक्साइड सोखता है, जबकि अन्य पेड़ पौधे केवल दिन में ही आक्सीजन दे पाते हैं। पीपल को अधिक खाद पानी की भी जरूरत नहीं होती, कहीं भी उग आता है, तो इस प्रकार के बहुउपयोगी और कम लागत पर उपलब्ध होने वाले पीपल के पौधे का सभी जगह रोपण क्यों नहीं किया जाता?‘‘
‘‘ मैंने कहा न! देश के कर्णधार पहले प्रदूषण फैलाने के लिये बड़े बड़े उद्योग लगायेंगे फिर, हो हल्ला मचायेंगे कि जीवन को खतरा है.... और एक ही जगह बार बार अनुपयोगी अल्पजीवी पौधों का रोपण करायेंगे.... जैसा कि तुम लोगों ने देखा भी है‘‘
‘‘सर! क्या देश के सभी उद्योगिक परिसरों में अधिक से अधिक पीपल के पेड़ लगाने का सुझाव नहीं दिया जा सकता ताकि प्रदूषण फैले ही नहीं?‘‘
‘‘क्यों नहीं ! परंतु उस पर ध्यान कौन देता है? हमारी सुनता कौन है?‘‘
‘‘ अच्छा सर! तो क्या पीपल के पेड़ लगाने का काम हम लोग अपने परिसर से ही प्रारंभ नहीं कर सकते? उसकी तो कलम भी लग जाती है, कुछ दिनों तक ही पानी देना पड़ता है फिर तो वह अपने आप बढ़ने लगता है , कहीं भी पनप जाता है और सैकड़ों वर्ष जीवित रहता है, छाया भी खूब घनी होती है, उसके फल और छाल आयुर्वेदिक औषधियाॅं बनाने के काम आती हैं, यह हमने पढ़ा है।‘‘
‘‘ क्यों नहीं, गुड आइडिया, परिसर में ही क्यों ? सड़कों के किनारे और गाॅंव के आस पास रिक्त स्थानों पर भी उन्हें क्यों न लगाया जाये, हमें देखकर अन्य स्कूलों में भी पीपल के पेड़ लगाने का विचार आयेगा। आज शाम को ही हम लोग चारों ओर एक एक पीपल का पेड़ लगायेंगे और पूरा बढ़ चुकने तक उसकी देखरेख करेंगे, गाॅंव के अन्य स्थानों के संबंध में ग्राम प्रधान से मैं आज ही बात करता हॅूं।‘‘
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