Saturday, September 12, 2020

88 यादों के रंग

 

सदा हॅंसते रहने वाले रवि को देर तक फोन पर किसी पुराने मित्र से बड़ी मस्ती भरी बातें पूरी करते करते अचानक बहुत सीरियस हो जाने पर सुनीता ने पूछा, 

‘‘ क्या बात है? फोन पर तो बड़ा रंग बरसा रहे थे अब अचानक क्या हुआ? कौन था या थी?‘‘

रवि जैसे तन्द्रा से जाग गया हो, सुनते ही बोला,

 ‘‘ ओह सुनीता! सब तारतम्य बिगाड़ दिया, तुमने तो रंग में भंग ही कर दिया।‘‘

‘‘अच्छा!  तो क्या मैं जान सकती हॅूं कि यह भंग हो जाने वाला रंग किसका था?‘‘

‘‘ अरे! यूनीवर्सिटी में पढ़ते समय एक सुंदर गीत के कारण हुई दोस्ती याद आ गयी और वे रंगीले दिन भी। अनेक वर्षों बाद आज फोन पर उससे बात हुई , लग रहा था जैसे बाॅटनी गार्डन में मित्रमंडली के साथ बैठा वह, वही गीत सुना रहा है।‘‘

'‘ तो क्या तुम मुझे वही गीत सुनाते हुए अपनी उन्हीं यादों को फिर से ताजा नहीं कर सकते? ‘‘

‘‘ मैं तुम्हें गीत के केवल बोल ही सुना सकता हॅूं, लय और तान का गायक तो वही है, मैं तो श्रोता ही रहा हॅूं हर समय।‘‘

‘‘ चलो वही सुना दो, रंग तो वापस आये‘‘

‘‘बुंदेली में गाये उस गीत के बोल हैं,  

.....पिया मोय भूल जिन जैयो, पिया मोय बिसर जिन जैयो, 

  मोरी चुरियन के रखवारे मोरे ऐंगर रैयो, पिया मोय.... ‘‘

ये लाइनें सुनते ही सुनीता अपने स्कूल के दिनों में खेले गये नाटक ‘‘ढोला मारु‘‘ की याद में खो गई जिसमें ‘ढोला‘ बनी उसने, अपने पति ‘मारु‘ बने सहपाठी ‘ज्ञान‘ को रिझाने के लिये यही गीत गाया था और अभिनय इतना आकर्षक बना था कि साथ पढ़ने वाले लड़के/लडकियाॅं उन्हें पति पत्नी कहकर ही बुलाने/ चिढ़ाने लगे  थे, जिससे तंग आकर दोनों ने एक दूसरे से बात न करने और भविष्य में कभी न मिलने की कसम खाई थी।

सुनीता को सीरियस देख रवि ने ताना दिया, 

‘‘क्या बात है? कहाॅं खो गईं?‘‘

सुनीता अपनी भाव भंगिमा छिपाते हुए बोली, 

‘‘कुछ नहीं ! गीत में प्रेमिका के भय मिश्रित संदेह को कितनी अच्छी तरह मेरी बुंदेली भाषा में प्रकट किया गया है, बस मैं तो यही सोच रही थी, लेकिन तुम अचानक उदास क्यों हुए?‘‘ 

‘‘इसलिये कि मैंने अनेक बार उसे अपने घर बुलाकर अपने अन्य सहपाठियों के साथ उसके गीतों का आयोजन करने का प्रस्ताव दिया पर किसी न किसी कारण से वह टालता गया और अब, मेरे उस मित्र ‘ज्ञान‘ ने अमेरिका जाकर वहीं  बसने का निश्चय कर लिया है‘‘

सुनते ही रंगहीन हुई स्तब्ध सी सुनीता, एक ओर तो मन ही मन ज्ञान को अपनी निरर्थक कसम देने के लिये क्षुब्ध थी और दूसरी ओर उसकी सात्विक वचनबद्धता के प्रति कृतज्ञता आंखों में छलकने को उत्सुक आंसुओं को रोकने का प्रयत्न कर रही थी। 



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