Thursday, September 10, 2020

87 परम्परा

 हाथ में लटकाये टीन के डिब्बे में एक काले रंग की तेल में अधडूबी मूर्ति की ओर इशारा करते हुए एक किशोरवय के लड़के ने श्रीमती गुप्ता से कहा-

‘‘ माताजी ! शनिदेव को सरसों का तेल चढ़ाइये, सब कष्टों से मुक्ति मिल जायेगी’’ 

श्रीमती गुप्ता आठ दस ग्राम सरसों का तेल डिब्बे में डालकर एक रुपये का सिक्का उस लड़के को देने को उत्सुक हुई ही थीं कि पास आकर गुप्ताजी उस लड़के से बोले-

‘‘ क्यों रे ! मैंने पिछले शनिवार को भी डाॅंट कर भगाया था आज फिर भी तू आ गया? भाग यहाॅं से नहीं तो बहुत पीटूंगा और पुलिस के हवाले कर दूंगा ‘‘

लड़का डर कर भागा......,

श्रीमती गुप्ता बोलीं-

‘‘ खुद तो कोई भजनपूजन करते नहीं, कोई दूसरा करे तो तुम्हें उसी पर आपत्ति होती है, तुम्हारा क्या नुकसान कर दिया उसने? शनिदेव न्याय के देवता हैं, व्यर्थ ही नाराज हो जायेंगे’’

" अरे ! तुम महिलाओं को सिर्फ अंधविश्वास और आडम्बर प्रिय होता है इसी कारण वे आदिकाल से लुटती चली आ रही हैं‘‘

‘‘ ऐंसा नहीं है। तुम पुरुष लोग चाहते ही नहीं कि स्त्रियाॅं शनिदेव का आशीर्वाद पाकर अपना न्यायसंगत महत्व स्थापित कर सकें। पुरुषवर्ग यह चाहता है कि केवल वही उनके कोप से बचे रहें ताकि घर और समाज दोनों जगह अपना वर्चस्व बनाये रख सकें। देखा नहीं, महाराष्ट्र के एक शनि मंदिर में तो महिलाओं को घुसने पर भी पुरुषों ने प्रतिबंध लगा रखा है’’ 

‘‘ हाॅं ! अच्छा याद कराया, उसी मंदिर में अभी अभी हुये मेनेजमेंट कमेटी के अध्यक्ष के चुनावों में एक महिला को ही चुना गया है जिसने कहा है कि वह महिलाओं को शनिमंदिर में नहीं घुसने देगी क्योंकि यह तो सैकड़ों वर्ष पुरानी परम्परा है जिसे कैसे तोड़ा जा सकता है। उसका कहना है कि भले ही सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को मंदिर में प्रवेष पर लगाये गये प्रतिबंध को समाप्त कर दिया है, परंतु वह उसे नहीं मानेगी। इसे क्या कहोगी?’’ .... .... 

‘‘ यही न! कि महिलाओं को तो अंधविश्वासों और आडम्बरों के मायाजाल में उलझकर लुटने, पिटने और मिटने की परंम्परा का ही पालन करना है?’’ 

 


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