‘‘ कल सिटी में एक पान के टपरे पर आपके आफिस के कुछ लोग आपकी बहुत बुराई कर रहे थे। मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगा, पर उतनी देर तक तो सब कुछ सुनना ही पड़ा जब तक पान खरीद रहा था।‘‘
‘‘ लेकिन मैं ने तो कभी उनका कुछ अच्छा किया ही नहीं, तो फिर वे लोग क्यों बुराई कर रहे थे? बड़ा आष्चर्य है।‘‘
‘‘ क्या मतलब? आपने कुछ भी अच्छा नहीं किया?‘‘
‘‘ हाॅं, संसार का नियम है न ? कि अच्छा करो तो बुरा मिलता है, इसीलिये कह रहा हॅूं।‘‘
‘‘ नहीं! मैं ने कानों से सुना है, आपको उनके विरुद्ध कार्यवाही करना चाहिये, आखिर यह आपकी कर्तव्यनिष्ठा और प्रतिष्ठा की बात है।‘‘
‘‘ यदि मैं उन लोगों पर बहुत अधिक ध्यान देता हॅूं जो मेरी तारीफ करते हैं या निंदा करते हैं तो मैं अपना वास्तविक काम नहीं कर पाऊंगा। चॅंूकि मैं यहाॅं बहुत कम समय के लिये आया हॅूं इसलिये मैं समझता हॅूं, मुझे केवल उस काम पर ध्यान देना चाहिये जो करने के लिये ईश्वर ने मुझे भेजा है।‘‘
‘‘अरे ! वह तो ठीक है पर अपनी पोजीशन का भी तो.... ‘‘
‘‘ भाईसाब! मैं तो केवल यह जानता हॅूं कि अपने निर्धारित कार्य को करते हुए मुझे यह ध्यान रखना चाहिये कि मैं परमसत्ता से संबंधित हॅूं और उन्हीं से आया हॅूं तथा वापस उन्हीं के पास जाना हैे अतः अपना काम पूरी गुणवत्ता के साथ जल्दी ही सम्पन्न कर लेना चाहिये, चाहेे कोई बुराई करे या प्रशंसा ।‘‘
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