‘‘ ओह, दीनू! बड़े ही दुख की बात है कि मेरे सबसे अच्छे मित्र और तुम्हारे पिता जी असमय ही चले गये, अब परिवार में सबसे बड़े होने के कारण तुम पर ही जिम्मेवारी आ गयी है, हमारी जरूरत हो तो निःसंकोच बताना‘‘ ।
‘‘ परिवार की देखरेख तो बाद की बात है ठाकुर चाचाजी! अभी तो त्रयोदषी और पिंडदान के कार्य को सम्पन्न करने में ही कठिनाई जा रही है।‘‘
‘‘क्यों? क्या बात है, किस प्रकार की कठिनाई जा रही है?‘‘
‘‘ परिवार के बुजुर्गो और अन्य रिश्तेदारों का कहना है कि इसमें पूरे गाॅंव के अधिक से अधिक लोगों को भोजन कराना पड़ता है, और पूजन कराने के लिये पंडित जी के अनुसार स्वर्ग में नन्दनवन के भीतर लगे पारिजात बृक्ष के नीचे तक मृत आत्मा को पहुंचाने की दक्षिणा पाॅंच हजार रुपये, स्वर्ग के गेट के बाहर तक पहुंचाने के तीन हजार रुपये और गेट से पच्चीस किलोमीटर दूर छोड़ने के एक हजार रुपये लगेंगे। बस इन्हीं बातों ने समस्या बना दी है।‘‘
‘‘ अरे! तुम भी किस जमाने में रहते हो? मृत्युभोज पूरे गाॅंव के लोगों को देने का कोई विधान नहीं है, अपनी श्रद्धा और सामथ्र्य के अनुसार ही इसे करना चाहिये, इसकी भी अनिवार्यता नहीं है।‘‘
‘‘ यह तो मैं समझता हॅूं पर घर के बुजुर्गो को समझाना बड़ा कठिन है, वे सब तो इन पंडितों के कहे अनुसार ही चलते हैं‘‘
‘‘ देखो भाई! मेरे विचार से तो अपने सामथ्र्य से बाहर कोई भी काम नहीं करना चाहिये, तुम तो साइंस के विद्यार्थी हो, स्वर्ग नर्क की बातों में क्यों भ्रमित होते हो? सोचो, उन्हें भोजन कराने का क्या अर्थ है जो दिन में तीन बार खाते हैं, अच्छा तो यह होगा कि गाॅंव के सबसे गरीब तेरह लोगों को भोजन करा दो और पंडित जी से कहो कि हमारे पिताजी पच्चीस नहीं पचास किलोमीटर पैदल चल कर वहाॅं पहुंच जायेंगे, बस इतनी पूजा करने की जो दक्षिणा वे कहें सो दे देना। रुपयों पैसों की जितनी आवश्यकता हो मुझसे ले लेना, चिंता न करना। बुजुर्गो को मैं भी समझाने का प्रयत्न करूंगा, मैं तुम्हारे साथ हॅूं।‘‘
‘‘ ठाकुर चाचा! मुझे तो लग रहा है कि जैसे साक्षात मेरे पिता ही आपके रूप में आकर मेरे मन का बोझ उतार रहे हैं, उनकी भी इसी प्रकार की विचारधारा थी। ‘‘
‘‘ बिलकुल। हमलोग स्कूल में साथ पढ़ते समय अपने षिक्षकों से इन विंदुओं पर खूब बहस किया करते थे और अपने तर्कों से सभी को सहमत कर लिया करते थे। एक बात और ध्यान रखना, संस्कृत में कही गई हर बात वेदवाक्य नहीं होती, पंडित लोग जो संस्कृत के कुछ ष्लोक सुनाकर पूजा सम्पन्न कराते हैं यदि उनके अर्थ के अनुसार भावनायें न हों तो उसका कोई प्रभाव नहीं होता। इस अवसर पर की जाने वाली पूजा के मंत्रों का सार यह होता है कि हे प्रभो! जबतक यह आत्मा हमारे साथ थी तब तक हमने यथाशक्ति उसकी सेवा की परंतु अब वह अपके आधीन और नियंत्रण में है, अब उस पर अपनी कृपादृष्टि बनाये रखना। इसलिये इस प्रकार की भावना से ही सभी कर्म सम्पन्न करना, यही असली पिंडदान है, अन्य सब तो कर्मकाॅंडीय प्रदर्शन ही है।‘‘
No comments:
Post a Comment