‘‘ क्यों संजय! जानते हो, एक समय था जब परीक्षाओं को उत्सव की तरह माना जाता था। फिर, परीक्षा में पास हो जाने वाले उत्सव और फेल होने वाले दुख मनाने लगे। इसके बाद परीक्षाओं में फेल होने वाले आत्महत्या करने लगे। पर, अब तो विचित्र जमाना आ गया है, परीक्षा देने से पहले ही छात्र आत्महत्या करने लगे हैं?‘‘
‘‘ हाॅं सुशील! बात तो तुमने सही पकड़ी है यार ! पता नहीं इन छात्रों को कौन इतना भयभीत कर देता है कि वे परिणाम की प्रतीक्षा करने के पहले ही जीवन समाप्त करने लगे हैं, जैसे मेरिट में न आ पाना या किसी विषय में कमजोर होना, या परीक्षा में फेल हो जाना कोई गंभीर अपराध होता हो।‘‘
‘‘ मेरे विचार से तो इसमें बच्चों की तुलना में उनके माता पिता का ही अधिक दोष होता है जो अपनी संतान से उनकी बौद्धिक क्षमताओं और अभिरुचियों का विश्लेषण किये बिना ही अपनी उन अपेक्षाओं को मूर्तरूप देने के सपने देखने लगते हैं जो उनसे स्वयं कभी पूरी नहीं हो सकीं ।‘‘
‘‘ हाॅं, यही मुझे भी लगता है, क्योंकि बोर्ड या यूनीवर्सिटी की परीक्षाओं में मेरिट पाना या बहुत अधिक प्राप्ताकों का आना अब उतना विश्वसनीय नहीं रह गया जितना कभी माना जाता था। इसके अनेक उदाहरण तब देखने को मिलते हैं जब किसी प्रतियोगी परीक्षा के परिणाम में बोर्ड/विश्वविद्यालय की परीक्षा के मेरिट होल्डर प्रारंभिक परीक्षा में भी पास नहीं हो पाते जबकि सामान्य प्रथम श्रेणी लाने वाले अंतिम रूपसे चयनित हो जाते हैं।‘‘
‘‘ अरे! क्या तुमने देखा नहीं, इस पास फेल और मेरिट के चक्कर में नकल करने और कराने की प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है, मूल्याॅंकन का कार्य अपात्रों के द्वारा कराया जाने लगा है, इतना ही नहीं नकल कराने, पास कराने, मेरिट दिलानें के ठेकेदारों का व्यवसाय भी जोरशोर से चलने लगा है।‘‘
‘‘ अच्छा ये बताओ कि यूपीएससी या पीएससी की परीक्षाओं में परीक्षार्थी नकल क्यों नहीं कर पाते? उन परीक्षाओं का मूल्याॅंकन विश्वसनीय क्यों माना जाता है? क्या बोर्ड और यूनीवर्सिटीज की परीक्षाओं तथा मूल्याॅंकन कार्य को इनकी तरह ही विश्वसनीय नहीं बनाया जा सकता? हम ज्ञान और कौशल केन्द्रित अध्ययन/अध्यापन का लक्ष्य छोड़कर केवल पास होने के लिये कब तक पढ़ते पढ़ाते रहेंगे? क्या इस प्रकार हम केवल साक्षर बेरोजगारों की भीड़ में लगातार बृद्धि नहीं करते जा रहेे?‘‘
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