एक मिठाई की दूकान के प्रवेश द्वार पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था ‘‘ आपकी सेवा में लगातार चालीस वर्षों से संलग्न, उत्कृष्ट मिष्ठान्न भंडार‘‘ जिसे पढ़कर एक सज्जन भीतर जा पहुंचे और एक खाली सीट पर बैठ गये।
‘‘ बोलिये सर! आपकी क्या सेवा करूं ‘‘
‘‘ आपकी जो इच्छा हो‘‘
‘‘ सर! आप आदेश दीजिये सेवक पालन करने के लिये उपस्थित है‘‘
‘‘ सेवा पूंछ कर नहीं स्वाभाविक रूप से की जाती है, चालीस वर्षों से सेवा कर रहे हो और इतना भी नहीं मालूम?‘‘
‘‘ सर ! यदि आप बता दें कि आप को क्या पसंद है, वर्फी, गुजिया, गुलाबजामुन, रसमलाई, जलेबी , पेड़ा ...... हम वही सेवा में प्रस्तुत कर दें‘‘
‘‘ अजीब बात है, सेवा, सेवा, सेवा! जाओ रसमलाई , वर्फी, गुजिया और जलेबी सब कुछ लाओ‘‘
‘‘ सर ! और कुछ?‘‘
‘‘ बस‘‘
‘‘ सर ! यह बिल, ‘व्यासी रुपये‘ काउंटर पर दे दीजिये‘‘
‘‘ ये किस बात के?‘‘
‘‘ अरे! जो मिठाइयाॅं आपकी सेवा में अभी परोसी गई थी, उनकी कीमत‘‘
‘‘ क्या बात है! बाहर लिखे हो और बार बार सेवा, सेवा, सेवा कह भी रहे हो फिर यह पैसे क्यों मांग रहे हो? सेवा तो निःषुल्क होती है? सेवा में तो केवल देना ही होता है लेना कुछ नहीं समझे? यदि पैसे लेना है तो यह तो व्यापार हुआ, इस हाथ ले उस हाथ दे, सेवा कहाॅं हुई? तुम लोग सेवा षब्द का दुरुपयोग कर रहे हो? तुम्हें मातृ भाषा की कद्र करना सीखना चहिये... .... ?‘‘
‘‘ तो शासकीय सेवक , बड़े बड़े अफसर, विधायक , साॅंसद, मंत्री ये सब सरकार की सेवा नहीं करते?‘‘
‘‘ नहीं । सभी लोग काम करते हैं और वेतन पाते हैं, यह तो नौकरी कहलाती है सेवा नहीं , सेवा में केवल देना और केवल देना ही होता है, कुछ भी लेने की कोई अपेक्षा नहीं होती।‘‘
‘‘ अरे!!! ए भाई साब! क्या लेक्चर दे रहे हो, यहाॅं सुनो.... बुजुर्गो ने कहा है कि सेवा करोगे तो मेवा मिलेगा, बोलो कहा है कि नहीं?‘‘
‘‘ हाॅं‘‘‘
‘‘ तो हमारी सेवा का ही मेवा है एट्टीटू रुपीज, ... दीजिये प्लीज?‘‘
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