‘‘ क्या हुआ? दो दिन से देख रही हॅूं तुम न्यूजपेपर लेकर थोड़ी देर में उदास होकर बैठ जाते हो?‘‘
‘‘ अरे, परसों अनाथालय को एक हजार रुपया दान में दिया था, पेपर वालों ने फोटो भी लिया था, पर अभी तक समचार पत्र में छापा नहीं है।‘‘
‘‘ अब समझी, दानवीर बनने के चक्कर में दो दिन से नींद नहीं आ रही?‘
‘‘ तुम्हें तो मेरा मजाक उड़ाने के अलावा कुछ नहीं सूझता ।‘‘
‘‘ नहीं तो और क्या कहॅूं? दान दे दिया बस भूल जाओ, अब यह क्या सोचना कि पेपर वाले नाम और फोटो छापकर दानवीर घोषित करते हैं कि नहीं?‘‘
‘‘ तुम से तो कोई जीत ही नहीं सकता‘‘
‘‘जीतने और पेपरों में छाये रहने वाले लम्बे खेल खेलते हैं, देखा नहीं चोट्टामल खोट्टामल घपलानी ने राजनैतिक पार्टी को पाॅंच लाख रुपये चंदा देकर अगले चुनाव के लिये विधायक का टिकिट बुक करा लिया है। चुनाव में भी इतने ही खर्च कर जीत जायेगा और फिर पाॅंच साल में करोड़ों कमायेगा, मान, यश प्रतिष्ठा और जीवन भर की पेंशन पायेगा वह अलग।‘‘
‘‘ इस राजनीति के पचड़े में पड़ना ही बेकार है, अपना तो छोटा मोटा धंधा ही ठीक है, मन की शाॅंति तो रहती है। मैंने तो इनकम टेक्स में रिवेट पाने के लिये ही दान दिया था।‘‘
‘‘ अच्छा! थोडे़ से इनकम टेक्स वचाने के चक्कर में दो दिन से नींद खोये बैठे हो, कहते हो कि मन की शाॅंति चाहिये? अरे, यह व्यवसाय का युग है, अच्छी लागत लगाओ, लम्बे खेल खेलो और फिर सब कुछ पाओ धन, पद, सम्मान, प्रतिष्ठा और कहलाओ युगपुरुष।‘‘
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