फूला और मूला दोनों बहनों के आठवीं कक्षा पास करते ही उनके माता पिता ने क्रमशः उनका विवाह कर दिया । फूला के पति का फूलों का व्यवसाय था, बड़े से फूलों के बगीचे में ही उनका घर था और घर भी फूलों से भरा रहता था। मूला के पति का मछली पालन का व्यवसाय था और उनका घर छोटे छोटे तालाबों के बीच था और घर मछलियों से भरा रहता था।
15/20 वर्षों बाद किसी काम से मूला के पति को फूला के गाॅंव जाना पड़ा, तब मूला ने भी साथ चलने का आग्रह किया ताकि वह बहुत वर्षों बाद अपनी बहिन से मिल सकेेगी और साथ में ही लौट भी आयगीे।
मूला और उसके पति को अचानक आये देख फूला और उसके पति अपना सब काम दूसरों को सौंप कर उनके स्वागत में जुट गये और उन्हें मना लिया कि अब कम से कम दो दिन तो उन्हें वहीं रुककर उनका आतिथ्य ग्रहण करना ही होगा। रात में सभी लोग विश्राम करने लगे। फूला दम्पति तो चैन से सो गये पर मूला दम्पति को क्षण भर भी नींद नहीं आई। सोच रहे थे कि एक रात काटने में जब इतनी मुश्किल है तो दो दिन कैसे कटेंगे? उन्हें लगता था कि कब सवेरा हो और वे अपने घर पहुंचें।
उन्हें, वहाॅं इतनी घुटन हो रही थी कि सवेरा होने से बहुत पहले वे दोनों, फूला और उसके पति से बिना मिले ही अपने गाॅंव चल दिये और वहीं फर्श पर फूलों को अक्षरों का आकार देकर लिख दिया, ‘‘स्वागत के लिये धन्यवाद, कभी फिर मिलेंगे‘‘।
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