Wednesday, September 2, 2020

66 पतिव्रता

 66 पतिव्रता

जोधन सिंह अपने लापरवाह परंतु ग्रेजुएट पुत्र को एक दिन अपने पास वैठा कर बड़े प्रेम से समझा रहे थे-

-" देखो निरंजन! पहला सुख, निरोगी काया । दूसरा सुख, घर में माया । तीसरा सुख, पतिव्रता नारी । 

4था सुख, सुत.... आज्ञाकारी.... "

" उनके, यह वाक्य पूरा बोलने से पहले ही निरंजन बोल पड़ा..."

- पिताजी! मैंने तो पढ़ा है कि प्रत्येक मनुष्य की दो पतिव्रतायें होती हैं जो जन्म से मृत्यु तक उसका साथ निभाती है फिर आप केवल एक मानकर उनको तीसरा नम्बर क्यों दे रहे हैं ? उन्हें तो पहले स्थान पर होना चाहिये ?

- किस प्रकार?

- अरे ! एक ‘आशा‘ जो हमेशा आगे आगे चलती है और दूसरी ‘दुर्दशा‘ जो हमेशा पीछे पीछे चलती है।

- अरे सौभाग्यवती ! ! जरा देखो , तुम्हारा सुपुत्र क्या पढ़ रहा है! ! !

- पिताजी ! माॅं को बीच में क्यों लाते हो..., शास्त्र कहते हैं कि, 

‘‘ सर्वासामेव नारीणाॅं नार्ये द्वेति पतिव्रते, ‘आशा‘ मे पुरतो याति ‘दुर्दशा‘ याति पृष्ठतः‘‘

 मैं तो वही कह रहा हॅूं.... ।


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