गौरीशंकर चौबे स्वयं सातवीं तक पढे़ थे पर तात्कालिक समय के नियमानुुकूल एक गाॅंव के सरकारी प्रायमरी स्कूल में शिक्षक हो गये।
स्कूल में शिक्षकों की कमी होने से हेडमास्टर ने उन्हें दूसरी, तीसरी, और छठवीं कक्षा की हिन्दी और गणित पढ़ाने का काम दे दिया। दूसरी और तीसरी कक्षा को पढ़ाने में अधिक कठिनाई नहीं थी उन्हें, पर छठवीं में तो गणित क्या हिन्दी में ही पसीना में तर हो जाया करते । इसलिये कि बच्चे शांत बैठे रहें और दूसरों को कोई डिस्टर्बेंस न हो, वे अपने पीरियड में उन्हें कोई न कोई कहानी सुना दिया करते और रोज ही मन में प्रार्थना करते कि जल्दी ही किसी शिक्षक की पोस्टिंग हो जाये और इस छठवीं कक्षा की बेगार से मुक्ति मिले।
एक दिन जब वे तीसरी कक्षा में गणित पढ़ा रहे थे, छठवीं कक्षा के दो छात्र किसी कारण झगड़ पड़े और
शिकायत उनके माता पिता तक पहुंची। अगले दिन दोनों पक्षों के अभिभावक हेडमास्टर के पास समस्या का निराकरण कराने आये। हेडमास्टर ने चौबेजी को जाॅंचकर्ता अधिकारी बनाकर रिपोर्ट एक घंटे में सौपने का निर्देश दिया । चौबेजी वैसे ही छठवीं कक्षा से डरते से थे कि एक और बला आ गयी ।
जाॅंच प्रारंभ की गई। जिस लड़के को चोट लगी थी उसने बताया कि देखो, मेरे हाथ में इसने स्केल पट्टी से मारा है। जिस लड़के ने मारा था उसने मारना स्वीकार किया पर साथ ही यह भी कहा कि मैंने पहले इसे तीन बार समझाया था कि मेरे बस्ते में अपनी स्लेट न रखे, पर यह नहीं माना। परसों ही तो आपने एक कहानी के माध्यम से यह पढ़ाया था कि ‘‘अपने दुश्मन को तीन बार समझाना चाहिये, समझाने पर न माने तो लड़ जाना चाहिये‘‘ इसलिये मैंने इसे मार दिया।
चौबे जी को लगा कि अब तो मेरी पोल खुलने वाली है और सबके सामने बेइज्जती होने वाली है पर फिर भी साहस कर वे पूरी सच्चाई के साथ अपनी जाॅंच रिपोर्ट तैयार कर हेडमास्टर के पास बैठे अभिभावकों के सामने ले गये।
सब के सामने रिपोर्ट पढ़ी गयी जिसमें इस घटना के लिये चौबेजी ने अपने को दोषी माना और कहा कि उन्हें ही दंडित किया जाये। रिपोर्ट में यह भी लिखा था कि मारने वाला छात्र निर्दोष है क्योंकि उसने तो शिक्षक द्वारा दी गई शिक्षा का पालन कर अपनी योग्यता ही सिद्ध की है ।
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