Friday, June 19, 2020

47 करोड़पति


अनेक वर्षों से शहर से बाहर एक पेड़ के चारों ओर बने चबूतरे पर एक वयोबृद्ध भिखारीनुमा फकीर अपनी पूरी गृहस्थी  को एक फटे  पुराने  कंबल में लपेटे रहा करते थे। एक करोड़पति सेठ ने उस पेड़ के सामने की जमीन को खरीद लिया और  अपना शानदार भवन बनवाकर  रहने लगे। 
पेड़ बहुत पुराना था और उसे काटने पर प्रतिबंध था इसलिये भिखारी महोदय भी शान से अपने चबूतरे पर यथावत निर्विघ्न रहने के लिये निश्चिन्त  थे। परंतु सेठ जी के परिवार वालों को भिखारी की गृहस्थी ठीक नहीं लगती थी क्योंकि भिखारी तो दिन में भीख मांगने चला जाता पर वह चबूतरा जिस पर कथरी रखी रहती उनके मुख्यद्वार के बिलकुल सामने पड़ने से उन्हें बुरी लगती। उन्होंने  अनेक प्रलोभन देकर उसे वहाॅं से अन्यत्र जाने को कहा पर वह टस से मस नहीं हुआ।  एक दिन जब भिखारी भीख मांगने चला गया तो गुस्साये सेठ ने नौकरों से कहकर कंबल की कथरी कहीं दूर फिकवा दी।
वापस आने पर जब भिखारी को अपनी गृहस्थी  यथावत न मिली तो उसने थाने में जाकर रिपोर्ट लिखाई कि मेरी एक दरी, एक कंबल, एक तकिया एक छत्ता , एक गद्दा चोरी चला गया और मुझे अमुक सेठ पर आशंका है यह उन्हीं की कारस्तानी हो सकती है। सेठ का नाम लेने पर पहले तो थाने का मुंशी  रिपोर्ट ही नहीं लिख रहा था पर यह सोचकर कि सेठ से इसी बहाने कुछ जेब में आ सकता है उसने रिपोर्ट लिख ली। थानेदार ने छानबीन प्रारंभ की और सेठ को थाने में हाजिर होने का संदेश  भिजवाया और रिपोर्ट में दर्ज चोरी की चीजों में उन्हें संदेहास्पद होने के बारे में बतलाया। 
सेठ के थाने पहुंचने के साथ ही भिखारी भी थानेदार के समक्ष उपस्थित हुआ, चोरी की लिस्ट में वस्तुओं के नाम सुनते ही सेठ को इतना गुस्सा आया कि उसने वह कथरी जहाॅं फिकवाई थी वहाॅं से उठाकर थानेदार के सामने भिखारी के सिर पर दे मारी और कहा ‘‘ ले , तेरे बाप ने कभी गद्दे , तकिये , कंबल, दरी , रजाई देखी है? ’’

‘‘थानेदार साब ! केवल यह चिथड़ी ही इसकी है जो मेरे घर के सामने के चबूतरे पर दिनरात पड़ी रहती है।’’
भिखारी बोला, ‘‘हाॅं साब ! यही है जो मेरी लिस्ट में दी गई सभी चीजों को प्रदर्शित  करती है’’, और एक एक कर किस प्रकार वह इन वस्तुओं की तरह उसका उपयोग करता है दिखा दिया। 
अपनी कथरी को पाकर प्रसन्नता से ले जाते हुए कहता गया,  
‘‘ सेठ जी! जो प्रसन्नता और सुख आपको करोड़ों की गृहस्थी में पलंग, गद्दे और रजाई देते हैं उससे कहीं अधिक सुख मुझे अपनी इस गृहस्थी में मिलता है। अब इसे न चुराना....।’’

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