"ये लड़का कौन है सुधीर? तुम्हारे पास इसे मैंने कई बार घर पर आते देखा है?.".
"भैया! ये श्याम है, मेरी कक्षा में ही है, मजदूरी करने के कारण रेगुलर स्कूल नहीं जा पाता इसलिये बीच बीच में मेरे नोट्स लेने यहाॅं आ जाता है।"
"स्कूल में भले ही मद करो पर घर पर बुलाना और प्रश्रय देना ठीक नहीं, ये छोटे लोग आगे बड़ी समस्या बन जाते हैं।" सुधीर के बड़े भैया बोलते हुए भीतर चले गये।
कुछ दिन बाद फिर बड़े भैया ने सुधीर और श्याम को घर पर मिलते देखा, उन्होंने गुस्से में श्याम से कहा कि वह यहाॅं सुधीर से मिलने न आया करे। अब घर पर उनका मिलना बंद हो गया।
आठ साल बाद सुधीर के बड़े भैया सरकारी दौरे से लौट रहे थे कि एक गाॅंव के बीहड़ में उनकी जीप में कुछ खराबी आ गई , ड्राइवर ने अनेक प्रकार से कोशिश की पर चालू नहीं हुई और शाम से रात होने लगी ।
ड्राइवर ने कहा, साहब इसे तो धक्का देकर ही आगे के गाॅंव तक ले जाना पड़ेगा वहाॅं पर ही कोई मेकेनिक मिल सकता है। खैर, दौनों धक्का लगाते हुए आगे चलते जा रहे थे कि सामने से एक लड़का खेतों की ओर से आता दिखा, उसे बुलाने पर पता चला कि वहाॅं से एक किलोमीटर दूरी पर उसके भाई का गेरेज है वह इसे ठीक कर सकते हैं और मदद करने के लिये साथ में ही धक्का लगाने लगा। गेरेज पर पहुंचकर गाड़ी ठीक हो गई और चलते हुए सुधीर के बड़े भैया मेकेनिक को रुपये देने लगे । मेकेनिक बोला " नहीं सर ! मैं यह नहीं ले सकता।"
बड़े भैया ने पूछा "क्यों? तुमने मुझे इस विपत्ति में मदद की है ,तुम्हारे छोटे भाई ने भी सहायता की है तो तुम्हारा ही नहीं तुम्हारे छोटे भाई का भी अधिकार है इन पर, इन्हें ले लो ,ये कम हों तो बताओ?"
मेकेनिक बोला , "भाई साहब! कभी विपत्तिकाल में आपके छोटे भाई ने मेरी मदद न की होती तो शायद ही मुझे यह अवसर देखने को मिल पाता। हाॅं ,यदि हो सके तो सुधीर को मेरा नमस्कार अवश्य कह दीजिएगा....."
बड़े भैया की स्मृति में वह पुराना दृश्य जीप की तरह पूरे रस्ते में गतिमान बना रहा तथा मन में अपनी अफसरी और बड़े होने का दम्भ धीरे धीरे दृगजल में धुलता रहा।
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