Wednesday, June 17, 2020

45 ठेकेदारी प्रथा


-क्यों राधेश्याम! अपना बबलू कई दिनों से दिखा नहीं, कहीं बाहर गया है?
-हाॅं, सीताराम! उसने एक कम्पनी बनाई है उसी के काम से अनेक शहरों में जाता आता रहता है।
-कौन सी कंपनी?
-मैन पावर सपलाइंग कंपनी।
-यह क्या है?
-अरे! ये तो तुम्हें मालूम ही होगा कि आजकल का जमाना ठेके पर चल रहा है, इसलिये बबलू ने ‘मैन पावर सप्लाइंग कंपनी‘ बनाकर जिसे जितने आदमी /कार्यकर्ता चाहिये होते हैं उन्हें उस कार्य के लिये, उतने समय के लिये , उतने लोग एकमुश्त  राशि  लेकर भेज देता है यही उसकी कंपनी का कार्य है।
-पर ये आते कहाॅं से हैं?
-अरे! कहाॅं भूले हो? कम से कम दो दिन पहले आर्डर तो दो, कितने चाहिये? बेरोजगारी कितनी है? दैनिक मजदूरी पर सैकड़ों मिल जाते हैं। खेतों की जुताई कराना हो या कटाई, मकानों को बनवाना हो , चुनाव प्रचार कराना हो, नेताओं की सभाओं में भीड़ जुटाना हो, सभाओं में तालियाॅं बजवाना हो या हूट कराना हो, धरने पर बैठना हो या जुलूस मेें हो हल्ला कराना हो सब कुछ ठेके पर ही होता है। इतना ही नहीं अब तो स्कूलों / कालेजों की पढ़ाई लिखाई भी ठेके पर ही कराई जाती है, समझे?

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