कँजूस
अपने धनाढ्य मातापिता की लाड़ली राजलक्ष्मी यह जानकर खुश थी कि उसकी शादी उसके पिता से भी अधिक सम्पन्न घर में हो रही है। पर, उसको चिन्ता सताने लगी जब किसी ने बताया कि उसके होने वाले ससुर बहुत ही कन्जूस हैं। बार बार वह यह सोचती कि यहाँ तो हमें आजादी है जो भी चाहें, मँहगा या सस्ता कभी भी खरीद सकते हैं किसी को कोई हिसाब नहीं देना पड़ता पर ससुराल में क्या होगा।
ससुराल में, राजलक्ष्मी जैसी बहु को पाकर सभी बहुत खुश थे , पर राजलक्ष्मी को एक यही चिंता सता रही थी। एक दिन ससुर जी द्वारा पति से सब्जी लाने के लिए दिए गए पचास रुपयों का हिसाब पूँछते सुना तो और डर गई पर, किससे क्या कहे बड़ी ही विकट स्थिति में थी। एक दिन उसने सबेरे से ही सास और पति को बता दिया कि उसका सिर जोर से दर्द कर रहा है इसलिए कोई उससे न बोले, आराम करने पर ठीक हो जायेगा तो बता देंगे। दोपहर में ससुरजी खाना खाने आये और बहु खाना परोसने नहीं आई तो उन्होंने कारण पूछा। जब सिर दर्द होने के बारे में उन्हें पता लगा तो तत्काल नौकर को भेज कर वैद्य बुलाया और दवा दिलाई। शाम को आये तो फिर पूछा बहु की तबियत कैसी है, पता चला की कोई प्रभाव नहीं हुआ। दूसरे वैद्य को बुलाया उन्होंने दूसरी दवा दी , सवेरे फिर पूंछा, पता चला सिर दर्द और बढ़ गया।
अबकी बार ससुरजी बहु के पास गए और पूँछा कि क्या इस प्रकार का दर्द पहले भी कभी हुआ था ? वह बोली हाँ। तो उस समय कैसे दूर हुआ था? वह बोली, मेरे पिताजी ने अनवेधे मोतियों को पीस कर लगाया था।
ससुरजी गए और भीतर से एक टोकनी भर कर अनवेधे मोती लाये और सिल लोढ़ा पर रख कर पीसने लगे। राजलक्ष्मी तत्काल उठी और ससुर जी का हाथ पकड़ कर कहने लगी , रुक जाइये पिताजी, अब तो दर्द दूर हो गया। वह बोले अरे ! अभी तो जोरों का दर्द हो रहा था , मोतियों का लेप लगाया ही नहीं फिर दूर कैसे हो गया? वह बोली, मैंने आपकी कँजूसी के किस्से सुने थे इससे डर रही थी कि क्या अब मेरी स्वतन्त्र जरूरतों की पूर्ती पर पाबंदी लग जाएगी? पर अब मेरा भ्रम दूर हो गया।
उन्होंने समझाया कि लोग मेरे कंजूस होने के बहुत किस्से सुनाते हैं इससे मुझे कोई बुरा नहीं लगता । मैं तो सभी से कहता हूँ कि फिजूल खर्च कम कर एक एक पैसा भी बचाते रहना चाहिए ताकि जरूरत के समय उसे पानी की तरह बहाया जा सके। विपत्ति के समय वही काम आता है जो अपने पास होता है , दूसरों से कुछ नहीं मिलता , यदि मिलता है तो केवल कर्ज की चिंता और उपकार का बोझ।
राजलक्ष्मी उनके पैरों में गिर कर क्षमा मांगने लगी कि उसने उनके बारे में कितना गलत समझा।
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