‘‘बड़ी मुसीबत है, पैदल चलना भी मुश्किल हो गया है । रोड पर हर जगह दिनरात वाहनों की भीड़ रहती है। ’’
‘‘ सच कहा यार! फुटपाथ तो बचे ही नहीं हैं, उन पर दूकानें सजी रहती हैं या फिर अव्यवस्थित वाहन खड़े रहते हैं और रोड पर तेज गति से वाहन चलते हैं।’’
‘‘ लोगों में ‘सिविक सेंस’ बचा ही नहीं, ट्रेफिक पुलिस भी उनकी लापरवाही को अनदेखा करती है। कोई बड़ी बात नहीं है, पुलिस चाहे तो सब कुछ ठीक हो जाए।’’
पार्क में बैठे बुजर्गों के बीच चल रही इस वार्ता को सुन सामने बैठा नवयुवक पास आकर बोला,
‘‘‘‘ अंकल! मैं अभी सिलेक्ट हुआ नया पुलिस इंस्पेक्टर हॅूं, मैंने एक ओवरलोड ट्रक को पकड़ कर कानूनी कार्यवाही करना चाही, दस मिनट के भीतर ही परिवहन मंत्री ने फोन किया, इंस्पेक्टर! ट्रक को छोड़ दो ये अपने आदमी हैं। मैंने कहा,
‘‘लेकिन सर! ओवरलोड के अलावा इसमें तो कुछ संदिग्ध माल भी भरा है, बिना जाॅंच कराए छोड़ना कानून का उल्लंघन होगा, कैसे छोड़ दॅूं? ’’
‘‘ भेरी गुड, नया नया है न! तू कानून का रखवाला है और मैं कौन हॅूं जानता है? मैं हॅूं कानून का बाप, कानून बनाने वाला, मैं जो कहता हॅूं वही कानून होता है, समझा?’’
‘‘ परन्तु सर! ट्रेनिंग के बाद हमने कानून की रक्षा की शपथ ली है, क्या मैं आपके कहने पर उसे तोड़ दॅूं?’’
‘‘ कितनी बहस करता है रे! अब, तू ही निर्णय कर ले, शपथ तोड़कर ट्रक को छोड़ता है या फिर कुर्सी?’’
मैंने शपथ नहीं तोड़ी, अब मैं सस्पेंडेड हॅूं’’’’
‘‘ बेटा! यही हो रहा है, लालैसनेस बढ़ती जा रही है, जनता को कानून का पाठ पढ़ाने वाले नेता स्वयं कानून का पालन नहीं करते। अब तो लोग कहने लगे हैं कि कानून के विपरीत काम न करा पाए तो नेता काहे के?’’
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